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सूरह नह्ल १६- पारा १४


मेरी तहरीर में – - -

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी

”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,

हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,

और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह नह्ल 16

(पहली किस्त)

सच का एलान

क़ुरआन मुकम्मल दरोग़, किज़्ब, लग्व, मिथ्य, असत्य और झूट का पुलिंदा है। इसके रचनाकार दर परदा, अल्लाह बने बैठे मुहम्मद सरापा मक्र, अय्यारी, बोग्ज़, क़त्लो-गारत गरी, सियासते-ग़लीज़, दुश्मने इंसानियत और झूटे हैं. इनका तख्लीक़ कार अल्लाह इंसानों को तनुज्ज़ली के ग़ार में गिराता हुवा इनकी बिरादरी कुरैशियों पर दरूद-सलाम भिजवाता रहेगा, इनके हराम ख़ोर ओलिमा बदले में खुद भी हलुवा पूरी खाते रहेंगे और करोरों मुसलमानों को अफ़ीमी इस्लाम की नींद सुलाए रखेंगे.

मैं एक मोमिन हूँ जो कुछ लिखता हूँ सदाक़त की और ईमान की छलनी से बात को छान कर लिखता हूँ.

मैं क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा मुसम्मी (बमय अलक़ाब) ” हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी” को लेकर चल रहा हूँ जो हिंदो-पाक में अपना पहला मुक़ाम रखते हैं. मैं उनका एहसान मंद हूँ कि उनसे हमें इतनी क़ीमती धरोहर मिली. मौलाना ने बड़ी ईमान दारी के साथ अरबी तहरीर का बेऐनेही उर्दू में अक्षरक्ष: तर्जुमा किया जोकि बाद के आलिमों को खटका और उन्होंने तर्जुमें में कज अदाई करनी शुरू करदी, करते करते ‘कूकुर को धोकर बछिया’ बना दिया.

” हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी” ने इस्लामी आलिम होने के नाते यह किया है कि ब्रेकेट(मनमानी) के अन्दर अपनी बातें रख रख कर क़ुरआन की मुह्मिलात में माने भर दिए हैं, मुहम्मद की ग्रामर दुरुस्त करने की कोशिश की है, यानी तालिब इल्म अल्लाह और मुहम्मद के उस्ताद बन कर उनके कच्चे कलाम की इस्लाह की है, उनकी मुताशाइरी को शाइरी बनाने की नाकाम कोशिश की है.” हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी” ने एक और अहेम काम किया है कि रूहानियत के चले आ रहे रवायती फार्मूले और शरीयत की बारीकियों का एक चूँ चूँ का मुरब्बा बना कर नाम रखा ‘तफसीर’। जो कुछ कुरआन के तल्ख़ जुज़ थे मौलाना ने इस मुरब्बे से उसे मीठा कर दिया है. तफसीर हाशिया में लिखी है , वह भी मुख़फ़फ़फ़ यानी short form में जिसे अवाम किया ख़वास का समझना भी मोहल है.

दूसरी बात मैं यह बतला दूँ कि कुरआन के बाद इस्लाम की दूसरी बुनियाद है हदीसें. हदीसें बहुत सी लिखी गई हैं जिन पर कई बार बंदिश भी लगीं मगर ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की हदीसें मुस्तनद मानी गई हैं मैंने इनको ही अपनी तहरीर के लिए मुन्तखिब किया है। ज़ईफ़ कही जाने वाली हदीसों को छुवा भी नहीं. याद रखें कि हदीसं ही इस्लामी इतिहास की बुन्याद हैं अगर इन्हें हटा दिया जाए तो इस्लाम का कोई मुवर्रिख न मिलेगा जैसे तौरेत या इंजील के हैं क्यूं कि यह उम्मी का दीन है. ज़ाहिर है मेरी मुखालिफत में वह लोग ही आएँगे जो मुकम्मल झूट कुरआन पर ईमान रखते है और सरापा शर मुहम्मद को ”सललललाहो अलैहे वसल्लम” कहते हैं. जब कि मैं अरब की आलमी इंसानी तवारीख तौरेत Old Testament को आधा सच और आधा झूट मान कर अपनी बात पर कायम हूँ।

अब आइए मुकम्मल झूट और सरापा शर कि तरफ . . .

सूरह नह्ल १६- परा १४

”अल्लाह तअला का हुक्म पहुँच चुका है, सो तुम इस में जल्दी मत मचाओ. वह लोगों के शिर्क से पाक और बरतर है. वह फरिश्तों को वह्यी यानी अपना हुक्म भेज कर अपने बन्दों पर जिस पर चाहे नाज़िल फ़रमाते हैं कि ख़बरदार कर दो कि मेरे सिवा कोई लायक़े इबादत नहीं है सो मुझ से डरते रहो. आसमान को ज़मीन को हिकमत से बनाया. वह उनके शिर्क से पाक है. इन्सान को नुतफ़े से बनाया फिर वह यकायक झगड़ने लगा. उसने चौपाए को बनाया, उनमें तुम्हारे जाड़े का सामान है और बहुत से फ़ायदे हैं और उन में से खाते भी हो. और उनकी वजेह से तुम्हारी रौनक़ भी है जब कि शाम के वक़्त लाते हो और जब कि सुब्ह के वक़्त छोड़ देते हो. और वह तुम्हारे बोझ भी ऐसे शहर को ले जाते हैं जहाँ तुम बगैर जान को मेहनत में डाले हुए नहीं पहुँच सकते थे. वाक़ई तुम्हारा रब बड़ी शफ़क़त वाला और रहमत वाला है. और घोड़े और खच्चर और गधे भी पैदा किए ताकि तुम उस पर सवार हो और ज़ीनत के लिए भी.”

सूरह नह्ल १६- आयत (१-८)

यह कुर आन की आठ आयतें हैं. मुताराज्जिम ने अल्लाह की मदद के लिए काफी रफुगरी की है मगर मुहम्माग के फटे में पेवंद तो नहीं लगा सकता.

१-अल्लाह तअला का हुक्म पहुँच चुका है . . . तो कहाँ अटका है?

२-सो तुम इस में जल्दी मत मचाओ – - – किसको जल्दी थी, सब तुमको पागल दीवाना समझते थे.

३-वह लोगों के शिर्क से पाक और बरतर है. . .क्या है ये शिर्क? अल्लाह के साथ किसी दुसरे को शरीक करना, न ? फिर तुम क्यूं शरीक हुए फिरते हो.

४- अल्लाह को तुम जैसा फटीचर बन्दा ही मिला था कि तुम पर हुक्मरानी नाज़िल कर दिया.

५-सो मुझ से डरते रहो – - – आख़िर अल्लाह खुद से बन्दों का डरता क्यूं है?

६-अल्लाह इन्सान को कभी नुतफ़े से बनता है, कभी बजने वाली मिटटी से, कभी, उछलते हुए पानी से तो कभी खून के लोथड़े से? तुम्हारा अल्लाह है या चुगद?

७- इन्सान को अगर अल्लाह नेक नियती से बनता तो झगडे की नौबत ही न आती.

८- अब इंसान को छोड़ा तो चौपाए खाने पर आ गए, उनकी सिफ़तें गिनाते है जिस पर अलिमान दीन किताबों के ढेर लगाए हुए हैं, न उन पर रिसर्च, न उनकी नस्ल अफ़ज़ाइश पर काम, न उनका तहफ़फ़ुज़ बल्कि उनका शिकार और उन पर ज़ुल्म देखे जा सकते हैं।

” और वह ऐसा है कि उसने दरया को मुसख़ख़िर (प्रवाहित) किया ताकि उस में से ताजः ताजः गोश्त खाओ और उसमें से गहना निकालो जिसको तुम पहेनते हो. और तू कश्तियों को देखता है कि वह पानी को चीरती हुई चलती हैं और ताकि तुम इसकी रोज़ी तलाश करो और ताकि तुम शुक्र करो. और उसने ज़मीन पर पहाड़ रख दिए ताकि वह तुम को लेकर डगमगाने न लगे. और उसने नहरें और रास्ते बनाए ताकि तुम मंजिले मक़सूद तक पहुँच सको . . . और जो लोग अल्लाह को छोड़ कर इबादत करते हैं वह किसी चीज़ को पैदा नहीं कर सकते और वह ख़ुद ही मख्लूक़ हैं, मुर्दे हैं, जिंदा नहीं और इस की खबर नहीं कि कब उठाए जाएँगे.

सूरह नह्ल १६- आयत (१४-२१)

बगैर तर्जुमा निगारों के सजाए यह कुरआन की उरयाँ इबारत है. मुहम्मद बन्दों को कभी तू कहते हैं कभी तुम, ऐसे ही अल्लाह को. कभी ख़ुद अल्लाह बन कर बात करने लगते हैं तो कभी मुहम्मद बन कर अल्लाह की सिफ़तें बयान करते हैं. कहते हैं ”वह पानी को चीरती हुई चलती हैं और ताकि तुम इसकी रोज़ी तलाश करो और ताकि तुम शुक्र करो” अगर ओलिमा उनकी रोज़े अव्वल से मदद गार न होते तो कुरआन की हालत ठीक ऐसी ही होती ”कहा उनका वो अपने आप समझें या खुदा समझे.” कठ मुल्ले नादार मुसलमानों को चौदा सौ सालों से ये बतला कर ठग रहे है कि अल्लाह ने ”ज़मीन पर पहाड़ रख दिए ताकि वह तुम को लेकर डगमगाने न लगे.” मुहम्मद इंसान के बनाए नहरें और रास्ते को भी अल्लाह की तामीर गर्दान्ते हैं. भूल जाते हैं कि इन्सान रास्ता भूल कर भटक भी जाता है मगर कहते हैं ” ताकि तुम मंजिले मक़सूद तक पहुँच सको” मख्लूक़ को मुर्दा कहते हैं, फिर उनको मौत से बे खबर बतलाते हैं. ”वह ख़ुद ही मख्लूक़ हैं, मुर्दे हैं, जिंदा नहीं और इस की खबर नहीं कि कब उठाए जाएँगे”

मुसलामानों की अक्ल उनके अकीदे के आगे खड़ी ज़िन्दगी की भीख माँग रही है मगर अंधी अकीदत अंधे कानून से ज़्यादा अंधी होती है उसको तो मौत ही जगा सकती है, मगर मुसलमानों! तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. जागो.

मुहम्मद जब अपना कुरआन लोगों के सामने रखते, लेहाज़न लोग सुन भी लेते, तो बगैर लिहाज़ के कह देते ” क्या रक्खा है इन बातों में ? सब सुने सुनाए क़िस्से हैं जिनकी कोई सनद नहीं” ऐसे लोगों को मुहम्मद मुनकिर (यानी इंकार करने वाला) कहते हैं और उन्हें वह क़यामत के दिन से भयभीत करते हैं. एक ख़ाका भी खीचते हैं क़यामत के दिन का कि काफ़िरो-मुनकिर को किस तरह अल्लाह जहन्नम रसीदा करता है और ईमान लाने वालों को किस एहतेमाम से जन्नत में दाखिल करता है. काफिरों मुशरिकों के लिए . . .

” सो जहन्नम के दवाज़े में दाखिल हो जाओ, इसमें हमेशा हमेशा को रहो, ग़रज़ तकब्बुर करने वालों का बुरा ठिकाना है.” और मुस्लिमों के लिए ”फ़रिश्ते कहते हैं . . .अस्सलाम अलैकुम! तुम जन्नत में चले जाना अपने आमाल के सबब.”

सूरह नह्ल १६- आयत (२२-३४)

इतना रोचक प्लाट, और इतनी फूहड़ ड्रामा निगारी.

मुशरिकीन ऐन मुहम्मद का कौल दोहराते हुए पूछते हैं

”अगर अल्लाह तअला को मंज़ूर होता तो उसके सिवा किसी चीज़ की न हम इबादत करते और न हमारे बाप दादा और न हम बगैर उसके हुक्म के किसी चीज़ को हराम कह सकते” इस पर मुहम्मद कोई माक़ूल जवाब न देकर उनको गुमराह लोग कहते हैं और बातें बनाते हैं कि माज़ी में भी ऐसी ही बातें हुई हैं कि पैगम्बर झुटलाए गए हैं . . . जैसी बातें करने लगे.

सूरह नह्ल १६- आयत (35-३७)

”और लोग बड़े ज़ोर लगा लगा कर अल्लाह कि क़समें खाते हैं कि जो मर जाता है अल्लाह उसको जिंदा न करेगा, क्यों नहीं? इस वादे को तो उस ने अपने ऊपर लाज़िम कर रक्खा है, लेकिन अक्सर लोग यक़ीन नहीं करते. . . . हम जिस चीज़ को चाहते हैं, पस इस से हमारा इतना ही कहना होता है कि तू हो जा, पस वह हो जाती है.”

सूरह नह्ल १६- आयत (३८+४०)

यह सूरह मक्का की है जब मुहम्मद खुद राह चलते लोगों से क़समें खा खा कर और बड़े ज़ोर लगा लगा कर लोगों को इस बात का यक़ीन दिलाते कि तुम मरने के बाद दोबारा क़यामत के दिन ज़िन्दा किए जाओगे और लोग इनका मज़ाक उड़ा कर आगे बढ़ जाते. मुहम्मद ने अल्लाह को कारसाज़े-कायनात से एक ज़िम्मेदार मुलाज़िम बना दिया है. उनका अल्लाह इतनी आसानी से जिस काम को चाहता है इशारे से कर सकता है तो अपने प्यारे नबी को क्यूँ अज़ाब में मुब्तिला किए हुए है कि लोगों को इस्लाम पर ईमान लाने के लिए जेहाद करने का हुक्म देता है? यह बात तमाम दुन्या के समझ में आती है मगर नहीं आती तो ज़ीशान और आलीशानों के।

”४१ से ५५” आयत तक मुहम्मद ने अपने दीवान में मोहमिल बका है जिसको ज़िक्र करना भी मुहाल है। उसके बाद कहते हैं

”और ये लोग हमारी दी हुई चीज़ों में से उन का हिस्सा लगते हैं जिन के मुताललिक़ इन को इल्म भी नहीं. क़सम है ख़ुदा की तुम्हारी इन इफतरा परदाज़यों की पूछ ताछ ज़रूर होगी.

सूरह नह्ल १६- आयत (५६)

मुहम्मद ज़मीन पर पूजे जाने वाले बुत लात, मनात, उज़ज़ा वगैरा पर चढ़ाए जाने वाले चढ़ावे को देख कर ललचा रहे हैं कि एक हवा का बुत बना कर सब का बंटा धार किया जा सकता है और इन चढ़ावों पर उनका क़ब्ज़ा हो सकता है, वह अपने इस मंसूबे में कामयाब भी हैं.एक अल्लाह ए वाहिद का दबदबा भी क़ायम हो गया है और इन्सान तो पैदायशी मुशरिक है, सो वह बना हुवा है. मुस्लमान आज भी पीरों के मज़ारों के पुजारी हैं,मगर हिदू बालाजी और तिरुपति मंदिरों के श्रधालुओं का मज़ाक उड़ाते हुए.

”और अल्लाह के लिए बेटियां तजवीज़ करते हैं सुबहान अल्लाह!और अपने लिए चहीती चीजें.”

सूरह नह्ल १६- आयत (५७)

मुहम्मद भटक कर गालिबन ईसाई अकीदत पर आ गए हैं जो कि खुदा के मासूम फरिश्तों को मर्द और औरत से बाला तर समझते हैं. उनके आकृति में पर, पिश्तान, लिंग आदि होते हैं मगर पवित्र आकर्षण के साथ. मुहम्मद को वह लडकियाँ लगती हैं, वह मानते हैं कि ऐसा ईसाइयों ने खुदा के लिए चुना. और कहते है खुद अपना लिए चाहीती चीज़ यानि बेटा.मूर्ति पूजकों के साथ साथ ये मुहम्मद का ईसाइयों पर भी हमला है.

”और जब इन में से किसी को औरत की ख़बर दी जाए तो सारे दिन उस का चेहरा बे रौनक रहे और वह दिल ही दिल में घुटता रहे, जिस चीज़ की उसको खबर दी गई है । इसकी आर से लोगों से छुपा छुपा फिरे कि क्या इसे ज़िल्लत पर लिए रहे या उसको मिटटी में गाड़ दे. खूब सुन लो उन की ये तजवीज़ बहुत बुरी है.”

सूरह नह्ल १६- आयत (५८-५९)

मुल्लाओं की उड़ाई हुई झूटी हवा है कि रसूल को बेटियों से ज़्यादः प्यार हुवा करता था. यह आयत कह रही है कि वह बेटी पैदा होने को औरत की पैदा होने की खबर कहते हैं. बेशक उस वक़्त क़बीलाई दस्तूर में अपनी औलाद को मार देना कोई जुर्म न था बेटी हो या बेटा. आज भी भ्रूण हत्या हो रही है. मुहम्मद से पहले अरब में औरतों को इतनी आज़ादी थी कि आज भी जितना मुहज्ज़ब दुन्या को मयस्सर नहीं. इस मौज़ू पर फिर कभी.

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान

सूरह नह्ल 16(तीसरी किस्त)


मेरी तहरीर में – - -

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी

”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,

हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,

और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह नह्ल 16

(तीसरी किस्त)

आजकल मुसलमानों में इस बात की खुमारी रहती है कि उनके इस्लाम को बड़ी तादाद में गैर मुस्लिम क़ुबूल कर रहे हैं, वह भी पढ़े लिखे प्रोफ़ेसर लेविल के लोग. है भी हैरत की बात कि गीता और वैद जैसी कीमती किताबों को ठुकरा कर कुरान जैसी अहमकाना दलील रखने वाली किताब पर ईमान लाते हैं. यह लोग आखिर कुरआन में क्या पाते हैं?

यह लोग इस्लामी चेहरा मोहरा और लबो-लहजा अपना कर उनकी तहरीक का एक हिस्सा बन जाते हैं. मज़े की बात यह है कि यह लोग इस्लामी तालीम खुद मुसलमानों से उनके साथ रह के लेते है, ऐसे लोग जब इस्लामी तहरीक, तक़रीर और तदबीर में शामिल हो जाते हैं तो मुसलमान फूले नहीं समाते. मुसलमानों को अपने ऊपर कभी भी भरोसा नहीं रहता, बल्कि अपने अल्लाह के भरोसे रहते हैं, या फिर इस किस्म के दूसरों पर ज्यादह भरोसा होता है, वह सुबूत में ऐसे गैर मुस्लिम का नाम पेश कर देते हैं कि उस दानिश वर ने इस्लाम कुबूल किया तो इस्लाम में ज़रूर कोई बात होगी. उसकी लिखी हुई किताब पढो और इस्लाम को समझो.

उनके पास ऐसे दानिशवरों कि लिस्ट मौजूद होती है जिन्हों ने इस्लाम को अपनाया.

मैं ऐसी किताबों का मुतालिया करता हूँ ? क्या इतना पढ़ा लिखा आदमी इस क़दर गिर सकता है कि मुहम्मद जो मुजरिमे-इंसानियत है, “को सल्लललाहो अलैहेवसल्लम” कहे? ख़याली इस्लामी अल्लाह, उसके कल्पित जन्नत और दोज़ख और रूस्वाए- ज़माना कुरान को महिमा मंडित करे?

मैं ऐसे किसी शख्स को रू बरु देखना चाहता था.एक रोज़ मेरे एक रिश्ते दार ने ऐसे एक प्रोफ़ेसर को मेरे रूबरू कर दिया. उन से मिलकर और उनसे बात करके सारा राज़ खुला कि कट्टर और सज़िशी हिन्दू तंजीमो के इशारे पर यह लोग अपने जीवन की आहूतियाँ देते है और इस्लाम कुबूल करने का नाटक करते हैं. इनको हिदायत होती है कि मुसलामानों को जिहालत में मुब्तिला रक्खो ताकि यह हमारे मुकाबिले में किसी भी मैदाने-इल्म में न आ सकें.

इनको हिदू तंजीमें अच्छी नौकरियां दिलाती हैं और खुद ऐसे लोगों के लिए खुफिया माली फायदे और तहफ्फुज़ देती हैं.

”और वह लोग खुदा के नेमत को पहचानते हैं, फिर इसके मुनकिर होते हैं, और ज्यादह तर इनमें न सिपास हैं.”

सूरह नह्ल पर१४ आयत (८३)

मुहम्मद क़ुदरत की नेमतों को तस्लीम कराते हैं, फिर कहते हैं कि इन्हीं के खालिक अल्लाह का कलाम हम तुम लोगों को सुनते हैं, उसी ने मुझे अपना रसूल बना कर तुम सब पर नाज़िल किया है, इस बात को लेकर लोग उखड जाते हैं तो मुहम्मद उन लोगों को एहसान फ़रामोश कहते हैं, अल्लाह की बख्शीश का. देखिए कि दूर की कौड़ी, दिमागी तिकड़म, अल्लाह बन जाने की दौड़ में बन्दा हक़ीर.

मुहम्मदी अल्लाह क़यामती पंचायत क़ायम करता है जिसमें वह खुद और उसके नबी हाकिम और गवाह होते हैं, काफ़िर मुद्दई बन कर मुक़दमा दायर करता है, बेढब अल्लाह उन की सजा बढ़ा देता है, ऐसा बार बार मुहम्मद अपने क़ुरआनी बकवास में दोहराते हैं.

सूरह नह्ल पर१४ आयत (८४-९०)

”और तुम लोग उस औरत के मुशाबह मत बनो जिसने अपना सूत काते, पीछे बोटी बोटी करके नोच डाला। । . . और अल्लाह तअला को अगर मंज़ूर होता तो वह सब को एक तरह का ही बना देते लेकिन जिस को चाहते हैं बे राह कर देते हैं और जिसको चाहते हैं राह पर डाल देते हैं और तुम से तुम्हारे आमाल कीबाज़पुर्स ज़रूर होगी.”

सूरह नह्ल पर१४ आयत (९१-९३)

अल्लाह अपने बन्दों को उन पागल अपनी बंदियों की तरह बनने को मना करता है जिनको काते हुए सूत को बोटियों की तरह नोचने वाला बना रक्खा है. वह भी अल्लाह की बनाई हुई हैं मगर उन जैसा ना बनना, वह तो नमूना है कि कहीं उनकी तरह ना बन जाओ. हालांकि ”अल्लाह तअला को अगर मंज़ूर होता तो वह सब को एक तरह का ही बना देते” मगर उनको दोज़ख और जन्नत का तमाशा जो देखना था, तभी तो ”जिसको चाहते हैं राह पर डाल देते हैं” और ”जिस को चाहते हैं बे राह कर देते हैं” अब भला बतलाइए कि इन्सान के बस में क्या राह गया है? सिवाए अल्लाह के मर्ज़ी के. या आलावा मुहम्मद के गुलामी के.

मुसलमानों कैसे तुमको समझया जाए कि तुम्हारा अल्लाह एक फ्राड है, तुम्हारा रसूल महा फ्राड।

”तो जब आप कुरआन पढना चाहें तो शैतान मरदूद से अल्लाह की पनाह मांग लिया करें यकीनन इसका काबू उन लोगों पर नहीं चलता जो इमान रखते हैं और अपने रब पर भरोसा रखते हैं.

सूरह नह्ल पर१४ आयत (९८-९९)

यानी शैतान इंसानी दिमाग पर इतना ग़ालिब रहता है कि अल्लाह भी इस का क़ायल है. इसके गलबा से महफूज़ रहने के लिए अल्लाह की पनाह मांगी जाय. ज़ालिम है ही ऐसी चीज़, लाख दे पनाह अल्लाह, चंद लम्हों में अंगड़ाई लेती हुई महबूबा की शक्ल में शैतान आँखों के सामने आया कि अल्लाह फुर्र. बेकारों के लिए ज़रीआ मुआश खुदा है, कुरआन नहीं, साइंस दानों के लिए उक्दा कुशाई मंजिले मक़सूद है कुरआन नहीं, मुहम्मद की रची हुई कुरआन नक़ायस इंसानी क्या, बल्कि नक़ायस ए मखलूकात का दर्जा रखती है.

”और जब हम किसी आयत को बजाए दूसरी आयत के बदलते हैं और हालांकि अल्लाह तअला जो हुक्म देता है, इसको वही खूब जनता है तो यह लोग कहते हैं कि आप इफतरा करने वाले हैं बल्कि इन्हीं में से कुछ लोग जाहिल हैं. आप फरमा दीजिए कि इसको रूहुल क़ुद्स, आप के रब की तरफ़ से हिकमत के मुवाफ़िक़ लाए हैं ताकि ईमान वालों को साबित क़दम रखें और मुसलमानों के लिए खुश खबरी हो जाए. और हम को मालूम है कि लोग कहते हैं इनको तो आदमी सिखला जाता है. जिस शख्स की तरफ़ यह निसबत करते हैं उसकी ज़ुबान तो अजमी है और यह कुरआनसाफ़ अरबी में है.”

सूरह नह्ल पर१४ आयत (१०१-१०३)

इंसानों पर बहुत ही गराँ वक़्त था क्या हिंदी क्या अरबी। मुहम्मद के गिर्द निहायत लाखैरे क़िस्म के लोग रहा करते थे, उस वक़्त पेट भर जाने का मसअला ही बहुत बड़ा था, उनमे अरबी अजमी, ईसाई ,यहूदी और काफिरों-मुशरिक सभी नज़र्यात की टोली मुहम्मद के समर्थकों में थी। ऐसे में वह लोग मुहम्मद की मदद करते क़ुरआनी आयतों में , कभी कोई ग़लत आयत मुहम्मद के मुँह से बहैसियत क़ुरआनी आयत निकल जाती और उसके जानकर शोर मचाते तो उसको वापस लेना पड़ता तब अवाम तअना देती कि क्या अल्लाह भी ग़लती करता है? तब मुहम्मद बड़ी बे शर्मी के साथ मुकाबिला करते.

द्ल्लाम नाम के एक ईसाई की उस वक़्त बड़ी चर्चा थी कि वह मुहम्मद का क़ुरआनी रहबर है. यह आयत उसी के संदर्भ में है.

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान

सूरह नह्ल 16


मेरी तहरीर में – - -

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी

”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,

हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,

और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह नह्ल 16

(दूसरी किस्त)

सूरतें क्या खाक में होंगी ?

मुहम्मद ने कुरआन में कुदरत की बख्शी हुई नेमतों का जिस बेढंगे पन से बयान किया है, उसका मज़ाक़ ही बनता है न कि कोई असर ज़हनों पर ग़ालिब होता हो. बे शुमार बार कहा होगा- – -

”मफ़िस समावते वमा फ़िल अरज़े” यानी आसमानों को( अनेक कहा है ) और ज़मीन (को केवल एक कहा है ). जब कि आसमान ,कायनात न ख़त्म होने वाला एक है और उसमें ज़मीने, बे शुमार हैं.

वह बतलाते हैं पहाड़ों को ज़मीन पर इस लिए ठोंक दिया कि तुम को लेकर ज़मीन डगमगा न पाए.

परिंदों के पेट से निकले हुए अंडे को बेजान बतलाते है और अल्लाह की शान कि उस बेजान से जान दार परिन्द निकल देता है.

ज़मीन पर रस्ते और नहरें भी अल्लाह की तामीर बतलाते हैं. कश्ती और लिबासों को भी अल्लाह की दस्त कारी गर्दानते है.

मुल्लाजी कहते हैं अल्लाह अगर अक्ल ही देता तो दस्तकारी कहाँ से आती? मुहम्मद के अन्दर मुफक्किरी या पयंबरी फ़िक्र तो छू तक नहीं गई थी कि जिसे हिकमत, मन्तिक़ या साइंस कहा जाए.

ज़मीन कब वजूद में आई?

कैसे इरतेकाई सूरतें इसको आज की शक्ल में लाईं, इन को इससे कोई लेना देना नहीं, बस अल्लाह ने इतना कहा” कुन”, यानी होजा और ”फयाकून” हो गई.

जब तक मुसलमान इस कबीलाई आसन पसंदी को ढोता रहेगा, वक़्त इसको पीछे करता जाएगा. जब तक मुसलमान मुसलमान रहेगा उसे यह कबीलाई आसन पसंदी ढोना ही पड़ेगा, जो कुरआन उसको बतलाता है. मुसलमानों के लिए ज़रूरी हो गया है कि वह इसे अपने सर से उठा कर दूर फेंके और खुल कर मैदान में आए.

देखिए कि ब्रिज नारायण चकबस्त ने दो लाइनों में पूरी मेडिकल साइंस समो दिया है।

ज़िन्दगी क्या है? अनासिर में ज़हूरे तरतीब,

मौत क्या है? इन्ही अजजा का परीशां होना।

कुरआन की सारी हिकमत, हिमाक़त के कूड़े दान में डाल देने की ज़रुरत है अगर ग़ालिब का यह शेर मुहम्मद की फ़िक्र को मयस्सर होता तो शायद कुरानी हिमाक़त का वजूद ही नहोता – - -

सब कहाँ कुछ लाला ओ गुल में नुमायाँ हो गईं,

सूरतें क्या खाक में होंगी जो पिन्हाँ हो गईं”

देखिए कि मुहम्मदी हिमाक़तें क्या क्या गुल खिलाती हैं – - -

”बखुदा आप से पहले जो उममतें हो गुजरी हैं, उनके पास भी हमने भेजा था (?) सो उनको भी शैतान ने उनके आमाल ए मुस्तहसिन करके दिखलाए, पस वह आज उन का रफ़ीक था और उनके वास्ते दर्द नाक सज़ा है.”

सूरह नह्ल पर१४ आयत (६३)

मुहम्मद का एलान कि कुरआन अल्लाह का कलाम है मगर आदतन उसके मुँह से भी “बखुदा” निकलता है। “जो उम्मतें हो गुज़री हैं, उनके पास भी हमने भेजा था (?)”

क्या भेजा था?

” गोया मतलब शेर का बर बतने-शायर रह गया”

मूतराज्जिम मुहम्मद का मददगार बन कर ब्रेकेट में (रसूलों को) लिख देता है। यह कुरआन का ख़ासा है.

”और हम ने आप पर यह किताब सिर्फ इस लिए नाज़िल की है कि जिन उमूर पर लोग इख्तेलाफ़ कर रहे हैं, आप लोगों पर इसे ज़ाहिर फ़रमा दें और ईमान वालों को हिदायत और रहमत की ग़रज़ से. और तुम्हारे लिए मवेशी भी गौर दरकार हैं, इन के पेट में जो गोबर और खून है, इस के दरमियान में से साफ़ और आसानी से उतरने वाला दूध हम तुम को पीने को देते हैं. और खजूर और अंगूरों के फलों से तुम लोग नशे की चीज़ और उम्दा खाने चीज़ें बनाते हो. बे शक इसमें समझने के लिए काफी दलीलें हैं जो अक्ल रखते हैं.”

सूरह नह्ल पर१४ आयत (६४-६७)

कठ मुल्ले ने गोबर, खून और दूध का अपने मंतिक बयानी से कैसा गुड गोबर किया है.

”और आप के रब ने शाहेद की मक्खी के जी में यह बात डाली कि तू पहाड़ में घर बनाए और दरख्तों में और जो लोग इमारते बनाते हैं इनमें, फिर हर किस्म के फलों को चूसती फिर, फिर अपने रब के रास्तों पर चल जो आसन है. उसके पेट में से पीने की एक चीज़ निकलती है, जिस की रंगतें मुख्तलिफ होती हैं कि इन में लोगों के लिए शिफ़ा है. इस में इन लोगों के लिए बड़ी दलील है जो सोचते हैं.”

सूरह नह्ल पर१४ आयत (६८-६९)

मुहम्मद का मुशाहिदा शाहेद की मक्खियों पर कि जिनको इतना भी पता नहीं की मक्खियाँ फलों का नहीं फूलों का रस चूसती हैं। रब का कौन सा रास्ता है जिन पर हैवान मक्खियाँ चलती हैं? या अल्लाह कहाँ मक्खियों के रास्तों पर हज़ारों मील योमिया मंडलाया करता है? मगर तफ़सीर निगार कोई न कोई मंतिक गढ़े होगा.

”और अल्लाह तअला ने तुम को पैदा किया, फिर तुम्हारी जान कब्ज़ करता है और बअज़े तुम में वह हैं जो नाकारा उम्र तक पहंचाए जाते हैं कि एक चीज़ से बा ख़बर होकर फिर बे ख़बर हो जाता है . . . और अल्लाह तअला ने तुम में बअज़ों को बअज़ों पर रिज्क़ में फ़ज़ीलत दी है, वह अपने हिस्से का मॉल गुलामों को इस तरह कभी देने वाले नहीं कि वह सब इस पर बराबर हो जावें. क्या फिर भी खुदाए तअला की नेमत का इंकार करते हो. और अल्लाह तअला ने तुम ही में से तुम्हारे लिए बीवियाँ बनाईं और बीवियों में से तुम्हारे लिए बेटे और पोते पैदा किए और तुम को अच्छी चीज़ें खाने कोदीं, क्या फिर भी बे बुन्याद चीजों पर ईमान रखेंगे . . .

सूरह नह्ल पर१४ आयत (७०-७२)

न मुहम्मद कोई बुन्याद कायम कर पा रहे हैं और न मुखालिफ़ को बे बुन्याद साबित कर पा रहे हैं। बुत परस्त भी बुतों को तवस्सुत मानते थे, न कि अल्लाह. तवस्सुत का रुतबा छीन लिया बड़े तवस्सुत बन कर खुद मुहम्मद ने. मुजरिम बेजान बुत कहाँ ठहरे? मुजरिम तो गुनेह्गर मुहम्मद साबित हो रहे हैं जिन्हों ने आज तक करोरो इंसानी जिंदगियाँ वक़्त से पहले खत्म कर दीं. अफ़सोस कि करोरो जिंदगियां दाँव पर लगी हुई हैं।

”और अल्लाह तअला ने तुम को तुम्हारी माओं के पेट से इस हालत में निकाला कि तुम कुछ भी न जानते थे और इसने तुम को कान दिए और आँख और दिल ताकि तुम शुक्र करो. क्या लोगों ने परिंदों को नहीं देखा कि आसमान के मैदान में तैर रहे हैं, इनको कोई नहीं थामता. बजुज़ अल्लाह के, इस में ईमान वालों के लिए कुछ दलीलें हैं. और अल्लाह तअला ने तुम्हारे लिए जानवरों के खाल के घर बनाए जिन को तुम अपने कूच के दिन हल्का फुल्का पाते हो और उनके उन,बल और रोएँ से घर की चीज़ें बनाईं . . . और मखलूक के साए . . . पहाड़ों की पनाहें . . . ठन्डे कुरते . . . और जंगी कुरते बनाए ताकि तुम फरमा बरदार रहो. फिर भी अगर यह लोग एतराज़ करें तो आप का ज़िम्मा है साफ़ साफ़ पहुंचा देना.

सूरह नह्ल पर१४ आयत (७८-८२)

यह है कुरानी हकीकत किसी पढ़े लिखे गैर मुस्लिम के सामने दावते-इस्लाम के तौर पर ये आयतें पेश करके देखिए तो वह कुछ सवाल उल्टा आप से खुद करेगा . . .

१-अल्लाह ने कान दिए और आँख और दिल – - – सुनने, देखने और एहसास करने के लिए दिए हैं कि शुक्र अदा करने के लिए?

२- और अब हवाई जहाज़, रॉकेट और मिसाइलें कौन थामता है? ईमान वालों के पस अक़ले-सलीम है?

३-अब हम जानवरों की खाल नहीं बुलेट प्रूफ़ जैकेट पहेनते हैं उन,बाल और रोएँ का ज़माना लद गया, हम पोलोथिन युग में जी रहे हैं, तुम भी छोड़ो, इस बाल की खाल में जीना और मरना. जो कुछ है बस इसीदुन्या में और इसी जिंदगी में है.

४-हम बड़े बड़े टावर बना रहे हैं और मुस्लमान अभी भी पहाड़ों में रहने की बैटन को पढ़ रहा है? और पढ़ा रहा है?

५-बड़े बड़े साइंसदानों का शुक्र गुज़र होने के बजाय इन फटीचर सी बातों पर ईमान लाने की बातें कर रहे हो.

६- तुम्हारे इस उम्मी रसूल पर जो बात भी सलीके से नहीं कर पता? तायफ़ के हाकिम ने इस से बात करने के बाद ठीक ही पूछा था ” क्या अल्लाह को मक्का में कोई ढंग का पढ़ा लिखा शख्स नहीं मिला था जो तुम जैसे जाहिल को पैग़म्बरबना दिया।”

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान

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