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ॐ नमो: नारायण:

मेरा मकसद है लोगो के बिच इस्लाम और कुरान के लिए ग़लतफ़हमी दूर करना..

कृपया इस ब्लॉग पर आने वाले सभी आगुन्तको से अनुरोध, इस ब्लॉग पर दिए गये सभी पोस्ट सत्य है और ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, पर इस ब्लॉग का उद्देश्य किसी की भावनाओ को ठेस न पंहुचा कर अपितु सत्य को उजागर करना है अत: किसी भी परकार की दुर्भावना को मन में न रख कर केवल ब्लॉग को पढ़े अगर किसी पोस्ट पर आपत्ति है या पोस्ट के गलत होने का प्रमाण है तो इस पेज आप आपत्ति व्यक्त कर सकते है,

परन्तु बिना प्रमाण के कृपया अपना समय नष्ट न करे और न ही सत्य को असत्य सिद्ध करने का प्रयत्न करे|

में सभी को दिखाना चाहता हू की जो कुरान में है वो असलियत में क्या है और उसे क्या दिखा कर दुनिया और मुसलमानों को भ्रमित किया जाता है.. इस ब्लॉग के जरिये मैं इस्लाम और कुरान के हर एक रायसे क पर्दाफाश करके उसे बेनकाब करूँगा..

आज पूरी दुनिया में इस्लाम के नाम पर आतंक मचाया जा रहा है कुछ लोग कहते है की मुसलमानों को बहकाया जाता है उनके साथ ज़बरदस्ती होती है.. आदि तरह तरह की बाते. पर मैं दिखाऊंगा की क्यों एक मुसलमान ऐसा करता है.. क्या है इस्लाम का असली मकसद और क्यों इस्लाम आज शैतानी मजहब बन गया है..

आप हमसे संपर्क भी कर सकते है, केवल अपना नाम और अन्य जानकारी इस फॉर्म के द्वारा हमे भेजे,

19 thoughts on “Contact Us”

  1. feedback@gmail.com said:

  2. yaisa kuchh nahi hai yah kuchh hindu ko ki kuchh nahi jante hai bas kuchh galat arth ko sahi karne me lage huwe hai

  3. aap sai baba ke bare jante kitna hai ? kya aap jo keh rahe is ko sach sabbit kar sakte hai ?

  4. jo bhi he tu blog likhne vala kya janta he islam ke bare me jis bhi dharm ka he tu pahale apne darm me galtiyan nikal fir dusron ke bare me sochana

  5. Jab Tak Musalmano ko jihad mein Marne par Muhhamad ki 72 huron aur jinda rahte hue countless rapes karne ki azadi ka LALACH ankhon ke samne rahega tab ek bhi Musalman insaan nahi banega na hi kisi aur ki sach baat ko sunega.
    Infect Muslims are under deep trouble if some muslims try to make themselves good he can’t as mohhamad know that one day every jihadi will remember his sins and will try to come on right path so he make Islam one way traffic like in war you can’t back otherwise you will be killed by your own friends.
    but i am too surprise as now even literate muslims are believing an illiterate mohammad without investigation or applying their mind.this is very shamefull.

  6. People like u should be ashamed on your self…
    Hindi to badi acchi likhi hai aapne par Humare Hindu Religion me koi kisi bhi bhagwan ko maan sakta hai.
    Bhagwan sab ek hain chahe Allah kaho, Ram kaho, jesus kaho ya Buddha.
    humare dharm me apne Gujar chuke Dada Dadi ki bhi pooja karni sikhayi jati hai to kya hum unhe na pooje..

    aapke jaise kattarpanti log jo samaaj me arajakta failate hain..
    Bhai bhai me aag laga ke maje lete hain.
    dukh ki baat hai ki aap jaise log Muslims me jyada hai isliye wo log jyada kattar ho gaye hain.

    ab hinduo me aap jaiso ki koi jarurat nai hain hum Patthar ko bhi Poojte hai wo bhi puri aasatha ke sath Sri Sai to fir bhi bahut bade hain..

    Mujhe pata hai ki meri baate padke aapko akal nai aaayegi..
    isilye apke liye dua karunga ki bhagwaan aapko sadbuddhi de aur aise Chutiyapa fir na kare..

    • Mr sharm aapko aani chahiye. aap hame dharm ka gyaan na de to behetar hai kyuki dharm ke bare me hum aapse zada jante hai.
      aagar dharm ki baat ki hai to hamare dharm me ye bhi kaha hai ki aagar aapke dharm ya priyajano pe koi aaghat kare to aapko ladhna hai.

      aapki tarah bhai bhai ki basuri nahi bajate rehte hai.
      aur hum jaise kattarpanti logo ki wajah se hi aap aur aapki mataye behene aaj bhi hindu hai nahi to kab ka unka musalmano ne dharm parivartan kara diya hota.aur kisi musalaman ke ghar ki shobha badha rahi hoti aur gai ka meat paka rahi hoti.

      aur muslims sirf samne hi bhai bhai ka gana gate hai lekin aasalme wo aapko bhai nahi mante kyuki islam unhe aisa karne ke liye kehta hai.

      aap islam aur muhammad ko izzat dena chate hai to jake padho islam ke hisab se non muslim auraton ko loundi(slave) banana sahi hai.. noon muslim aurato to kidnap karke zabaran dharm badalwana sahi hai aur unki shadi zabardasti kisi musalaman se karna bhi sahi hai. jake google me :love jihad” search karo.
      ye sare kaam pakistan me roozkiye jate hai.
      aur bharatme to chipchip ke kiye jate hai kyuki hindu ladakiya zarurat se zada seculer hoti hai. non muslim ladakiyan fasane ke liye reward diya jata hai.sabse zada kimat sikh ladaki ki hain. jao seach karo “love jihad”

      aur hame bhagwan ne sadbuddhi dedi hai. sahi raste ki zarurat aapko hai.
      aur haan islam ko hindu dharm ke sath compare karke hindu dharm ka aapman na kare.

      aur izzat dena dono taraf se hota hai . kya aapne kisi mulle ko temple me dekha hai?koi nahi jata . sirf aap jaise murkh seculer hindu hi masjid me ghuste hain.

      sach me dharm pata karna hai to jake Vedas aur Geeta etc ko ache se samajh ke padhe.

      fir yaha aake batekarna.

    • @Utkarsh singh……..kaash tumhare,jaise muslim log bi hote to aaj hum shaan se tumhara saath dete…….muje lagta hai ki tum muslim samaj me nhi rhte isliye unke liye gandhi giri kar rhe ho kabhi hamare yha kashmir k muslim k views padna tumhe khud pta chal jyega ki wo hamare aur hamari behno k liye kya kya bolte hai……… Tum jaise logo ki wjah se hi hamare hinduon ki itni doordasha ho rhi he…….JAI HIND

  7. manish kumar aur utkarsh kumar tumhe itna hi sai baba ko bhagwan manne ka shauk hai to mai to yhi suggest krunga ki tum Bhgagat singh,Chandrashekhar Azad aur Neta ji aur Gurugovind Singh aur Shivaji ko pujo kyonki inke Ahsan ham pr aur desh ke liye Sai Baba jaise farji fakiro se khi jyada hai aur rhega

  8. ये ब्लॉग पर जो भी है वोह इस्लाम और कुरान और हदीसो के बारे में जानने के लिये ये ब्लॉग जरुर पढ़े मे लिंक देता हु http://hadeesi-hadse.blogspot.in/ और
    http://harf-e-galat-ll.blogspot.in/

  9. आपने अपने एक लेख में अपने धर्म के लिए लिखा है “इनके सिद्धांत सार्वभौमिक और अटल हैं” इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जो “सर्वभौमिक और अटल है”, आप जिस धर्म को “सर्वभौमिक और अटल” बताने की मूर्खता भरी कोशिश में लगे हो, यह तो समय के साथ अपनी असल शकल कब का खो चूका है, और यदि इसे पहले की शकल पे लाया जाये तो यह एक ऐसा धर्म है जिसे दुनिया के किसी भी सभ्य कहे जाने वाले इलाके में क़ुबूल नहीं किया जा सकता, और यदि इसे विश्व में क़ुबूल करने के लायक बनाकर पेश करते हैं तो यह कैसे “सार्वभौमिक और अटल” हुआ जब कि इसके सिद्धांत को आवश्यकता पड़ने पर बदला जाता है। मान्यवर आप इसे किस आधार पर “सार्वभौमिक और अटल” कह रहे हो जब कि इसके बहुत से विधानों पर अब अमल हो पाना अस्वीकार्य है। भारत सरकार खुद इसके खिलाफ कानून बना चुकी है। मान्यवर झूट जितना भी चिल्ला-चिल्ला कर बोला जाये सच नहीं बन सकता, इस्लाम के खिलाफ आप जो मूर्खता भरी कोशिश कर रहें हैं, इससे कहीं ज्यादा और बड़े पैमाने पर इस्लाम के शुरुवात से ही होती रही है मगर इस्लाम आप के सबसे पुराने धर्म को उसके जन्म भूमि में भी परास्त कर पुनर्विचार पर विवश कर चूका है, अब आप अपने धर्म में परिवर्तन कर ही उसे इस्लाम से श्रेष्ठ साबित करने कि नाकाम कोशिश कर सकते है, पर अफसोस यदि आप ऐसा करते है तो आप के धर्म के “सिद्धांत सार्वभौमिक और अटल” नहीं कहे जा सकते। झूट को खूब जोरदार तरीके से पेश करो चिल्लाओ-चिल्लाओ, मगर सच का सूरज जब-जब सामने आयेगा झूट का अँधेरा अपनी बिल में घुस जायेगा।

    • आपने लिखा की – इस्लाम के खिलाफ आप जो मूर्खता भरी कोशिश कर रहें हैं, इससे कहीं ज्यादा और बड़े पैमाने पर इस्लाम के शुरुवात से ही होती रही है
      ////
      तो क्या भारत सरकार जो कानून ला रही है वो भी कही धर्म के विरुद्ध अधर्म तो नहीं,
      इस्लाम के विरुद्ध कुछ कदम उठे तो आपने उसे धर्म युद्ध करार दे दिया और सनातन धर्म पर प्रहार हो रहे है तो आपने उसे सही बता दिया, कृपया करके एकतरफ़ा तो ना चले,
      दूसरी और भारत भूमि पर इस्लाम के आने की बात है तो मियां 1200 सालो से आपने ये सपना देखा और उस सपने को कभी आपने गौरी, कभी गजनवी तो कभी अकबर या औरंगजेब के द्वारा पूर्ण करने का प्रयास किया पर सफल कभी नहीं हुए,
      और आपका इस्लाम कब से सर्वभोमिक हो गया, ६३२ ई से पहले तो आपका कही अता पता तक नहीं था, इस पर आपके समक्ष मैं एक पोस्ट ला रहा हु, वो अवश्य देखे और अपने मन से शंकाओं के बादल को हटाकर देखे की सनातन धर्म के सूर्य पर ग्रहण लग सकता है पर उस सूर्य का प्रकाश कभी समाप्त नहीं हो सकता.
      वर्तमान में धर्म का क्षय हो रहा है तो इसका अर्थ ये नहीं की धर्म समाप्त हो जायेगा,
      हम शाश्वत थे, है और रहेंगे,
      हम सर्वभोमिक और अटल थे, है और रहेंगे,
      अतीत में हमने शक हुण तो क्या इस्लाम को भी पराजित किया और इस्लामिक सत्ता को कायम होने से रोका, वर्तमान में हम अतीत के गौरव को पुन: स्थापित करने में असफल रहे पर इसका अर्थ ये नहीं की आप जीत गये और सनातन धर्म हार गया,
      और मियां, सच का सूरज आपके साथ नहीं हमारे साथ है, क्यूंकि आप चाँद वाले है और सूरज वाले हम है, और अभी इस सूरज पर थोडा कीचड है जो समय के साथ साथ समाप्त हो जायेगा,
      और याद रखे,
      जब 1200 में आप कुछ न उखाड़ सके तो अब क्या कर लोगे,

      • मान्यवर यदि आप उन्हीं बातों के Reply देते जो मैंने लिखीं तो अच्छा रहता, पर आप बातों को कहाँ ले जा रहे है भाई? वैसे इन बातों कि Reply की कोई ज़रुरत तो नहीं, खैर आप की बातों के short Reply दे ही देता हूँ, मैं Point-to-Point रहते हुए ही अपनी बात पूरी करने की कोशिश करूँगा।
        1) ////“तो क्या भारत सरकार जो कानून ला रही है वो भी कही धर्म के विरुद्ध अधर्म तो नहीं, इस्लाम के विरुद्ध कुछ कदम उठे तो आपने उसे धर्म युद्ध करार दे दिया और सनातन धर्म पर प्रहार हो रहे है तो आपने उसे सही बता दिया, कृपया करके एकतरफ़ा तो ना चले”////
        देखिए मैं यहाँ किसी तरह का कोई Judgment नहीं दे रहा हूँ, न मैं ऐसा कर सकता हूँ, न ही मैंने अपने पहले कमेंट में ऐसा किया है। ना जाने आप किस प्रकार से सोचते हैं कि आपने मेरी बातों से यह मतलब निकल लिया।
        मैंने सिर्फ आपके हिन्दू धर्म के “सर्वभौमिक और अटल” होने के दावे के भ्रम को दूर करने के लिए उन तथ्यों की ओर इशारा किया था जो समाज में मानने योग्य नहीं हैं। जैसे: स्त्रियों को अधिकार न देना, विधवाओं के साथ किया जाने वाला दुर्व्यवहार, वर्ण व्यवस्था आदि।
        “स्मत्रियों गृह सूत्रों व धर्मशास्त्रों में वर्ण व्यवस्था की जैसी व्याख्या की गई है, क्या आज के युग में भी हम उसी के अनुसार आचरण करें? क्या आज भी यदि वेद का एक शब्द किसी शुद्र के कान में पड़ जाये तो हम पिघला हुआ सीसा उसके कानों के भर दें? क्या आज भी किसी कला में निपुण होनें वाल शुद्र का अंगूठा काट लिया जाए जैसा के द्रोण ने एकलव्वय के साथ किया था। अथवा तपस्या करने वाले शुद्र की गर्दन ही उडा दी जाए?, जैसा की स्वयं भगवान राम ने किया था।, क्या आज भी यदि कोई शुद्र ब्रह्मणो के किसी घाट पर स्नान कर ले तो उसकी शुद्धि करनी होगी? जैसा ब.आर. अम्बेडकर जी के स्नान करने पर हुआ था।“…
        2) दूसरी और भारत भूमि पर इस्लाम के आने की बात है तो मियां 1200 सालो से आपने ये सपना देखा और उस सपने को कभी आपने गौरी, कभी गजनवी तो कभी अकबर या औरंगजेब के द्वारा पूर्ण करने का प्रयास किया पर सफल कभी नहीं हुए”

        आप किस सपने कि बात कर रहे है मैं नहीं जानता यदि आप साफ़-साफ़ लिखते तो मालूम पड़ता कि आप क्या कहना चाहते हैं?
        मैं यहाँ सिर्फ औरंगजेब र.अ. के विषय में कुछ लिखना पसंद कर रहा हूँ मगर उम्मीद है आप इसे झूट ही मानेंगे,
        “औरंगजेब र.अ. के दौर में, एक मुस्लमान अधिकारी एक ब्राह्मण लड़की को देख उसके पिता के पास सन्देश भेजता है कि अपनी बेटी को मेरे पास फलां दिन भेज देना, इस पर वह लड़की भेष बदल कर आगरा आ जाती है और बादशाह जब मस्जिद से नमाज़ अदा कर के बहार आते है तो उनसे अपनी बात कहती है इसके पश्च्यात बादशाह खुद उस लड़की के घर जाते है और उस अधिकारी को हथियों से चिरवा देते है”
        “औरंगजेब र.अ. ने न जाने कितनी मंदिरों को ज़मीनें दीं, और तो और मंदिर मालगुजारी से भी मुक्त हुआ करते थे” और भी बहुत कुछ है पर आप विश्वाश क्यों करेंगे आप की आँखों पर तो मूर्खता की पट्टी चढ़ी हुई है
        “औरंगजेब र.अ. के दौर में हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था चरम पर थी, आप इसे भी झुठलाएंगे, कोई भी अर्थ व्यवस्था तभी चरम पर पहुँच सकती है जब देश में स्थिरता लगातार बनी रहे”

        वैसे आपने प्रो. वि.एन. पाण्डेय जी (भूतपूर्व राज्यपाल) की पुस्तक “इतिहास के साथ यह अन्याय!!” पढ़ी ही होगी, यदि नहीं पढ़ी तो अब जरूर पढ़ लीजिए गा। इसमें आप को औरंगजेब र.अ. के बारे में कुछ और जानकारी मिल जायेगी।

        एक बात ख़ास तौर पर ध्यान रखा कीजिये इस्लाम किसी से ज़बरदस्ती नहीं क़ुबूल कराया जा सकता, इसको दिल से मानना जरूरी है “जब कोई आदमी दिल से इस्लाम को अपना धर्म मानता है तभी वह मुस्लमान होता है” और यह बात इस्लाम कि बुनियादी बात है ये बात मुझसे पहले के सारे मुसलमानों को अच्छे से पता थी, हाँ कोई जाति तौर पर कोई भी फैसला कर सकता है, किसी का जाति फैसला इस्लामिक नहीं हो सकता है भले ही उसके फैसले से इतिहास प्रभावित होता हो, पर यदि उसका फैसला इस्लाम के सिद्धांतों के मुताबिक है तभी उस फैसले को इस्लाम से जोड़ना न्यायसंगत है वरना नहीं ।

        3) ///और आपका इस्लाम कब से सर्वभोमिक हो गया, ६३२ ई से पहले तो आपका कही अता पता तक नहीं था, इस पर आपके समक्ष मैं एक पोस्ट ला रहा हु, वो अवश्य देखे और अपने मन से शंकाओं के बादल को हटाकर देखे की सनातन धर्म के सूर्य पर ग्रहण लग सकता है पर उस सूर्य का प्रकाश कभी समाप्त नहीं हो सकता.
        वर्तमान में धर्म का क्षय हो रहा है तो इसका अर्थ ये नहीं की धर्म समाप्त हो जायेगा,
        हम शाश्वत थे, है और रहेंगे, हम सर्वभोमिक और अटल थे, है और रहेंगे///

        मैं तो “सार्वभौमिक” का मतलब “universal” समझता हूँ इसलिए इस्लाम को ही सार्वभौमिक मानता हूँ क्योंकि इस्लाम ही ऐसा धर्म है जिसके मुताबिक पुरे विश्व में कहीं भी अलम किया जा सकता है, “जबकि आप का हिन्दू धर्म तो सिर्फ भारत को ही सार्वभौम (universe) बना देता है” बाकि विश्व तो इसके लिए कोई मायने ही नहीं रखते। खैर यह अलग विषय है इसलिए इसपर कोई बात नहीं लिख रहा हूँ।

        मगर आप तो “सार्वभौमिक” का बुल्कुल अलग ही मतलब पेश कर रहें है मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप अपने धर्म को “सार्वभौमिक” साबित करना चाहते हैं या “सार्वकालिक”

        खैर जब आप इस्लाम के ६३२ से पहले कहाँ होने कि बात कर रहें हैं, तो इससे पहले कि मैं कुछ लिखूं मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि बात विश्वाश की है जो आप इस्लाम के प्रति रखते नहीं, मगर मैं रखता हूँ इसलिए मैं इस बात को मानता हूँ आप नहीं मान सकते, जबतक कि आप विश्वाश न करने लगें।

        अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने क़ुरान-ए-करीम में पहले आने वाले नबियों के कुछ नाम बतायें है और हदीसों में इनकी तादात करीब सवा लाख बताई गई है, यह भी है कि अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने हर इलाके में उसी इलाके की बोली बोलने वाले, उसी इलाक़े के लोगो की तरह से जीवन-यापन करने वाले उन्हीं में के नबियों को भेजा है सब एक ही बात “एक अल्लाह की इबादत की तरफ लोगों को बुलाते थे”, जिन उम्मतों को किताब अता की गई उनमें एक आखिरी नबी का भी ज़िक्र अल्लाह ने पहले ही कर दिया कि जब वो तुममे आ जायें तब तुम उनकी ही पैरवी करना। और अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने उनकी कई निशानियाँ को भी सब अहले किताब को किताबों में बता रखी है। चाहे वो यहूदी हों, ईसाई हों या सनातन धर्म के मानने वाले सबकी धर्म ग्रंथों में आखिरी नबी का ज़िक्र और पहचान मौजूद है मगर सब अपने-अपने तरीके से उसे ऐसे परिभाषित करने की कोशिश करते है मानों जैसे वह अब तक आये ही नहीं हैं, जबकि सभी की किताबों में आखिरी नबी की जो निशानियाँ मौजूद हैं वह हज़रत मुहम्मद सलल्लाहुअलैहिवसल्लम की तरफ ही इशारा करती हैं यानि हज़रत मुहम्मद सलल्लाहुअलैहिवसल्लम से ही मिलती है।

        मुझे नहीं समझ आ पता है कि लोग खुद को ऐसा कैसे समझा पते हैं कि कोई कैसे इतनी अलग-अलग जगहों में लिखी निशानियों को अपनी ज़िन्दग़ी में फ़र्ज़ी तरीके से पैदा कर सकता है, सच तो यह है कि ऐसा कोई भी नहीं कर सकता सिवाए अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला के, चूँकि अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला को ऐसा ही करना था इसी लिए अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने ऐसा करने से पहले ही इसका ज़िक्र कर दिया।

        अब आप कहेंगे कि एक तरफ तो मैं आपके धर्म को गलत ठहरा रहा हूँ दूसरी तरफ उसी से अपने धर्म कि सत्यता का प्रमाण देने की कोशिश कर रहा हूँ, देखिये चाहे सनातन कहें या इस्लाम अवल तो दोनों के मतलब एक ही हैं और दोनों में मूलरूप से एक ही निराकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की बात मैजूद है, मगर समय के साथ सनातन कहा जाने वाला धर्म न जाने कब आज का हिन्दू धर्म बन गया अल्लाह ही बेहतर जाने। न जाने कैसे लोगो ने निराकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर को छोड़कर, जाने कैसे कैसे आकारों प्रतीकों के पीछे हो गए। खैर अल्लाह कि मर्ज़ी अल्लाह को जब-जब जो-जो जैसे-जैसे करना होता है अल्लाह तबारक-व-तआला उसके होने की सूरत पैदा कर देते हैं और वह चीज़े हो जाया करती हैं जो कुछ बचन होता है बचते है जो मिटाना होता है मिटते है जिसे बदलना होता है बदलते है, जिसे रहने देना होता है रहने देते हैं, अल्लाह कि कुदरत अल्लाह ही जाने।

        जब कहीं किन्हीं लोगों में कोई विवाद हो और कोई ऐसा मौजूद ना हो जो यह बता सकता हो कि इस विवाद में किसका पक्ष कितना सही या किसका पक्ष कितना गलत है तब सच का पता लगाने के लिए हमें सभी की बातों को सुनकर इनकी बातों में मौजूद common बातों के जरिये ही सच तक पंहुचा जाता है।

        4) ///अतीत में हमने शक हुण तो क्या इस्लाम को भी पराजित किया और इस्लामिक सत्ता को कायम होने से रोका////
        मैंने अपने कमेंट में लिखा था “इस्लाम आप के सबसे पुराने धर्म को उसके जन्म भूमि में भी परास्त कर पुनर्विचार पर विवश कर चूका है” आप इसमें मेरे “परास्त” शब्द का क्या अर्थ शायद तलवारों से हुई जंगों में मिली सफलताओं या असफलताओं के सन्दर्भ में ले रहे हैं मैंने लिखा है “परास्त कर पुनर्विचार पर विवश कर चूका है” मेरी बात का ज़ोर परास्त पर नहीं बल्कि पुनर्विचार पर है और पुनर्विचार कोई सैन्य ताकत पर नहीं धर्म कि सूरत पर, पराजय राजनैतिक नहीं या सैन्य नहीं बल्कि इस बात की पराजय कि हिंदुस्तान के हिंदुओं ने अपने बाप दादाओं के धर्म को ठुकरा इस्लाम को धारण कर लिया और फिर कभी नहीं लौटे। आज हिंदुस्तान, पाकिस्ता या बंगला देश कहीं भी भारतीय मूल के जो भी मुस्लमान हैं सब कभी हिन्दू या और भारतीये धर्मों के मानने वालों के ही वंशज है जिन्हे आप कभी पुनर जागृत नहीं कर सकते क्योंकि जो जागा हुआ होता है उसे क्या जगाओगे।
        यदि आप के धर्म में इस्लाम से ज्यादा आकर्षण है तो मुझे दिखाओ।

        5) //////इस सूरज पर थोडा कीचड है जो समय के साथ साथ समाप्त हो जायेगा/////
        अरे भाई मिशाले तो ठीक से दिया करे भाई, सूरज पर कीचड़ नहीं लगता नहीं लग सकता है हाँ हावाओं के झोंकों से बदल आ जाते है और दूसरे झोंकों के साथ फिर इधर-उधर बिखर जाते है या पानी कि बूंदों में बह जाते है इंशाअल्लाह मुसलमानों की जिंदगियों और इस्लाम के बीच के बदल जल्द ही हट जायेंगे तब इस्लाम की रोशनी मुसलमानों की जिंदगियों में दिखाई देगी और फिर यही मुस्लमान खुद सूरज कि तरह दूसरों कि जिंदगियों में रोशनियाँ भर देंगे जैसे पहले के मुस्लमान भर गए।

        6) ////और याद रखे, जब 1200 में आप कुछ न उखाड़ सके तो अब क्या कर लोगे/////
        आप कि भाषा में मैं तो जवाब नहीं दे सकता क्यों कि मेरे अल्लाह मुझसे ऐसी भाषा के इस्तेमाल की वजह से नाराज़ हो जायेंगे, और मैं अल्लाह नाराज़ नहीं कर सकता। रही बात १२०० सालों कि तो मान्यवर अल्लाह ने मुसलमानों को यहाँ किसी का कुछ बिगाड़ने को नहीं बल्कि बिगड़ों की बनाने को भेजा है, आपको सर्वभौमिक और अटल बनाने को भेजा है, यदि आप उस आखरी ऋषि को नहीं देखना चाहते क्योंकि वे आप कि भाषा नहीं बोलते इसलिए अपनी आँखों पर पट्टी बांध लेते कानों में ऊँगली ठूंस लेते हो तो ये आप कि मूर्खता है किसी दूसरे कि नहीं। हाँ एक सपना मुस्लमान होने के नाते मेरे है, जैसा कि मैं जिस चीज़ को अपने लिए हितकर मानता हूँ और जिस चीज़ को अपने लिए हानिकारक मानता हूँ उस चीज़ से अपने भाइयों को भी बचने को कहता हूँ और उस चीज़ का से फायदा लेने को कहता हूँ जो मुझे फायदा पहुंचा रही है और यदि कोई मुझे मेरे भाइयों को नुकसान कि तरफ लेजाये या फायदा देने वाली चीज़ से रोके तो इसके लिए उस शख्स से मैं जिस तरह मुकाबला कर सकता हूँ करूँगा ताकि मेरे भाइयों का अहित न हो।

        पर आप तो सिर्फ संस्कृति-संस्कृति ही चिल्लाते रहते हो जिस संस्कृति पर क्या कहूं क्या सतिप्रथा कि संस्कृति को वापस लाना चाहते हो, क्या किसी कला में निपुर्ण शुद्र के हाथ काटने कि संस्कृति पर गर्व करते हो,…..

        आप लोग मुसलमानों पर न जाने क्या-क्या आरोप लगते हो न जाने कहाँ कि कहाँ जोड़ते हो, सबसे पहली बात ये कि १२०० सालों का बीतना ही सबसे बड़ा सुबूत है इस बात का कि यहाँ वैसा कुछ भी नहीं होता रहा होगा जैसा फूहड़ इतिहासकार आरोप लगाते हैं क्योंकि इंसान स्वभाव से ही विद्रोही है इसलिए यदि इतने सालों में यदि आरोप सच होते तो विद्रोह इतने ज्यादा होते कि किसी भी हुकूमत का उसे संभल पाना असम्भव हो जाता, मगर इतिहास में उतने विद्रोह क्यों नहीं मिलते क्या हिंदुस्तान के लोगों का स्वभाव मनुष्यों जैसा नहीं था? ये अलग दुनिया के प्राणी थे क्या? अब जबकि किसी भी घटना के सही background का पता लगा पाना नामुमकिन है तब उन पर क्यों बहस की जा रही है? जबकि इतिहास में जितने विद्रोह मिलते हैं वह बहुत कम पड़ते हैं किसी को वैचारिक तौर पर परेशान करने वाला साबित करने में, एक तरुप का पत्ता संघी लोग पेश करते है जिज्या मगर लगता है इन्हे जिज्या का ‘ज’ भी नहीं मालूम कि जिज्या क्यों और किस्से लिया जाता था इसे ऐसे पेश करते है कि यह कर गैर-मुसलमानों पर इस्लाम क़ुबूल करने को मज़बूर करने के लिए लगाया जाता था जिस की वजह से गरीब गैर-मुस्लिम मजबूरन मुस्लमान बन जाता था, सबसे पहली बात यह कि जिज्या किसी गरीब से नहीं लिया जाता यदि संघियों के पास ठोस प्रमाण हो जिससे वे यह साबित कर पाएं कि मुस्लमान बादशाह ने गरीबों से जिज्या वसूलने का हुक्म जारी किया हो, दूसरी खास बात यह गलत फहमी फैलाना कि मुस्लमान कर मुक्त थे सरा-सर जेहालत है हर मुस्लमान पर जकात धार्मिक तौर पर फ़र्ज़ होती है जो आज भी है बस फर्क इतना है कि आज भारत के मुस्लमान इस रकम को अपने विवेक से किसी ज़रुरत मंद को देते हैं या ज़रुरत कि जगह पर खर्च करते है, उस वक्त यह रकम हुकूमत वसूला करती थी जब हुकूमत अपनी एक प्रजा से कर वसूल कर रही है तो वह दूसरी प्रजा से क्यों कर नहीं वसूल सकती आप ही सोच कर बताओ।।। वैसे आप कि जानकारी के लिए आप को बता दूँ कि भारत भर में बहुत से मंदिर मौजूद हैं जिनके संरक्षको के पास ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं जिनमे लिखा है कि मंदिर मालगुजारी से मुक्त है। सच तो यह है कि दोहरा आचरण आज भारत देश में गौर-हिंदुओं के साथ हो रहा है मिसाल के तोर पर इनकम टैक्स में HUF…

    • SABSE PAHLE TO YE JAAN LO ISLAM KOYE DHARM NAHE YE KISI EK AADMI DWARA CHALAYA GAYA EK SANGHTAN GUTH HAI . OR AISE MURKH LOGO SE KYA BAHAS KARNI HAI JISKA WO DOOD PEETE HAIN USKO HE MAAR KAR KHA JATE HAIN . TUM KISI EK HINDU KI GALTI KI SANTANE HO YE TUM MANO YA MANO …

  10. तुझे धर्मो के बारे में गलत बोलने और लिखने में बड़ा मज़ा आता है?? वेसे तेरी दो रूपये की औकात नहीं है अपनी साईट का डोमेन और होस्टिंग तक तो तू खरीद नहीं पाया ऐसे ही वर्डप्रेस पर फ्री फंडे की साईट बना के अपना चुतायापन दिखा रहा है. पहले अपने आपको तो देख तेरी औकात क्या है एक साईट के लिए 99 रुपये का डोमेन खरीदने तक की तेरी औकात नहीं और कमिया निकाल रहा है धर्मों में.

  11. Hi

    I am Sharang Dhar Sharma of Aungari Village , Nalanda – District Bihar .
    there is one Surya Temple at my village , One of the solder- head – commander , came to our village and asked , if there is god in this temple , he must save themselves otherwise He ( solder- Head- commander ) will be destroying this temple .

    because the prohits were not strong enough to fight against that commander and his contingent .

    As soon as he started destroying temple , there were a big rore from inside the temple and the contingent unable to move neither front of backward .

    We the villagers of Aungari worship God Surya and the Muslim Commander as well .
    You may visit ( Aungari Dham Trust Aungari) to see the temple . it is available in You tube as well .

    Kindly Read ;————-

    One of the main objectives of Aurangzeb’s policy was to demolish Hindu temples. When he ordered (13th October 1666) removal of the carved railing, which Prince Dara Shukoh had presented to Keshava Rai temple at Mathura, he had observed ‘In the religion of the Musalmans it is improper even to look at a temple’, and that it was totally unbecoming of a Muslim to act like Dara Shukoh (Exhibit No. 6, Akhbarat, 13th October 1666). This was followed by destruction of the famous Kalka temple in Delhi (Exhibit No. 6, 7, 8, Akhbarat, 3rd and 12th September 1667).

    In 1669, shortly after the death of Mirza Raja Jai Singh of Amber, a general order was issued (9th April 1669) for the demolition of temples and established schools of the Hindus throughout the empire and banning public worship (Exhibit Nos. 9 & 10). Soon after this the great temple of Keshava Rai was destroyed (Jan.-Feb. 1670) (Exhibit No. 12) and in its place a lofty mosque was erected. The idols, the author of Maasir-i-Alamgiri informs, were carried to Agra and buried under the steps of the mosque built by Begum Sahiba in order to be continually trodden upon, and the name of Mathura was changed to Islamabad. The painting (Exhibit No. 13) is thus no fancy imagination of the artist but depicts what actually took place.

    This was followed by Aurangzeb’s order to demolish the highly venerated temple of Vishwanath at Banaras (Persian text, Exhibit No. 11), Keshava Rai temple (Jan.-Feb. 1670) (Persian Text, exhibit No. 12 and Painting, Exhibit No. 13), and of Somanatha (Exhibit No. 14).To save the idol of Shri Nathji from being desecrated, the Gosain carried it to Rajputana, where Maharana Raj Singh received it formally at Sihad village, assuring the priest that Aurangzeb would have to trample over the bodies of one lakh of his brave Rajputs, before he could even touch the idol (Exhibit No. 15)

    Aurangzeb’s zeal for temple destruction became much more intense during war conditions. The opportunity to earn religious merit by demolishing hundreds of temples soon came to him in 1679 when, after the death of Maharaja Jaswant Singh of Jodhpur in the Kabul Subah, he tried to eliminate the Rathors of Marwar as a political power in Rajputana. But Maharana Raj Singh of Mewar, in line with the great traditions of his House, came out in open support of the Rathors.. This led to war with both Mewar and Marwar during which the temples built on the bank of Rana’s lake were destroyed by his orders (Exhibit No. 23, Akhbarat 23rd December 1679) and also about three hundred other temples in the environs of Udaipur. (Exhibit No. 25, Text), including the famous Jagannath Rai temple built at a great cost in front of the Maharana’s palace which was bravely defended by a handful of Rajputs (Exhibit Nos. 20, 21).

    Not only this, when Aurangzeb visited Chittor to have a view of the famous fort, he ordered the demolition of 63 temples there which included some of the finest temples of Kumbha’s time (Exhibit No. 22). From Marwar (in Western Rajasthan) alone were brought several cart-loads of idols which, as per Aurangzeb’s orders, were cast in the yard of the Court and under the steps of Jama Masjid (Exhibit No. 19). Such uncivilized and arrogant conduct of the Mughal Emperor alienated Hindus for ever, though they continued to be tolerant towards his creed.

    In June 1681, orders, in a laconic two-liner, were given for the demolition of the highly venerated Jagannath Temple in Orissa (Exhibit No. 24, Akhbarat, 1st June 1681). Shortly afterwards, in September 1682, the famous Bindu-Madhav temple in Banaras was also demolished as per the Emperor’s orders (Exhibit No. 27, Akhbarat, Julus 26, Ramzan 20). On 1st September 1681, while proceeding to the Deccan, where his rebel son Prince Akbar, escorted by Durga Das Rathore, had joined Chhatrapati Shivaji’s son, Shambhaji, thus creating a serious problem for him, Aurangzeb ordered that all the temples on the way should be destroyed. It was a comprehensive order not distinguishing between old and newly built temples (Exhibit No. 26, Akhbarat, Julus 25, Ramzan 18). But in the district of Burhanpur, where there were a large number of temples with their doors closed, he preferred to keep them as such, as the Muslims were too few in number in the district. (Exhibit No. 28, Akhbarat 13th October 1681). In his religious frenzy, even temples of the loyal and friendly Amber state were not spared, such as the famous temple of Jagdish at Goner near Amber (Exhibit Nos. 30, Akhbarat, 28th March and 14th May 1680). In fact, his misguided ardour for temple destruction did not abate almost up to the end of his life, for as late as 1st January 1705 we find him ordering that the temple of Pandharpur be demolished and the butchers of the camp be sent to slaughter cows in the temple precincts (Akhbarat 49-7).

    Regards

    Sharang Dhar Sharma

    Aungari – Village

    Naland – distric

    Bihar – 801321

    sdmcd2015@gmail.com

  12. My moto is not to harm some one or any one … it is only for the information to all interested people who is interested to know the facts……………..!
    Sahrang

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