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भारतीय इतिहास पर छायी आर्य आक्रमण सम्बन्धी झूठ की चादर को विज्ञान की खोज ने एक झटके में ही तार-तार कर दिया है। विज्ञान की आंखों ने जो देखा है उसके अनुसार तो सच यह है कि आर्य आक्रमण नाम की चीज न तो भारतीय इतिहास के किसी कालखण्ड में घटित हुई और ना ही आर्य तथा द्रविड़ नामक दो पृथक मानव नस्लों का अस्तित्व ही कभी धरती पर रहा है।

इतिहास और विज्ञान के मेल के आधार पर हुआ यह क्रांतिकारी जैव-रासायनिक डीनएनए गुणसूत्र आधारित अनुसंधान फिनलैण्ड के तारतू विश्वविद्यालय,
एस्टोनिया में हाल ही में सम्पन्न हुआ है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉं. कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के शोधछात्र ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिध्द किया है कि सारे भारतवासी जीन अर्थात गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है, और तो और जो अनुवांशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डीएनए गुणसूत्र दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाए गए।

A Deep Study on Arya invasion Theory

A Deep Study on Arya invasion Theory

शोधकार्य में अखण्ड भारत अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों,  जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई। इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं।

भारतीयों के पूर्वजों का डीएन गुणसूत्र यूरोप, मध्य एशिया और चीन-जापान आदि देशों की नस्लों से बिल्कुल अलग है और इस अन्तर को स्पष्ट पहचाना जा सकता है ।

जेनेटिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया —

ज्ञानेश्वर चौबे को जिस बिन्दु पर शोध के लिए पीएच.डी. उपाधि स्वीकृत की गई है उसका शीर्षक है- ‘डेमॉग्राफिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया: द प्रिवेलिंग
जेनेटिक कांटिनिटी फ्रॉम प्रीहिस्टोरिक टाइम्स’ अर्थात ‘दक्षिण एशिया का जनसांख्यिक इतिहास: पूर्वऐतिहासिक काल से लेकर अब तक की अनुवांशिकी निरंतरता’। संपूर्ण शोध की उपकल्पना ज्ञानेश्वर के मन में उस समय जागी जब वह हैदराबाद स्थित ‘सेन्टर फॉर सेल्यूलर एंड मोलेक्यूलर बायोलॉजी’ अर्थात
सीसीएमबी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्यातलब्ध भारतीय जैव वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह और डॉ के. थंगराज के अन्तर्गत परास्नातक बाद की एक शोधपरियोजना में जुटे थे।

ज्ञानेश्वर के मन में विचार आया कि जब डीएनए जांच के द्वारा किसी बच्चे के माता-पिता के बारे में सच्चाई का पता लगाया जा सकता है तो फिर भारतीय सभ्यता के पूर्वज कौन थे, इसका भी ठीक- ठीक पता लगाया जा सकता है। बस फिर क्या था, उनके मन में इस शोधकार्य को कर डालने की जिद पैदा हो गई। ज्ञानेश्वर बताते हैं-बचपन से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि हमारे पूर्वज कौन थे? बचपन में जो पाठ पढे़, उससे तो भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी कि क्या हम आक्रमणकारियों की संतान हैं? दूसरे एक मानवोचित उत्सुकता भी रही। आखिर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो यह जानने की उत्सुकता पैदा होती ही है कि उसके परदादा-परदादी कौन थे, कहां से आए थे,उनका मूलस्थान कहां है और इतिहास के बीते हजारों वर्षों में उनके पुरखों ने प्रकृति की मार  कैसे सही, कैसे उनका अस्तित्व अब तक बना रहा है?

ज्ञानेश्वर के अनुसार, पिछले एक दशक में मानव जेनेटिक्स और जीनोमिक्स के अध्ययन में जो प्रगति हुई है उससे यह संभव हो गया है कि हम इस बात का  पता लगा लें कि मानव जाति में किसी विशेष नस्ल का उद्भव कहां हुआ, वह उद्विकास प्रक्रिया में दुनिया के किन-किन स्थानों से गुजरी, कहां-कहां रही और उनके मूल पुरखे कौन रहे हैं? उनके अनुसार- माता और पिता दोनों के डीएनए में ही उनके पुरखों का इतिहास भी समाया हुआ रहता है। हम जितनी गहराई से उनके डीएनए संरचना का अध्ययन करेंगे, हम यह पता कर लेंगे कि उनके मूल जनक कौन थे? और तो और इसके द्वारा पचासों हजार साल पुराना अपने पुरखों का इतिहास भी खोजा जा सकता है।

कैंब्रिज के डॉ. कीवीसील्ड ने किया शोध निर्देशन हैदराबाद की प्रयोगशाला में शोध करते समय उनका संपर्क दुनिया के महान जैव वैज्ञानिक प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ आया। प्रो. कीवीसील्ड संसार में मानव नस्लों की वैज्ञानिक ऐतिहासिकता और उनकी बसावट पर कार्य करने वाले उच्चकोटि के वैज्ञानिक माने जाते हैं। इस नई सदी के प्रारंभ में ही प्रोफेसर कीवीसील्ड ने अपने अध्ययन में पाया था कि दक्षिण एशिया की जनसांख्यिक संरचना अपने जातीय एवं जनजातीय
स्वरूप में न केवल विशिष्ट है वरन् वह शेष दुनिया से स्पष्टत: भिन्न है। संप्रति प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बायोसेंटर का निर्देशन कर रहे हैं।

प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड की प्रेरणा से ज्ञानेश्वर चौबे ने एस्टोनियन बायोसेंटर में सन् 2005 में अपना शोधकार्य प्रारंभ किया। और देखते ही देखते जीवविज्ञान
सम्बंधी अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध जर्नल्स में उनके दर्जनों से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो गए। इसमें से अनेक शोध पत्र जहां उन्होंने अपने गुरूदेव प्रोफेसर
कीवीसील्ड के साथ लिखे वहीं कई अन्य शोधपत्र अपने उन साथी वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से लिखे जो इसी विषय से मिलते-जुलते अन्य मुद्दों पर काम
कर रहे हैं।

अपने अनुसंधान के द्वारा ज्ञानेश्वर ने इसके पूर्व हुए उन शोधकार्यों को भी गलत सिद्ध किया है जिनमें यह कहा गया है कि आर्य और द्रविड़ दो भिन्न मानव नस्लें हैं और आर्य दक्षिण एशिया अर्थात् भारत में कहीं बाहर से आए। उनके अनुसार, ‘पूर्व के शोधकार्यों में एक तो बहुत ही सीमित मात्रा में नमूने लिए गए थे, दूसरे उन नमूनों की कोशिकीय संरचना और जीनोम इतिहास का अध्ययन ‘लो- रीजोलूशन’ अर्थात न्यून-आवर्धन पर किया गया।
इसके विपरीत हमने अपने अध्ययन में व्यापक मात्रा में नमूनों का प्रयोग किया और ‘हाई-रीजोलूशन’ अर्थात उच्च आवर्धन पर उन नमूनों पर प्रयोगशाला में
परीक्षण किया तो हमें भिन्न परिणाम प्राप्त हुए।’

माइटोकांड्रियल डीएनए में छुपा है पुरखों का इतिहास —

ज्ञानेश्वर द्वारा किए गए शोध में माइटोकांड्रियल डीएनए और वाई क्रोमासोम्स और उनसे जुड़े हेप्लोग्रुप के गहन अध्ययन द्वारा सारे निष्कर्ष प्राप्त किए गए हैं। उल्लेखनीय है कि माइटोकांड्रिया मानव की प्रत्येक कोशिका में पाया जाता है। जीन अर्थात मानव गुणसूत्र के निर्माण में भी इसकी प्रमुख
भूमिका रहती है। प्रत्येक मानव जीन अर्थात गुणसूत्र के दो हिस्से रहते हैं। पहला न्यूक्लियर जीनोम और दूसरा माइटोकांड्रियल जीनोम। माइटोकांड्रियल जीनोम गुणसूत्र का वह तत्व है जो किसी कालखण्ड में किसी मानव नस्ल में होने वाले उत्परिवर्तन को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है और वह इस उत्परिर्तन को आने वाली पीढ़ियों में सुरक्षित भी रखता है।

इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि माइटोकांड्रियल डीएनए वह तत्व है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक माता के पक्ष की सूचनाएं अपने साथ हूबहू स्थानांतरित करता है। यहां यह समझना जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति की प्रत्येक कोशिका में उसकी माता और उनसे जुड़ी पूर्व की हजारों पीढ़ियों के माइटोकांड्रियल डीएनए सुरक्षित रहते हैं। इसी प्रकार वाई क्रोमोसोम्स पिता से जुड़ी सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित करते हैं। वाई क्रोमोसोम्स प्रत्येक कोशिका के केंद्र में रहता है और किसी भी व्यक्ति में उसके पूर्व के सभी पुरूष पूर्वजों के वाई क्रोमोसोम्स सुरक्षित रहते हैं।

इतिहास के किसी मोड़ पर किसी व्यक्ति की नस्ल में कब और किस पीढ़ी में उत्परिवर्तन हुआ, इस बात का पता प्रत्येक व्यक्ति की कोशिका में स्थित वाई क्रोमोसोम्स और माइटोकांड्रियल डीएनए के अध्ययन से आसानी से लगाया जा सकता है। यह बात किसी समूह और समुदाय के संदर्भ में भी लागू होती है।

एक वंशवृक्ष से जुड़े हैं सभी भारतीय


ज्ञानेश्वर ने अपने अनुसंधान को दक्षिण एशिया में रहने वाले विभिन्न धर्मों- जातियों की जनसांख्यिकी संरचना पर केंद्रित किया। शोध में पाया गया है कि तमिलनाडु की सभी जातियों-जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश जिन्हें पूर्व में कथित द्रविड़ नस्ल से प्रभावित माना गया है, की समस्त जातियों के डीनएन गुणसूत्र तथा उत्तर भारतीय जातियों-जनजातियों के डीएनए का उत्पत्ति-आधार गुणसूत्र एकसमान है। उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं।

इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाये जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं। बाबासाहब आम्बेडकर की किताब “जाती व्यवस्था का उच्चाटन” (Annihilation of caste) डी. के. खापर्डे ने कांशीराम को पढ़ने के लिए दिया था. पिछड़े जातिय कर्मचारीयों के हितों की रक्षा करने के लिए जातिगत संघटन बनाया, जिनका नाम बामसेफ है.

बाबासाहब के विचारों से ब्राह्मण “आर्य” है, क्षत्रिय “आर्य” है, वैश्य “आर्य” है और शुद्र भी “आर्य” है. सभी लोग अलग अलग परिस्थितियों मे एक दूसरों के साथ झगडो मे विजित हुए है. जो विजित हुए है, वे ही “आर्य” हुए है. “आर्य” होकर भी “शुद्र” क्यों कहलाए गए? इसमें किसकी साजिश थी? इसे बाबासाहब ने उजागर किया है. वे कहते है, –
१. भारतीय “आर्य शुद्र” गिर गए क्योंकी उच्च जाती के साथ बहुत ही घुल गए.
२. आज कल के शुद्र प्राचीन शुद्र नहीं थे (वे आर्य थे),
३. प्राचीन शुद्र (आर्य) के लिए जो विधान बने है वे आज कल के नए शूद्रों के लिए लागू कैसे हो सकते?
४. इस सवाल के जवाब पाने के लिए उन्होंने “who were the shudras” को लिखा है.
५. यह ग्रन्थ “आर्य समाज” के विरुद्ध है क्योंकि आर्यों के चार वर्ण है , और वेद ईश्वरीय कृति होने का ब्राह्मण दावा करते है.
६. बाबासाहब आम्बेडकर ने यह सिद्ध किया की आर्यों के पहले तीन ही वर्ण थे, बाद मे ब्राह्मणों ने दस्यु, दासों को चौथे वर्ण मे धकेल दिया. इसमें ईश्वर की कोई भूमिका नहीं है. यह सब ब्राह्मणों ने अपने निजी स्वार्थों के लिए किया था. शुद्र भी “आर्य” है तो भारतीय OBC / अन्य मागासवर्गीय जातीया भी “आर्य” है. जो “आर्य” है वे अगर विदेशी है, तो हिन्दुधर्म और उसका पालन करने वाले भी विदेशी है.

यह Who were the Shudras ग्रन्थ केवल शूद्रों की खोज नहीं है, तो “आर्यों” की भी खोज है. इसमें बाबासाहब आम्बेडकर लिखते है, “दास तथा दस्यु ,आर्य तथा दासों और दस्युओं मे जातीय भिन्नता न थी. दास तथा दस्यु; आर्य तथा दासों और दस्युओं मे जातीय भिन्नता न थी, दास तथा दस्यु आर्य हो सकते है. आर्य एक जाती है, यह एक मनगढंत बात है. इसका आधार डॉक्टर बाप की पुस्तक “Comparative Grammar” मे है. इस पुस्तक मे यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है की, सारी यूरोपीय भाषाए तथा कुछ एशिया की भाषाए एक ही भाषा से निकली है और यह भाषा “आर्य” भाषा है. इसी से लोगों ने दो परिणाम निकाले: –
१. आर्य भाषा किसी जाती की भाषा थी और
२. वह जाती आर्य थी. इससे यह भी अनुमान किया गया की, आर्य जाती का एक ही निवास-स्थान है.
आर्य-जाती यह अन्य जातियों से ऊँची है, इसके लिए यह बात गढ़ी गई की, आर्यों ने भारतवर्ष पर हमला किया और दास तथा दस्यु जाती को जीता. यह बात भी केवल अनुमान मात्र है की आर्य गोरे थे. रंग के बारे मे प्रोफ़ेसर रिप्ले का कथन है की यूरोप की पुराणी जातियों का सर लंबा और रंग सांवला था. (Races Of Europe, p.-466). यह बात वेदों से भी सिद्ध है. (ऋग्वेद -१,११७,८)

चार्ल्स डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार पृथ्वी और उसपर निर्भर सजीव विकसित हुए है. पहले जीव पानी मे विकसित हुआ, बाद मे वह भूखंडपर आया. विश्व मे सबसे ऊँचा हिमालय पर्वत है. इसके इर्द-गिर्द मे पहले सजीव पानी से निकलकर आये और एक से अनेक जिव विकसित होते गए. गोपाल गुरु चक्रनारायण के “लार्ड बुद्ध वाज दि फादर ऑफ येशु ख्रीस्त एंड महम्मद पैगम्बर” इस किताब मे मानव प्राणी सबसे पहले भारत मे, तराई के प्रदेश मे विकसित हुआ, जो हिमालय के गोदी मे आता है. भूखंडों के विभाजनों से भूमंडलीय जीव भी विलग हुए है और अन्य जगहों पर भी वे विकसित हुए.

भारतीय लोगों का व्यापार पुरे विश्व मे चलता था. व्यापार के साथ संस्कृति भी विकसित होते गयी. एक देश के अच्छी चीजे या प्राणी दूसरे देश मे आयात-निर्यात किये गए, उसमे व्यापारीयों द्वारा घोड़े भी भारत मे आयात हुए, इस सम्भावना को नकार नही सकते. घोड़ों के लिए उचित वातावरण भारत मे था इसलिए हजारों सालों से घोड़े यहाँ पर जीवित है. जैसे विदेशी कुत्ते भारत मे व्यापारी द्वारा आयात होते है वैसे ही प्राचीन भारतीय व्यापारीयोंने घोड़े भी आयात किये हो. डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के मतानुसार आर्य का मतलब “श्रेष्ठ” है.
जो भी जीतते है वे ही श्रेष्ठ कहलाते है. भारत मे ही नहीं तो हर जगह पर मानव प्राणी अलग अलग चिजो के प्राप्ति के लिए झगडे करता आया है. झगडों मे अलग-अलग हत्यारों का और जीवों का भी वापर हुआ है. बाबासाहब आंबेडकर ने घोड़े के लिए उत्तम परिस्थिति उत्तर ध्रुवो पर है क्या? यह सवाल किया था.
इसका उत्तर अभी तक मूलनिवासी वाले मनुवाद के शाखाओं ने नहीं दिया.