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एक योगी जिसके 3-4 सर है , यह असल में भगवान शिव है |
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ये भगवान पशुपतिनाथ है ओर मेवाड के एकलिंगजी देखिये-
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आप देख सकते है की सिन्धु घाटी सभ्यता के शिव और मेवाड़ के एकलिंगनाथ यानि भगवान शिव में कितनी समानता है ,एक समय मेवाड़ में भी सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग रहते थे और आज भी वह के लोग 4 सर वाले शिव की पूजा करते है
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इस चित्र में आप देखेंगे की लाल घेरे के बिच में एक मानव का सर है ,कुछ इसे बलि देते हुए दर्शाते है पर मेरे अनुसार वह सर असल में प्रजापति दक्ष का है ,भगवान् शिव से देवताओ ने प्राथना की और प्रजाति को जीवित करने हेतु बकरा लाया गया है ताकि उसका सर प्रजापति को लगाया जाए |
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आपको वह कहानी तो पता ही होगी की भागवान कृष्ण अनजाने में 2 वृक्ष उखाड़ देते है जिसमे से 2 यक्ष निकलते है ,यह सील वही कहानी बता रहा है ,आप 2 वृक्ष देख सकते है जो उखाड़ गए है (विद्वान् अनुसार ) और उनके बिच एक व्यक्ति नजर आ रहा है जो यक्ष हो सकता है ,दूसरा यक्ष शायद इस सील के दुसरे भाग में हो क्युकी यह सील टुटा हुआ है |
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आप अगर देखे तो इस मूर्ति में उस व्यक्ति ने एक कपडा बाँध रखा है ,वेदो मे एक अध्यात्मिक दसराजन युद्ध में इस बात का जीकर है की राजा इस कदर सर पर कपड़ा बांधते जो की सच्चाई का प्रतिक था |
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भारत में रथ थे और घोड़े भी ,सच तो यह है की आज जो घोड़े यूरोप और एशिया में है वे 70 साल पहले भारतीय घोड़ो से विकसित हुए है |
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नंदी से लड़ते गणेश या नंदी संग युद्ध कला सीखते कार्तिक
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सिंधु घाटी में ऋग्वेद सिन्धुवासी भी वेद पढते थे वे भी आर्य थे उसका प्रमाण ये सील है मित्रो उपर्युक्त जो चित्र है वो हडप्पा संस्कृति से प्राप्त एक मुद्रा(सील) का फोटोस्टेट प्रतिकृति है।ये सील आज सील नं 387 ओर प्लेट नंCXII के नाम से सुरक्षित है,, इस सील मे एक वृक्ष पर दो पक्षी दिखाई दे रहे है,जिनमे एक फल खा रहा है,जबकि दूसरा केवल देख रहा है।
यदि हम ऋग्वेद देखे तो उसमे एक मंत्र इस प्रकार है-

द्वा सुपर्णा सुयजा सखाया समानं वृक्ष परि षस्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्तयनश्न न्नन्यो अभिचाकशीति॥
-ऋग्वेद 1/164/20

इस मंत्र का भाव यह है कि एक संसाररूपी वृक्ष पर दो लगभग एक जैसे पक्षी बैठे है।उनमे एक उसका भोग कर रहा है,जबकि दूसरा बिना उसे भोगे उसका निरीक्षण कर रहा है। उस चित्र ओर इस मंत्र मे इस तरह की समानता से आप लोगो को क्या लगता है???  क्युकि हमारे कई पुराने मंदिरो पर या कृष्ण जी के
मन्दिरो पर रामायण ओर कृष्ण जी की कुछ लीलाए चित्र रूप मे देखी होगी,जिनका आधार रामायण ओर महाभारत जैसे ग्रंथ है।
तो क्या ये चित्र बनाने वाला व्यक्ति या बन वाने वाले ने ऋग्वेद के इस मंत्र को चित्र रूप दिया हो ताकि लोगो को इस मंत्र को समझा सके । क्या हडप्पा वासी वेद  पढते थे।ऋग्वेद मे स्वस्तिक शब्द है ओर उसका चित्र रूप जो हम आज शुभ कार्यो मे बनाते है वो हडप्पा सभ्यता से प्राप्त हुआ है।
तो क्या हडप्पा वासी भी वेद पढते थे।वे वेदो को मानते थे। मित्रो इसी चित्र को अगर थोडा मोड दे तो-

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ये ॐ बन जाता है|
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बल्थल जो आहार बसन संस्कृति (Ahar Basan Culture) का भाग था वहा 2000 ईसापूर्व पुराना एक शव मिला पद्मासन में जो समाधी का सबूत है (तस्वीर देखे) समाधी भी हिन्दू होने का सबूत है ।
अत: यदि हम इन सब प्रमाणो के अलावा कुछ अन्य सिंधु सभ्यता ओर सिंधु सरस्वती सभ्यता के कुछ अन्य स्थल जैसे कालिबंगा,लोथल आदि की वस्तुओ ओर चित्रो का अध्ययन करे तो इस तरह के अन्य ओर प्रमाण मिल सकते है जिससे ये सिध्द होता है कि सिन्धु सभ्यता एक हिन्दु सभ्यता ही थी|