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इस्लाम धर्म के पांच स्थायी फ़र्ज़ों में अंतिम फ़र्ज़ (धार्मिक कर्तव्य) है हज जो इस वर्ष २०११ के ६ नवंबर को सऊदी में मनाया जायेगा और ७ नवंबर को भारत सहित अन्य दक्षिणी ऐशियाई देशों में. यह दिन सालाना हज का अंतिम दिन होता है, इसे ईद -अल- अधाह, ज़ुहा, बड़ी ईद भी कहा जाता है यानि कुर्बानी का त्यौहार, बलिदान पर्व. ६३१ में पैगंबर मौहम्मद के नेतृत्व में दसियों हजारमुसलमानों ने मदीने से मक्का की यात्रा कर हज किया था, इस सफ़ल, हिंसा रहित हज का इस्लामी इतिहास में अपना एक महत्व है, इसी दिन पैगंबर साहब की हिजरत खत्म हुई थी, इसी हज के दौरान मक्का के परिसर की सफ़ाई की गयी कोई ३०० बुतों को निकाल फ़ेका गया इस संदेश के साथ कि अल्लाह एक है. इस हिसाब से यह १३८० वां हज है (कुछ एक सालों को छोड़कर जब हज सम्पन्न न हो सका), जाहिर है यह सफ़र कोई नया नहीं एक लंबा समय गुजर चुका है और बीता हुआ हर लम्हा अपने अच्छे बुरे असर पीछे छोड़ जाता है. कोई भी आंदोलन और उसका स्वरुप वही नहीं रहता जैसा वह अपने प्रारंभ में हो, इस्लाम भी उससे अछूता नहीं है जिसमें आज की तारीख तक कोई ३८० मत जन्म ले चुके हैं, आज हम सिर्फ़ हज और उससे जुडी विद्रूपताओं पर ही चर्चा करेंगे.

ऐसे रक्तपात से कौन सा अल्लाह/इश्वर प्रसन्न या खुश होगा

ऐसे रक्तपात से कौन सा अल्लाह/इश्वर प्रसन्न या खुश होगा

हज यात्रा दुनिया भर से शुरु हो कर मक्का में ख़त्म होती है, मक्का में शुरु होने वाले कर्मकाण्ड इस्लामी कलेंण्डर के अंतिम माह दुह अल हिजाह के ८ वें दिन से शुरु होकर १२वें दिन को समाप्त होते हैं, अधिकतर मुसलमानों को यह भ्रांति है कि हज सिर्फ़ इस्लामी पर्व है, यह सालाना समारोह मक्का में इस्लाम के उदभव पूर्व हजारों साल से होता आ रहा है जिसमें इसाई और विभिन्न पगान अरब समुदाय अपने-अपने ईष्ट देवता की मूर्ति समक्ष शिरकत करते आ रहे थे, इसी धार्मिक जमावडे के चलते न केवल मक्का उक्त भूभाग का एक प्रमुख व्यवसाय केन्द्र बना बल्कि चढ़ावे के रुप में भारी रकम हर साल मक्का में जमा होती जिस पर पैगंबर मौहम्मद के कबीले का पुश्तैनी कब्ज़ा था. हज से जुडी एक पुरानी कथा है, जिसे इस्लाम में बडे कायदे से सजा लिया गया है, कथा के मुताबिक ईसा से २००० पूर्व पैगंबर इब्राहम की खुदा ने परीक्षा ली और उनके इकलौते बेटे इस्माईल को भेंट में मांग लिया,इब्राहीम अपने इकलौते बेटे को कुर्बान करने को तैय्यार हो गये और उसका गला काटने ही वाले थे कि उन्हें तत्कालीन परमात्मा ने बता दिया कि यह एक परीक्षा थी जिसमें वह उत्तीर्ण हो गये है लिहाजा उन्हें भेड़, बकरी, मेंढे इत्यादि जैसे विकल्प दिये गये कि बेटे की जगह आप इन पशुओं का वध करके बलिदान कर सकते हैं. यह सिलसिला तभी से चला आ रहा है न कि ६३१ ई० से. एक अन्य कथा के मुताबिक इब्राहीम के इसी नवजात पुत्र इस्माईल द्वारा अपनी ऐढी जमीन पर पटकने के कारण मक्का में जल स्रोत बना जिसे आबे ज़मज़म के नाम से जाना जाता है, इन घटनाओं का जिक्र यहूदी और इसाई धर्म ग्रंथो में है जिसे कुरान शरीफ़ में भी दोहरा दिया गया है.

ईष्ट देव को खुश करने के लिये पशुओं का वध करना सिर्फ़ इस्लाम तक महदूद नहीं है, ग्रीक, रोमन,यहूदी, ईसाई और अन्य ओरियटल धर्मों में पशुवध सामान्य रुप से प्रचलित है, मुसलमानों में इसे कुर्बानी कहा जाता है, यह शब्द हीब्रू भाषा के शब्द कोर्बान से आया है जिसका अर्थ है चढावा, यहूदियों के धर्मस्थल पर बाकायदा कुबार्नी दी जाती थी. विडंबना यह है कि इस्लाम अपने समय से पहले के समय को दौरे जाहिलिया घोषित करता है लेकिन इसी जहालत के दौर की हज जैसी न जाने और कितने किस्से कहानियां नये सिरे से गढ़ कर जनता को परोसने से नहीं चूकता. जाहिर है इस्लाम के इस अंतिम फ़र्ज को लागू करने में राजनीतिक और आर्थिक कारण अधिक प्रभावी थे और है जिन्हें मात्र धर्म और कर्मकाण्ड की चादर तले ढक दिया गया है. इस सालाना मेले के बूते मक्का और मदीने की अर्थव्यवस्था पिछले १४०० साल से चल रही है इन शहरों को भूख से मुक्ति का यह पैगंबर मुहम्मद द्वारा दिया गया सबसे बडा वरदान है. इन दोनों जगह के ऊपर नियंत्रण करने के संघर्षों को देख कर यही स्थापित होता है कि यह प्रसंग शुद्ध रूप से आर्थिक राजनैतिक था और आज भी है. आज राजा सऊद खानदान ने इसे एक बेहतर पर्यटन उद्योग की तरह विकसित किया है और अरबों डालर खर्च करके इन धार्मिक स्थलों का आधुनिकीकरण भी किया है. कई ऐतिहासिक धरोहरों (तुर्की किला) को गिरा कर सात सितारे होटल और चकाचौंध कर देने वाले शापिंग माल खोल दिये गये हैं, होटलों में हर नस्ल की लडकियों द्वारा वैश्यावृति की सेवायें उपलब्ध हैं. खास लोगों को शराब भी मिल जाती है.

उपरोक्त भूमिका के मद्देनज़र अब मुख्य प्रश्न पर चर्चा करना सरल होगा, क्योंकि पाठकगण इसके बिना इस मौजू पर कोई राय बनाने में थोड़ा समय लेते. हज के अंतिम पडाव पर हर व्यक्ति को कुर्बानी देना अनिवार्य है, जिसे वह वहां भेड़, बकरी, मेंढे़, ऊँट,गाय, भैंस आदि खरीद कर देता, इस वर्ष दुनिया भर से कोई ३० लाख लोगों द्वारा हज करने के इमकान हैं, इस संख्या से आप वहां होने वाले रक्तपात का अनुमान लगा सकते हैं. व्यवहारिक कर्मकाण्ड की विद्रूपता यह है कि मक्का में कुर्बानी करने वाला हाजी इस पशु का गोश्त खा ही नही पाता, बस सुन्नत के नाम पर गुर्दे, कलेजी निकाल कर पका ली जाती हैं और बाकी गोश्त सरकार की चैरिटी को दान कर दिया जाता है जिसे कहा जाता है कि गरीब मुल्कों में भेजा जाता है, ध्यान रहे यह व्यवस्था ८-१० साल पहले तक नहीं थी..तब यह तमाम गोश्त रेगिस्तान में दफ़ना दिया जाता था.

पैगंबर के ज़मानें में पशुवध इस लिये जायज़ हो सकता था कि इस पर्व के दौरान हजारों गरीब गुर्बों को इस बहाने खाने को गोश्त मिल जाता

(दूसरे पशुपालन का काम करने वाली जातियों के पशु हर साल अच्छी कीमतों में बिक जाते, जो आज भी चालू है) क्योंकि कुल गोश्त को तीन हिस्सों में बाँटते, एक हिस्सा घर, दूसरा खानदान और तीसरा हिस्सा गरीबों का, लेकिन जब कर्मकाण्ड चेतना पर कब्ज़ा कर ले तब कोई कूढमगज़ ही पशु की कुर्बानी उसके गोश्त को दबाने के लिये करेगा. हाजियों की बडी संख्या कुर्बानी के इस कर्मकाण्ड को बजाये मक्का के अपने गृह राज्य में भी करने लगी हैं, लेकिन फ़िर भी, मक्का में होने वाले इस विश्व के सबसे बडे पशुवध मेले को आज की परिस्थितियों में स्वीकार किया जाना एक मुजरिमाना कार्यवाही है, न केवल संवेदना के स्तर पर बल्कि दुनिया भर में इतनी बडी खाद्य सामग्री के अपमान के कारण भी इस पर तत्काल प्रतिबंध लगे और कुर्बानी करने वाले धर्मभीरुओं को दुनिया का वह हिस्सा दिखाया जाना चाहिये जहां अकाल पडा है और अरबों लोगों के पास खाना ही नहीं पीने का पानी भी नसीब नहीं है, जब एक अरब इंसान इस पृथ्वी पर भूखा हो तब ३० लाख आदमी मक्का में कुर्बानी कर के अपने गुनाहों की माफ़ी मांगता है, है न विडंबना..इंसान की भी और उसके इश्वर की भी. धर्म अगर एक घंधा न बन गया होता तो यही हाजी और उनका हज संचालन करवाने वाले राजा, क्या इस गोश्त का निर्यात पिछले ४०-५० साल से इथियोपिया, सोमालिया, सूडान, कांगों, बांगलादेश जैसे देशों में नहीं कर सकते? क्या अब तक सऊदी अरब के आस पास के देशों की भूख की समस्या हल नहीं हो गयी होती? क्या यह जरुरी है कि पशुओं की कुर्बानी दी जाये…क्या इस पशु के मूल्य के बराबर पानी, दवा, खाद्यान्न आदि नहीं भेजा जा सकता? आज दुनिया इतनी छोटी बन चुकी है अगर इच्छा शक्ति हो, संवेदना हो, परोपकार की भावना हो तो बहुत से विकल्प हैं लेकिन कुरान शरीफ़ के अंतिम सत्य से आगे देखने का साहस कौन करे?

मक्का में हज के अतिरिक्त पूरी दुनिया के करीब १.५ अरब मुसलमान इस पर्व पर अपनी हैसियत के मुताबिक कुर्बानी जरुर करते है, भारत जैसे मुल्क में इस कुर्बानी का न कोई धार्मिक अर्थ रह गया है न गरीबों के प्रति किसी संवेदना का. तीन दिन तक जी भर कर जानवर काटे जाते और कुर्बानी करने वाले घरों में गोश्त इतना इकट्ठा हो जाता कि उसे रखने की जगह न रहती, कुर्बानी करने वाले परिवार ही आपस में एक दूसरे के घरों से आने वाले गोश्त का विनिमय करते रहते और जिन्हें इस गोश्त की वाकई जरुरत होती वह फ़िर भी इससे महरुम ही रहते. बलि दिये गये जानवरों की खालों को आमतौर पर मदरसों-मस्जिदों को दान कर दिया जाता जिसे वह बाज़ार भावों के मुताबिक बेच कर पैसा कमाते, हफ़्ते दस दिन तक मुल्लाह-इमाम-हाफ़िज की दाढि़याँ सालन की चिकनाई में तर रहती, उन्हें लगता कि देखों इस्लाम अपने उरुज़ की तरफ़ किस कदर तेज़ी से बढ़ रहा है. नव धनाढ्य मुस्लिम कई लाख-लाख रुपये का बकरा खरीद कर उसकी कुर्बानी करके समाज में अपने रुतबे का फ़ाहशी दिखावा करेंगे और न कोई मुल्लाह बोलेगा न कोई इमाम.

मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व अपनी आत्ममुग्धता और सर्वश्रेठवादी विचार के चलते लगभग अंधा हो चुका है, जिस वर्ग के विश्वास को संचालित करने की डोर १४०० वर्ष पुरानी सोच हो उससे भला यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि मुसमानों के इस व्यवहार का इस पृथ्वी के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड रहा है? एक अनुमान के मुताबिक बंगलादेश जैसे गरीब देश से धनपति एक लाख मुसलमान इस वर्ष हज और कुर्बानी करने के लिये लगभब ५० करोड अमेरिकी डालर खर्च कर के अपने देश के अमूल्य संसाधनों को नष्ट कर के और गरीबी की दलदल में धंस जायेगा, हर वर्ष २ से ३ अरब डालर हज पर खर्च किये जाते हैं..अभी वक्त आ गया है कि मुस्लिम समाज इन सभी सवालों पर कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करे. आखिर इन पंक्तियों के लेखक ने अपने अल्प जीवन में ही १९७५-७६ में दस रुपये प्रति किलो बकरे के गोश्त, ५ रु० किलो भैंस/कटडे का, २०-२५ रु० की मुर्गी खरीदी है जो आज क्रमश:३००.००/१००.००/१५०.०० प्रति किलो पहुंच गया है क्यों? क्या सिर्फ़ इसके लिये मुद्रा स्फ़ीति ही जिम्मेदार है? २५ साल पहले मुर्गी का गोश्त सबसे मंहगा था जो आज उसी अनुपात के अनुसार सबसे महंगा होना चाहिये था, लेकिन ऐसा इसलिये नहीं हुआ क्योंकि पोल्ट्री फ़ार्म्स के आने से उसकी सप्लाई बढ गयी…आज पशुपालन के क्षेत्र में भारत बहुत पिछडता जा रहा है जिसका प्रमुख कारण है कि इसे खाने वालों का अनुपात, पालने वालों से अधिक बढा, इसी कारण दूध के मूल्यों में भी बेहताशा वृद्धि पिछले २० वर्षों में ही हुई है. क्यों नहीं आज कोई फ़तवा दिया जाता कि एक बकरा वही काटे जो पहले पांच बकरे पाले? भैंस को पालने वाला ही उसके कटडे को कुर्बानी दे सकने का हकदार हो? क्यों नहीं कुर्बानी के बराबर धनराशी का इस्तेमाल शिक्षा फ़ण्ड बना कर किया जा सकता? क्यों नहीं एक इमाम हर साल इसी एकत्रित धन से कोई इंजीनियरिंग अथवा वोकेशनल कालेज का उदघाटन कर सकता? आठ-आठ, दस-दस बार उमरा और हज करने वाले अपनी मुक्ति के लिये जितने आतुर दिखाई देते हैं,वह अपने आस-पास के समाज और उनसे जुडी समस्यायें के प्रति उतने ही अंधे क्यों हैं? क्यों धार्मिक नेतृत्व उन पर प्रतिबंध लगाता? क्यों न यह हर साल बर्बाद होने वाला पैसा समाज से गरीबी और अशिक्षा मिटाने के लिये किया जाये? क्या परलोकवादी इस्लाम से इस लोक के प्रश्न और उनके समाधान प्रस्तुत करने की दिशा में कोई उम्मीद की जानी चाहिये? क्या उन्हें यह बताने की जरुरत है कि इस त्यौहार के सात दिनों के बाद कोई गैर मुस्लिम मुसलमानों के गली मौहल्लों से बिना मुंह पर कपडा बांधे नहीं गुजर सकता? क्या इस त्यौहार पर जिस तरह गलियों में, नालियों में पशुओं का खून बहाया जाता है वह किसी शिष्ट संस्कृति का परिचायक है? क्या छोटे-छोटे मासूम बच्चों के सामने उसके बाप द्वारा बकरे,गाय, भैंस के गले पर छुरी फ़ेरना, उनका अनुकूलन करना नहीं है? क्या इस महीमा मंडित हिंसा को देखने वाले बाल ह्र्दय में हम कूट-कूट कर हिंसा नहीं भर देते? क्या यही धर्म है, यही आध्यात्मवाद है? हो सकता है इसकी जरुरत १४०० वर्ष पहले हो, लेकिन क्या आज भी इस मानसिक अत्याचार की कोई आवश्यकता है?

अभी समय आ गया है कि मुस्लिम समाज बलिदान को वास्तविक अर्थों में समझ ले, बलिदान दें अपने आडंबरों का, बलिदान दें अपनी मूढ़ता को त्याग कर, बलिदान करें अपने समाज में व्याप्त जातिवाद को त्याग कर, कुर्बानी ही देनी है तो दहेज न ले, न दें जिसका कैंसर पूरे समाज को खा रहा है…नेता भी चुप है और मुल्लाह भी, बलिदान करें- गरीब घरों में अपने बच्चों की शादी करके, बलिदान करें..किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा दिला कर, बलिदान करें किसी चलते हुए शिक्षण संस्थान में दान करके, बलिदान करें, अपने पर्यावरण की हिफ़ाज़त करके, बलिदान करें अपने आस पडौस में सफ़ाई करके, कुर्बानी देनी है तब पशु की कीमत के बराबर अपने आस पडौस में पेड़ लगा दें/किसी बीमार को दवा ला दें/किसी अनाथालय अथवा वृद्धाश्रम में दान दे दें, बलिदान करें इस समाज को शोषण से मुक्त करके, बलिदान करें अमन, भाई चारे को कायम करके..करने के लिये इतना कुछ है कि कई जीवन चाहियें, लेकिन जिन्हें सिर्फ़ जन्नत और हूरों के ख्वाब का चश्मा जन्म से मृत्यु तक चढा दिया जाता हो, वह इन सब मूल्यों के प्रति न केवल निष्पृह जो जाते है बल्कि अपने आने वाली पीढियों को भी एक अभूतपूर्व अंधकार में वह ढकेल जाते हैं.. जाते जाते सिर्फ़ कर्मकाण्ड और दिखावे की चुस्की उनके मुंह में लगी छोड़ देते हैं, इसी चुस्की को जाने वाला स्वंय जीवन भर चूसता रहता और इसी को आने वाले के मुंह में छोड़ जाता है…क्या यह सिलसिला कभी टूटेगा? क्या सिर्फ़ अपनी मुक्ति चाहने वाला यह समाज लगातार बढ़ रहे विद्रूपताओं के कोढ़ से खुद को और समाज को मुक्त कर पायेगा?

शमशाद इलाही अंसारी

-टोरोंटो, कनैडा

नोट: तकनीकी कारणों के मद्दे नज़र मैं इस लेख को अपनी भारत यात्रा के दौरान न प्रकाशित कर सका, बारहाल यह लेख अब और आने वाली कई शताब्दियों तक प्रसांगिक है और रहेगा, फ़िर भी अगर कोई असुविधा हुई हो तो उसके लिये खेद है. मुस्लिम समाज में कोई खुली सोच और चिंतन विकसित हो इस लेख का आश्य यही है. Dec 12,2011