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is Islam religion of Peace?

कुछ दिन पहले हमारे ब्लॉग के एक पाठक महोदय शाहबाज खान ने टिप्पणी देते हुए एक अजीब सा तर्क दिया है ,कि किसी प्राचीन ग्रन्थ में ” हिन्दूधर्म “ शब्द का कोई उल्लेख नहीं मिलता है , इसलिए हिन्दूधर्म नामका कोई धर्म नहीं है .जबकि इस्लाम के साथ दीन यानी धर्म शब्द लगा है ,इसलिए इस्लाम एक धर्म है .और उन महाशय से हमारा यही जवाब है कि यदि इस्लाम को धर्म मान भी लिया जाये तो इसमे कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है .यही ऐसा धर्म है कि जिसमे रसूल के साथियों , खलीफाओं और मुहम्मद की पत्नियों को मुसलमानों का एक बहुत बड़ा समुदाय खुले आम लानत भेजता रहता है .यही धर्म है जिसमे रसूल द्वारा परदे का हुक्म होने के बावजूद खुद उनकी पत्नी बेनकाब होकर जंग करती है .और जिसके कारण आजतक मुस्लमान आपस में लड़ते रहते हैं .यही नही जहाँ भारत की स्त्री अपने पति के साथ कई जन्मों तक साथ निबाहने का इरादा रखती है .इस्लाम ही एक धर्म है ,जिसमे रसूल की प्यारी पत्नी मरने के बाद रसूल के साथ कब्र के दफ़न होने की जगह पत्थर या जंगल का पेड़ बनने की इच्छा रखती है .
इस लेख से हमारा उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं बल्कि प्रमाण देकर लोगों का इस्लाम के बारे में भ्रम दूर करना है , जिसे संक्षिप्त में बिन्दुवार दिया जा रहा है ,

1-आयशा का परिचय

मुहम्मद साहब की कुल 12 पत्नियाँ थीं , जिनमे आयशा तीसरे नंबर पर आती है ,अयश के पिता का नाम अबूबकर था जो मक्का में आकर बस गए थे ,अयशा (Arabic: عائشة ) का जन्म सन 612 ईo में हुआ था .आयु में सबसे छोटी होने पर भी मुहम्मद साहब ने सभी औरतों के साथ आयशा को भी ” उम्मुल मोमिनीन “(Arabic: أمّ المؤمنين   ) यानी ईमान वालों की माता का पद दे दिया था .जो कुरान की सूरा – अहजाब 33:6 में वर्णित है ,

2-आयशा की हदीसें

मुहम्मद के सहाबी अबू हुरैरा की कुल 5374 हदीसें किताबों में मौजूद हैं , उनमे रसूल के घर के लोगों द्वारा कही गयी हदीसों की संख्या इस प्रकार है ,आयशा 2210,उमर खत्ताब 527,अली इब्न अबी तालिब 536 और आयशा के पिता अबू बकर 142.इस प्रकार मुहम्मद के घर में ही कुल 3425 हदीसों का जन्म हुआ है .अर्थात आधी से अधिक हदीसें तो केवल आयशा द्वारा बयान की गयी हैं .

3-आयशा की पिटायी

“आयशा ने कहा कि जब भी मैं रसूल को बताये बिना किसी काम के लिए बाहर जाती थी तो रसूल गुस्सा होकर मेरी छातियों पर इतनी जोर से घूंसे मारते थे , कि जिसके कारण कई दिनों तक छातियों में दर्द होता रहता था ”
सही मुस्लिम -किताब 4 हदीस 2127

4-आयशा के झूठ

“” अस्वादबिन यजीद ने कहा कि आयशा ने बताया है , कि रसूल ने अली को पहला खलीफा बनाने की वसीयत करने की इच्छा प्रकट की थी , जिसका मैंने भी समर्थन किया था .लेकिन उस समय उनके सीने में तेज दर्द उठने लगा . इस लिए मैंने उनको सहारा देकर अपनी गोद में लिटा लिया .ताकि वह आराम कर सकें , लेकिन मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था कि वह रसूल की अंतिम साँस थी “Sahin Muslim. Kitaab al Wasiyya-Book 013, Number 4013

“रसूल की म्रत्यु के बाद जब लोगों ने आयशा से रसूल की वसीयत के बारे में पूछा तो .तो आयशा ने इंकार कर दिया .और कहा कि रसूल ने अपने पीछे न कोई दीनार ,दिरहम छोड़ा है .और न उनके पास कोई बकरी , भेड़ या कोई ऊंट ही था . यही नहीं उनके पास कोई निजी सामान भी नहीं था . इसलिए उनकी वसीयत का सवाल ही नहीं उठता “
Sahin Muslim. Kitaab al Wasiyya-Book 013, Number 4011:

5–जंगे जमल

इस्लामी इतिहास में ‘जंगे जमल “ को ऊंटों की लड़ाई (Battle of Camel ) कहा जाता है , यह घटना 3 दिसंबर सन 656 ईसवी में बसरा के पास खुरैबा गाँव के “वादी उस्सबा “मैदान में हुई थी . इस लड़ाई में एक तरफ आयशा के समर्थकों और दूसरी तरह अली के समर्थकों में लड़ाई हुई थी , जिसमे आयशा की फ़ौज ह़ार गयी थी .इस लड़ाई में आयशा के 16796 सैनिक और अली के 1070 सैनिक मारे गए थे .

6-लड़ाई का कारण

शिया इतिहासकारों के अनुसार अयशा अली से उसी समय से नफ़रत करने लगी थी , जब वह एक व्यक्ति के साथ चुपचाप चली गयी थी , और लोगों ने उस पर व्यभिचार का आरोप लगा दिया था .लेकिन अली ने उसका बचाव नहीं किया था .और जब आयशा से पूछा गया कि वह रात भर कहाँ रही तो उसने बहाना कर दिया कि वह अपने गले का हार (Neckless ) खोज रही थी ..जबकि वह एक व्यक्ति के साथ अकेली पकड़ी गयी थी , और हसन ने यह बात अपने पिता अली को बता दी थी . यह सारी घटना इस हदीस में मौजूद है .
Sahih Bukhari Volume 5 ,Book 59,hadith number 462:

7-लड़ाई का कारण -2

आयशा का अली से नफ़रत करने का दूसरा मुख्य कारण यह था , कि जब खलीफा उस्मान की हत्या हुई तो आयशा मदीना में नहीं थी , वह अपने रिश्तेदार जुबैर को खलीफा बनवाना चाहती थी ,लेकिन उसे पता था कि मुहम्मद साहब ने सबसे पहले अली को ही खलीफा बनाने की इच्छा प्रकट कर दी थी .इस लिए अली आयशा के रास्ते की रूकावट बन रहे थे .जब उस्मान का क़त्ल हुआ तो अली बसरा में थे . आयशा जब मदीना आई तो उसने लोगों को बहकाया कि उस्मान की हत्या में अली का हाथ है .आयशा ने कुरैश के सरदारों से कहा कि हमें बसरा जाकर उस्मान की हत्या का बदला लेना चाहिए .और आयशा के साथ जुबैर और ताल्हा भी शामिल हो गए ,आयशा ने फ़ौरन एक फ़ौज बना कर बसरा की तरफ कूच कर दिया , फ़ौज का खर्च यमन के उसी गवर्नर ने दिए जिसे अली ने नियुक्त किया था .अपने इस भारी फ़ौज की कमान संभालने के लिए आयशा ने अपना बुरका फेक दिया और बेपर्दा होकर ” अल अक्सर ” नाम के ऊंट पर सवार हो गयी .इस तरह वह इस्लाम की पहली ऐसी औरत थी , जिसने मुहम्मद की पत्नी होने के बावजूद कुरान में दिए गए परदे के हुक्म का उल्लघन किया था 

8-लड़ाई का नतीजा

चूंकि आयशा ने बेपर्दा होकर ऊंट पर सवार होकर लड़ाई का नेतृत्व किया था . इसलिए लोग आयशा के समर्थकों को ” ऊंट वाले “(the companions of the camel)الاصحاب الجمل “)  कहने लगे .जो आजकल ” सुन्नी ” मुसलमान कहलाते हैं .लेकिन अली आयशा के समर्थकों को ” नकिसून الناّكثون ” यानी वचन तोड़ने वाले कहते nakisun (those who broke oath), थे .इस शब्द का उल्लेख कुरान की सूरा 48 आयत 10 में है .और जो लोग अली के साथ थे उनको ” शीअते अली شيعة العلي” यानी अली के अनुयायी कहा जाता है .अर्थात (the followers of Ali).यद्यपि इस ऊंट के युद्ध में आयशा के समर्थक बुरी तरह से पराजित हुए थे .लेकिन शिया लोगों के अनुसार इसी धूर्त , बेशर्म . और चरित्रहीन औरत आयशा के कारण मुसलमानों के दो गिरोह बन गए . जिनकी आपसी लड़ाई में अब तक करोड़ों लोग मारे गए हैं
.यही कारण है कि मुसलमानों का दूसरा बड़ा समुदाय ” शिया ” सार्वजनिक रूप से मुहम्मद के साथियों ,और उनकी पत्नियों , खासकर आयशा को गालियाँ देते हैं , और उन पर लानत भेजते रहते हैं .जो इस विडिओ में दिया है -Video

Aisha & The Shia | عائشة والشيعة

9-आयशा लानती है ?

आयशा धिक्कार योग्य है , यह प्रमाणों से सिद्ध हो चूका है , मुसलमानों को पता होना चाहिए कि रसूल की पत्नी या रिश्तेदार होने पर भी कोई सच्चा मुसलमान नहीं माना जा सकता है , जब तक उसके कर्म अच्छे नहीं हों . जिसकी मिसाल खुद कुरान की इस आयत में दी गयी है .फिर मुल्ले मौलवियों की क्या हैसियत है .
“अल्लाह ने कुफ्र करने वालों के बारे में नूह की पत्नी और लूत की पत्नी की मिसाल पेश कर दी है , और उनके लिए कहा कहा कि जाओ आग में जहन्नम की आग में दाखिल होने वालों के साथ “सूरा -तहरीम 66:10

10–आयशा की अंतिम इच्छा

शिया विद्वान् अल्लामा हाफिज कारी वदूद हयी ने अपनी किताब ” हयाते आयशा ” में लिखा है कि जब रसूल की मौत के बाद लोग अयशा को तसल्ली देने के लिए आये ,तो उसने लोगगों से कहा कि यदि मैं मर जाऊं तो मुझे रसूल के साथ उनके हुजरे में दफ़न नहीं करना ,बल्कि मुझे अल बाकी कबरिस्तान में दफ़न करना ,जहाँ रसूल की दूसरी औरतें दफ़न है , मैं तो चाहती हूँ कि मैं मरने के बाद पत्थर या जंगल का कोई पेड़ बन जाऊं “
“when people came to her for meeting, and gave her hope; she said ,she made this will that she should not be buried in this hujra/place where prophet asws was buried,
so bury me along with other wives in baqi’i”she said 
“i wish i was a stone or a plant in a jungle”

“كنت أتمنى لو كان حجر أو زرع في غابة”
hayat-e-ayesha, qari waduud, page 109]

11-शहबाज खान को जवाब

अब हम  शहबाज खान से इतना ही कहना चाहते हैं कि किसी चीज का नाम नहीं होने , या नाम बदल देने से लोग गुणों के आधार पर हिन्दूधर्म को धर्म स्वीकार कर लेंगे .लेकिन जिस इस्लाम में खुद मुसलमानों के एक समूह खुले आम मुहम्मद के साथियों को गाली देता हो .जिस इस्लाम में रसूल की औरत व्यभिचार में पकड़ी जाये और उसे बचाने के लिए कुरान की आयत बना दी जाये ,और जो रसूल दूसरों की औरतों के लिए परदे का आदेश देता हो उसी की पत्नी सबके सामने बेनकाब हो कर लड़ाई में हिस्सा लेती हो .और जिस रसूल की प्यारी पत्नी मरने के बाद रसूल के साथ दफ़न होने की बजाये पत्थर या पेड़ बनने की इच्छा रखती हो .हम ऐसे इस्लाम को धर्म कैसे मान सकते हैं .इस से तो बिना नाम का हिन्दू धर्म ही बेहतर है , हिन्दुओं का कोई भी समुदाय न तो किसी दूसरे समुदाय को गाली देता है , और न उनकी हत्याएं करता है .बताइए जो ऊंट वाली के समर्थक भारत को “भारतमाता “कहने पर आपत्ति उठा देते है , वही एक चरित्रहीन औरत को “उम्मुल मोमिनीन “किस मुंह से कहते हैं ?
.हम ऐसी दोगली निति वाले इस्लाम को धर्म नहीं मान सकते .

http://www.ismaili.net/histoire/history03/history339.html
http://bhaandafodu.blogspot.in/2013/03/blog-post_15.html