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इस्लामी आक्रमणकारियों ने जिस प्रकारसे अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मस्थान एवं काशी के विश्वनाथ मंदिर को बलपूर्वक ले लिया था, उसी प्रकार का प्रयत्न वे धार (मध्यप्रदेश) की भोजशाला के विषय में कर रहे हैं । भोजशाला, अर्थात विद्या की देवी सरस्वती का प्रकटस्थल ! अपने अनेक प्रकारकी विद्याओं का जनक भारतीय विश्वविद्यालय ! महापराक्रमी राजा भोज की तपोभूमि ! इस सरस्वतीदेवी के मंदिर में आज प्रत्येक शुक्रवार को ‘नमाज’ पढी जाती है । सहस्रों वर्ष से चल रहा इस भोजशाला मुक्ति का संघर्ष आज भी जारी है । अधर्मी शासन मतों की तुष्टीकरण राजनीति से प्रेरित होकर हिंदुओं के आस्था केंद्रों की उपेक्षा कर रहा है । पुनर्वैभव की प्रतीक्षा कर रहे भोजशाला की श्री सरस्वती देवीका परंपरागत वसंतोत्सव शुक्रवार, १५ फरवरी २०१३ को है ।

भोजशालाका भव्य प्रांगण तथा मध्यभागमें विशाल यज्ञकुंड

भोजशाला का भव्य प्रांगण तथा मध्यभाग में विशाल यज्ञकुंड

भोजशालाका इतिहास तथा उसका प्राचीन वैभव !

१. सरस्वती देवीकी प्रकटस्थली, अर्थात वाग्देवी मंदिरका इतिहास ! : ‘पूर्वकाल में मालवा राज्य के (वर्तमान मध्यप्रदेश के) परमार वंश में महापराक्रमी और महाज्ञानी राजा भोज (शासनकाल वर्ष १०१० से १०६५) हुए । इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सरस्वती देवी ने उन्हें दर्शन दिए थे ।  तत्पश्चात, राजा भोज ने सुप्रसिद्ध मूर्तिकार मनथलद्वारा संगमरमर पत्थर से देवी की शांतमुद्रा में मनमोहक मूर्ति बनवाई । राजा भोज को जिस स्थान पर वाग्देवी के अनेक समय दर्शन हुए थे, उसी स्थान पर इस मूर्ति की स्थापना की गई ।

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शिलालेखपर शब्द – ‘सीताराम’

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उत्खनन में पाए गए स्तंभपर देवी-देवताओं की शिल्पकारी

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उत्खनन में पाए गए स्तंभपर देवी-देवताओं की शिल्पकारी

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उत्खनन में पाए गए व्याघ्रमुख एवं स्तंभ

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मंदिर के गर्भगृह की चौखट पर घंटेकी शिल्पकारा

२. केवल सरस्वती देवी की प्रकटस्थली नहीं, अपितु भारत का सबसे बडा विश्वविद्यालय ! : राजा भोज ने ‘सरस्वती देवीकी उपासना’, ‘हिंदू जीवनदर्शन’ एवं ‘संस्कृत प्रसार’ के लिए वर्ष १०३४ में धार में भोजशाला का निर्माण किया । इस भोजशाला में भारत का सबसे बडा विश्वविद्यालय और विश्व का प्रथम संस्कृत अध्ययन केंद्र बना । इस विश्वविद्यालय में देश-विदेश के १ सहस्र ४०० विद्वानों ने अध्यात्म, राजनीति, आयुर्वेद चिकित्सा, व्याकरण, ज्योतिष, कला, नाट्य, संगीत, योग, दर्शन इत्यादि विषयों का ज्ञान प्राप्त किया था । इसके अतिरिक्त इस विद्यालय में वायुयान, जलयान, चित्रकशास्त्र (कैमरा), स्वयंचलित यंत्र इत्यादि विषयों में भी सफल प्रयोग किए गए थे । एक सहस्र वर्ष पूर्व राजा भोज के किए हुए कार्य को भारतीय शासकों ने दुर्लक्षित किया था, किंतु आज भी विश्व उसे आश्चर्यभरी दृष्टिसे देख रहा है । इस विषय में संसारके २८ विश्वविद्यालयों में अध्ययन और प्रयोग किए जा रहे हैं ।

भोजशाला का वैभव नष्ट करने वाले धर्मांध मुसलमान आक्रमणकारी और उनका प्राणपण से विरोध करनेवाले हिंदू राजा !

१. राजा भोज के राज्य की अखंडता पर कपट से आघात करने वाला ‘सूफी संत (?) कमाल मौलाना’ ! : राजा भोज के असामान्य कर्तृत्व के कारण उनके राज्यपर आक्रमण करने का साहस किसी को नहीं होता था । उनकी मृत्युके लगभग २०० वर्ष पश्चात, इस राज्य की अखंडतापर पहला आघात किया सूफी संत के रूपमें घूमनेवाले कमाल मौलाना ने ! वर्ष १२६९ में मालवा में आए इस मौलानाने यहां ३६ वर्ष रहकर राज्यके तथा यहां के सर्व गुप्त मार्गों की जानकारी एकत्र की । इस काल में उसने इस्लाम का प्रचार, तंत्र-मंत्र, जादू टोना, गंडा-डोरा का योजनाबद्ध प्रयोग कर सैकडों हिंदुओं को मुसलमान बनाया । इस स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा राज्यपर आक्रमण कर दिया ।

२. इस्लाम को अस्वीकार करने वाले १२०० विद्वानों को यज्ञकुंड में जलाकर हत्या करने वाला और वाग्देवी की मूर्ति का अंगभंग करने वाला अलाउद्दीन खिलजी ! : अलाउद्दीन खिलजी ने वर्ष १३०५ में मालवा राज्य पर आक्रमण कर दिया । यह आक्रमण रोकनेके लिए राजा महलक देव और सेनापति गोगादेव जी-जान से लडे । भोजशाला के आचार्यों और विद्यार्थियों ने भी खिलजी की सेना का प्रतिकार किया । किंतु, इस युद्ध में वे पराजित हुए । खिलजी ने १२०० विद्वानों को बंदी बनाकर इनके समक्ष प्रस्ताव रखा -‘इस्लाम धर्म अपना लो’ अथवा ‘मृत्यु’के लिए तत्पर हो जाओ । उसने, मुसलमान बनना अस्वीकार करनेवालों की हत्या कर उनके शवों को भोजशाला के यज्ञकुंड में फेंक दिया तथा जिन लोगों ने मृत्यु से भयभीत होकर मुसलमान बनना स्वीकार कर लिया, ऐसे कुछ मुट्ठी भर लोगोंको विष्ठा स्वच्छ करनेके कार्यमें लगा दिया । खिलजी ने भोजशाला सहित हिंदुओं के अनेक मानबिंदु स्थानों को उद्ध्वस्त किया । उसने वाग्देवी की मूर्ति का भी अंग-भंग किया तथा मालवा राज्य में इस्लामी शासन आरंभ किया ।

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श्री वाग्देवी (श्री सरस्वती देवी) के गर्भगृहके सर्वओर नई मार्बलकी पट्टी जिसपर अरबी भाषामें लिखा है । इसके साथ मंदिरके गर्भगृहके समीप नमाज पढनेवाले मौलवीके लिए बनाया गया चबूतरा ।

(संपूर्ण मंदिर गुलाबी पत्थरोंसे बना हुआ है । मंदिरमें इस मार्बलकी पट्टीके अतिरिक्त कहीं भी मार्बलका उपयोग नहीं किया गया है । इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि यह पट्टी बादमें लगाई गई है ।) ३. श्री सरस्वती मंदिर के कुछ भाग का मस्जिद में रूपांतर करने वाला हिंदूद्वेषी दिलावर खां गोरी ! : खिलजी के पश्चात गोरी ने वर्ष १४०१ में मालवा राज्य को अपना राज्य घोषित किया तथा सरस्वती मंदिर का कुछ भाग मस्जिद में रूपांतरित कर दिया । ४. भोजशाला को मस्जिद में बनाने के लिए उसे खंडित करने का प्रयत्न करने वाला तथा कमाल मौलाना को महान बताने वाला महमूदशाह खिलजी ! : गोरी के पश्चात महमूदशाह खिलजी ने वर्ष १५१४ में भोजशाला को खंडित कर वहां मस्जिद बनाने का प्रयत्न किया । महमूदशाह के इस कुकृत्य का राजपूत सरदार मेदनीराय ने प्रबल प्रत्युत्तर दिया । इस प्रत्युत्तर की विशेषता यह थी कि महमूदशाह को चुनौती देने के लिए सरदार मेदनीराय ने मालवा राज्य के वनवासियों को प्रेरित किया । धर्मयुद्ध की प्रेरणा से संगठित वनवासियों की सहायता से मेदनीराय ने महमूदशाह के सहस्रों सैनिकों को मार डाला तथा ९०० सैनिकों को बंदी बना लिया । अंततः, इस पराजय से भयभीत महमूदशाह ने गुजरात पलायन किया । महमूदशाह तो भाग गया; किंतु कमाल मौलाना की मृत्यु के २०४ वर्ष पश्चात उसने अपने शासनकाल में, भोजशाला की बाहरी भूमि पर अवैध अधिकार कर वहां पर उसकी कब्र बना दी । यह कब्र आज भी हिंदुओं के लिए सिरदर्द बनी हुई है । आज इस कब्र के आधारपर देवी सरस्वती के मंदिरको कमाल मौलाना की मस्जिद बनाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है ।  प्रत्यक्ष में वर्ष १३१० में कमाल मौलानाकी मृत्यु के पश्चात उसे कर्णावती (अहमदाबाद), गुजरात में दफना दिया गया ।

हिंदुओं का प्रवेश वर्जित कर मंदिर को मस्जिद में रूपांतरित करनेवाले (मौलाना) दिग्विजय सिंह !

सैकडों वर्ष से आरंभ भोजशाला पर आक्रमण के इतिहास में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात, १२.५.१९९७ को एक नया मोड आया, जब कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंहने एक अध्यादेश जारी कर अपना हिंदूद्वेष प्रकट किया । इस अध्यादेश के अनुसार भोजशाला की सर्व प्रतिमाओं को हटा दिया गया । वहां हिंदुओंका प्रवेश वर्जित कर दिया गया । दिग्विजय सिंह का हिंदूद्वेष इतने पर ही नहीं थमा, उन्होंने भोजशाला को मस्जिद होने की मान्यता दे डाली । उन्होंने, भोजशाला की रक्षा हेतु पराक्रमी हिंदू राजाओं के और सैनिकों के बलिदान का अनादर करते हुए भोजशाला मुसलमानों को दे डाली । भोजशाला में नमाज पढने की अनुमति देकर उसे भ्रष्ट भी किया गया । इस अध्यादेश से पूर्व भोजशाला में हिंदुओं की पूजा-अर्चनापर प्रतिबंध था; परंतु प्रवेश की अनुमति थी । यह अनुमति भी इस अध्यादेश द्वारा समाप्त कर दी गई । हिंदुओं को वर्षमें केवल एक दिन वसंत पंचमी पर विविध प्रतिबंधात्मक नियमों के साथ भोजशाला में प्रवेश की अनुमति दी गई ।

वर्ष २००२ में तो हिंदुओं को वर्ष में एक दिन दी गई भोजशाला प्रवेशकी अनुमति में भी बाधा डाली गई । इस वर्ष की वसंत पंचमी समीप आने पर कमाल मौलाना के जन्मदिन को निमित्त बनाकर भोजशाला में नमाज, कव्वाली और लंगर का आयोजन किया गया । तत्कालीन कांग्रेसी शासन ने भी हिंदुओं पर पहले से अधिक कडा नियम बनाकर धर्मांधों को  प्रोत्साहित किया । इस परिवर्तित नियम के अनुसार वसंत पंचमी के दिन हिंदुओं को दिन के १ बजे तक ही पूजा-अर्चना करने की तथा मंदि रमें अकेले प्रवेश करनेकी अनुमति दी गई । सबके लिए एक ढोलक, एक ध्वनिक्षेपक और ध्वज भी एक होगा । दोपहर २ बजेके पश्चात मुसलमानों का कव्वाली और लंगर का कार्यक्रम आरंभ होगा, यह आदेश प्रशासन ने जारी किया ।

न्यायोचित धार्मिक अधिकारोंके लिए संघर्ष करनेवाले हिंदुओंपर किए गए अगणित अत्याचार !

हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन करने वाले प्रशासनिक आदेश को अमान्य कर सहस्रों हिंदू भोजशालामें पूजा करने आए । उस दिन राजकीय अवकाश होनेके कारण हिंदुओंको अपनी न्यायोचित मांगों के लिए भी कोई मंच उपलब्ध नहीं था । हिंदूद्वेषी शासकों के आदेश से पुलिस कर्मियों ने यज्ञ करने भोजशाला में जानेवाले युगलों को रोका, गालियां दी तथा महिलाओं के हाथसे पूजा की थाली छीनकर फेंक दी । हिंदुओं को धक्के मारकर पीछे ढकेला तथा बिना कोई पूर्वसूचना दिए श्रद्धालुओं पर लाठी प्रहार किया । यह सब सहकर भी हिंदुओं ने कठोर विरोध करते हुए भोजशालामें यज्ञ और सरस्वतीदेवी की महाआरती पूर्ण की । हिंदुओं के इस सफल कृत्य से क्रुद्ध कांग्रेसी राज्यशासन ने देवी की पूजा करनेके अपराध में ४० कार्यकर्ताओंपर पुलिस की दैनंदिनी में असत्य आरोप प्रविष्ट किए । शासन की इस दमननीति का प्रत्युत्तर देनेके लिए सहस्रों लोगोंने धार जनपद के सर्व पुलिस थानोंका घेराव कर अपने आप को बंदी बनवाया । तत्पश्चात, सत्याग्रह के रूपमें प्रत्येक मंगलवारको भोजशाला के बाहर मार्ग में आकर ‘सरस्वती वंदना’ और ‘हनुमान चालीसा पढना’ प्रारंभ किया गया ।

असंख्य अत्याचारों का भय त्याग कर भोजशाला को मुक्त करने के ध्येय से व्यापक संगठन खडा करनेवाले धर्माभिमानी हिंदू !

कांग्रेसी शासनकी दमननीतिका अनुभव करनेवाले हिंदुओंने किसी भी परिस्थितिमें वर्ष २००३ तक भोजशाला हिंदुओंके लिए मुक्त करनेके उद्देश्यसे व्यापक जनजागरण कर ‘धर्मरक्षक संगम’ सभा आयोजित करनेका निश्चय किया । इन सभाओंको व्यापक जन समर्थन मिलता देखकर घबराए दिग्विजय सिंह शासनने ‘धर्मरक्षक संगम’को विफल बनाने के लिए प्रयत्न आरंभ कर दिए । कांग्रेसी शासन ने अत्यंत निम्नस्तर पर जाकर निम्नानुसार दुष्टताका हथकंडा अपनाकर हिंदुओं के संगठन में बाधाएं उपस्थित करने का प्रयत्न किया –

१. शासनने, इस कार्यक्रमके प्रचारके लिए चिपकाए गए २० सहस्र भित्ति-पत्रकोंको पुलिसकर्मियोंके हाथों फडवा दिया अथवा उनपर कोलतार पोतवा दिया ।

. वसंत पंचमी समीप आनेपर ही राज्य शासनने ‘ग्राम संपर्क  अभियान’ आरंभ कर उसमें १९ सहस्र हिंदू राजकीय सेवकोंको नियुक्त किया ।

३. ‘धर्मरक्षक संगमके कार्यक्रममें उपद्रव एवं बम विस्फोट होंगे’,यह भय फैलाकर लोगों को कार्यक्रम में जानेसे रोका ।

४. वसंत पंचमी के केवल पांच दिन पूर्व धारस्थित सर्व धर्मशाला, पाठशाला, ‘लॉज’ और बस गाडियों को अधिगृहीत कर लिया गया तथा निजी वाहन वालों को धमकाया ।

५. गांवोंमें ५ सहस्र सैनिकोंका पथसंचलन (परेड) करवाकर भयका वातावरण उत्पन्न किया ।

६. वसंत पंचमी के दिन राज्यशासन ने १६ केंद्रों में ३२ विभागों से संबंधित जनसमस्याओंका निवारण करनेके लिए शिविरों का आयोजन किया । इस शिविरमें प्रस्तुत की गई सभी समस्याओंका निवारण तुरंत किया, जिन्हें पहले करनेमें अनेक फेरे मारने पडते थे । इसी प्रकार, इस शिविरमें सहस्रों लोगोंको निःशुल्क भोजन दिया ।

केंद्र शासन का आदेश अमान्य कर राज्य शासन द्वारा हिंदुओं पर अगणित अत्याचार कर भोजशाला को मस्जिद घोषित किया जाना !

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भोजशाला परिसर में आक्रमक मुसलमानों द्वारा बनाई गई मस्जिद

कांग्रेसी शासन के उपर्युक्त हिंदूद्रोही षड्यंत्र को विफल करते हुए १ लाख से अधिक हिंदू धर्माभिमानी ‘धर्मरक्षा संगम’में उपस्थित हुए थे । इस सभा में शासन को चेतावनी दी गई कि वह भोजशाला को हिंदुओं के लिए प्रतिबंध मुक्त करे । इस आंदोलन की तीव्रता देखकर तत्कालीन केंद्रीय पर्यटन और सांस्कृतिक मंत्री श्री. जगमोहन ने भोजशाला को प्रतिबंधमुक्त करने के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था । तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस पत्रको कूडेके डिब्बेमें पेंâकते हुए भोजशालाको कमाल मौलानाकी मस्जिद घोषित कर वहां पूजा करने जानेवाले हिंदुओंको कारागृहमें डाल दिया तथा उन्हें जानसे मारनेकी धमकी भी दी । यह शासन इतनेपर ही नहीं रुका; उसने पुलिसबलका प्रयोग कर हिंदुओंका दमन आरंभ कर दिया । इन सर्व अत्याचारोंमें भी अडिग रहकर हिंदुओंने संगठित होकर जो संघर्ष किया, उसके परिणामस्वरूप ६९८ वर्ष पश्चात ८.४.२००३ को प्रतिदिन दर्शन और प्रत्येक मंगलवारको केवल अक्षत-पुष्पके साथ भोजशालामें प्रवेशको स्वीकृति दी गई । भोजशाला सरस्वती देवीका मंदिर है, यह शासनने स्वीकार किया । वर्ष में केवल वसंतपंचमी पर कुछ प्रतिबंधों के साथ पूजा करनेकी अनुमति दी गई । दूसरी ओर मुसलमानोंको प्रति शुक्रवार नमाज पढनेकी अनुमति दी गई, जो आज तक चल रही है ।

हिंदुओंके वसंत पंचमीके उत्सवमें नमाज पढनेकी अनुमति देनेवाला मुसलमानप्रेमी भाजपा शासन !

वर्ष २००३ के पश्चात थोडी-थोडी स्वीकृत मांगोंको मानकर हिंदू भोजशालामें दर्शनके लिए जाने लगे थे । वर्षमें एक ही दिन वसंत पंचमीको उन्हें वास्तविक अर्थोंमें भोजशालामें विधि-विधानसे पूजा-अर्चना करनेकी अनुमति थी । वर्ष २००६ में शुक्रवारको ही वसंत पंचमी आनेके कारण हिंदुओंने राज्यशासनसे मांग की कि आजके दिन यहां नमाज न पढने दी जाए, केवल हिंदुओंको पूजाकी अनुमति मिले, जिसे शासनने अमान्य कर दिया । भारतीय जनता पार्टीके मुख्यमंत्री शिवराज सिंहने मुसलमानोंको संतुष्ट रखनेके लिए तथा अपने दलकी धर्मनिरपेक्ष छवि बनानेके लिए भोजशालाकी यज्ञाग्नि बुझाकर मुसलमानोंको नमाज पढनेकी अनुमति दी । भाजपा नेताओंने हिंदुओंको फुसलाकर भोजशाला खाली करवाई । दूसरी ओर संत और उपस्थित हिंदुओंपर गोलियां बरसा कर उन्हें वहांसे भगा दिया गया । इस मार-पीटमें ७४ हिंदू गंभीर रूपसे घायल हुए । हिंदुओंको पीटनेके साथ-साथ १६४ हिंदुओंपर हत्याके प्रयत्न करनेका अपराध भी प्रविष्ट कर दिया । वहीं, मुसलमानोंको पुलिसके वाहनोंमें बैठाकर वहां नमाज पढनेके लिए सब प्रकारसे सहायता की ।

सरस्वती देवी को बंदीगृह में रखने वाले भाजपा के मुख्यमंत्री !

वर्ष २००६ के पश्चात पुनः वर्ष २०११ में  भाजपा शासन का हिंदूद्वेषी रूप दिखा । राजा भोज की जन्मशताब्दी पर धार के हिंदुओं ने सरस्वती देवीकी भव्य पालकी यात्रा आयोजित की थी । ‘लंदनके संग्रहालयमें रखी वाग्देवीकी मूर्तिको लाकर भोजशालामें स्थापित करूंगा’, ऐसी गर्जना करनेवाले; किंतु सत्तामदसे उन्मत्त भाजपाने मंदिरमें स्थापित वाग्देवीकी नवीन मूर्तिका अधिग्रहण कर बंदीगृहमें डाल दिया; पालकी यात्राके समारोहपर प्रतिबंध लगा दिया एवं इस समारोहका आयोजन करनेवाले कार्यकर्ताओंको भी कारागृहमें डाल दिया । इन कुकृत्योंका जब हिंदुओंने तीव्र विरोध किया, तब यह मूर्ति हिंदुओंको हस्तांतरित कर कार्यकर्ताओंको कारागृहसे मुक्त किया गया ।

वाग्देवीकी मूर्तिका पुनः अधिगृहण करनेवाले प्रशासनके षड्यंत्रमें सम्मिलित न होनेवाले हिंदुत्ववादियोंको यातनाएं देनेवाला भाजपा शासन !

वर्ष २०१२ में भाजपा शासनने पुनः वसंत पंचमीके पूर्व वाग्देवीकी मूर्तिको बंदीगृहमें डालकर सरस्वती जन्मोत्सवपर प्रतिबंध लगा दिया । शासनके इस कृत्यका असमर्थन करनेवाले संघ कार्यकर्ताओंके परिजनोंकी दुर्दशा की गई । तब मूर्तिको कारागृहसे मुक्त करनेके तथा जन्मोत्सवके लक्ष्यसे प्रेरित हिंदुओंने आमरण अनशन प्रारंभ किया । लोकतंत्रद्वारा स्वीकृत अनशनसमान शांतिपूर्ण मार्गसे होनेवाले आंदोलनको भी शासनने कुचल दिया ।

हिंदुओ, यह चुनौती स्वीकार कर अपना धर्मकर्तव्य पूरा करो !

आगामी वसंत पंचमीको वर्ष २००६ की भांति शुक्रवार ही आ रहा है । अतः हिंदुओंने मांग की है कि भोजशालामें नमाज पढना वर्जित कर, उन्हें पूजा करनेकी अनुमति मिले तथा कारागृहमें रखी गई अष्टधातुकी वाग्देवीकी मूर्ति शासन मुक्त करे । वर्ष २०१३ के अंतमें मध्यप्रदेशमें विधानसभाका चुनाव होनेवाला है । इस दृष्टिसे भाजपा भोजशालाको मुसलमानोंको दे सकती है । इससे पूर्व वर्ष २००६ में इस विषयमें भाजपाद्वारा किए गए छल-कपटको ध्यानमें रखकर हिंदुओंको सतर्क  रहना चाहिए ।

आज हिंदुओंको अपना धर्मिक अधिकार प्राप्त  करनेके लिए  प्रभावशाली हिंदू संगठनकी आवश्यकता है । इसके लिए निम्नांकित मार्गोंका अवलंबन कर सकते हैं ।

१. अपने कार्यक्षेत्रमें व्यापक जनजागरण एवं प्रबोधन करना ।

२. सामाजिक, धर्मिक एवं जातीय संघोंके माध्यमसे हस्ताक्षर अभियान चलाकर, हस्ताक्षरयुक्त पत्र मुख्यमंत्रीको भेजना ।

३. पत्र, ‘ई-मेल’, ‘फेसबुक’ इ. से अपनी भावनाएं राज्यशासन एवं केंद्रशासनको अवगत करवाना ।

४. १५ फरवरीको आसपासके मंदिरोंमें सामूहिक महाआरतीका आयोजन करना ।

५. प्रत्यक्ष भोजशालामें होनेवाले समारोहमें इष्टमित्रोंसहित सम्मिलित होना ।

अधिक जानकारीके लिए पढें : http://www.hindujagruti.org/activities/campaigns/religious/bhojshala/