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कुछ दिन पहले मैं इस्लाम हिंदूइस्म वालो की साईट देख रहा था, उसमे एक लेख देखा, स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य द्वारा कुरान की २४ आयतों का जवाब, विदित हो की अखिल भारत हिन्दू महासभा के तत्कालीन उपप्रधान इन्द्रसेन शर्मा जी ने कुरान की इन आयतों के पम्पलेट बटवाए थे, तक एक मुस्लिम बंधू ने उनके खिलाफ कोर्ट में याचिका डाल दी,
पर कहते है न की सांच को आंच नहीं, और वही हुआ, कोर्ट ने इन आयतों को खतरनाक और हिंसा भड़काने वाला बताया, अब ये इस्लाम हिन्दुइज्म की साईट पर इस लेख में कैसे स्वामी जी कैसे इन आयतों को सही करार दे रहे है वो देखते है

पहली आयत ये है :
” फिर, जब हराम के महीने बीत जाएं , तो ‘ मुशरिकों’ को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, और पकड़ो , और उन्हें घेरो, और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो । फिर यदि वे ‘तौबा ‘ कर लें नमाज़ क़ायम करें और, ज़कात दें, तो उनका मार्ग छोड़ दो । नि:संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है ।”
– ( 10 ,9 ,5 )

स्वामी जी इस आयत को सही साबित करने के लिए मुह्हमद साहब पर हमले करने वाले मक्का के गैर इस्लामिक या मुशरिको का हवाला देकर ये जाहिर करने की कोशिश की, की ये आयत केवल उन लोगो के लिए है, इसके लिए उन्होंने कुरान की और भी आयातों का हवाला दिया, अब अगर मेरे सामने कुछ लोगो की भीड़ मुझे मारने आये तो मैं बचाव या जवाबी कारवाही में अपने लोगो को निर्देश दूंगा की इन लोगो को मारो, या ख़त्म कर दो, मैं ये नहीं कहूँगा की इन जैसे दिखने वाले हर आदमी को ख़त्म करो या मार डालो, चूँकि कुरान आयातों में है पुराण की तरह कथाओं में नहीं इसलिए ये कहना मुश्किल है की अल्लाह ने कब किस समय किस आयत के जरिये निर्देश दिया की हमले करने वालो को मारो,
अब देखे:
फिर, जब हराम के महीने बीत जाएं , तो ‘ मुशरिकों’ को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, और पकड़ो ,
क्या यहाँ पर ये लिखा है की मुशरिक ने कोई गलती की है इसलिए उनको मारने का हुक्म दिया है,,फिर थोड़ी सी ही आगे – फिर यदि वे ‘तौबा ‘ कर लें नमाज़ क़ायम करें और, ज़कात दें, तो उनका मार्ग छोड़ दो । अगर हमला करने वाला तौबा कर ले नमाज अदा कर ले तो जाने दो, पहले उनके मारने का हुक्म फिर अगर वो झुक जाए तो छोड़ दो, ये तो सच है की हमले करने वाला कभी झुकने की बात सोच कर हम्ला नहीं करता, या तो वो हमलावर नहीं है या फिर उसको जानबूझ कर हमलावर दिखा कर किसी निर्दोष की हत्या करने की बात कही गयी है,उसके बाद – नि:संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है
पहले अल्लाह क़त्ल करवाता है फिर दया वां और क्षमाशील भी बन जाता है,

अब आप ही बताये स्वामी जी को ऐसा क्या दिखा की उन्होंने इस आयत को ही सही साबित करने की कोशिश की वो भी तब जब भारत के न्यायालय ने इस पर अपना फैसला भी सुना दिया है, या तो ये लोग भारत की न्याय पालिका में विश्वास नहीं रखते या फिर केवल इस्लाम के ही जंगली कानून मानते है, भारत के कानून इनकी नजर में कुछ नहीं है,

स्वामी जी ने कुरान की जीन २४ आयतों का जवाब अपनी साईट पर लिखा हुआ है, उनमे से दूसरी आयत ये है
2 -” हे ईमान’ लेन वालो ! ‘ मुशरिक’ ( मूर्तिपूजक ) नापाक हैं ।”
-( 10 ,9 , 28 )
स्वामी जी इस पर ये जवाब देते है
लगातार झगड़ा-फ़साद, अन्याय-अत्याचार करने वाले अन्यायी , अत्याचारी अपवित्र नहीं, तो और क्या हैं ?

हिन्दुराष्ट्र का तर्क

अब मेरा सवाल, पहले ये मुशरिक का अर्थ तो बताये,

जैसा की आप सब देख सकते है, इस आयत में ही मुशरिक का अर्थ मूर्तिपूजक दिया हुआ है,
अब मूर्तिपूजक है कौन कौन ये देखते है,,
हिन्दू धर्म या सनातन धर्म में अधिकतर लोग मूर्ति पूजा ही करते है, इश्वर को मानने वाले ये दलील देते है की वे मूर्ति की नहीं मूर्ति के जरिये इश्वर को पूजते है,
ये एक प्रकार से सही भी है क्युकी इश्वर निराकार रूप में अवश्य है पर वो इतना अधिक शक्तिशाली है की साकार रूप में भी आ सकता है, चलेकिन हर मानव की सोच और समझ एक सी नहीं होती, यह है हिन्दू धर्म की विशेषता, लेकिन सिर्फ सनातन धर्म ही नहीं अन्य धर्म भी जैसे यहूदी, इसाई, सिख (केवल फोटो ), जैन, बोद्ध से लेकर तक़रीबन विश्व में अधिकतर मतान्तरो के लोग मूर्ति पूजा ही करते है, ऐसे में सवाल उठता है की क्या अल्लाह के लिए सारे मूर्तिपूजक या एक तरह से कहे इस्लाम के अनुयाइयो को छोड़ कर सारे नापाक है??
क्या केवल मुसलमान ही पाक है?? जबकि इतिहास गवाह है की आज तक कोई भी मुसलमान बड़ा वैज्ञानिक नहीं हुआ, किसी भी मुसलमान ने ऐसा अविष्कार नहीं किया जिससे दुनिया खुश हो या तरक्की करे, फिर कौन पाक है कौन नापाक, इसका फैसला समय करता है किसी का अनदेखा अनजाना काल्पनिक इश्वर नहीं,,
इसलिए पहले इस्लाम हिन्दुइज्म वाले ये बताये की वे केवल इस्लाम को इंसानियत समझते है या सभी इंसानों को इंसानियत की श्रेणी में रखते है,,
तीसरी आयत का जवाब 
स्वामी जी द्वारा स्पष्ट की गयी तीसरी आयत ये है जो हिन्दू महासभा के तत्कालीन उपाध्यक्ष इंद्र सेन जी द्वारा बांटे गये एक पम्पलेट से ली गयी है,पैम्फलेट में लिखी तीसरी क्रम की आयत है: –

3 – ” नि:संदेह ‘ काफ़िर’ तुम्हारे खुले दुश्मन हैं ।” – सूरा 4 , आयत-101

वास्तव में जान-बूझ कर इस आयत का एक अंश ही दिया गया है । पूरी आयात ध्यान से पढ़ें- ” और जब तुम सफ़र को जाओ, तो तुम पर कुछ गुनाह नहीं कि नमाज़ को कम पढो, बशर्ते कि तुमकोडर हो कि काफ़िर लोग तुमको ईज़ा ( तकलीफ़ ) देंगे । बेशक काफ़िर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं ।”
-कुरआन, पारा 5 , सूरा 4 , आयत-101

इस पूरी आयात से स्पष्ट है कि मक्का व आस-पास के काफ़िर जो मुसलमानों को सदैव नुक़सान पहुँचाना चाहते थे ( देखिए हज़रत मुहम्मद सल्ल० की जीवनी ) । ऐसे दुश्मन काफ़िरों से सावधान रहने के लिए ही इस 101 वीं आयात में कहा गया है :- ‘कि नि:संदेह ‘ काफ़िर ‘ तुम्हारे खुले दुश्मन हैं ।’
इससे अगली 102 वीं आयात से स्पष्ट हो जाता है जिसमें अल्लाह ने और सावधान रहने का फ़रमान दिया है कि :
और ( ऐ पैग़म्बर ! ) जब तुम उन ( मुजाहिदों के लश्कर ) में हो और उनके नमाज़ पढ़ाने लगो, तो चाहिए कि एक जमाअत तुम्हारे साथ हथियारों से लैस होकर खड़ी रहे, जब वे सज्दा कर चुकें, तो परे हो जाएँ , फिर दूसरी जमाअत , जिसने नमाज़ नहीं पढ़ी ( उनकी जगह आये और होशियार और हथियारों से लैस होकर ) तुम्हारे साथ नमाज़ अदा करे । काफ़िर इस घात में हैं कि तुम ज़रा अपने हथियारों और अपने सामानों से गाफ़िल हो जाओ, तो तुम पर एक बारगी हमला कर दें ।
-कुरआन, पारा 5 , सूरा 4 , आयत-102पैग़म्बर मुहम्मद ( सल्ल०) कि जीवनी व ऊपर लिखे तथ्यों से स्पष्ट है कि मुसलमानों के लिए काफ़िरों से अपनी व अपने धर्म कि रक्षा करने के लिए ऐसा करना आवश्यक था । अत: इस आयत में झगड़ा करने, घृणा फैलाने या कपट करने जैसी कोई बात नहीं है, जैसा कि पैम्फलेट में लिखा गया है । जबकि जान-बूझ कर कपटपूर्ण ढंग से आयात का मतलब बदलने के लिये आयत के केवल एक अंश को लिख कर और शेष छिपा कर जनता को वरगालाने , घृणा फैलाने व झगड़ा करने का कार्य तो वे लोग कर रहे हैं, जो इसे छापने व पूरे देश में बाँटने का कार्य कर रहे हैं ।जनता ऐसे लोगों से सावधान रहे ।

Saffron Hindurashtra – यहाँ पर स्वामी जी ने ये दिखाने की कोशिश की है की ये आयत ही आधी है, इसलिए आयत में गलती नहीं है, अब मैं एक जगह पर लिखा है, गाँधी जी (मेरे लिए जी नहीं है,) का जन्म भारत में गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था,
यदि उसी वाक्य को मैं ऐसे लिखू की गाँधी जी पोरबंदर में पैदा हुए थे, तो क्या सामने वालो को समझ नहीं आयेगा, स्वामी जी ने ये बताने की जहमत नहीं उठाई की आखिर किस प्रकार के काफ़िरो को मारने का अल्लाह ने हुक्म दिया है, इस्लाम की नजर मैं जो अल्लाह को ना माने वो काफिर है, तो बंधुओ आप ही बताये की दुनिया में जो भी अल्लाह को नहीं मानता वो मुसलमानों का दुश्मन है तो मुह्हमद साहब यहाँ पर सही है या पूरी दुनिया में मुसलमानों के अलावा सब गलत है और केवल मुसलमान ही सही है,,
यहाँ पर तो एक और शब्द जोड़ा गया है जो एक आतंकी संगठन का ही दूसरा नाम है – तुम उन ( मुजाहिदों के लश्कर ),,, अर्थात यहाँ पर इस्लाम हिंदूइस्म वालो ने मुजाहिदीन और लश्कर नाम से बने हर एक आतंकी संगठन को ही सही साबित करने की कोशिश की है,
इसी पर आप ये आयते पढ़े:
कुरान में एक आयत है की ‘विश्वासियो! अपने निकट बसने वाले गैर-मुसलमानों से युद्ध करो। तुम उनके साथ कठोर बनो’ (सूरा ९ आयत १२३)

अब एक और आयत देखे, इसमे कुरान लिखने वाला एक तरह से दादागिरी दिखाते हुए लिखता है की – गैर-मुसलमानों को बता दो कि यदि वे अपने ढंग बदल देते हैं यानि कि इतिहास स्वीकार कर लेते हैं तो उनके भूतकालीन अपराध क्षमा कर दिये जाएँगे; किन्तु यदि वे पाप करने में लिप्त रहे आने की जिद्‌द करते हैं यानि कि मूर्ति पूजा करते रहते हैं तो, उन्हें उनके पूर्व पुरुषों के भाग्य (मृत्यु) का सामना करने दो यानि कि उन्हें मार दो।’
(सूरा ८ आयत ३८)

एक अन्य जगह कुरान कहता है-’चाहे निहत्थे हो अथवा हथियारों से पूर्णतः युक्त हो, अग्रसर हो, अल्लाह के लिए युद्ध करो। अपनी धन सम्पत्ति से और अपने शरीर से यदि तुम समझ सको तो यही तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ है’ (सूरा ९ आयत ४१) ‘तुम्हारे लिए युद्ध करना अनिवार्य है भले ही (तुम्हें नापसन्द हो), तुम उसे न चाहो तो भी’ (सूरा २ आयत २१६)

इन्हें पढने के बाद आप अपने विवेक से ही बताये की कुरान की ये आयते मैत्री भाईचारा बढ़ा रही है या एक इंसान को दुसरे इंसान के विरुद्ध जबरदस्त तरीके से भड़का रही है, क्या इन्हें पढ़ कर नहीं लगता की कुरान विश्व में केवल और केवल घृणा फैलाना चाहती है,

अब अगर ऐसे दुष्ट विचारों और ग्रंथो के बारे में लोगो को जागरूक करना अगर घृणा फैलाना और जनता को बरगलाना है तो जागरूकता किसे कहते है ये इस्लाम हिंदूइस्म वाले हमे बताये, हम उनके किये अनुसार कार्य करेंगे,,

चौथी आयत का जवाब –

स्वामी जी का तर्क पम्पलेट में लिखी चौथे क्रम कि आयत है :4 – “हे ‘ईमान’ लेन वालों ! ( मुसलमानों !) उन ‘काफ़िरों’ से लड़ो जो तुम्हार आस-पास हैं, और चाहिये कि वे तुममें सख्ती पायें ।” -सूरा 9 , आयत-123 पैग़म्बर मुहम्मद ( सल्ल० ) कि जीवनी व ऊपर लिखे जा चुके तथ्यों से स्पष्ट है कि मुसलमानों को काफ़िरों से अपनी व अपने धर्म कि रक्षा करने के लिये ऐसा करना आवश्यक था । इसलिए इस आत्मरक्षा वाली आयात को झगड़ा करने वाली नहीं कहा जा सकता

हिन्दुराष्ट्र का तर्क
चूँकि तीसरी आयत में ये साबित हो चूका है की कुरान की ये आयत बेहद खतरनाक और साम्प्रदायिक वैमनस्य बढाने वाली है, ये भी मैंने साबित किया की इस्लाम हिंदूइस्म वालो की आस्था आतंक को बढाने वालो में है न की ख़त्म करने वालो में, इसलिए एक तरह से ये लोग आतंकी संगठनो का ही समर्थन और भारत की न्यायपालिका का घोर अपमान कर रहे है, इसलिए हम देश के कानून से मांग करते है की ऐसे नफरत फ़ैलाने वाले साहित्य पर तुरंत बिना किसी के दबाव में आये प्रतिबंध लगाया जाए