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शिर्डी साईं – एक इस्लामिक एजेंट

मैं इससे पहले भी बहुत बार तर्क सहित प्रश्नों के साथ साईं भक्तो के सामने बहुत से सवाल रखे, पर हर बार मुझे निराशा ही हाथ लगी, दुसरे शब्दों में कहू तो साईं भक्तो का एक ही प्रशन था की साईं बाबा के खिलाफ आपके पास प्रमाण नहीं है, तर्क बहुत है पर बिना प्रमाण के वे सभी तर्क झूठे है, अब मैं ये बात कह सकता हु की मेरे पास इतने प्रमाण है की साईं के भक्त उन प्रमाणों को झुठला नहीं सकते,

मेरे सभी मित्र ध्यान दे, ये सभी प्रमाण साईं सत्चरित्र से लिए गये है, जिन मित्रो को लगता है की इसमें कुछ मैंने अपनी तरफ से जोड़ा है या गलत लिखा है तो वे प्रमाण के लिए शिर्डी से प्रकाशित साईं सत्चरित्र या उसी सत्चरित्र से इकट्ठे किये गये कुछ प्रमाण की एक पूरी कॉपी (हिन्दू व् इंग्लिश दोनों में उपलब्ध है) यहाँ देख सकते है https://hindurashtra.wordpress.com/2012/08/13/374

उसके बाद मेरा साईं के भक्तो से एक ही निवेदन है की सत्य को पहचाने, अनजाने में ही सही पर आप लोग साईं को पूजकर अपने ही सनातन धर्म की जड़े खोद रहे है, साईं न तो कोई भगवान् है और न ही इश्वर, यहाँ तक की वह तो एक हिन्दू संत होने का भी अधिकारी नहीं है, इसलिए ऐसे व्यक्ति को भगवान् कह कर अन्य सनातनी इश्वरो व् अवतारों का यह घोर अपमान है, सत्य जानने के लिए पूरा लेख पढ़े

(हृदयप्रिय बन्धुओँ! इस लेख का मंतव्यकिसी की धार्मिक भावनाओँ की भर्त्सना करना नहीँ बल्कि सत्य को उजागर करना है।)

दोस्तोँ, कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीँ रामायण और महाभारत का नाम न जानता हो?ये दोनोँ महाग्रन्थ क्रमशः श्रीराम और कृष्ण के उज्ज्वल चरित्र को उत्कर्षित करते हैँ, उसी प्रकार साईँ के जीवनचरित्र की एकमात्र प्रामाणिक उपलब्ध पुस्तक है- “साँईँ सत्चरित्र”॥

इस पुस्तक के अध्ययन से साईँ के जिस पवित्र चरित्र का अनुदर्शन होता है,
क्या आप उसे जानते हैँ?
कि

(1)साँईँ माँसाहार का उपयोग करता था?

(2)साईँ बकरा काटने का स्वयं उपदेश देता है और न काटने पर क्रोधित होकर अपशब्द कहने लग जाता है?

(3)वह स्वयं भी अपने हाँथ से बकरा काटता है?

(4)मुस्लिम होने के कारण माँस-पुलाव आदि का सेवन करना उसकी पहली पसन्द थी?

(5)साईँ ने एक अतिवादी ब्राह्मण को कुछ पैसे मांस खरीद लाने के लिए दिये?

(6)मांस-पुलाव पकाते समय एक बार साईँ ने उसी ब्राह्मण का हाँथ पकड़ कर उस बटुए मेँ डालकर कहता है कि “अपना कट्टरपन छोड़ो और थोड़ा चख कर देखो”?

(7)साँईँ ने कहा कि मैँ एक मुस्लिम फकीर हूँ ,मुझे गंगाजल से क्या लेना-देना?

(8) साईं बाबा ने एक ब्राहमण को मांस खाने के लिए बाध्य किया

(9) साईं बाबा ने न खुद कभी उपवास या व्रत रखा न किसी को रखने दिया,

(10) साईं ने कहा की ठहर जा, तू तो ब्राहमण है पर मैं तो यवनी हु,

(11) साईं बाबा के पास मस्जिद में शाकाहारी और मंशाहरी दोनों तरह के लोग आते थे, ऐसे में बाबा प्रसाद में ही मांस मिला कर देते थे,,

(12) बाबा रोज खाने से पहले फातिहा पढ़ते थे, नियमित रूप से कुरान पढना उनकी दैनिक गतिविधियों में शामिल था,,

अब कृपया आप स्वयं इन प्रश्नोँ के उत्तर देँ…..

(1)सनातन धर्म के अनुसार “जीव-हत्या पाप है” तो क्या साँईँ पापी नहीँ?

(2)क्या साँईँ की नजर मेँ हलाली किये जाने वाले जीव, जीव नहीँ कहे जाते?

(3)एक पापी जिसे स्वयं क्षणभंगुर जिह्वा के स्वाद की तृष्णा थी, क्या वो आपको मोक्ष दिला पायेगा?

(4)मानव धर्म कहता है कि जीवहत्या मेँतल्लीन व्यक्ति तत्वज्ञानी नहीँ होतेतो साँईँ तत्वज्ञानी कैसे?

(5)भारतभूमि पर जब-जब धर्म की हानि हुई है और अधर्म मेँ वृध्दि हुई है, तब-तब परमेश्वर साकाररूप मेँ अवतार ग्रहण करते हैँ और तबतक धरती नहीँ छोड़ते, जबतक सम्पूर्ण पृथ्वी अधर्महीन नहीँ हो जाती। लेकिन साईँ केजीवनकाल मेँ पूरा भारत गुलामी की बेड़ियोँ मे जकड़ा हुआ था, मात्र अंग्रेजोँ के अत्याचारोँ से मुक्ति न दिला सका तो साईँ अवतार कैसे?

(6)राष्ट्रधर्म कहता है कि राष्ट्रोत्थान व आपातकाल मेँ प्रत्येक व्यक्ति का ये कर्तव्य होना चाहिए कि वे राष्ट्र को पूर्णतया आतंकमुक्त करने के लिए सदैव प्रयासरत रहेँ, परन्तु गुलामी के समय साईँ किसी परतन्त्रता विरोधक आन्दोलन तो दूर, न जाने कहाँ छिप कर बैठा था, तो क्या ये देश से गद्दारी के लक्षण नहीँ है?

(7)यदि साँईँ चमत्कारी था तो देश की गुलामी के समय कहाँ धौँसकर बैठा था?

(8)यदि साँईँ हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक होता तो उसे ऐसा ढ़ोँग करने की क्या आवश्यकता थी कि “सिर को सदैव मुस्लिम परिधान मेँ बाँधकर रखना, सिर से पाँव तक पूर्णतया इस्लामी वस्त्र, एक लम्बी दाढ़ी, क्या ये मुस्लिम कट्टरता के लक्षण नहीँ हैँ?

(9)साँईँ की जिद थी की उसकी मृत्यु के पश्चात्‌ उसे एक मन्दिर मेँ दफना दियाजाय, क्या ये न्यायसंगत है? क्योँकि ताजमहल(शिवमन्दि र) मेँ शाहजहाँ की बेगम व अनेकानेक मुगल राजदरबारियोँ के दफनाये जाने का यहीँ रवैया था?

(10)उसका अधिकाँश जीवन कुरान व अल-फतिहा का पाठ करने मेँ व्यतित हुआ, यदि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक होता तो उसे वेद या गीता पढ़ने मेँ क्या बुराई थी?

इत्यादि दोस्तोँ आप ऐसे अनेक प्रश्न तैयार कर सकते हैँ जिससे कि साँईँ जैसे पाखंडियोँ की पोल खोली जा सके…..
(ज्ञानीजन बन्धुओँ से अनुरोध है कि अनंत- पाखंडरूप साँईँ-पूजा का बलात्‌ निषेध करेँ)

इन्द्रो विश्वस्य राजति । शं नो अस्तुद्विपदे शं चतुष्पदे ॥

हे जगदीशश्वर ! आप विद्युत के समान सारे संसार में प्रकाश मान है आपकी कृपा से दो पैर तथा चार पैर वाले सभी प्राणियों को सुख हो ||
-YAJUR VEDA
{चार पैरोँ के प्राणियोँ के सुख की कामना करने वाले वेदमन्त्र गौहत्या व जीवहत्या को कैसे जायज ठहरा सकते हैँ भला?}

असतो मा सद्गमयः
तमसो मा ज्योतिर्गमयः
(हे परमेश्वर! हमेँ बुराई से अच्छाई व अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलेँ)
ॐ!!!!!