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भाइयो कुछ दिन पहले एक सबल पूछा गया था की ढोल , गवार, पशु , शूद्र , नारी ये सब है ताडन के अधिकारी का क्या अर्थ है और क्यों तुलसीदास जी ने ये लिखा है ? …

 

पहले मै भी भर्मित हुआ था ढोल के कारण और इसके अर्थ के कारण, लेकिन जब मैंने सोचा की राम जी जो मर्यादा पुरुष कहलाते है क्या बो ऐसा बोल सकते है …या लक्ष्मण जी …???

 

फिर तुलसीदास जी ने ऐसा क्यों लिखा .. की जिसका अर्थ की बेअर्थ लग रहा है फिर .. मैंने सोचा की ये किस संदर्भ में लिखा है तुलसीदास जी ने … फिर मैंने रामचरित्र मानस पढ़ी तो ये चोपाई मुझे सुन्दरकांड  में दोह ५८ के चोपाई ६  की अंतिम पंक्ति में मिली ..जिसको पढ़ने के उपरान्त मेरी शंका का समाधान हो गया है …

 

इस में जब श्री राम जी समुद्र से प्राथना करते हुए ३ दिन वित जाते है और समुद्र रास्ता नहीं देता तब श्री राम जी अपने धनुष पर तीर लगा कर छोड़ने को तैयार हते है तो समुद्र भगवान श्री राम से क्षमा मागता हुआ बोलता है ..भगवान मेरे अब्गुन को माफ करे ..मै तो वैसा ही हू जैसा आपने मुझ को बनाया है ..

पूरा संसार आपकी माया के बश में है और आप ही इसको चलाये है अपने ही हर एक को उसका कार्य दे रखा है … जो की उसके अनुरूप सही है ..और उसके चरित्र के अनुसार है .. कुछ लोगो के लिए बो सही तो कुछ के लिए खराब है ..जैसा मेरा कार्य है की मै अपना कार्य ही कर रहा हू .. सूख कर रास्ता देना मेरे अनुरूप नहीं है और ये सही भी नहीं है … लेकिन अभिमान बस मैंने आपको जबाब नहीं दिया ये गलती है लेकिन येही मेरा कार्य है बहना बिना रुके ,

लेकिन जिस प्रकार आपने मुझे शिक्षा दी है सही कार्य के लिए उसी प्रकार भगवन ये ढोल (अंदर से खाली) , गवार( अज्ञानता के कारण) , शूद्र (कर्म के अनुसार ) , पशु ( हिंसात्मक आचरण) . नारी ( नारी ही नारी की दुसमन है  ईर्ष्यालु आचरण के कारण ) भी शिक्षा के अधिकारी है क्युकी ये लोग बो ही कर हरे है जो इनको ठीक लगता है जैसे की ढोल को सही से कोई बजाये तो संगीत बजता है ..

किसी  गवार को ज्ञान मिल जाये तो बो ज्ञानी बन जाता है ..

शुद्र जो डाकू ,या गलत कार्य करते है बो भी यदि सही ज्ञान को जनले तो बो भी बाल्मीकि जी बन सकते है ,

नारी यदि ईर्ष्यालु आचरण में रहेगी तो बो अपने ही घर और समाज को लोक हँसाई करा सकती है क्युकी नारी ही माँ, बेटी, पत्नी, बहन है ..

ईर्ष्यालु आचरण के कारन या तो बो कैकयी , सुपनखा, बन कर अपने ही घर और समाज को बुरायी दिल्बती है या सीता , कोशल्या , मंदोदरी बन कर अपने घर और समाज को मान दिलाती है ..

यहाँ पर समुद्र ने ये शब्द इस लिए कहे थे नाकि किसी जाती विशेष पर .. उनके  अनुसार यदि कोई गलत कर रहा है जो की बो उसका स्वभाब है उसको यदि राम की कृपा जो जाये तो बो भी सही दिशा में आ सकता है ..उसको भी ज्ञान मिलना चाहिए ……जिससे ये भी मोक्ष को प्राप्त हो … जय श्री राम …

 

यदि आब भी लोग इस को नहीं समझ पाए है तो मई बस इतना ही कहुगा की ……..

 

मुर्खता की कोई औषधि नहीं है.