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by: भांडाफोडू

संगीत को भी ईश्वर को प्रसन्न करने और आत्मिक शांति का साधन माना जाता है .विश्व के लगभग सभी धर्मों में सगीत के वाद्यों के साथ ईश्वर की स्तुति गाने की परंपरा है .दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे संगीत या गाने बजाने से नफ़रत होगी .लेकिन मुहम्मद साहब एक इसके अपवाद थे . जिनको संगीत से इतनी चिढ हो गयी थी कि उसे हराम कर दिया था .जिसका कोई तर्कपूर्ण कारण नहीं मिलता.
चूंकि मुसलमान ऐसे मुहम्मद साहब का अनुसरण करते है ,जिनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है .क्योंकि वह जो कहते थे उसके विपरीत काम करना उनकी आदत थी .
मुहम्मद साहब ने गाना इसलिए हराम कर दिया था , क्योंकि उनकी आवाज . भर्राती हुई और फटी हुई थी .लेकिन उन्होंने जब किसी संगीत के वाद्य को हराम किया तो , वह खुद ही खूठे साबित हो गए
.प्रमाण देखिये .
1-संगीतकार नबी राजा दाउद
मुसलमान अल्लाह की चार किताबें , तौरैत , जबूर, इंजील और कुरान मानते हैं . और अल्लाह ने जबूर नामकी किताब इस्राएल के राजा दाउद को प्रदान की थी . जो इब्रानी भाषा में थी .जबूरزبور‎ को अंगरेजी में Pslam यानि स्तुति “praises” और हिब्रू में ( Tehillim, תְהִלִּים )कहते हैं .यह किताब बाइबिल के पुराने नियम में आज भी मौजूद है . इसमें 150 भजन हैं . जो हिब्रू के ” कीना” नाम के छंद में हैं .इसे संगीत वाद्यों के साथ गाया जाता था .दाउद को अंगरेजी में David और हिब्रू में दविद ( דָּוִיד) कहा जाता है .इनका समय ई ० पू .1040–970 BC,है उस समय अल्लाह को संगीत से नफ़रत नहीं थी , क्योंकि अल्लाह के नबी ” दाउद “एक श्रेष्ठ संगीतकार थे . और उन्होंने कई संगीत के वाद्यों का अविष्कार भी किया था. हार्प Harp . तुरही Trumpet ,ढपली आदि प्रमुख हैं .इसके अलावा राजा दाउद बांसुरी ( Flute ) भी अच्छी तरह से बजाया करते थे . और उसमे कई राग भी निकल सकते थे
और जब वह यरूशलेम के मंदिर में होने वाले भजनों में अन्य वाद्यों के साथ अपनी बांसुरी भी बजाते थे तो उपस्थित लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे .
इसके बारे में बाइबिल में यह लिखा है ,
सभी पुजारी राजा दाउद द्वारा बनाये गए वाद्यों लेकर राजा के साथ खड़े हो गए .और यहोवा की स्तुति गाकर उसका धन्यवाद करने लगे “2 इतिहास 7 :6
तब यहोवा का स्तुतिगान प्रारंभ हो गया . और इस्राएल के राजा दाउद के बनाये वाद्य बजने लगे .और उनके साथ दाउद भी अपनी बांसुरी (Flute ) बजाता रहा .और फूंकने वाले भी अपनी तुरहियाँ फूँकते रहे “2 इतिहास 29 :26 -27
तुम भी राजा दाउद की तरह बांसुरी के साथ सारंगी से अपनी बुद्धि से तरह तरह के राग निकालो ” आमोस -6 :5
2-दाउद का ईश्वरीय संगीत .
कहा जाता है कि नबी दाउद ईश्वर कि स्तुति में जो सगीत वाद्य बजाते थे यसका प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं जड़ चेतन सभी पर होता था.यहाँ तक पक्षी भी संगीत सुनने के किये दाउद के पास जमा हो जाते थे . यह खुद कुरान बताती है ,
हमने दाउद को महानता प्रदान की , और पर्वतों से कहा उसके साथ भजन गायें, फिर चिड़ियों ने भी उसका साथ दिया “सूरा -सबा 34 :10
जब दाऊद बजाते थे , तो चिड़ियाँ इकट्ठी हो जाती थीं , और गाने लगती थीं ” सूरा -साद 38 :19

3-दाउद की बांसुरी को मिल गयी
चूँकि मुहम्मद साहब जगह जगह जिहाद करते रहते थे , और खुद को अल्लाह का अंतिम रसूल मानने के कारण जोभी कीमती चीज लूट में मिल जाती थी उस में जो भी महत्वपूर्ण होती थी अपने पास रख लेते थे . उनको दौड़ की बांसुरी कैसे और कहाँ से मिली . इसके बारे में हदीस में विस्तार से नहीं लिखा है .लेकिन इस एक प्रमाणिक हदीस से पता चलता है कि मुहम्मद साहब के हाथों दाउद की बांसुरी लग गयी थी .यह बिलकुल सही हदीस है , जिसे इमाम बुखारी ने नक़ल किया है , इसलिए हिंदी के साथ अरबी और अंगरेजी भी दी जा रही है ,

“Narrated Abu Musa: That the Prophet said to him’ “O Abu Musa! we have been given one of the musical wind-instruments of the family of David .’

अबू मूसा ने कहा , कि एक दिन रसूल ने बताया हे अबू मूसा मुझे दाउद के घर से एक मुंह से फूंक कर बजाने वाला वाद्य ( बांसुरी ) मिला है ”

“وروى أبو موسى: أن النبي قال له: “يا أبا موسى لقد أعطيت أنت واحدة من الأدوات الموسيقية الرياح من عائلة داود ”

बुखारी – जिल्द 6 किताब 61 हदीस 568

4-रसूल बांसुरी बजाते थे .
क्योंकि हमें पता है कि कुतर्क करना , अर्थ का अनर्थ करना , सत्य से इंकार करना मुसलमानों का स्वभाव है . और वह इस हदीस को भी गलत साबित करने का प्रयास करेंगे .लेकिन इस हदीस की व्याख्या से उनका भ्रम दूर हो जायेगा .इसमे साफ लिखा है , कि मुहम्मद साहब में दौड़ कि बांसुरी धरोहर की तरह छुपा कर नहीं रख लिया था . बल्कि उसे बजाकर कुरान का संगीत भी निकलते थे ,
इसलिए इसी हदीस की तफ़सीर देखिये .Explaning-

“He is saying Abu Musa has a beautiful voice for reciting Qur’an. and Prophet liked to beautiful Qur’anic recitation on the Flutes of David others as “musical wind-instruments of David” Notice the hadith below it speaking of playing Qur’anic recitation on flute .
इस हदीस की व्याख्या में दिया है कि अबू मूसा की आवाज बहुत ही मधुर थी . लोग उसकी तुलना दाऊद की बांसुरी की ध्वनि से करते थे . इसलिए जब भी रसूल उस बांसुरी को फूंकते थे ,तो उस में से भी कुरान के पाठ जैसी आवाज निकलती थी .रसूल कहते थे मूसा , यह दाउद की बांसुरी कुरान का पाठ करती है.

“، فهو يقول أبو موسى لديه صوت جميل لتلاوة القرآن الكريم. بعض الناس الرجوع إلى تلاوة قرآنية جميلة كما في المزامير الآخرين ديفيد بأنها “آلات موسيقية الرياح داود” لاحظ الحديث تحته الحديث عن تلاوة القرآن الكريم. ”

(Explanation -of Sahih Bukhari, Virtues of the Qur’an, Volume 6, ( البخاري، فضائل القرآن، المجلد 6 )

इस हदीस से सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में धर्म के नाम पर परस्पर विरोधी बातों का संग्रह कर दिया गया है . ताकि विरोधियों को जब चाहे जीसी न किसी नियम के अधीन फसा जा सके . और अपमे लोगों को बचा जा सके .जैसे जब मुहम्मद साहब ने संगीत , और संगीत के वाद्यों को हराम कर दिया है , तो दरगाहों में और मजारों पर कव्वालियाँ क्यों होती हैं ? और जब उसी अल्लाह ने अपने नबी दाउद को संगीत के वाद्यों से स्तुति करने की अनुमति दे राखी थी, तो महम्मद साहब ने सगीत को हराम क्यों कर दिया .? और जब हराम ही कर दिया तो खुद दाउद कि बांसुरी क्यों बजाने लगे .

अब तो रसूल का नाम ” वंशी बजैया ” रख देना चाहिए .

http://answers.yahoo.com/question/index?qid=20090311002619AAUzgO2