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मसीह में आने से पेहले मेरी ज़िन्दगी

मेरा नाम मुहम्मद अब्बास है। मैं हिन्दुस्तान का रहनेवाला हूँ। मेरे मसीह में आने की वजह आप को बताना चाहते हूँ। मैं एक मुस्लिम घराने में पैदा हुवा था। बचपन से मैं जितनी होसके उतनी रास्तबाज़ी की ज़िन्दगी जी रहा था। पर मेरी ज़िन्दगी में अमन और शांति नहीं थे। उन दिनों मैं एक फ़ैकटरी में काम कर रहा था। उसी फ़ैकटरी में यूसुफ़ नाम का एक मसीही थे। उन्होंने मेरी बेचैनी की ज़िन्दगी देखकर एक दिन मुझसे यह कहे कि – “देखिये अब्बास भाई, एक सच्चा ख़ुदा है, अगर आप उसे मानेंगे तो वह आप को उद्धार देंगे, और आपके पापों की क्षमा करके आपके हृदय में शांति देंगे”। तब मैं ने प्रश्न किया कि – “कौन सा ख़ुदा है”? क्योंकि जहाँ तक मुझे पता था, मसीही लोग तीन ख़ुदा को मानते हैं। तब उन्होंने कहा कि – “मसीह जो परमेश्वर है, आप के पापों की क्षमा कर सकते हैं”। तब मैं ने कहा कि – “मसीह तो परमेश्वर या परमेश्वर के पूत्र नहीं हैं।
वह तो एक मनुष्य हैं, और एक भविष्यद्वक्ता हैं, और हमारा यह विश्वास है”। तब उन्होंने कहा कि – “यीशु एक भविष्यद्वक्ता हैं, परन्तु वह उद्धारकर्ता भी हैं। उद्धारकर्ता इसलिये हैं क्योंकि वे हमारे पापों केलिए मरे। अगर आप प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकार्ता मानेंगे तो वह आप को शांति देंगे”। तब मैं ने कहा कि – “हाँ उद्धारकर्ता के रुप में मैं मान सकता हूँ”। क्योंकि कुछ दिन पेहले मैं ने एक मौलाना सहाब से बातचीत करते होए यह सुना था कि “यीशु का अर्थ है पापों से छुड़ानेवाला, और मसीह का अर्थ है मुरदों में रुह फूँकने वाला, मुरदों को ज़िन्दा करनेवाला और बीमारों को चंगा करनेवाला”। (इसी बात को फ़ीरोज़-उल-लुग़ात की डिक्शनरी में भी पाते हैं)। तब मैं ने कहा कि – “हाँ यीशु एक उद्धारकार्ता हैं, यह बात मैं मानता हूँ”।
फिर उन्होंने मेरेलिए इन शब्दों में प्रार्थना की – “हे प्रभु यीशु मसीह आप इनके पापों केलिए मरे और फिर से जी उठे हैं। क्योंकि आज आप जीवित हैं, इन के पापों की क्षमा कीजिये और इन को यह अनुभव होने दिजीये कि आप ज़िन्दा हैं। आप इनको शांति और तसल्ली दिजीये”। यह उनकी बहुत सीधी सधी प्रार्थना थी। उन की प्रार्थना के बाद, मैं घर गया और खाना खाकर सो गया। उस रात मैं ने बहुत अराम की नींद सोई। दूसरे दिन जब मैं सुबह उठा तो मेरे मन में एक अलग सी शांति और सुकून था, और मानो ऐसा लग रहा था कि किसी ने मेरे सर और कन्धों पर से कुछ बोझ को हटा दिया हो। मुझे बहुत हलका सा अनुभव हो रहा था। तब मैं ने दूसरे दिन उनसे कहा कि – “आपने जो प्रार्थना मेरेलिए की थी, क्या आप उस प्रार्थना मुझे बतायेंगे? क्योंकी आप की प्रार्थना के बाद मेरे दिल में अजीब सी शांति और सुकून हैं”।

फिर उन्होंने कहा कि – “वह प्रार्थना यह है कि आप अपनी तकलीफ़ें प्रभु को बतायें, वह आपको शांति देंगे”। तब मैं ने कहा कि “हम प्रभु से किस तरह केह सकते हैं। आप मुझे बताइये, और मैं उस तरह प्रार्थना करूंगा, या फिर उस प्रार्थना को मेरेलिये लिखकर दीजिये। तब उन्होंने मुझे बाईबल की नया नियम पुस्तक दिया और बताया कि – “इस नया नियम पुस्तक की पहली किताब जो मत्ती है, उस के 6 अध्याय में प्रभु यीशु मसीह ने अपने चेलों को यह प्रार्थना सिखायी थी जिसे दुआ़-ए-रब्बानी कहते हैं, आप उसे पढ़िये”। फिर उस प्रार्थना को मुझे बताया और कहा कि “आप हमेशा इस प्रार्थना कीजिये और प्रभु यीशु मसीह के वचन को पढ़िये तब आप को शांति मिलेगी”। उसके बाद मैं ने बाईबल का नया नियम पढ़ना शुरु किया। जब मैं मत्ती की इन्जील के 5वा अध्याय को पढ़ रहा था तब उस अध्याय के कुछ वचन मेरे दिल को छूलिये, जैसे के “धन्य हैं जो शोक करते हैं, क्योंकी वे शान्ति पाएँगे” तब मुझे इस तरह लगा कि प्रभु मेरी तकलीफ़ को जानते हैं और मेरी तकलिफ़ को समझ रहे हैं। तब से मैं और ध्यान से पढ़ने लगा। एक दिन जब मैं यूहन्ना की किताब (3:16) पढ़ रहा था जहाँ यह लिखा है- “क्‍योंकि परमेश्वरने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्‍तु अनन्‍त जीवन पाए”।

इस वचन को पढ़ने के बाद उनसे मैं ने प्रश्न किया कि “यह परमेश्वर का पुत्र कौन है”? तब उन्होंने कहा कि- “मसीह”। तब मैं ने प्रश्न किया कि – “मसीह परमेश्वर के पुत्र कैसे हो सकते हैं”? क्योंकि जब मुस्लिम लोग नमाज़ पढ़ते हैं, तो नमाज़ में एक सूरा है जिसे इस तरह पढ़ा जाता है- “क़ुल हुवा आल्लाहू अह़द” (कहो वह आल्लाह एक है), “आल्लाहु स्समद” (आल्लाह सनातन है), “लम यलिद व लम यूलद” (वह किसी से पैदा न हूआ, न उससे कोई पैदा हूआ), “व लम यकुन लहु कुफ़ुवन अहद” (और उसके समान कोइ नहीं है)। क्योंकि यह बात मेरे दिल में थी कि “वह किसी से पैदा न हूआ न उस से कोई पैदा हूआ”, इसलिए मैं ने उन से यह प्रश्न किया कि – “परमेश्वर से तो कोई पैदा नहीं हुआ तो उनका कोई पूत्र कैसे हो सकता है”? और यह बात तो हमारे ईमान के अनूसार पाप है, और हम इस पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। तो उन्होंने कहा कि – “यह आप की मर्ज़ी पर है, अगर आप मानना चाहते हैं तो मानें, नहीं मानना चाहते हैं तो छोड़ दीजिए। मैं तो आपके इस प्रश्न के बारे में ज़्यादा नहीं बता सकता हूँ”। फिर मैं ने कहा कि- “देखिये आपने तो कहा है कि यीशु हमारा उद्धारकर्ता हैं, और आप की प्रार्थना से मेरे दिल में शांति भी आयी है, तो मैं इन बातों के बारे में ज़्यादा जानना चाहता हूँ, क्योंकि आज तक मैं ने प्रतिदिन पांच वक़्त के नमाज़ पढ़ी और ख़ुदा के नियमों का पालन करता रहा, परन्तु इस तरह का अनुभव मुझे कभी भी नहीं हुवा। मैं यह जानना चाहता हूँ कि मसीह के नाम से की गयी प्रार्थना में क्यों इतना असर है”? मैं ने उनसे विस्तार से बताने केलिए कहा था। तब उन्होंने कहा कि- “भाई साहब मुझे बाइबल के बारे में कुछ ज़्यदा नहीं मालूम है”। मैं ने उनसे पूछा कि – “अगर आप को किसी पादरी के बारे में पता हो, तो मुझे बताइये और मैं उनसे मिलूंगा और उन्ही से अपने प्रश्नों का उत्तर जानूंगा। शायद मुझे उनसे कई उत्तर मिलेंगे”।

तब उन्होंने मु्झे एक पास्टर सहाब के बारे में बताये, जो अब चेन्नै (मद्रास) चले गये। और उन्होंने कहा कि – “मद्रास में बहुत सारे मसीही लोग रहते हैं। अगर आप जानना चाहते हैं, तो वहाँ के लोग आपके प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं”। और मैं सोंचने लगा कि करूं तो क्या करुं? परन्तु जब भी मैं दुआ़-ए-रब्बानी (जो यीशु मसीह से सिखाई हुई प्रार्थना है) को पढ़ता था और साथ ही नये नियम का अध्ययन करता था तब मेरे दिल में एक अजीब सा सुकून रहता था। और मेरे दिल में एक प्रश्न उठने लगा कि -“अखिर मसीह के नाम में ऐसी कौनसी बात है जिस के वजह से सीधी साधी प्रार्थना करने से इस तरह का सुकून मिलता है, जो कभी भी मेरे दिल में पेहले नहीं था?” ये प्रश्न बार बार मेरे दिल में उठ रहा था। इस प्रश्न की बेचैनी की वजाह से मैं नें मद्रास जाने की ठानी और मद्रास चला गया।

मसीहिय्यत को सही तरह समझना

जब मदरास रैलवे स्टेशन पर उतरा तो वहाँ पर मैं ने एक आटो वाले से पूछा कि – “भाई यहाँ पर कोई यीशु मसीह का गिरजा घर है क्या”? तब आटो वाले ने मुझ को “सन्त थोमास मऊन्ट” के उपर ले गया जहाँ थोमास की याद्गारी थी (थोमास मसीह के शागिर्द थे जो 2000 साल पेहले भारात आये हुये थे)। मैं वहाँ एक रोमन कैथोलिक पादरी से मिला और मैं ने उन से अपने प्रश्नों का उत्तर पूछा । मेरा पेहला प्रश्न यह था कि – “मसीह परमेश्वर का पूत्र किस तरह हो सकते हैं”? तब उन्हों ने मुझे बताया कि उन्हें हिन्दी नहीं अती है। फ़िर कुछ दिनों के बाद मुझे एक साहब मिले जिनका नाम विठल दास है। जब मैं उनसे मिला, उन्होंने मुझे बताया और समझाया कि- “देखिये जब हम क़ुरआ़न शरीफ़ पढ़ते हैं तो क़ुरआ़न में यह लिखा हुवा देखते हैं कि ख़ुदा की कोई बीवी नहीं है, तो उसका बेटा कैसे हो सकता है? और यह क़ुरआ़न का सूरा अन आम 6:101 में और सूरा जिन्न 72:3 में देखते हैं कि ख़ुदा की कोई बिवी नहीं है और न उसका कोई बेटा है, परन्तु हम मसीही लोग मसीह को ख़ुदा का शारीरिक नहीं परन्तु आत्मिक बेटा मानते हैं, क्योंकी यह प्रश्न बीबी मरयम ने भी किया था जब स्वर्गदूत ने आकर कहा कि – “बीबी मरयम आप को एक बेटा होगा और आप उसका नाम ईसा रखना”। तो मरयम ने स्वर्गदूत से कहा,-“यह कैसा होगा? मैं तो पुरुष को जानती ही नहीं”। तब स्वर्गदूत ने उत्तर दिया “पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य आप पर छाया करेगी, इसलिये वह पवित्र जो उत्‍पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा”। तो जो आप का प्रश्न है वह बीबी मरयम का भी प्रश्न था। परन्तु परमेश्वर का उत्तर क्या है? उत्तर यह है कि वह पुत्र परमप्रधान की सामर्थ्य से उत्पन्न होगा, और यही बात हम क़ुरआ़न में पढ़ते हैं। खास तौर से सूरह अल तहरीम 66:12 में इस तरह का ज़िक्र है कि – “याद करो इमरान की बेटी जिस ने अपनी पाकिज़गी की हिफ़ाज़त की और हमने (यानी ख़ुदाने) अपनी आत्मा उसके अंदर फूंकदिया”। इन बातों को समझाने के बाद उन्हों ने मुझे साबित करके दिखाया कि मसीह ख़ुदा के रुहानी बेटा हैं जिस्मानी बेटा नहीं हैं। तब मेरी समझ में अया कि मसीही लोग मसीह को थोड़ा अलग समझते हैं और हम लोग उस तरह नहीं समझते हैं। फिर मैं ने मद्रास से वापिस घर गया।

घर मे पेहली गवाही

इसके बाद मैं ने अपने ईमान का बायान अपने घर में किया जिस की वजह से बहुत सारे लोग मुझे प्रश्न करना शुरु किये। उन लोगों ने यह कहा कि मसीही लोगों ने बाइबल बदल दिया है, और वे तीन ख़ुदाओं को मानते हैं, और ये लोग शराब पीते हैं। इन सब प्रश्नों से उन लोगों ने मेरे दिल में बहुत सारे प्रश्न पैदा कर दिये। मैं ने फिर से उसी सहाब के पास गया और पूछा कि ‘जनाब क्या आपके यहाँ भी कोई पाठशाला होती है, जैसे कि हमारे पास होती है, जहाँ पर हम बचपन में जाते हैं और सब धार्मिक बातें सीखते हैं। अपने मज़हब के बारे में तो उन्होंने कहा, “हाँ एक बाइबल कालेज है, वहाँ पर आप सब कुछ जान सकते हैं”। फिर मैं ने बाइबल कालेज़ जाने की ठानी। मैं बाइबल कालेज़ गया। वहाँ पर दो साल की पढ़ाई की। दो साल की पढ़ाई के बाद मेरे दिल में और पढ़ने की इच्छा हूई, और फ़िर आगे भी पढ़ना शुरु कर दिया।

इस्लाम को छोड कर मसीही बना

इस के बाद मुझे बहुत सारे लोग प्रश्न करना शुरु किए और यह कहने लगे कि मैं इस्लाम को नहीं जानता हूँ, इसलिए मैं ने मसीह को ग्रहण कर लिआ है। फिर इन सारे प्रश्नों के बाद मैं ने इस्लाम की पढ़ाई शुरु करदी। जब मैं इस्लाम के बारे में पढ़चुका, तब मैं ने हज़रत मुहम्मद के बारे में पढ़ना शुरु किया। इस अध्ययन के बाद मैं ने प्रभु को स्वीकार किया और इस्लाम को पूरा छोड़ दिया।

मेरे अध्ययन का नतीजा

अध्ययन के दौरान बहुत सारे प्रश्न मेरे मन में आना शुरु होगये कि – बाइबल में ख़ुदा ने हज़रत आदम से लेकर सारे नबियों के ज़रिये यह बताया था कि मसीह ही हमारे एक उद्धारकर्ता हैं, और उसके अनुसार हज़रत ईसा सलीब पर हमारे लिए अपनी जान दीये थे। परन्तु जब मैं मुहम्मद के बारे में पढ़ना शुरु किया तब देखता हूँ कि मुहम्मद सहाब इस बात को पूरी तराह से इन्कार करते हैं। इस की वजह जब मुहम्मद की ज़िन्दगी में पढ़ते हैं तो मुहम्मद की ज़िन्दगी में ऐसी बहुत सारी बातें हैं, जैसे कि हम पढ़ते हैं सही-अल-बुखारी वाल्यूम नंमबर-7; हदीत नंमबर 658.660.661 में पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि मुहम्मद भी एक जादू के बस में थे। इतना ही नहीं जब हम “इब्न-ए-इसहाक़ का पेज नंमबर 36-72 में पढ़ते हैं कि “जब मुहम्मद सहाब बच्चा थे तब ही उनके ऊपर शैतानी प्रभाव था। तब मैं ने पढ़ा की मुहम्मद सहाब ही एक एसे नबी थे जिन के ऊपर शैतानी प्रभाव था। क्योंकि जब हम मूसा की व्यवस्था (तौरात) पढ़ते हैं तो “गिनती की किताब 23:23” में लिखा है कि इस्राएल पर कोई मंत्र या जादू नहीं चलेगा और हम ऐसा ही कथन क़ुरआन के सूरे बनी इस्राएल 17:60-65 में ख़ुदा और शैतान की बहेस में होती है। शैतान कहता है कि – “सारे इन्सान को भटका दूंगा”। ख़ुदा ने शैतान से कहा “तो जा, परन्तु मेरे जो खास बन्दे हैं उन पर कोई असर न होगा”। यही वचन हम बाइबल और क़ुरआन में पाते हैं, और ये दोनों वचन एक ही बात पर सहमत हैं। अगर यह सच है तो मुहम्मद सहाब के ऊपर मंत्र या जादू कैसे चल गया? ऐसा कोई नबी नहीं है जिन के ऊपर जादू चला हो। परन्तु जब हम बाइबल में पढ़ते हैं तब हम देखते हैं कि बाइबल में शाऊल के बारे में लिखा है कि ख़ुदा की तरफ़ से एक दुष्ट आत्मा आई जो 1 शमूएल का अधयाय 16:13-23 में है। हमें यह देखना है कि उनके ऊपर दुष्ट आत्मा क्यों आई जब हम 1 शमूएल का अधयाय 13 और 15 का अध्ययन करते हैं, तो उस में यह पाते हैं कि शाऊल ने ख़ुदा की आज्ञा को नहीं माना, इस करण ख़ुदा ने उसके ऊपर दुष्ट आत्मा को भेजा। इसके सिवा हम कहीं पर भी नहीं पाते हैं कि किसी और नबी के ऊपर ढुष्ट आत्मा आई हो। जब मुहम्मद सहाब के बारे में पढ़ते हैं, तब यह पता चलता है कि मुहम्मद सहाब दूसरे नबियों की दी हुई शिक्षा के विरुध में शिक्षा देते हैं। मैं यहाँ यह सच बताना चाहता हूँ कि ख़ुदा ने अपने सारे नबियों के ज़ारीये एक ही तालिम दिया है, परन्तु जब मुहम्मद सहाब की दि हुई शिक्षा को देखते हैं तो उनकी शिक्षा सारे नबियों के शिक्षा के विरुध में है। तो यहाँ यह पता चलता है कि जब सारे नबी सच्चे ख़ुदा की तरफ़ से भेजे गये, तो मुहम्मद सहाब उस सच्चे ख़ुदा की तरफ़ से नही भेजे गये हैं। यह तो उनकी दीगयी शिक्षा से पता चलता है। और मैं यह कहना चाहता हूँ कि सच्चे ख़ुदा को पहचाने तो हमारी आख़िरत भी अच्छी होगी अगर हम ग़लत फ़ेस्ला लेते हैं तो हमारी आख़ीरत बुरी होगी। जैसे के एक भाई सहाब ने कहा है कि किसी भी झूठ को जानने का तरीका यह है कि “किसी भी चीज़ की असली या नकली को पहचान करने केलीये उसकी असली चीज़ के बारे में हमें जानकारी रहना ज़रुरी है, तभी हम असली और नक़ली के दरमियान तुलना कर सकते हैं”। जैसे कि जब तक हम असली सौ रुपये के नोट को नहीं जानते, तब तक हम नक़ली सौ रुपये की नोट को नहीं पहचान सकते हैं।” हमें असली की पहचान ज़रुरी है। दूनयाँ के किसी भी कमपनी के प्रोड़क्ट या चीज़ का अगर हमें असली की पहचान ना हो, तो हम नक़ली की पहचान नहीं कर सकते। इसी तरह जब तक हम नबियों के सच्चे ख़ुदा को नहीं जानते हैं, हम यह कैसे मान सकते हैं कि हम सच्चे ख़ुदा को मानते हैं। या जब तक हम नबियों के सच्चे तालीम को ना जानते हैं, हम यह कैसे मान सक्ते हैं कि हम जिस नबी को मानते हैं वो सच्चे हैं या नहीं? अगर हम बाइबल के सच्चे ख़ुदा के लक्षण, गुण और तालीम को कु़रआ़न के अल्लाह के लक्षण, गुण और तालीम के दरमियान तुलना करेंगे, और सच्चे नबियों के जीवन, उनकी तालीम को मुहम्मद सहाब के जीवन और उनकी तालीम से तुलना करके देखा जाये तो पता चलेगा कि सच्चाई क्या है। ख़ास कर जब यीशु मसीह के जीवन को हम देखते हैं तो उन की मिसाल नहीं है। उन का जीवन, उन की पैदाइश, उन की मौत, उन का जी उठना, हम किसी से तुलना नहीं कर सकते हैं। इसका एक ही मतलब है कि मसीह ने स्वयं ही कहा कि वे मसीह है, उद्धारकर्ता है, वे ख़ुदा के बेटे हैं। और हमारे पापों केलिए सलीब पर अपनी जान देदी और तीन दिन के बाद मुर्दों में से जीउठे, और जोकोई उन पर विश्वास करेगा वह अनन्‍त जीवन पायेगा। मसीह ने यह भी कहा है कि “जो मुझे तुच्‍छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है, उस को दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्यात् जो वचन मैं ने कहा है, वह पिछले दिन (आख़िरत) में उसे दोषी ठहराएगा”। तो मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि मसीह वह शख़्स हैं जिस का उन्होंने दाव किया है। तो न्याय के दिन हर एख को उनके सामने खड़ा होना है और उद्धार मसीह के द्वरा ही है। इसलिए हम को यह जनना बहुत ज़रुरी है। और इसकी तहक़ीक़ न करते हुए किसी भी बेहकावे में आकर किसी ग़लत चीज़ पर विश्वास रखते हैं, तो हमारी आख़िरत न्याय के दिन अच्छी नहीं होगी। ख़ुदा ने हमें अक़ल दी है। हमें उसका प्रयोग करना चाहिए। सही और ग़लत को जानना बहुत ज़रुरी है। कयोंकी हमारा उद्दार केवल मसीह यीशु के द्वारा ही है।

अब मेरी ज़िन्दगी

ख़ुदा की रहमत के मुताबिक अब मैं आज़ाद हूँ। मैं अब खुदावन्द की ख़िदमत गुज़ारी में लगा हुवा हूँ। मेरे लिये प्रार्थना करना।

ख़ुदा आप को आशीष दे।

आमीन।