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By: Agniveer

This article is also available in English at http://agniveer.com/645/naikexposed/

डॉ जाकिर नाइक हजारों की भीड़ में इस्लाम और बाकी मजाहिब (धर्मों) पर अक्सर बोलते देखे जाते हैं. वे खुद इस बात को बड़े फख्र से पेश करते हैं कि वो इस्लाम और बाकी मजहबों के तालिब इ इल्म (विद्यार्थी) हैं. वैसे कभी कभी वो खुद को इस इस बात में आलिम भी कहते हैं! असल में भी जब जाकिर भाई कुरान, हदीसों और दूसरी किताबों के हवाले (प्रमाण) बिना किसी किताब की मदद से केवल अपनी सनसनीखेज याददाश्त से देते हैं तो मौके पर ही हज़ारों को अपना मुरीद बना लेते हैं. हम खुद जाकिर भाई की अधिकतर बातों से इतेफाक (सहमति) नहीं रखते थे लेकिन इस्लाम के लिए जाकिर भाई की कोशिशें काबिल ए तारीफ़ जरूर समझते थे. हम अब तक यही सोच रहे थे कि जाकिर भाई इस्लाम की खिदमत में जी जान से हाजिर हैं. इसके लिए उन्होंने न जाने कुरान, हदीस, सीरत, वेद, पुराण, उपनिषद्, भगवद गीता, मनुस्मृति, महाभारत, तौरेत, बाईबल, धम्म पद, गुरुग्रंथ साहिब, और न जाने क्या कुछ न सिर्फ पढ़ डाला है बल्कि याद भी कर लिया है. दुनिया की हर मजहबी किताब में मुहम्मद (सल्लo) को ढूँढने का दावा भी किया है. इसके लिए उन्होंने ये सारी किताबें कितनी बारीकी से पढ़ी होंगी यह सोचना कोई मुश्किल काम नहीं. पूरी दुनिया में इस्लाम का झंडा बुलंद करने की गरज (आवश्यकता) से सदा इधर उधर तकरीरें (भाषण) करते हुए भी इतना सब पढ़ डाला, यह अपने आप में एक सनसनी पैदा करने वाली बात है. हम यही सोचते हुए अल्लाह से दुआ कर रहे थे कि जाकिर भाई जैसी काबिलियत हमें भी बख्शें ताकि हम भी अपने मजहब की खिदमत इसी तरह कर सकें!

हम ये सब सोचते हुए दिन ही बिता रहे थे कि अचानक हम एक किताब से रूबरू हुए. इस का नाम था “Muhammad in World scriptures” मतलब “दुनियावी किताबों में मुहम्मद” मतलब (विश्व की पुस्तकों में मुहम्मद). इसके लिखने वाले जनाब मौलाना अब्दुल हक विद्यार्थी हैं, जिन्होंने इसे १९३६ में लिखा था. जब इसे पढ़ा तो हम कुछ देर के लिए हैरान रह गए. हमें झटका सा लगा.

जाकिर भाई के सारे दावे लफ्ज़ दर लफ्ज़ (शब्दशः) इस किताब में मिलने लगे. जब इसे पूरा पढ़ा तो हमारी हैरानी का ठिकाना न रहा जब हमने देखा कि मुहम्मद (सल्लo) के दुनिया की और मजहबी किताबों में होने के बारे में जाकिर भाई का सारा काम इस किताब की ज्यों की त्यों नक़ल ही है! इससे बढ़कर यह कि जाकिर भाई ने कहीं भी अपनी किसी किताब, तक़रीर, या लेख में इन हजरत अब्दुल हक का नाम भी नहीं लिया, उनका शुक्रिया अदा करना तो बहुत दूर रहा. इस तरह चोरी से किसी की चीज पर हक जता कर अपने नाम से पेश करने की सजा शरियत में क्या है, यह तो हम आगे लिखेंगे. लेकिन अभी इस मामले की सबसे हैरतंगेज और पूरी मुस्लिम उम्मत का दिल दहला देने वाली इत्तला दी जानी बाकी है.

डॉ जाकिर नाइक ने जिस मौलाना की किताब से ये बातें चुराई हैं, वो कोई ऐसा वैसा मोमिन नहीं है. वो एक ऐसे फिरके (वर्ग) से है जिसे मुसलमानों का कोई फिरका मुसलमान नहीं समझता. यहाँ तक कि उन्हें काफिरों से भी बदतर समझा जाता है और सब मुस्लिम मुल्कों में उस पर पाबंदी है. जी हाँ! यह फिरका कादियानी मुसलमानों (?) का है जिसे अहमदी भी कहा जाता है. तो बात यह है कि मौलाना अब्दुल हक, जिसकी किताब से जाकिर भाई ने चोरी की है, वो एक कादियानी/अहमदी मुसलमान है, जिसको खुद जाकिर भाई भी मुसलमान नहीं समझते! जाकिर भाई खुले तौर पर कादियानियों को काफिर बोलते हैं.

इससे पहले हम आगे कुछ लिखें, बताते चलें कि मुसलमान दोस्त क्यों कादियानियों से नफरत करते हैं. असल में कादियानी फिरका मुहम्मद साहब को आखिरी पैगम्बर नहीं समझता. यह फिरका उन्नीसवीं सदी के एक आदमी मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने चलाया था जिसने आम मुसलमानों की मुखालफत (विरोध) करते हुए खुद को मसीहा कहा था और साथ ही यह भी दावा किया कि उस पर भी अल्लाह के इल्हाम उतरते हैं जैसे मुहम्मद (सल्लo) पर उतरा करते थे. तो इस तरह कादियानी मुहम्मद (सल्लo) को आखिरी पैगम्बर नहीं मानते. यही नहीं, कादियानी फिरके के लोग यह भरोसा रखते हैं कि राम, कृष्ण, बुद्ध, गुरु नानक वगैरह भी अल्लाह के पैगम्बर थे. इसके साथ ही यह फिरका कल्कि अवतार (अल्लाह का इंसान बनके धरती पर आना) को आखिरी नबी बताता है. मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी को अपनी नबुव्वत पर इतना भरोसा था कि उसने उन लोगों को दोजख की धमकी दी जो उसमें ईमान नहीं लाये.

अब यहाँ बात आती है कि जाकिर भाई ने ऐसे आदमी की किताबों से चोरी करके मुसलमानों को गुमराह किया जो मुहम्मद को आखिरी रसूल नहीं मानता था, जो गैर कादियानियों के लिए सदा रहने वाली दोज़ख मानता था, जो अल्लाह का इंसान बनकर धरती पर आना मानता था, जो राम, कृष्ण, बुद्ध, नानक वगैरह को भी मुहम्मद की तरह ही पैगम्बर मानता था. मौलाना अब्दुल हक़ विद्यार्थी ने यह किताब लिखी ही कादियानी फिरके के सिद्धांतो को फ़ैलाने के लिए. इस कादियानी किताब से पहले आज तक किसी ने दावा नहीं किया था मुहम्मद के वेद, पुराण, धम्मपद आदि किताबो में होने का.

कादियानों के लिए तो यह बिलकुल ठीक ही है. क्योंकि इसी प्रकार वे राम, कृष्ण, बुद्ध को भी पैगम्बर साबित करते हैं. फिर उसी तरह मुहम्मद और फिर मिर्ज़ा गुलाम को भी उसी पैगम्बरी परंपरा का दूत दिखाते हैं. कादियानी फिरके के आलावा कोई और मुसलमान इस को नहीं मानता. और इसी कारण आज दुनिया के अधिकांश मुसलमान मुल्कों में कादियानी फिरके को सरकारी तौर पर भी काफिर माना जाता है. आज दुनिया का कोई आम मुसलमान काफिर कहलाना मंजूर कर सकता है लेकिन कादियानी नहीं. इसलिए एक सीधे साधे मुसलमान के साथ इससे बड़ा फरेब और कोई हो ही नहीं सकता. जाकिर नाइक अपने इस कारनामे से जिन जिन बुरी बातों के सरताज बने हैं, वे हैं-

१. लफ्ज़ दर लफ्ज़ (शब्दशः) किसी की किताब से बिना पूछे चोरी करना और उसका शुक्रिया अदा करना तो दूर, उसका नाम भी नहीं लेना.
२. एक कादियानी (काफिर) की बातों को मुसलमानों के बीच इस्लाम कह कर पेश करना यानी मुसलमानों को धोखा देना.
३. और इस सारे काम की वाहवाही खुद लूटना जबकि यह किसी और का काम था और खुद को मजहबी मामलों का आलिम कहकर मुसलमानों को गुमराह करना.
४. अपने चाहने वालों को कादियानियों के सामने जलील होने की वजह बनना.
५. वेदों में मुहम्मद का दावा होने पर भी वेदों को इल्हामी ना मानना.
६. बड़ी चालाकी से कादियानी सिद्धान्तों को मुसलमानों में चुप चाप बढ़ावा देना ताकि किसी को कोई शक न हो.

इन सब बातों से इस बात का शक होता है कि कहीं जाकिर भाई मुसलमान के भेष में कादियानी तो नहीं? क्योंकि कादियानियों को ऊपर से गलत कहकर सीधे साधे मुसलमानों की भीड़ जुटाकर जाकिर भाई जब कादियानी किताबों की खासमखास बातों को ही फैलाने में लगे हैं तो इसका और क्या मतलब निकलता है? हम जाकिर भाई से पूछना चाहते हैं कि उन्होंने अपने चाहने वाले एक सच्चे मुसलमान के लिए क्या रास्ता छोड़ा है? यही कि या तो जाकिर भाई की तरह कादियानियों के शुक्रगुजार हों और उनके कर्जदार हो जाएँ या फिर इस्लाम को दाग लगाने वाले जाकिर भाई से ही तौबा कर लें!

जिस किसी को भी जाकिर भाई के इस फरेब को अपनी आँखों से देखना है वो इस लिंक पर जाए. http://www.scribd.com/doc/24693331/Zakir-Naik-s-Qadiyani-source-for-research

डॉ जाकिर नाइक के इन मसलों पर लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं ताकि ऊपर दिए लिंक से मिला कर देख सकें. http://www.irf.net/index.php?option=com_content&view=article&id=145&Itemid=128

कादियानियों के बारे में जानने के लिए आप यहाँ जा सकते हैं. इस से आप जानेंगे के जिन बातों को जाकिर फैला रहे हैं, उनके कारण किस तरह कादियानी काफिर बने और इन बातों को फ़ैलाने के पीछे कादियानी मकसद क्या है.
http://en.wikipedia.org/wiki/Prophethood_%28Ahmadiyya%29
http://en.wikipedia.org/wiki/Ahmadiyya_Muslim_Community

अब नीचे हम एक कादियानी आलिम जाहिद अज़ीज़ का लिखा एक लेख (असल लेख अंग्रेजी में था, यहाँ उसे हिंदी/उर्दू में दिया है) देते हैं जिसमें उन्होंने जाकिर नाइक और मौलाना अब्दुल हक के कामों को एक साथ दिखा कर यह साबित किया है कि जाकिर नाइक ने किस तरह अब्दुल हक की किताबों से हूबहू बातें चुराई हैं.

१. जाकिर नाइक के लेख में बहुत सी भविष्यवाणियाँ दी गयी हैं. इसमें तीन भविष्य पुराण से दी गयी हैं. इनमें से पहली है-

“एक मलेच (गैर मुल्की और गैर जबान इस्तेमाल करने वाला) रूहानी (अध्यात्मिक) रास्ता दिखाने वाला अपने साथियों के साथ आएगा. उसका नाम मोहम्मद होगा…..”

यही भविष्यवाणी मौलाना अब्दुल हक की किताब की भी पहली भविष्यवाणी है. मौलाना अब्दुल और जाकिर नाइक के लेख हूबहू एक हैं. बस अंतर है कि अब्दुल हक ने “मलेच्छ” लिखा है जबकि जाकिर ने “मलेच”! और मौलाना अब्दुल हक की किताब में इतना फ़ालतू लिखा है कि “ओ प्यारे अल्लाह के अक्स (प्रतिबिम्ब), सबसे बड़े, मैं तुम्हारा गुलाम हूँ, मुझे अपने पैरों में जगह दे दो”

२. इन भविष्यवाणियों को लिख कर जाकिर नाइक ने लेख में नीचे छह नुक्ते (बातें/points) लिखे हैं जबकि मौलाना ने दस. हम देखते हैं कि जाकिर के शुरू के तीन नुक्ते और मौलाना के शुरूआती तीन नुक्ते एक ही हैं. और जाकिर के नुक्ते ४, ५, ६ मौलाना के १०, ७, ६ की नक़ल हैं. यहाँ तक कि लफ्ज़ भी एक से ही हैं.
मिसाल (उदाहरण) के तौर पर दोनों का तीसरा नुक्ता इस तरह शुरू होता है- “Special mention is made of the companions of the Prophet”

३. इन छह नुक्तों के बाद जाकिर नाइक के लेख में दो बातें लिखी हैं. पहली इस बात के जवाब में है कि राजा भोज तो ईसा से ११ सदी पहले हुआ था. यह बात और इस पर जवाब जो जाकिर के लेख में है वह हूबहू वही है जो मौलाना की किताब में, कि भोज नाम का केवल एक अकेला राजा नहीं हुआ. जाकिर का लेख कहता है-

“The Egyptian Monarchs were called as Pharaoh and the Roman Kings were known as Caesar, similarly the Indian Rajas were given the title of Bhoj.”

जबकि मौलाना ने लिखा है-

“Just as the Egyptian monarchs were known as Pharaohs and the Roman kings were called Kaisers, similarly, the Indian rajas were given the epithet of Bhoj”

४. दूसरी बात जो जाकिर के लेख में मसीहा के गंगा में नहलाये जाने से जुडी है, वह है-

“The Prophet did not physically take a bath in the Panchgavya and the water of Ganges. Since the water of Ganges is considered holy, taking bath in the Ganges is an idiom, which means washing away sins or immunity from all sorts of sins. Here the prophecy implies that Prophet Muhammad (pbuh) was sinless, i.e. Maasoom“

बिलकुल यही बात मौलाना की किताब में कुछ यूं मिलती है-

“Another point which requires elucidation is the Prophet’s taking bath in ‘Panchgavya’ and the water of the Ganges. This did not, of course, actually happen as it was only a vision; so we give it the interpretation that the Prophet will be purged of and made immune from all sorts of sins.“

५. जाकिर के लेख में भविष्य पुराण से दूसरी भविष्यवाणी वही है जो मौलाना की दूसरी. जाकिर ने लिखा है-

“The Malecha have spoiled the well-known land of the Arabs. Arya Dharma is not to be found in the country.“

इस पूरी भविष्यवाणी, जो कि ऊपर लिखी गयी बातों की दस गुनी है, पूरी की पूरी मौलाना की किताब से मेल खाती है.

६. इस भविष्यवाणी पर जाकिर के लेख में दस नुक्ते (points) हैं वहीँ मौलाना की किताब में बारह. नाइक के पहले दो नुक्ते मौलाना के पहले दो नुक्ते ही हैं. जाकिर के तीन से दस तक के नुक्ते मौलाना के पांच से बारह तक के नुक्ते ही हैं.

७. जाकिर के लेख में भविष्य पुराण की तीसरी और आखिरी भविष्यवाणी कुछ इस तरह शुरू होती है- “Corruption and persecution are found in seven sacred cities of Kashi, etc“

मौलाना की किताब में भी अगली भविष्यवाणी यही है और करीब करीब इन्हीं अल्फाज़ में.

८. आगे जाकिर ने अथर्ववेद की तीन भविष्यवाणियाँ दी हैं. मौलाना की किताब में भी अगली बारी इन्हीं की है. इन भविष्यवाणियों के बारे में जाकिर के लेख में उठाये गए सारे नुक्ते मौलाना की किताब में हैं और ठीक उसी क्रम में जिस क्रम में जाकिर के नुक्ते हैं.

९. इससे आगे जाकिर के लेख में एक भविष्यवाणी संस्कृत के एक लफ्ज़ “सुश्रवा” के बारे में है जो हूबहू मौलाना की किताब में दिया है.

१०. इसके आगे और आखिरी भविष्यवाणी संस्कृत के एक लफ्ज़ “अहमिद” के बारे में है जो बिलकुल इन्हीं अल्फाज़ में मौलाना ने लिखी है.

और इस पर जाकिर नाइक का लेख ख़त्म होता है और साथ ही मौलाना का “हिन्दू किताबों में पैगम्बर” लेख भी. इससे साफ़ जाहिर है कि जाकिर नाइक का लेख मौलाना की किताब के कुछ हिस्सों का ही छोटा रूप है जो बिलकुल उसी क्रम में है जिस क्रम में मौलाना की किताब के वो हिस्से. इसमें शक नहीं कि बाद का कोई लिखने वाला पहले वाले के काम से मदद ले सकता है, पर अगर वो इससे बहुत फायदा उठा रहा है तो उसको चाहिए कि वह इस बात को तस्लीम (स्वीकार) करे कि उसने मदद ली है और मदद करने वाले का शुक्रिया अदा करे.

मौलाना अब्दुल हक का काम इस्लाम के उस पैगाम पर टिका है जिसमें कहा गया है कि अल्लाह ने मुहम्मद (सल्लo) से पहले हर मुल्क में अपने नबी भेजे. मुस्लिम आलिमों ने इस बात को केवल इस्राइली पैगम्बरों तक ही रखा.

हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने इस बात पर जोर दिया और कहा कि हिन्दू मजहब के बड़े लोग जरूर अल्लाह के भेजे नबी थे और उनकी किताबें शुरू में अल्लाह का इल्हाम थीं. इसी को लेकर मौलाना अब्दुल हक ने हिन्दू किताबों से मुहम्मद (सल्लo) की भविष्यवाणियों को खोज निकाला. यही वजह थी कि मौलाना ने लिखा-
“The coming prophet will attest the truth of the Aryan faith”
मतलब, आने वाला नबी, आर्य धर्म (वेद का मजहब) के सच्चाई की सील होगा.

जबकि, डॉ जाकिर नाइक ने किसी और जगह पर यह कहा है कि वेद इल्हाम नहीं भी हो सकते. देखिये एक सवाल, कि “क्या वेद और बाकी हिन्दू किताबें अल्लाह का इल्हाम मानी जा सकती हैं”, के जवाब में जाकिर क्या जवाब देते हैं-

“कुरान या सही हदीस में कहीं भी हिंदुस्तान में भेजे गए इल्हाम के बारे में कुछ नहीं मिलता. क्योंकि वेदों का या और किसी हिन्दू किताबों का नाम कुरान या सही हदीस में नहीं मिलता इसलिए यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि वे अल्लाह का इल्हाम थे. वो अल्लाह का इल्हाम हो भी सकते हैं और नहीं भी.”

अगर ऐसा है कि उनमें से कुछ भी अल्लाह का इल्हाम नहीं था तो इन किताबों में नबी के आने की भविष्यवाणी कैसे मिलती है? अगर वे इल्हाम नहीं भी हो सकते हैं, तो यह भी मुमकिन है कि उनके जो हिस्से डॉ जाकिर नाइक ने अपने लेख में दिए हैं वो भी अल्लाह की तरफ से मुहम्मद (सल्लo) के बारे में भविष्यवाणियाँ न हों.

मजेदार बात यह है कि इस लेख में डॉ नाइक ने मौलाना अब्दुल हक के ये अल्फाज़ भी नक़ल कर दिए कि “आने वाला नबी आर्य धर्म (वेदों के मजहब) के सच्चाई की सील होगा” यानी पैगम्बर मुहम्मद (सल्लo) भी आर्य धर्म की किताबों (वेद) को अल्लाह का इल्हाम ही समझेंगे. लगता है कि डॉ नाइक को पता ही नहीं चला कि उनके ये अल्फाज़ ऊपर ही दिए गए उनके अल्फाजों को काटते हैं.
अग्निवीर: वैसे यह लेख ख़त्म करने से पहले बताते चलें कि इस्लामी शरियत, जिसके जाकिर भाई सख्त हिमायती हैं, चोरी करने वाले के हाथ काटने का हुक्म देती है! साथ ही अपने ईमान को छोड़ देने वाला (मुस्लिम से गैर मुस्लिम हो जाने वाला) वाजिबुल्कत्ल (मार डालने के काबिल) है. अब देखना यह है कि जाकिर भाई और उनके चाहने वाले, यह साबित हो जाने पर कि उन्होंने चोरी की है और साथ ही काफिरों की किताबों से चीजें उठाकर उनको इस्लाम के नाम पर पेश किया है, उनके साथ कैसा बर्ताव चाहते हैं? क्या ही अच्छा हो अगर जाकिर भाई यहीं से शरियत लागू करने का हौंसला दिखाएँ और साबित करें कि वे कोई कादियानी नहीं लेकिन शरियत में यकीन करने वाले सच्चे मोमिन हैं!
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