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By: Agniveer

This article is also available in English on http://agniveer.com/848/rakshas-vedas-hinduism/

एक भ्रांत कल्पना यह भी कर ली गई है कि आर्यों ने यहां के निवासियों को राक्षस नाम से पुकारा और उनका वध किया | अतः आर्यों के अत्याचार का शिकार माने गए दास या दस्यु ही राक्षस समझ लिए गए हैं | वस्तुतः राक्षस शब्द का अर्थ दस्यु या दास के काफ़ी पास है | परंतु राक्षस को भिन्न नस्ल या वंश मानना कोरी कल्पना ही है |

पहले के लेखों में हम देख ही चुके हैं कि दास या दस्यु कोई भिन्न जाति या नस्ल नहीं बल्कि विध्वंसकारी गतिविधियों में रत मनुष्यों को ही कहा जाता था |

इस लेख में हम राक्षस कौन हैं और वेद में स्त्री राक्षसी के भी वध की आज्ञा क्यों दी गई है ? यह देखेंगे –

ऋग्वेद ७ |१०४| २४

हे राजेन्द्र ! आप पुरुष राक्षस का और छल कपट से हिंसा करने वाली स्त्री राक्षसी का भी वध करो | वे दुष्ट राक्षस भोर का उजाला न देखें |

यहां राक्षसों को यातुधान ( जो मनुष्यों के निवास स्थान पर आक्रमण करते हैं ) और क्रव्याद ( कच्चा मांस खाने वाले ) कहा गया है |

ऋग्वेद ७|१०४|१७

जो राक्षसी रात में उल्लू के समान हिंसा करने के लिए निकलती है, वह अन्य राक्षसों के साथ नष्ट हो जाए |

ऋग्वेद ७|१०४| १८

हे बलवान रक्षकों ! आप प्रजा में विविध प्रकार से रक्षा के लिए स्थित हों | विध्वंसकारी और रात्रि में आक्रमण करने वाले राक्षसों को पकड़ें |

ऋग्वेद ७|१०४|२१

परम ऐश्वर्यशाली राजा, हिंसा करने वाले तथा शांतिमय कार्यों में विघ्न करने वाले राक्षसों का नाशक है |

ऋग्वेद ७|१०४|२२

उल्लू, कुत्ते, भेड़िये, बाज़ और गिद्ध के समान आक्रमण करनेवाले जो राक्षस हैं, उनका संहार करो |

स्पष्ट है कि राक्षस शब्द तबाही मचाने वाले, क्रूर आतंकियों और भयंकर अपराधियों के लिए प्रयुक्त हुआ है | ऐसे महादुष्ट पुरुष या स्त्री दोनों ही दंड के पात्र हैं |

इसी सूक्त के दो मंत्र राक्षस कर्म से बचने के लिए कहते हैं –

ऋग्वेद ७|१०४|१५

यदि मैं यातुधान ( मनुष्यों के निवास स्थान पर आक्रमण करने वाला) हूं और यदि मैं किसी मनुष्य के जीवन को नष्ट करता हूं | यदि मैं ऐसा हूं तो, हे भगवन! मैं आज ही मर जाऊं | परंतु यदि मैं ऐसा नहीं हूं तो, जो मुझको व्यर्थ ही यातुधान कहता है वह नष्ट हो जाए |

ऋग्वेद ७|१०४|१६

जो मुझको यातुधान या राक्षस कहता है, जबकि मैं राक्षस नहीं हूं, और जो राक्षसों के साथ होने पर भी स्वयं को पवित्र कहता है ऐसे दोनों प्रकार के मनुष्यों का नाश हो |

जो सदाचारी जनों को झूठे ही कलंकित करे और स्वयं राक्षसों – आतंकियों का समर्थक होकर भी सदाचारी बनने का दंभ करे, ऐसे भयंकर समाज घातकों के लिए भी वेद में दयाभाव के बिना विनाश की आज्ञा है |

आइए, इन प्रार्थनाओं को सफ़ल बनाएं, समूचे विश्व से राक्षसों- आतंकियों का नामो – निशान मिटा दें |

अनुवादक: आर्यबाला

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