Tags

, , , ,


by भांडाफोडू (Bhandafodu)

मनुष्य को एक सामजिक प्राणी कहा जाता है. क्योंकि उसका स्वभाव है कि वह अपने जैसे विचारों और सामान सवभाव के लोगों से मित्रता करके एक समूह या समुदाय बना लेता है. इस से वह स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है. यहाँ तक यही आदत दुसरे जीवों में भी होती है.

फारसी के कवि शेख सादी ने कहा था “कुनद हम जिन्स बा हम जिन्स परवाज, कबूतर बा कबूतर, बाज़ बा बाज़ “. आसमान में जैसे कबूतर, और बाज़ अपने ही समूह के साथ उड़ते हैं. उसी तरह से मनुष्य भी अपने ही समुदाय के साथ रहना पसंद करता है.लेकिन अपना समूह बनाने के लिए आपसी मित्रता होना जरुरी होती है.

किस से मित्रता की जाये किस से नहीं, इसके बारे में इस्लाम ने कुछ निर्देश (Guide Lines) दिए हैं, और इसका कारण भी दिया गया है. यही नियम संक्षिप्त में दिए जा रहे है –

1- विधर्मियों से दोस्ती न करें —

कुरान के समय सिर्फ यहूदी और ईसाई थे. हिदुओं का कोई उल्लेख नहीं है. इसलिए उनकी जगह काफ़िर या मुश्रिक कहा गया है. और कहा है –

हे ईमान वालो तुम यहूदियों और ईसाइयों को अपना दोस्त नहीं बनाओ, क्योंकि यह आपस में एक दूसरे से दोस्ती रखते हैं. “सूरा -मायदा 5 :51.

तुम ऐसे बहुत से लोगों को देखोगे जो, कुफ्र करने वालों (गैर मुस्लिम) लोगों को अपना दोस्त बना लेते हैं. बेशक यह कितनी बुरी बात है, क्योंकि इस से अल्लाह उन पर क्रोधित होगा “सूरा -मायदा 5 :80.

अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा, जो भी गैर मुस्लिमों से दोस्ती करेगा, तो वह भी उन्ही कि तरह काफ़िर माना जायेगा “अबू दाऊद-किताब 41 हदीस 4815.

2 – दोस्ती न करने का कारण —

मुहम्मद को डर था कि अगर मुसलमान गैर मुस्लिमों से दोस्ती करेंगे तो वह उनसे प्रभावित होकर उनके रीति रिवाज अपना लेंगे. इस से इस्लाम की कट्टरता कम हो जाएगी. इसलिए कहा कि —

हे ईमान वालो तुम ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखो, जिनको हमारी तारीफ पसंद नही है” .सूरा-नज्म 53 :29.

क्या तुम्हारे यह लोग (दोस्त) इस्लाम आलावा किसी दूसरे धर्म को अच्छा बताते हैं. “सूरा -आले इमरान 3 :83.

“ईमान वाले (मुस्लिम) और काफ़िर (गैर मुस्लिम) दो ऐसे प्रतिद्वंदी (opponents) हैं, जो हमेशा अपने अपने रब (God) की बड़ाई में हमेशा झगडा करते रहेंगे “सूरा -अल हज्ज 22 :19.

यह लोग तो बस (दोस्ती के बहाने) यही चाहते हैं कि, तुम भी काफ़िर बन जाओ, और उनके जैसे ही बन जाओ . इसलिए तुम उन में से किसी को भी अपना दोस्त कभी नहीं बनाना “सूरा -अन निसा 4 :89.

3 – गैर मुस्लिम को अपना भेद नहीं बताएं —

ईमान वालो को चाहिए कि वह ईमान वालों के विरुद्ध किसी काफ़िर कि मदद नहीं करें, और न उसे मित्र बनायें “सूरा -आले इमरान 3 :28.

हे ईमान वालो तुम मुसमानों के अतिरिक्त किसी को अपना कोई भेद नहीं बताओ “सूरा -आले इमरान 3 :318.

4 – दोस्ती के लिए शर्त —

जैसे पाकिस्तान भारत से दोस्ती करने के लिए शर्तें रखता रहता, वैसी ही नीति कुरान में बताई गयी है. यहाँ तक अपने बाप को भी इस शर्त से नहीं छोड़ा है, और कहा है —

“तुम अपने बाप और भाइयों को भी अपना हितैषी और दोस्त नहीं मानो, यदि वह किसी दूसरे धर्म को सही मानते हो “सूरा -तौबा 9 :23.

अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा, जो भी गैर मुस्लिमों से दोस्ती करेगा, तो वह भी उन्ही कि तरह काफ़िर माना जायेगा “अबू दाऊद-किताब 41 हदीस 4815.

“रसूल ने बद्र कि लड़ाई के समय कहा था, हे मेरे इमान वालो. तुम मेरे किसी भी विरोधी को अपना दोस्त तब तक नहीं बनाना, जब तक वह इमान नहीं लाता, फिर रसूल ने उसी समय कुरान की सूरा मुम्तहिना (60 :1) की यह आयत सुना दी. “हे इमान वालो तुम मेरे दुश्मनों को और इस्लाम के दुश्मनों की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढाओ “बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 572.

5 – सिर्फ मुसलमानों को दोस्त मानो —

कभी लिखापढ़ी करके या कोई अनुबंध (Treaty) करके दोस्ती नहीं हो सकती. इन पिछले साठ सालों में भारत ने पाकिस्तान के साथ अनेकों समझौते किये हैं. और सब जानते हैं, उनका कितना पालन हुआ है. क्योंकि कुरान साफ कहता है कि –

“तुम्हारे वास्तविक दोस्त तो सिर्फ मुसलमान ही हैं, जो सिर्फ अल्लाह को ही मानते है, और अपने रसूल पर ही इमान रखते हैं “सूरा-मायदा 5 :55.

6 – गैर मुस्लिमों से दोस्ती पर फतवा —

किसी मुस्लिम व्यक्ति ने गैर मुस्लिम व्यक्ति से दोस्ती करने, और उस से घनिष्टता रखने के बारे में मुफ्ती से सवाल किया था, और मुफ्ती ने जो फतवा दिया था, वह अंगरेजी, हिंदी और अरबी में दिया जा रहा है –

सवाल – मेरा इस्लाम से सम्बंधित सवाल है, क्या आप मुझे इसके बारे में समझायेंगे “क्या किसी मुस्लिम को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ मित्रता क़रने और उससे आत्मतीयता रखने की अनुमति है, जो गैर मुस्लिम हो ?

जवाब – अल हम्दु लिल्लाह, किसी मुस्लिम को यह इजाजत नहीं है कि वह किसी मुशरिक से दोस्ती करे, और उसे अपना करीबी समझे. क्यों कि इस्लाम का हुक्म है, काफिरों को छोड़ दो. और उनसे अपने वादे तोड़ दो. क्योंकि वह अल्लाह के आलावा किसी दुसरे कि इबादत करते हैं.वल्लाहु आलिमु

“I have questions about Islam; can you explain them to me? Is it permissible for a Muslim to be a sincere friend to a person who is not Muslim?

Praise be to Allaah. It is not permissible for a Muslim to make friends with a mushrik or to take him as a close friend, because Islam calls on us to forsake the kaafirs and to disavow them, because they worship someone other than AllaahAnd Allaah knows best.

هل للمسلم أن يكون صديقاً مخلصاً لكافر ؟الحمد لله لا يجوز للمسلم أن يصادق المشرك أو أن يتخذه خليلاً ، لأن الإسلام يدعو إلى هجر الكافرين والتبرؤ منهم لأنهم عبدوا غير الله تعالى والله أعلم

आज मुसलमान इस्लाम के दोस्ती सम्बन्धी नीतियों का पूरी तरह से पालन कर रहे हैं. और दुनियां से लोहा ले रहे हैं. क्योंकि वह अपने लोगों को धोखा नहीं देते. लेकिन दूसरी तरह हिन्दू हैं, जो अपने ही लोगों से चल चलते रहते है. ऊपर से मीठी बात और अन्दर जहर भरा हुआ है. जैसे —

“परोक्षे कार्य हन्तारं, प्रत्यक्षे प्रिय वादिनम, वर्जयन ता दृशं मित्रं ,विष कुम्भं पयो मुखं ”

पीठ पीछे धोखा देने वाले, मुंह पर मीठी मीठी बातें वाले लोगों को उस तरह त्याग दो.जैसे कोई घड़ा जिसमे ऊपर दूध और अन्दर जहर भरा हुआ हो. इसी लिए बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्याग कर दिया था.लोग हिदू होने पर गर्व करने की जगह इस्लाम से सीखें !

http://www.islam-qa.com/en/ref/21530

http://www.thereligionofpeace.com/Quran/009-friends-with-christians-jews.htm