Tags

, , , , ,


सऊदी अरब कि विख्यात नारीवादी लेखिका वाजेहा अल-हैदर का अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के नाम खुला पत्र –

आप संभवत: जानते होंगे कि सऊदी अरब की औरतों का वाहन चलाना और मतदान करना प्रतिबंधित हैं। लेकिन क्या आप जानते है कि उन्हें वयस्कों जैसे काम, लगभग हर काम, को करने के लिए पुरुष अभिभावकों की सहमति की आवश्यकता होती है फिर चाहे वह विवाह करना, यात्रा करना, कार्य करना, शिक्षा प्राप्त करना, घर भाड़े पर लेना, अदालत जाना या इकरारनामा करने जैसा कोई भी काम हो। सऊदी स्त्रियाँ, वे जायज़ संतानें हैं जिनका पूरा जीवन पिताओं, पतियों, भाइयों यहाँ तक कि पुत्रों द्वारा नियमित तथा संचालित होता हैं। इस क्रूर, अन्यायपूर्ण व्यवस्था ने सऊदी अरब को विश्व का सबसे बड़ा मानव-अधिकारों का उल्लंघन करनेवाला राष्ट्र बना दिया है। पर जैसा कि पीड़ित लड़कियाँ और महिलाएँ हैं, और पुसंवादी मौलिक न्याय ही धर्म है, और सऊदी अरब के पास बड़ी तेल संपदा हैं, और वह मध्यपूर्व के बिल्कुल बीचोंबीच है, और किन्हीं अर्थों में अमेरिका का मित्र-राष्ट्र भी है, उनकी तकलीफों पर ध्यान भी नही दिया गया।

क्या स्त्री मानवाधिकार राष्ट्रपति ओबामा की कार्यसूची का मुद्दा होगा जब वे बादशाह अब्दुल्ला से 29 जून, मंगलवार को जी20 के शिखर सम्मेलन में मिलेंगे? जैसा हमेशा व्हाइट हाउस के अनुसार प्रेषित होता है, ‘क्रमिक सार्वजनिक हित में जोकि खाड़ी सुरक्षा, मध्यपूर्व में शांति, और अन्यान्य क्षेत्रीय एवं वैश्विक विषयों की सूची में होगा।

माननीय राष्ट्रपति जी,

मेरा परिचय: मैं वाज़ेहा अल-हैदर हूँ, सऊदी लेखिका और सऊदी अरब राज्य में महिला अधिकारों की सक्रिय कार्यकर्त्ता।

आनेवाले सप्ताह में आप जब बादशाह अब्दुल्ला बिन अब्दुल-अज़ीज़ से मिलें तो हमारी प्रार्थना है कि आप बादशाह का ध्यान सऊदी पुरुषों के अभिभावकत्व की व्यवस्था के सुधार के मुद्दे की ओर दिलाएँ।

मैं मेक्सिको की खाड़ी के पक्षियों को देख रही हूँ जो काले तेल के छीटों से पूरी तरह ढ़ँक गए हैं। इनके दुख के साथ मैं सऊदी औरतों की पीड़ा की समानता देख पा रही हूँ। ये पंछी मुश्किल से हिलडुल पाते हैं, अपने जीवन पर इनका कोई नियंत्रण नहीं होता, वे स्वाधीन रूप से उड़कर ऐसी जगह नहीं जा सकते जहाँ शांति से रह सकें। यही हाल सऊदी औरतों का हैं। मैं उनकी पीड़ा से परिचित हूँ। मैंने पूरे जीवन इसे झेला है।

दशकों से सऊदी अरब की महिलाएँ सऊदी मर्दों के अभिभावकत्व के वर्चस्व में इन्हीं बदनसीब पक्षियों की भाँति रह रहीं हैं। जो आपकी अनवरत चिंता का कारण हो सकता है। सऊदी औरतें पूर्ण नागरिक होने के अधिकार को भी खो चुकी हैं। यह अराजक व्यवस्था परिपक्व स्त्रियों को सामान्य जीवन भी जीने नही देती। यह औरतों तक स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ भी नही पहुँचने देती और न ही किसी पुरुष संरक्षक (फिर चाहे वह उसका 16 साल का पुत्र हो) के बिना यात्रा करने की सहमति। सऊदी स्त्रियाँ को व्यक्तिगत कार्यों के संदर्भ में निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं होता। यह भी उनके लिए पुरुष ही करते हैं।

मेक्सिको की खाड़ी की चिड़ियाँ और सऊदी अरब की महिलाएँ समान त्रासद परिस्थितियों से गुजर रहीं हैं; उन्हें अत्यंत ही दुरूह स्थितियों में अपने ही प्राकृतिक, सहज परिवेश में कैद कर दिया गया है। उन्हें मदद की ज़रूरत है ताकि वे पुन: बच सकें, जी सकें।

जब आप बादशाह अब्दुल्ला बिन अब्दुल-अज़ीज़ से मिलें कृपया उनकी सहायता करें जिससे कि वे देख सकें, सऊदी मर्दों के संरक्षण की व्यवस्था का सऊदी महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ा है।

बच्चों को अभिभावक चाहिए, परिपक्व स्त्रियों को नहीं।

धन्यवाद.

आपकी आभारी,

वाजेहा अल-हैदर.

अनुवाद- विजया सिंह, रिसर्च स्कॉलर,कलकत्ता विश्वविद्यालय,कोलकाता।

‘दि नेशन’ दैनिक से साभार।