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मुसलमान अपने आप को पाक कहते हैं और हिंदु को नापाक सिर्फ इसलिए कि उनका लिंग कटा होता है इसलिए पेशाब करने के बाद वो मिट्टी के ढेले से उसे साफ कर लेते हैं और चूँकि हिंदुओं का लिंग कटा नहीं होता इसलिए वो नापाक होते हैं क्योंकि बिना कटे लिंग को अगर पानी से धो दिया भी जाय तो भी कुछ ना कुछ अंश तो फसा रह ही जाएगा ना लिंग में..
इस तरह की बातें ये अपने आपको तसल्ली देने के लिए करते हैं या सच में मुसलमान धर्म अपना लेने के बाद कुरान, अल्लाह और मुहम्मद सब मिलकर इनकी बुद्धियों को डाका डाल कर लेते जाते हैं क्योंकि इन तीनों(कुरान,मुहम्मद और अल्लाह) को बुद्धि की सख्त आवश्यकता है क्योंकि ये चीज इनके पास नहीं है…
वैसे तो पेशाब करने के बाद उसे पानी से धोने के बारे में हिंदु धर्म में भी बताया गया है लेकिन जबसे हिंदुओं ने धोती को त्यागकर फूलपैन्ट पहनना शुरु किया तबसे बैठकर पेशाब करने और पानी से धोने की परम्परा को त्यागकर अंग्रेजों की तरह खड़े-खड पेशाब करना शुरु कर दिया..पर उल्लेखनीय बात ये है कि क्या शुद्धता का पैमाना बस यही पेशाब की कुछ बूँदें….?? बाँकि मल त्याग करने के बाद अगर गुदा ना धोओ तो भी पाक कोई बात नहीं..!.? अगर शौच के बाद हाथ को साबुन से ना धोओ फिर भी पाक..!.?अगर ६ दिन ना नहाओ फिर भी पाक.!.?
ये भारतीय संस्कार इनलोगों में अबतक है कि शौच के बाद गुदा धो लेते हैं पानी से पर हाथ धोने का संस्कार क्यों भुला दिए यार..?कहीं मुसलमान धर्म में ये भी कोई गुनाह तो नहीं…..??

चलिए अब जरा इनके पाक होने का एक और हास्यास्पद तरीका दिखिए…नमाज पढ़ने के पहले इन्हें वजू करना पड़ता है..वजू के लिए इन्हें जोड़ के नीचे वाले भाग को धोना पड़ता है यनि केहुनी से नीचे,ठेहुने से नीचे तथा गर्दन से उपर वाले भाग को..चलिए यहाँ तक ठीक है पर समस्या तब आती है जब वजू करने के बाद ये नवाज के लिए तैयार होते हैं और इनके पीछे से अपानवायु छूट जाती है..क्योंकि हवा के निकलते ही वजू टूट जाती है और इन्हें फिर से वजू करना पड़ता है यनि कि फिर से हाथ पैर और सर भिगोंना पड़ता है…अब प्रश्न ये है कि अगर वायु कमर के नीचे से निकली है तो कमर के पूरे नीचे वाले भाग को भिंगोना चाहिए..!! और फिर केहुनी और सर का क्या दोष जो उसे भी फिर से कष्ट……!
पता नहीं इनलोगों में शुद्ध होने के लिए नहाने की भी कोई परम्परा है या नहीं..!

एक बात तो आपलोग जानते ही होंगे कि यहाँ भी हिंदु के विपरीत जाने के लिए ये पानी को केहुनी से हाथ की तरफ नहीं बल्कि हथेली से केहुनी की तरफ गिराते हैं…
चलिए छोड़िए ये सब छोटी मोटी बातें हैं..मुझे बस ये पूछना है कि क्या शुद्धता का पैमाना सिर्फ लिंग तक ही सीमित है,बाकि अंग से कोई लेना-देना नहीं…?जो हिंदु पूरे तन को सिर्फ पानी से ही नहीं बल्कि विभिन्न प्रकार के अपमार्जक का उपयोग करके गंगा जल छिड़ककर अपने मन को गंदे विचारों से दूर रखकर उसे भगवान की भक्ति से भरकर अपने तन के साथ-साथ अपने मन को भी शुद्ध रखने पर ध्यान देते हैं..जिस हिंदु का पैर भी अगर मैले पर चला जाता है तो पहने हुए सारे कपड़े को अपमार्जक में धोने के बाद खुद स्नान करता है वो हिंदु नापाक और जो मुस्लिम जहाँ-तहाँ से ढेले को उठाकर अपना लिंग पॊछ लेते हैं वो पाक….!!क्या ये न्याय है..??
जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख में बताया था कि उम्रभर मुसलमानों का सारा ध्यान सिर्फ लिंग पर ही केन्द्रित होता है यनि उनकी हरेक बात बस यहीं आकर खत्म हो जाती है…
अल्लाह की भक्ति क्यों….
इसलिए कि जन्नत में हूरें मिलेंगी जो इस लिंग को सुख देंगी…(अल्लाह की भक्ति भी लिंग पर आकर खत्म)
आत्मघाती बन बनते हैं क्यॊं… इस बात का भी अंतिम लक्ष्य यहीं पूरा होता है..
इनके शुद्ध होने का भी क्रिया-विधि बस यहीं आकर खत्म होता है….यनि बस लिंग को मिट्टी से सटा दो हो गए पाक…
लिंग-काटने की परम्परा इनके काटने-छाँटने की प्रवृति का ही परिणाम है..और जाहिर सी बात है जिसका बचपन में ही इतना महत्त्वपूर्ण अंग काट दिया जाय उसमें भी मारने-काटने की प्रवृति तो आयेगी ही लेकिन बात यहीं पर आकर खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं..दुःख की बात ये है कि ये लड़कियों के लिंग को भी नहीं छोड़ते….उनके लिंग को भी ६-७ साल की उम्र में काट देते हैं ये..और ये क्रिया बहुत ही कष्टकारी होती है..ये क्रिया इसलिए की जाती है ताकि लड़कियाँ संभोग का सुख प्राप्त ना कर सके,यनि वो सिर्फ मर्दों के भोगने की चीज है,उसके सुख दुख से इन्हें कोई लेना-देना नहीं..इस तरह की परम्परा के बारे में भारत के बहुत कम ही लोग जानते हैं क्योंकि ये भरतीय संस्कृति का प्रभाव है कि भारतीय मुसलमान औरतें इस तरह के कष्ट से बच गई लेकिन मुस्लिम बहुल देशों की औरतें अभी भी सह रही हैं जैसे बंग्ला-देश,पाकिस्तान आदि.मैंने ये लेख बंग्ला देश की एक औरत की आत्मकथा में पढ़ा था.उसमें जिसतरह वर्णन किया गया था सचमुच हृदय-विदारक घटना थी वो.. तो मुझे भी नहीं पता उस लेख में तो बस इतना लिखा हुआ था कि उनके योनि के बीच में कैंची चला दी गई..शायद लड़कियों के योनी के बीच में छोटी सी कोई रचना होती

होगी…उस छोटी चीज को भी काटने में दया नहीं आती इन्हें…लड़कियों के प्रति क्रूरता का इनका एक और उदाहरण है कि ईरान में अविवाहित लड़की की फाँसी देने के पहले उनका बलात्कार किया जाता है..चूँकि मुसलमान धर्म के अनुसार बिना शादी-शुदा लड़की को फाँसी देने का नियम नहीं है इसलिए उस कुँवारी लड़की का जल्लाद से शादी करवाकर उसका कौमार्य तोड़ा जाता है और उसके अगले दिन फाँसी दी जाती है..यनि इनके लिए शादी का मतलब बस इतना सा ही है..यनि बस सेक्स करना..वो शादी वाली रात इतनी भयानक होती है कि लड़कियाँ फाँसी से नहीं बल्कि उस बलात्कार वाले रात से ही डरती है..कई लड़कियों को उस रात के बाद अपना चेहरा बुरी तरह नोचते देखा गया है..

वो तो मुझे भी नहीं पता उस लेख में तो बस इतना लिखा हुआ था कि उनके योनि के बीच में कैंची चला दी गई..शायद लड़कियों के योनी के बीच में छोटी सी कोई रचना होती होगी…उस छोटी चीज को भी काटने में दया नहीं आती इन्हें…लड़कियों के प्रति क्रूरता का इनका एक और उदाहरण है कि ईरान में अविवाहित लड़की की फाँसी देने के पहले उनका बलात्कार किया जाता है..चूँकि मुसलमान धर्म के अनुसार बिना शादी-शुदा लड़की को फाँसी देने का नियम नहीं है इसलिए उस कुँवारी लड़की का जल्लाद से शादी करवाकर उसका कौमार्य तोड़ा जाता है और उसके अगले दिन फाँसी दी जाती है..यनि इनके लिए शादी का मतलब बस इतना सा ही है..यनि बस सेक्स करना..वो शादी वाली रात इतनी भयानक होती है कि लड़कियाँ फाँसी से नहीं बल्कि उस बलात्कार वाले रात से ही डरती है..कई लड़कियों को उस रात के बाद अपना चेहरा बुरी तरह नोचते देखा गया है..