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समस्या यह कि कुरान में लिखा है कि दुनिया का सबसे बड़ा अपराध अल्लाह व मोहम्मद के अतिरिक्त किसी अन्य को पूजना है । एतएव बलात्कार हत्या इत्यादि अन्य जघन्य अपराध इस्लाम को न मानने के मुकाबले छोटे पड़ जाते हैं । अतः कसाब जवाहिरी हेडली से बड़े आतंकवादी इस देश के हिन्दू हैं ।
एक मुसलमान कैसे सोचता है । आइए देखते हैं
पालनहार का साझी बनाना सबसे बड़ा गुनाह
उस सच्चे असली स्वामी ने अपनी किताब कुरआन में हमे बताया कि भलाइयां और सदकर्म छोटे भी होते हैं और बडे़ भी। इसी तरह उस स्वामी के यहाँ अपराध, पाप और बुरे काम भी छोटे बडे़ होते हैं। उसने हमें बताया है कि जो अपराध व पाप मनुष्य को सबसे अधिक और भयानक दण्ड का भोगी बनाता है, जिसे वह कभी क्षमा नहीं करेगा और जिसको करने वाला सदैव के लिए नरक में जलता रहेगा। वह नरक से बाहर नहीं जा सकेगा। वह मौत की इच्छा करेगा परन्तु उसे मौत कभी न आएगी। वह अपराध इस अकेले ईश्वर, पालनहार के साथ, उसके गुणों व अधिकारों में किसी को भागीदार बनाना है, इसके अलावा किसी दूसरे के आगे अपना सिर या माथा टेकना है और किसी और को पूजा योग्य मानना, मारने वाला, जीवित करने वाला, आजीविका देने वाला, लाभ व हानि का मालिक समझना बहुत बडा पाप और अत्यन्त ऊँचें दर्जे का जुल्म है, चाहे ऐसा किसी देवी देवता को माना जाए या सूरज चांद, सितारे या किसी पीर फ़क़ीर को, किसी को भी उस एक मात्रा स्वामी के गुणों में बराबर का या भागीदार समझना शिर्क (बहुदेववाद) है, जिसे वह स्वामी कभी क्षमा नहीं करेगा। इसके अलावा किसी भी गुनाह को यदि वह चाहे तो माफ़ कर देगा। इस पाप (अर्थात शिर्क) को स्वयं हमारी बुद्धि भी इतना ही बुरा समझती है और हमें भी इस काम को उतना ही अप्रिय समझते हैं।
यही कारण है कि सारी दुनिया को सबसे बड़े पाप ( शिर्क ) से बचाने के लिए जिहाद जिहाद को अपना अंतिम उद्देश्य बना लिया है ।
इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर और जिहाद का उद्‌देश्य इस्लाम के धर्म-ग्रंथों-कुरान और हदीसों में सुस्पष्ट दिया गया है। देखए कुछ प्रमाण-
(१) ”तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फितना (उपद्रव) बाकी न रहे और ‘दीन’ (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह के लिए हो जाए”। (कुरान मजीद ८:३९, पृ. ३५४)
(२) ”वही है जिसने अपने ‘रसूल’ को मार्ग दर्शन और सच्चे ‘दीन’ (सत्यधर्म) के साथ भेजा ताकि उसे समस्त ‘दीन’ पर प्रभुत्व प्रदान करे, चाहे मुश्रिकों को नापसन्द ही क्यों न हो”। (९:३३, पृ. ३७३)
(३) पैगम्बर मुहम्मद ने मदीना के बैतउल मिदरास में बैठे यहूदियों से कहाः ”ओ यहूदियों! सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके ‘रसूल’ की है। यदि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो तो तुम सुरक्षित रह सकोगे।” मैं तुम्हें इस देश से निकालना चाहता हूँ। इसलिए यदि तुममें से किसी के पास सम्पत्ति है तो उसे इस सम्पत्ति को बेचने की आज्ञा दी जाती है। वर्ना तुम्हें मालूम होना चाहिए कि सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके रसूल की है”। (बुखारी, खंड ४:३९२, खंड ४:३९२, पृ. २५९-२६०,मिश्कत, खंड २:२१७, पृ. ४४२)।
(४) पैगम्बर मुहम्मद ने अपने जीवन के सबसे आखिरी वक्तव्य में कहाः ”हे अल्लाह! यहूदियों और ईसाइयों को समाप्त कर दे। वे अपने पैगम्बरों की कबरों पर चर्चे (पूजाघर) बनाते हैं अरेबिया में दो धर्म नहीं रहने चाहिए।” (मुवट्‌टा मलिक, अ. ५११:१५८८, पृ. ३७१)
(५) पैगम्बर मुहम्मद ने मुसलमानों से कहा ”जब तुम गैर-मुसलमानों से मिले तो उनके सामने तीन विकल्प रखोः उनसे इस्लाम स्वीकारने या जिजिया (टैक्स) देने को कहा। यहदि वे इनमें से किसी को न मानें तो उनके साथ जिहाद (सशस्त्र युद्ध) करो।” (मुस्लिम, खं ३: ४२४९, पृ. ११३७; माजाह, खं. ४: २८५८,पृ. १८९-१९०)
यही कारण है कि मुसलमान अपने देश में किसी अन्य को मंदिर अथवा चर्च बनाने की अनुमति नहीं देते ।
जाकिर नायक का वीडियो
जाकिर नायक ने अपने वीडियो में कुरान के हवाले से कहा है कि दुनिया में सिर्फ एक ही दीन ठीक है और वह है इस्लाम इसीलिए हम अपने मुल्क में किसी अन्य को मंदिर या चर्च बनाने की इजाजत नहीं देगें ।
यही कारण है कि मुसलमान अपने देश में गैर मुसलमानों पर अपमानजनक कर जजिया लगाते हैं ।
उपरोक्त जो भी लिखा है सब सत्य है यही कारण है कि जब दिल्ली की तीस हजारी अदालत तक ने कुरान की आयतों को घृणा फैलाने वाला बताया तो किसी ने भी उसके विरूद्ध उपरी न्यायालय में आज तक अपील नहीं की । एवं आज भारत में कुरान व हदीस के विषय में इतनी पुस्तकें छापी जा रहीं हैं आज तक किसी मुसलमान की न्यायालय जाने की हिम्मत नहीं हुई ।
कुरान की आयतों पर अदालत का निर्णय
२- दूसरी समस्या यह है कि कुरान में यह भी लिखा है कि कुरान कयामत तक के लिए है एवं इसमें कयामत तक कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता । यहां यह भी समझने योग्य है कि एसे देशों में मुसलमानों की जनसंख्या कम है मुसलमान इस बात का प्रचार जोर शोर से करते रहते हैं कि इस्लाम तो शांति का मजहब है परंतु उनकी यह बात केवल गैर मुसलमानों को मूर्ख बनाने के लिए है ।
इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद साहब की तरह, जिहाद के भी दो चेहरे हैं जोकि पूरी तरह कुरान पर आधारित हैं। इसका कारण यह है कि कुरान के ११४ सूराओं में से ९० सूरा मुहम्मद साहब पर मक्का में (६१०-६२२ ए. डी.) अवतरित हुए; और बाकी के २४ मदीना में। इन दोनों जगहों में अवतरित सूराओं के कथनों के स्वभाव, विषय, उद्‌देश्यों और परिस्थितियों में व्यापक अन्तर है। उन्होंने अपने नए मज़हब इस्लाम को स्वीकार ने के लिए मक्का में बार-बार शान्तिपूण्र ढंग से आग्रह किया। उस समय अरब में विभिन्न कबीलों के लोग अपने-अपने इष्ट देवी-देवताओं की अपने ढंग से काबा में पूजा करने की पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी,सामाजिक समरसता का उपदेश दिया। हालांकि यहाँ जिहाद पर ५ आयतें हैं परनतु इस्लाम स्वीकाने के लिए गैर-मुसलमानों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध की आज्ञा नहीं दी;बल्कि कुरान कहलता है :
(i) ”दीन’ धर्म के बारे में कोई जबरदस्ती नहीं।” (२ः२५६, पृ. १७२)
(ii) ”कह दो : हे काफ़िरों ! मैं उसकी ‘इबादत’ करता नहीं जिसकी ‘इबादत’ तुम करते हो; और न तुम ही उसकी ‘इबादत’ करते हो जिसकी ‘इबादत’ मैं करता हूँ और न मैं उसकी ‘इबादत’ करने का जिसकी ‘इबादत’ तुम करते आए और न तुम उसकी ‘इबादत’ करने के जिसकी ‘इबादत’ मैं करता हूँ। तुम्हें तुम्हारा ‘दीन’ और मुझे मेरा दीन’ (१०९ : १-६, पृ. १२०७) ऐसा इसलिए कि यहाँ मुहम्मद कमज़ोर था। परन्तु सितम्बर ६२२ में मदीना में आकर उन्होंने निम्नलिखित पाँच सूत्रीय योजना के द्वारा अपने अनुयायियों का सैनिकीकरण किया : १) अपने अनुयायियों (मुसलमानों) को मदीना में बसना आवश्यक किया; २) प्रत्येक वयस्क मुसलमान के लिए ‘अल्लाह के लिए जिहाद’करना अनिवार्य किया; ३) व्यापारिक कारवाओं को पवित्र महीनों में भी लूटना वैध कर दिया; ४) लूट और पराजितों के धन, सम्पत्ति, स्त्री आदि में अस्सी प्रतिशत भाग जिहादियों और बीस प्रतिशत अपने लिए सुरक्षित कर दिया और ४) परम्परागत स्वेच्छा से दान (ज़कात) देना सबके लिए अनिवार्य कर दिया। इनके अतिरिक्त अरब के युवकों को आश्वासन दिया गया कि यदि वे गैर-मुसलानों के विरुद्ध लड़ाई में मारे गए तो उन्हें फौरन ज़न्नत मिलेगी जहाँ वे तीस वर्ष के नौजवान हो जाऐंगे और न कभी बूढ़े होंगे। वहाँ उन्हें एक सौ पुरुषों के बराबर वीर्यवत्ता दी जाएगी और कम से कम बहत्तर युवा सुन्दरियों (हूरों) के साथ उनकी शादी रचा दी जाएगी जिनके साथ वे अनन्त काल तक स्वादिष्ट भोजन, मादक शराब, सोने चांदी के महलों में रहते हुए सभी प्रकार के भोग विलास और यौन सुखों का आनन्द लेते रहेंगे। (बायर, मेडिन्स ऑफ पैराडाइज,; अनवर शेख, इस्लाम सैक्स एण्ड वायलेन्स)।
इसकी पुष्टि में कुरान कहता है :
(i) ”निस्संदेह अल्लाह ने ‘ईमान वालों’ से उनके प्राण ओर उनके माल इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए ज़न्नत है। वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं, तो वे मारते भी हैं और मारे भी जाते हैं। यह उसके जिम्मे तौरात, इन्जील, और कुरान में (किया गया) एक पक्का वादा है और अललाह से बढ़कर अपने वायदे को पूरा करने वाला हो भी कौन सकता ळै ” ? (९ : १११, पृ. ३८८)
(ii) ”तुम उनसे लड़ों यहाँ तक कि फितना शेष न रह जाए और ‘दीन (धर्म)’ अल्लाह के लिए हो जाएं। अतः यदि वे बाज़ आजाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त, किसी के विरुद्ध कोई कदम उठाना ठीक नहीं।” (२ : १९३, पृ. १५८)
(iii) ”उनसे युद्ध करो जहाँ तक कि कितना शेष्ज्ञ न रहे और दीन-पूरा का पूरा अल्लाह का हो जाए” (८ : ३९, पृ. ३५३)
(iv) ”तुम पर युद्ध फ़र्ज किया गया है’ और वह तुम्हें अप्रिय है-और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है ओर तुम नहीं जानते।” (२ : २१६, पृ. १६२)
(v) मक्का विजय (६३० ए. डी.) के बाद पेगम्बर मुहम्मद ने कहा : ”फिर जब हराम महीने बीत जाऐं तो मुश्रिकों को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो और उन्हें पकड़ों और उन्हें घेरों और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे ‘तौबा’ कल लें और ‘नमाज़’ कायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो।” (९ : ५, पृ. ३६८)। उपरोक्त आयतों से सुस्पष्ट है कि मक्का की आयतों में सहिष्णुता, सह-अस्तित्व, शान्ति और धार्मिक स्वतंत्रता की बात कही गई है जबकि मदीना की आयतों में इस्लाम न स्वीकार करने वाले दुनियां भर के लोगों के विरुद्ध अनिवार्य सशस्त्र युऋ के आदेश सुस्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मक्का में १३ वर्षों तक शान्तिपूर्ण ढंग से इस्लाम का प्रचार करने के बाद भी उलगभग एक सौ ही लोगों ने इस्लाम स्वीकारा। वहाँ मुहम्मद की सैनिक शकित कमज़ोर थी। परन्तु मदीना में मुसलमानों का सैनिकीकरण, अनिवार्य ज़कात, लूट के माल और जन्नत के भोगविलास पूर्ण जीवन के अनिवार्य ज़कात, लूट के माल और जन्नत के भोगविलास पूर्ण जीवन के प्रलोभनों के फलस्वरूप पैगम्बर मुहम्मद अत्यन्त शक्तिशाली हो गए। यहाँ सात साल के अन्दर ६३० ए. डी. में मक्का पर आक्रमण करते समय पैगम्बर की सेना में दस हजार सैनिक थे और ६३२ में (मृत्यु से पहले) उनके पास बीस हजार सैनिक थे। अतः गेर-इस्लामी देशों में जहाँ पर मुसलमान संखया बल में कमज़ोर होते हैं, वह देश ‘दारूल हरब’, जैसे भारत, होता है तो वहाँ वे मक्का की शान्ति,सहिष्णुता और सह-अस्तित्व वाली आयतों (२ः२५६; १०९ : १-६ आदि) पर बल देते हैं तािा इस्लाम को शान्ति का मज़हब होने का दावा करते हैं। वहाँ जिहाद का चेहरा शान्ति का होता है। जहाँ वे राजनैतिक दृष्टि से शकितशाली होते हैं और उनका देश दारूल इस्लाम होता है तो वे मदीना की ९.५ जैसी आयतों की भाषा बोलते हैं। वहाँ उनका चेहरा आक्रामक व डिक्टेटर जैसा हो जाता है। परन्तु यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि गैर-मुसलमानों को मक्का की उदार व शान्तिपूर्ण दिखने वाली आयतों के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि अल्लाह ने उन्हें निरस्त कर दिया है। आयतों का निरस्तीकरण : इस्लाम की मान्यता है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह इस्लाम के हित में पिछली आयतों को निरस्त करके नई या उससे बेहतर आयतें भेजता है जैसे :
(i) ”हम जो काई ‘आयत’ मन्सूख (निरस्त) कर देते हैं या भुलवा देते हैं तो उससे अच्दी या उस जैसी दूसरी (आयत) लाते हैं।” (२ : १०६, पृ. १४३)।
(ii) ”अल्लाह जो चाहता है, मिटा देता है और (जो कुछ चाहता है) क़ायम रखता है और उसी के पास मूल किताब है।” (१३ : ३९, पृ. ४६२)।
उपरोक्त आयतों के कारण सभी उलेमा आयतों के निरस्तीकरण के सिद्धान्त को मानते हैं। चौदहवीं सदी के विद्वान जलालुद्‌दीन सुयूती के अनुसार कुरान की पांच सौ आयतें निरस्त या अप्रभावी हैं। (डिक्शनरी ऑफ इस्लाम, टी. पी. ह्नयूज. पृ. ५२०)।
इस्लाम के विद्वान यह भी मानते हैं कि कुरान का ९वां सूरा सबसे बाद में अवतरित हुआ था। इसकी ५वीं आयत, जिसे ‘तलवार की आयत’ भी कहते हैं,मक्का और मदीना में अवतरित सभी पिछली आयतों को निरस्त करती हैं जो कि तर्क संगत भी है। (सैयद कुत्व, माइल स्टोन, पृ. ६३; मौहूदी-मैसेज ऑफ़ इस्लाम) इसी प्रकार म्यूर (लाईफ ऑफ मुहम्मद, पृ. (xxvii) एवं अब्दुल अज़्ज़ाम (बुर्क अलकायदा पृ. ३२) के अनुसार आयत ९ः५, क्रमशः २२४ और १४० पिछली आयतों को निरस्त करती हैं। इस सन्दर्भ में आर. बेले ने, २००२ में, लिखा है ”हालांकि सभी मुसलमान विश्वास करते हैं कि अल्लाह ने कुछ नई आयतों को भेजकर पुरानी आयतों को निरस्त किया था। परन्तु इस विषय में उनमें व्यापक मतभेद हैं कि कौन-सी आयत ने किस आयत का स्थान लिया। फिर भी अधिकांश विद्वान मानते हैं कि जिहाद के विषय में आयत ९.५ इससे पहले अवतरित हुई, सभी स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और पारस्परिक शक्तियों के आधर पर बनाया जाता है। मुसलमानों े सभी आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक कार्यक्रम जिहाद से ही नियन्त्रित होते हैं।
व्यवहार में जिहाद का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति कहाँ रहता है। यदि कोई मुसलमान गैर-मुस्लिम राज्य में रहता है तो उसके लिए जिहाद का एक अर्थ सब सम्भव उपायों द्वारा मुस्लिम समुदाय की संखया बढ़ाना तथा सरकार से अधिकाधिक आर्थिक सहायता, धार्मिक स्वतंत्रता, और राजनैतिक अधिकारों को प्राप्त करना है और दूसरी तरफ साम-दाम-दण्ड-भेद आदि उपायों और शान्तिपूर्ण जिहाद द्वारा धीरे-धीरे ऐसे देश में इस्लामी राज्य स्थापित करना है। यदि वह किसी मुस्लिम राज्य में रहता है तो उसके लिए जिहाद का मतलब है कि वह वहाँ अल्लाह का कानून अक्षरशः लागू करवाने का प्रयास करें। परन्तु व्यवहार में ५७ इस्लामी राज्य होते हुए भी इनमें इस्लामी कानून (शरियत) एक समान नहीं है। क्योंकि इस्लाम स्वयं ७३ फिरकों में बंटा हुआ है और प्रत्येक की अलग-अलग शरियत है। अतः जिहाद का स्वरूप भी विभिन्न है। इसीलिए शिया, सुन्नी, सूफ़ी, अहमदिया, बहावी आदि फिरकों के मुसलमान अल्लाह के नाम पर जिहाद के विषय में आपस में संघर्ष करते पाए गए हैं। मुहम्मद अमीर राना के अनुसार ‘कश्मीर में ही जिहाद के नाम पर विभिन्न जिहादी फिरकों की बीच दो हजार संघर्ष हुए हैं।” (गेट वे टू टैरोज्मि, पृ. २९)। इन फिरकों में आपसी मतभेद कितने भी क्यों न हों परन्तु ये सब फिरके गैर-मुस्लिम राज्यों को जल्द से जल्द इस्लामी राज्य बनाने में पूरी तरह से एकमत एवं एक जुट है ।
सारांश में समस्या यह कि कुरान व हदीस ने मुसलमानों को सारी दुनिया को मुसलमान बनाने का आदेश दे दिया है । इसी कारण मुसलमानों ने गैर मुसलमानों के विरूद्ध सारी दुनिया में जिहाद छेड़ रखा है ।
मुसलमानों की गैर मुसलमानों से इस तरह के व्यवहार से सभी गैर मुसलमान परेशान हो चुके हैं । अब आइए देखते हैं हिन्दुओं द्वारा भारत में अब इस्लाम से निपटने के लिए क्या क्या उपाय किए गए हैं ? एक साधारण उपाय हिन्दु कहते हैं कि पाकिस्तान के आतंकवादी शिविरों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देना चाहिए । पर वह काम तो अमेरिका कर ही रहा है और उससे आतंकवाद के समाप्त होने का कोई निशान दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है । लादेन के मरने से आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ है। कुरान व हदीस में गैर मुसलमानों के विरूद्ध जहर के रहते मदरसे हर साल लाखों की संख्या में लादेन व उसके अनुयायी पैदा करते ही रहेंगे । हिन्दुओं द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अब तक जो इस्लाम की आंधी को रोकने के लिए किए गए कार्य किए गए उनमें सबसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 को हटाने का मुद्दा उठाया इसी के लिए अपना बलिदान दिया । पर उनके बलिदान के आज 50 वर्ष से भी अधिक बीत जाने के बावजूद धारा 370 हटाये जाने के कोई आसार नहीं हैं । न हीं समान नागरिक संहिता लागू करने के कोई आसार दिखाई देते हैं । उसके बाद राम मंदिर आंदोलन व हाल ही में कश्मीर में अमरनाथ मंदिर के लिए भूमि का आवंटन करने के लिए भी हिन्दुओं द्वारा आंदोलन किया गया है परंतु इन सभी आंदोलनों से समस्या की जड़ पर कोई प्रहार नहीं हुआ बल्कि इस्लाम का अपनी आबादी बढ़ाना और मदरसों द्वारा उस आबादी को कट्टर बनाने का कार्य निर्बाध रूप से जारी है । अब मान ले हम अपने उपरोक्त आंदोलन में सफल हो भी जाते हैं तो इन सबसे समस्या का समाधान किसी भी स्तर पर नहीं होगा । यदि राम मंदिर हिन्दुओं को अदालत के आदेश से मिल भी जाता है तो आने वाले समय में पुनः छिन जाएगा । अनुच्छेद 370 को हटा भी दिया जाता है तो आने वाले समय में पूरा भारत कश्मीर की तरह हो जाएगा व पूरे भारत से हिन्दुओं को कश्मीर की तरह से निकालने की साजिश की जाएगी ।
मुलसमानों की वास्तविक स्थिति
मुसलमान सारी दुनिया में वास्तव में सबसे दुखी कौम है । मुसलमान कहते हैं सारी दुनिया इस्लाम को समाप्त करने की साजिश कर रही है । वे ऐसा क्यों कहते हैं वे ऐसा इसीलिए कहते हैं क्योंकि वे खुद सारी गैर मुस्लिम दुनिया को समाप्त करके सारी दुनिया को इस्लाम के हरे रंग में रंगने की तैयारी कर रहे हैं । चूंकि वे खुद सारी दुनिया के हजार वर्ष से दुश्मन बनें हैं अतः उन्हें सारी दुनिया भी मुसलमानो की दुश्मन नजर आती है । दिया । अब हथियारों का उत्तर किसी भी दुनिया में अंहिसा से नहीं दिया जा सकता अतएव भारत सरकार ने भी मजबूरी में अपनी सेना को कश्मीर में लगाना पड़ा । अब लगातार 25 वर्षों से कश्मीर भारत से केवल सेना के बल पर ही रूका हुआ है अगर आज भारत सरकार कश्मीर से सेना हटा लेती है तो निश्चित रूप से कश्मीरी मुसलमान कश्मीर का पाकिस्तान में विलय कर देंगे ये मुसलमानों की मजबूरी है । कुरान व मौहम्मद के आदेश से मुसलमान इंकार कर नहीं सकते । इसीलिए वह कश्मीरी जिसकी प्रति व्यक्ति आय आतंकवाद के शुरू होने से पहले भारत में सबसे अधिक थी आज हजारों करोड़ की मदद से दाना पानी खा रहे हैं । अब जरा राष्ट्रवादी मुस्लिम की स्थिति पर भी विचार करें वह भारत के लिए सोचता है । कट्टरता से भी ग्रस्त नहीं है पर जब वह हिन्दुओं का व्यवहार देखता है कि सारे हिन्दू उसे संदेह की नजर से देखते हैं तो उसके दिल पर क्या बीतती होगी यह केवल वही जानता । उसी के दिल की व्यथा को भारतीय फिल्मों में दिखाया जाता है । कुरान की आयतों ने ही पूरे मुस्लिम व गैर मुस्लिम समाज को परेशान कर रखा है । मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच शत्रुता की खाई को तब तक के लिए खोद दिया है जब तक कि सारे गैर मुसलमान मुसलमान न बन जाएं । समस्या यह है कि कुरान नफरत के बीज फैला रही है और जब यह बीज बढ़कर गोधरा जैसे नरसंहार का कारण बनते हैं तो उसके प्रति नफरत फैलना दूसरे समाज के लिए स्वाभाविक है । परंतु यदि हम जड़ पर कोई प्रहार नहीं करेंगे तो इसी प्रकार के नरसंहार होते ही रहेंगे ।
इस तरह से गैर मुसलमान समाज यह बताए कि यदि उसका जन्म मुसलमान के रूप में हुआ होता तो आज उसकी हालत क्या किसी मुसलमान से भिन्न होती । अतः गैर मुसलमान का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वह जिहादी मानसिकता वाले मुसलमानों को उसकी इस शोचनीय व निरतंर युद्ध की काल्पनिक दुनिया से बाहर निकालें ।
उपाय-
१- इस्लाम की मूल विचारधारा को देश का बुद्धिजीवी समझे । संक्षेप में इसके लिए सउदी अरब के इस फतवे का अध्ययन हर बुद्धिजीवी को करना चाहिए ।
http://www.islamhouse.com/p/289311
स्थान स्थान पर बुद्धिजीवी वर्ग की गोष्ठियां करके गैर मुस्लिम समाज को इस्लाम के सही स्वरूप से परिचित कराया जाए । समस्या की जड़ तक पहुंच कर जब तक उस पर प्रहार नहीं किया जाएगा तबतक केवल इसकी फूल पत्तियों या टहनियों को काट कर को समाधान नहीं मिल पाएगा । जड़ के रहते वे फिर से आ जांएगी । अतः अब प्रहार सीधे जड़ पर करना होगा । और जड़ कुरान व हदीस में लिखें मौहम्मद पैगम्बर का संदेश है । अब इसका केवल एक ही उपाय है कि सारे गैर मुसलमान मुसलमानों से कहें कुरान में जो गैर मुसलमानों के विरूद्ध लिखा गया है उसे मानना अथवा कुरान को मानना ( अर्थात इस्लाम छोड़ दें ) बंद करें । मुसीबत को और बढ़ने से रोकने के लिए मुसलमानों की जनसंख्या पर तुरंत रोक लगाने का उपाय किया जाए । सारे गैर मुसलानों को इस प्रयास में युद्ध स्तर पर लग जाना चाहिए । अब इसका केवल एक ही उपाय दिखायी देता है कि सारे गैर मुसलमान मुसलमानों से कहें कुरान में जो गैर मुसलमानों के विरूद्ध लिखा गया है उसे मानना अथवा कुरान को मानना ( अर्थात इस्लाम छोड़ दें ) बंद करें । मुसीबत को और बढ़ने से रोकने के लिए मुसलमानों की जनसंख्या पर तुरंत रोक लगाने का उपाय किया जाए ।
इस्लाम की इस विचारधारा के रहते अन्य पंथ वालों का इस्लाम के साथ कोई मेल नहीं हो सकता । यह तभी संभव है जब देश का गैर मुस्लिम समाज संगठित होकर इस बात के मुसलमानों पर दबाव बनाए ।
२- पूरी दुनिया में इस्लामी राज फैलाने के लिए इस्लाम में महिलाऒं का उपयोग बच्चा पैदा करने की मशीन के रूप में हो रहा है । इसी कारण इस्लाम में महिलाऒं को केवल भरण पोषण का अधिकार दिया गया है । मुस्लिम महिलाऒं को जागरूक बनाया जाए ।
एक मुस्लिम औरत की व्यथा
इस्लाम में महिलाओं की स्थिति
इस्लाम में गर्भ निरोधक हराम
३- शोध से बात सामने आयी है भारत का केवल १५ प्रतिशत मुस्लिम समाज ही अपने उपर निर्भर है । १५ प्रतिशत में खेतीहर सउदी अरब से रूपया भेजने वाले सरकारी नौकरीवाले इत्यादि शामिल हैं । शेष समाज आज भी हिन्दू समाज से ही अपनी आजीविका चला रहा है ।
अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार के भरोसे रहने के बजाए पूरा हिन्दू समाज इस समस्या को समाप्त करने के लिए अपनी कमर कस ले । इस नालायक व भ्रष्टाचारी सरकार को पूरे समाज के जागरण से ही ठीक किया सकता है ।
प्रवीन भाई तोगड़िया का हिन्दू समाज को संदेश
4-यदि कोई मुस्लिम इस्लाम छोड़ना चाहे तो उसका स्वागत किया जाए । अपने ही समाज से विधर्मी बने लोगों को वापिस अपने में न लेने के कारण ही आज मुसलमान इतनी बड़ी संख्या में हो गए हैं । जिस प्रकार मुसलमान बड़ी संख्या में लव जिहाद चला रहे हैं उस प्रकार हिन्दू भी लव जिहाद चलाकर मुस्लिम लड़कियों व लड़कों को हिन्दू बनाएं । यदि समय रहते ही इन लोगों के लिए अपने हिन्दू धर्म में वापसी का रास्ता खुला होता तो आज यह समस्या इतनी नहीं बढ़ी होती । यदि आज अपने समाज के दो व्यक्ति मुसलमान बनते हैं व उनके ३० वर्ष होने पर ४ बच्चे होते हैं अर्थात ३० वर्ष में दोगुने होते हैं तो २७० वर्ष में यही दो व्यक्ति १००० हो जाएगें । इस हिसाब से यदि औरंगजेब ने ३०० वर्ष पूर्व १ लाख हिन्दुऒं को मुसलमान बनाया हो तो आज वे बढ़कर १० करोड़ हो गए हैं । क्योंकि यह तो सभी जानते हैं कि न के बराबर हिन्दू ही इस्लामी ग्यान से प्रभावित होकर मुसलमान बनते हैं अधिकतर हिन्दू जजिया या अन्य प्रलोभन इत्यादि के कारण ही मुसलमान बने हैं ।