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मेरी तहरीर में – – –

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी

”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,

हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,

और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह हुज्र,१५ पारा१४

(दूसरी किस्त)

मैजिक आई

अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ (हलधर) कहते हैं अँधेरा जितना गहरा होता है, मैजिक आई उतनी ही चका चौंध और मोहक लगती है.

हाली साहब सर सय्यद के सहायकों में एक थे, रेडियो कालीन युग था जब रेडयो में एक मैजिक आई हुवा करती थी, श्रोता गण उसी पर आँखें गडोए रहते थे. हाली का अँधेरे से अभिप्राय था निरक्षरता.

कहते हैं कि चम्मच से खाने पर भी मुल्लाओं का कटाक्ष है जब कि यह साइंसटिफिक है, क्यूँकि इंसान की त्वचा बीमारी के कीटाणुओं को आमन्तिरित करती है.

सर सय्यद को मुल्लाओं ने काफ़िर होने का फ़तवा दे दिया था. पता नहीं मौलाना हाली को बख्शा या नहीं.

कुरआन का सपाट तर्जुमा और उस पर बेबाक तबसरा पहली बार शायद अपने भारतीय माहौल में मैंने किया है. मेरे विश्वास पात्र सरिता मैगज़ीन के संपादक स्वर्गीय विश्व नाथ जी ने कहा इतना तो मैं भी समझता हूँ जो तुम समझते हो मगर इसका फायदा क्या? मुफ्त में अंगार हाथ में ले रहे हो और मेरे लेख की पंक्तियाँ उन्हें अंगार लगीं, सरिता में जगह देने से इंकार कर दिया.

कुरआन को नग्नावस्था में देखने के बाद कुकर्मियों की रालें टपक पड़ती हैं कि एक अनपढ़, उम्मी का नाम धारण करके अगर इतना बड़ा पैगम्बर बन सकता है तो मैं क्यूँ नहीं? न बड़ा तो मिनी पैगम्बर ही सही. गोया चौदह सौ सालों से मुहम्मद की नकल में जगह जगह मिनी पैगम्बर कुकुर मुत्ते की तरह पैदा हो रहे हैं.

इसी सिलसिले के ताज़े और कामयाब पैगम्बर मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी हुए हैं. यह मुहम्मद की ही भविष्य वाणी के फल स्वरुप हैं कि ”ईसा एक दिन मेहदी अलैहिस्सलाम बन कर आएँगे और दज्जाल को क़त्ल कर के इस्लाम का राज क़ायम करेंगे .”

मिर्ज़ा ने मुहम्मद की बकवास का फ़ायदा उठाया, और बन बैठे” मेंहदी अलैहिस्सलाम” क़दियानियों की मस्जिदें तक कायम हो गईं, वह भी पाकिस्तान लाहोर में. उसमें इस्लामी कल्चर के मुवाफिक क़त्ल ओ ग़ारत गरी भी होने लगी. पिछले दिनों ७२ अहमदिए शहीद हुए. उस शहादत की याद आती है जब मुहम्मद का वंश कर्बला में अपने कुकर्मों का परिणाम लिए इस ज़मीन से उठ गया था, वह भी ७२ थे.

उम्मी (निरक्षर) मुहम्मद सदियों पहले अंध वैश्वासिक युग में हुए. उन्होंने इर्तेक़ा (रचना क्रिया) के पैरों में ज़ंजीर डाल कर युग को और भी सदियों पीछे ढकेल दिया. इस्लाम से पहले अरब योरोप से आगे था, खुद इसे योरोपियन दानिश्वर तस्लीम करते हैं और अनजाने में मुस्लिम आलिम भी मगर मुहम्मद ने सिर्फ अरब का ही नहीं दुन्या के कई टुकड़ों का सर्व नाश कर दिया.

युग का अँधेरा दूर हो गया है, धरती के कई हिस्सों पर रातें भी दिन की तरह रौशन हो गई मगर मुहम्मद का नाज़िला (प्रकोपित) अंधकार मय इस्लाम अपनी मैजिक आई लिए मुसलमानों को सदियों पुराने तमाशे दिखा रहाहै.

आइए अब अन्धकार युग के मैजिक आई कि तरफ़ चलें . . .

”और हम ही हवाओं को भेजते हैं जो कि बादलों को पानी से भर देती हैं फिर हम ही आसमान से पानी बरसते हैं फिर तुम को पीने को देते हैं और तुम जमा करके न रख सकते थे और हम ही ज़िन्दा करते मारते हैं और हम ही रह जाएँगे.

सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (२१-२३)

कुदरत अपने फ़ितरी अमल पर गामज़न रहते हुए मुहम्मदी अल्लाह की बातों पर हँस रही होगी न रो रही होगी जो उसकी सिफ्तों को अपने नाम कर रहा है और बदले में खुद को पुजवा रहा है. कमज़रफी के साथ खुद सताई कर रहा है.

”बेशक आप का रब हिकमत वाला है और हमने इन्सान को बजती हुई मिटटी से जो कि सड़े हुए गारे की बनी हुई थी पैदा किया. और जिन्न को इस के क़ब्ल आग से कि वह एक गरम हवा हुवा करती थी, पैदा किया.”

सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (२५-२७)

ये बजती हुई मिटटी भी खूब रही? जिससे इन्सान बनाया गया? आदमी बोलता है, गाता है, तिलावत भी करता है मगर बजता कहाँ है? हाँ कभी कभी बदबू दार हवा छोड़ने से या पेट का हारमोनियम फूलने से रियाह खरिज हो जाने की वजेह बज जाता है. ऐसे गंधैले इंसान का मंसूबा जब साफ सुथरे फरिश्तों के सामने अल्लाह रखता है कि मैं इसको वजूद में ला रहा हूँ तो तमाम फ़रिश्ते उसको सजदा करने पर राज़ी हो जाते हैं मगर इब्लीस भड़क उठता है. इस की कहानी जानी पहचानी दूर तक कुरआन में जो बार बार दोहराई जाती है, शुरू हो जाती है . . .

मुहम्मद का एक और शगूफा की जिन्न को गरम हवा से पैदा किया. खुद इनको अल्लाह ने दरोग और मक्र से पैदा किया।

(आदम के वजूद और इब्ल्लीस की बग़ावत की कहानी उम्मी की ज़ुबानी कई बार दोहराई जाती है)

सूरह हुज्र,१५ पारा१४आयत (२८-४४)

”बेशक अल्लाह से डरने वाले बाग़ों और चश्मों में होंगे. तुम उसमें सलामती और अम्न से दाखिल होगे. उनके दिलों में जो कीना था वह हम सब दूर कर देंगे कि सब भाई भाई की तरह रहेंगे तख्तों पर आमने सामने, वहां इनको ज़रा भी तकलीफ़ नहीं होगी. और न वहां से निकाले जाएँगे. आप मेरे बन्दों को इत्तेला दे दीजिए कि मैं बड़ा मगफेरत वाला हूँ और मेरी सजा दर्दनाक सजा है.”

सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (४५-५०)

मुहम्मद से डरने वालों की ही खैर है. कल जब वह हयात थे तो उनके साथी हथियार बन्दों से डरना पड़ता था, उनके बाद उनकी खड़ी की गई फौजों से, फिर उन फौजयों की लश्करों और जज़िया से, फिर ओलिमा के फ़तुओं से और अब इस्लामी गुंडों से डरना पड़ रहा है. हम बागों और चश्मों में तो नहीं, हाँ झुग्गी और झोपड़ियों में रहते चले आए हैं और मुहम्मदी अल्लाह ने चाहा तो हमेशा रहेंगे. सब्र,सुकून अम्न और अल्लाह के डर के साथ. अल्लाह ऊपर हमारे दिलों के तमाम कीना, बुग्ज़ दूर कर देगा दुन्या में दूर करके हम सब को नेक इन्सान क्यूं नहीं बना देता? आखिर उसकी भी तो कुछ मजबूरी होगी, मगर ऐ अल्लाह जो भी हो तू है पक्का दोगला. इत्तेला देता है ”मैं बड़ा मगफेरत वाला हूँ ”और अगली साँस में ही कहता है ”मेरी सज़ा दर्दनाक सज़ा है।”

”अल्लाह ने इस सूरह में फिर किस्से इब्राहीमी और किस्से लूत बड़ी बेमज़ा तरह से दोहराया है जिसे सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (५१-७६) तक देखा जा सकताहै।

”और हुज्र वालों ने पैगम्बर को झूठा बतलाया और हमने उनको अपनी निशानयाँ दीं सो वह लोग उस से रू गरदनी करते रहे और वह लोग पहाड़ों को तराश तराश कर अपना घर बनाते थे कि अमन में रहें सो उनको सुबह के वक़्त आवाज़ ए सख्त ने आन पकड़ा सो उनका हुनर उनके कुछ काम न आया . . और ज़रूर क़यामत आने वाली है, सो आप खूबी के साथ दरगुज़र कीजिए.”

सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (८०-८५)

मुहम्मद ने तौरेती वाक़ेए के मुखबिर यहूदी के ज़ुबानी सुना सुनाया किस्सा गढ़ते हुए उस बस्ती को लिया है जिस पर कुदरती आपदा आ गई थी जिसमें बसे लूत बस्ती को तर्क करके पहाड़ों पर अपनी बेटियों के साथ आबाद हो गए थे और उनकी बीवी हादसे का शिकार हो गई थी. उसके आसार आज भी देखे जा सकते हैं कि योरोपियन लूत की नस्लें मुआबियों और अम्मोनियों को उस वाक़ेए पर रिसर्च करने की तैफीक़ हुई है. मुहम्मद उसकी कहानी की गाढ़ी कुरआन की मुसलामानों से तिलावत करा रहे हैं.

”बिला शुबहा आप का रब बड़ा खालिक और बड़ा आलिम है. और हम ने आप को सात आयतें दीं जो मुक़र्रर हैं और कुरआन ए अज़ीम. आप अपनी आँख उठा कर भी इस चीज़ को न देखिए जो कि हम ने उन मुख्तलिफ़ लोगों को बरतने के लिए दे रक्खी है और उन पर ग़म न कीजिए.और मुसलमानों पर शिफक़त रखिए.”

सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (८६-८८)

अल्लाह अपने प्यारे नबी से वार्ता लाप कर रहा है कि वह बड़ा निर्माण कुशल और ज्ञानी है, कहता है हमने आपको सात आयतें दीं(?) { अब याद नहीं कि सात दीं या सात सौ ? कुछ याद नहीं आ रहा} कि कुराने-अज़ीम समझो. वह अपने बच्चे को समझाता है दूसरों की संपन्नता को आँख उठा कर देखा ही मत करो. ”रूखी सूखी खाए के ठंडा पानी पिव, देख पराई चोपड़ी क्यूं ललचाए जिव.” इस बात का गम भी न किया करो.( कुरैशियों का आगे भला ज़रूर होगा.) बस मुसलामानों को चूतिया बनाए रहना।

”और कह दीजिए कि खुल्लम खुल्ला मैं डराने वाला हूँ जैसा कि हम ने उन लोगों पर नाज़िल किया है जिन्हों ने हिस्से कर रखे थे यानी आसमानी किताबों के मुख्तलिफ़ अजज़ा करार दिए थे, सो तुम्हारे परवर दिगार की क़सम हम उन सब के आमाल की ज़रूर बाज़ पुर्स करेंगे. ये लोग जो हँसते हैं अल्लाह तअला के साथ, दूसरा माबूद क़रार देते हैं, उन से आप के लिए हम काफ़ी हैं. सो उनको अभी मालूम हुवा जाता है. और वाक़ई हमें मालूम है ये लोग जो बातें करते हैं उस से आप तंग दिल हैं.”

सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (९५-९७)

अल्लाह की राय मुहम्मद को कितनी सटीक है कि कहता है कह दीजिए कि खुल्लम खुल्ला मैं डराने वाला बागड़ बिल्ला हूँ , यह कि इस से वह हजारों साल तक डरते रहेगे. हमने उन मुसलमानों पर दिमागी हिपना टिज्म कायम ओ दायम कर दिया है. यह आसमानी किताबों के मुख्तलिफ़ अजज़ा क्या होते हैं किसी दारोग गो आलिम से पूछना होगा की अल्लाह यहाँ पर बे महेल बहकी बहकी बातें क्यूं करता है? अपने प्यारे नबी को तसल्ली देता है कि वह उनके दुश्मनों से जवाब तलब करेगा कि मेरे रसूल की बातें क्यूं नहीं मानीं? और उल्टा उनका मजाक उड़ाया.

काश कि मुहम्मद तंग दिल न होते, कुशादा दिल और तालीम याफ़्ता भी होते।

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान