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मेरी तहरीर में – – –

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी

”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,

हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,

और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह यूनुस -१०

(दूसरी किस्त)

खुद मुहम्मद ने आज़माइश के तौर पर दो चमत्कारी झूट गढ़े, शक्कुल क़मर यानि चाँद के दो टुकड़े उंगली के इशारे से कर दिए जिसके नतीजे में चाँद का टुकड़ा एक इस छोर गिरा और दूसरा उस छोर पर गिरा,

और मेराज यानि सैर ए आसमानी. यह दोनों करतब उन्होंने ईसा, मूसा की नक़ल में लोगों के ताने पर किए मगर इस का सिवाय मुहम्मदी अल्लाह के कोई गवाह न मिला, खलीफाओं की सख्त फटकार पर फिर कोई इस किस्म का चमत्कार नहीं हुवा.

इस्लामी धर्म गुरुओं ने मुहम्मद के बाद न इन पहले मुअजज़ात को ही सच ठहराया बल्कि उसके बाद तलवार के साए में रह कर मुहम्मद के बारे में कुछ चमत्कारी झूट गढ़ा, वह भी अपने आप में चमत्कार ही कहा जाएगा. पानी का क़हेत पड़ जाना, उसपर रसूल की उगलियों से पानी का झरना बह निकलना, सूरज के डूब जाने के एक घंटे बाद उसे फिर बाहर निकल देना, खाने और पानी में मुहम्मद के थूक देने से उस में कई गुना बरकत हो जाना वगैरा वगैरा – – –

इस तरह मुहम्मद के चमत्कारों एक लंबा अंबार भरा पड़ा है.

जलवे तूर ख्वाबे-मूसा है,

किसने देखा है, किसको देखा है.

या यूँ कहें – – –

बुद्धि हाथों पे सरसों उगती रही,

बुद्धू कहते रहे कि चमत्कार है.

अब आइए मुहम्मदी अल्लाह के एहसानों में दब कर जीने का तरीका देखें – – –

“जब इंसान को कोई तकलीफ पहुँचती है तो हम को पुकारने लगता है, लेटे भी, बैठे भी और खड़े भी, फिर जब हम इसकी तकलीफ हटा देते हैं तो फिर अपनी पहली हालत पर आ जाता है. जो शख्स अल्लाह और रसूल की पूरी इताअत करेगा, अल्लाह तअला उसको ऐसी बहिश्तें में दाखिल करेंगे जिसके नीचे नहरें जरी होंगी। हमेशा हमेशा इनमें रहेगे, यह बड़ी कामयाबी है.”

सूरह यूनुस १० -११-वाँ परा आयत (12)

ऐ मुहम्मदी अल्लाह!

तू मुसलामानों को तकलीफ में मुब्तिला ही क्यूँ करता है?

क्या इस लिए कि वह तुझ को पुकारें?

तकलीफ दूर हो जाने के बाद भी क्या तू चाहता है कि वह अल्ला हू अल्ला हू करता रहे?

मुसलामानों!

क़ुदरत ने अपने मख्लूक़ के लिए एक निज़ाम सादिक़ बना कर खुद को इसके इंतेज़ाम से अलग थलग कर रखा है जिसकी वज़ाहत तुलसी दास ने बहुत खूब की है – – –

धरा को प्रमाण यही तुलसी,

जो फरा, सो झरा, जो बरा, सो बुताना.

जिसे फ़ारसी में कुछ यूँ कहा गया है- – –

” हर कमाले रा ज़वाल.”

मुहम्मद इस निज़ाम ए कुदरत में अपनी क़ुरआनी खिचड़ी उबाल कर दुन्या को गुमराह किए हुए हैं.

जागो मुसलमानों !

बहुत पीछे हो चुके हो!!

और पीछे हो जागो तुम्हारे लिए अल कायदा, तालिबानियों और जैश ए मुहम्मद ने जहन्नम तैयार कर रक्खी है।

“और हमने तुम से पहले बहुत से गिरोहों को हलाक कर दिया, जबकि उन्हों ने ज़ुल्म किया (यानी कुफ़्र और शिर्क) हालाँकि इनके पैगम्बर दलायल लेकर आए. वह ऐसे लोग कब थे कि ईमान ले आते. हम मुजरिम लोगों को ऐसी ही सजा दिया करते हैं, फिर दुन्या में बजाए उनके तुम को आबाद किया कि ज़ाहिरी तौर पर हम देख लें कि तुम कैसा काम करते हो. जो शख्स अल्लाह और उसके रसूल की पूरी इताअत करेगा, अल्लाह तअला उसको ऐसी बहिश्तों में दाख़िल कर देंगे जिसके नीचे नहरें जारी होंगी, हमेशा हमेशा इसमें रहेंगे, ये बड़ी कामयाबी है.”

सूरह यूनुस १० -११-वाँ परा आयत (१३-१४)

इंसानी गिरोह के नादान और इस सदी के मासूम, सीधे सादे मुसलामानों!

क्या तुम्हारा अल्लाह ऐसा ज़ालिम होना चाहिए जो कह रहा है कि उसने इंसानी गिरोहों को हलाक कर दिया है?

सोचिए कि उसने ऐसे इंसानी गिरोह पैदा ही क्यों किया?

उनको ऐसी नाकिस अक्ल ही क्यूं दी?

जो इतना बेवकूफ कि इंसानों के ज़ाहिर को देखना चाहता है, उसका बातिन कैसा भी हो?

जो धमकी दे रहा हो कि ईमान न लाए तो तुहारे मादरे वतन हिंद पर तुम को मिटा कर चीनियों और जापानियों को आबाद कर देगा.जो मुहम्मद की पुर जेहल बातों को दलायल भरी बातें मानता हो?

वह कोई अल्लाह हो सकता है?

सोचो कि तुम अल्लाह के धोखे में किसी फ्रोड की इबादत तो नहीं कर रहे हो. कुरान में बार बार दोहराता है ”जो शख्स अल्लाह और उसके रसूल की पूरी इताअत करेगा, अल्लाह तअला उसको ऐसी बहिश्तों में दाख़िल कर देंगे जिसके नीचे नहरें जारी होंगी, हमेशा हमेशा इसमें रहेंगे, ये बड़ी कामयाबी है.”

अगर सर्द मुल्कों में ऐसे नहरों वाले घर मिल जाएं तो अजाब ही होंगे मगर कुवें के मेंढक मुहम्मद को अरब के सिवा इल्म कि क्या था?

“और जब इनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं जो बिलकुल साफ़ साफ़ हैं, तो यह लोग जिनको हमारे पास आने का बिलकुल खटका नहीं है, कहते है इसके अलावः कोई दूसरा कुरआन लाइए या कम अज़ कम इसमें कुछ तरमीम कर दीजिए. आप कह दीजिए कि मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं इस में अपनी तरफ़ से कुछ तरमीम कर दूं. बस मैं तो इसी की पैरवी करूँगा जो मेरे पास वहिय के ज़रिए भेजा गया है, अगर मैं इसमें अपने रब की ना फ़रमानी करूँगा तो मैं एक बड़े भारी दिन के अज़ाब का अंदेशा रखता हूँ.”

सूरह यूनुस १० -११-वाँ परा आयत (१५)

इस्लाम बुत परस्ती के खिलाफ़ मक़बूल हो रहा था। कुछ संजीदा और साहिबे इल्म लोग भी इसमें शामिल हो रहे थे जिनको कुरआन फ़ितरी तौर पर हज्म नहीं हो रहा था (जैसे कि आज तक इन मक्कार और खुद गरज़ ओलिमा के सिवा इसको समझने के बाद यह किसी को हज्म नहीं होता) लोग कुरआन को इस्लामी तहरीक से जुदा कर देना चाहते थे या फिर इसकी इस्लाह चाहते थे. चालाक मुहम्मद यह बात अच्छी तरह जानते थे कि अल्लाह से वहिय (ईश वाणी) का सिसिला ही उनकी पैगम्बरी की बुन्याद है. वह इससे एक सूत भी पीछे हटने को तैयार न थे. बिल आखीर उनको कहना पड़ा कि कुरआन तिलावत की चीज़ है ना कि समझने समझाने की. कुरआन का झूट ही मुसलामानों के दिलो-दिमाग और वजूद परग़ालिब है. इससे जिस दिन मुसलामानों को नजात मिल जाएगी उस दिन से उसका उद्धार शुरू हो जायगा.

“और यह लोग अल्लाह की तौहीद (एक ईश्वर वाद) को छोड़ कर ऐसी चीज़ों की इबादत करते हैं जो इन लोगों को ज़रर पहुँचा सकें न नफ़ा पहुंचा सकें और कहते हैं कि यह अल्लाह के पास हमारे सिफारशी हैं. आप कह दीजिए कि क्या तुम अल्लाह तअला को ऐसी चीज़ की खबर देते हो जो कि उसे मालूम नहीं?”

सूरह यूनुस १० -११-वाँ परा आयत (१८)

इस्लाम के मुताबिक़ कुफ़्र वह है जो अल्लाह वाहिद लाशारीक को छोड़ कर किसी और को अल्लाह माने जो उमूमन हिन्दू बुद्ध और जैन वगैरह मानते हैं और शिर्क वह है जो अल्लाह वाहिद लाशारीक के साथ किसी को शरीक करे। इस सिलसिले में बावजूद इस्लाम के सब से ज़्यादः बर्रे सागीर का मुस्लमान शिर्क ज़दा है। कब्र पुज्जे सब से ज्यादह उप महाद्वीप में ही मिलेंगे. यह इंसानी फितरत है जहाँ हर अल्लाह फ़ेल है.मुहम्मद को मालूम था कि इन मिनी अल्लाहों को अगर मिटा दिया जाए तो इस दुन्या में सिर्फ उनका नाम रह जायगा। जिसमे किसी हद तक वह कामयाब रहे मगर झूट केबद तरीन अंजाम के साथ.

“और यह लोग कहते हैं इन पर(मुहम्मद पर) इनकी रब की तरफ़ से कोई मुअज्ज़ा क्यूं नाज़िल नहीं हुवा? सो आप कह दीजिए को ग़ैब की खबर सिर्फ़ अल्लाह को है सो तुम भी मुन्तज़िर रहो, तुम्हारे साथ हम भी मुन्तज़िर हैं.”

सूरह यूनुस १० -११-वाँ परा आयत (२०)

मूसा और ईसा के बहुत से मुआज्ज़े(चमत्कार)थे जिनको देख कर लोग क़ायल हो जाया करते थे और उनकी हस्ती को तस्लीम करते थे. मूसा के करिश्मे कि पानी पर लाठी मारके उसे फाड़ देना, लाठी को ज़मीन पर डालकर उसे सांप बना देना, दरयाय नील को अपनी लाठी के लम्स से सुर्ख कर देना, नड सागर को दो हिस्सों में तक़सीम करके बीच से रास्ता बना देना वगैरह वगैरह. इसी तरह ईसा भी चलते फिरते करिश्में दिखलाते थे. बीमार को सेहत मंद कर देना, कोढियों को चंगा करदेना, सूखे दरख़्त को हरा भरा कर देना और बाँझ औरत की गोद भर देना वगैरह वगैरह. लोग मुहम्मद से पूछा करते कि आप बहैसियत पैगम्बर क्या मुअज्ज़े रखते हैं तो जवाब में मुहम्मद बजाय अपने करिश्मे दिखलाने के कुदरत के कारनामें गिनवाने लगते, जैसे रात के पीछे दिन और दिन के पीछे रात के आने का करिश्मा, मेह से पानी बरसने का करिश्मा, ज़मीन के मर जाने और पानी पाकर जी उठने का करिश्मा, अल्लाह को हर बात के इल्म होने का करिश्मा. किस कद्र ढीठ और बेशर्मी का पैकर थे वह. करिश्मा साज़. बाद में रसूल के प्रोपेगंडा बाजों नें रसूली करिश्मों के अम्बार लगा दिए. पानी की कमयाबी अरब में मसला-ए-अज़ीम था, सफ़र में पानी की जहाँ कमी होती लोग प्यास से बिलबिला उठते, बस रसूल की उँगलियों से ठन्डे पानी के चश्में फूट निकलते. लोग सिर्फ प्यास ही न बुझाते, वजू भी करते बल्कि नहाते धोते भी. रसूल हांड़ी में थूक देते, बरकत ऐसी होती की दस लोगों की जगह सैकड़ों अफराद भर पेट खाते और हांड़ी भरी की भरी रहती. इस किस्म के दो सौ चमत्कार मुहम्मद के मदद गार उनके बाद उनके नाम से जोड़ते गए.मुहम्मद जीते जी लोगों के तअनो से शर्मसार हुए तो दो मुअज्ज़े आख़िरकार गढ़ ही डाले जो मूसा और ईसा के मुअज्जों को ताक़ पर रख दें. पहला यह कि उंगली के इशारे से चाँद के दो टुकड़े कर दिए जिसे ”शक्कुल क़मर” नाम दिया. दूसरा था पल भर में सातों आसमानॉ की सैर करके वापस आ जाना, इसको नाम दिया ”मेराज”। यह बात अलग है कि इसका कोई गवाह नहीं सिवाय अल्लाह के. अफ़सोस कि मुसलामानों का यह गैर फितरी सच ईमान बन गया है।

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान