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हिन्दुस्तान-पाकिस्तान दो पड़ोसी मुल्क होने के बाद भी जुदा-जुदा हैं। एक देश विकास की ओर अग्रसर है तो दूसरा आतंकवाद-कट्टरवाद-साम्प्रदयिक हिंसा-ड्रग्स स्मगलरों-अवैध हथियारों की मंडी और धार्मिक हिंसा का केन्द्र बना है।पूरी दुनिया में दोनों देशों की ईमेज में जमीन-आसमान का अंतर है।भारत के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान अपने जन्म के समय से ही अभिशाप बना हुआ।भारत को अस्थिर और नेस्तानाबूत करने का प्रयास सीमा पार से लगातार जारी है।मंसूबे हिन्दुस्तान को इस्लामिक मुल्क बनने के भी देखे जाते हैं।भारत को लेकर जिन्ना से लेकर जरदारी तक की सोच में कोई बदलाव देखने को नहीं मिलता।पाकिस्तानी हुक्मरान और सेना दोनों ही भारत के खिलाफ जहर उगलती रहती हैं। ‘लड़ के लिए है पाकिस्तान,हॅस करे लेगें हिन्दुस्तान’ जैसे तमाम जुमले सरहद पार अक्सर सुनने को मिल जाते हैं,लेकिन ताज्जुब इस बात का होता है कि हिन्दुस्तानी सरकारें पाकिस्तान के खिलाफ कोई ठोस फैसला लेने से हिचकिचाती रहती हैं।यही वजह है दाऊद अहमद और सईद जैसे तमाम आतंकवादी हिन्दुस्तान में दहशत फैलाने के बाद भी पाकिस्तान में आराम से जीवन बसर कर रहे हैं।यही नहीं उन्हें पाक में सिर्फ इस लिए सम्मान से देखा जाता है क्योंकि यह लोग भारत में दहशत फैलाने में महारथ हासिल रखते हैं।

पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में कोई समानता नहीं है।सिवाय एक के कि दोनों ही मुल्कों में हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार की खबरें और हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के प्रति केन्द्र और राज्य सरकारों की नकारात्मक सोच ने हिन्दुओं के सामने एक बड़ा प्रश्न चिंह लगा दिया है।हिन्दू हितों की बात करना जिस देश में साम्प्रदायिकता समझी जाती हो, उस देश के बहुसंख्यक समाज में निराशा पैदा होना स्वभाविक है।जिस देश(भारत) का प्रधानमंत्री यह कहे कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर मुसलामनों का पहला हक है।उस देश का भला कौन कर सकता है।यही नहीं मौकापरस्ती की राजनीति देश में इतनी हावी हो गई है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मुंह खोलने की भी जुर्रत नहीं कर पाते हैं।बंटवारे के समय जो हिन्दू पाकिस्तान के जनक जिन्ना के बहकावे(पाकिस्तान इस्लामिक देश नहीं लोकतांत्रिक देश बनेगा) में आकर वहां रूक गए थे,उनके पास आज पछताने के सिवा कुछ नहीं बचा है।पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों को जबर्दस्ती उठाकर मुसलमान लड़कों से निकाह करा देना।हिन्दुुओं को अपने धार्मिक क्रियाकलाप करने की छूट नहीं होना,यहां तक की उन्हें मतदान का अधिकार तक नहीं मिल पाना यह दर्शने के लिए काफी है कि पाकिस्तान में हिन्दुओं के लिए जीवन कितना कष्टादायक होगा।कई हिन्दुओं ने तो इससे छुटकारा पाने के लिए इस्लाम अपनाना ही बेहतर समझा,लेकिन जिनका जमीर धर्म परिर्वतन के लिए तैयार नहीं हुआ उनके लिए पाकिस्तान नरक से कम नहीं है।पाकिस्तान में हिन्दुओं की दुर्दशा का ही नतीजा था कि आजादी के बाद से यहां

हिन्दुओं की आबादी लगातार घटती जा रही है।सिंध विधान सभा के अल्पसंख्यक सदस्य पीतांबर कहते हैं कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हर महीने जबरन 25-30 हिन्दू लड़कियों का जबरन निकाह मुसलमान युवकों से करा दिया जाता है।नहीं मानने पर उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता है।पाक को आजाद हुए 65 वर्ष हो चुके हैं लेकिन वहां की सरकार ने आज तक हिन्दू मैरिज एक्ट को कानूनी दर्जा नहीं दिया है।जिस कारण पाक में हिन्दू पति-पत्नी को राष्ट्रीय पहचान पत्र नहीं मिलता। इस वजह से वह सरकारी सुविधाओं का फायदा नहीं उठा पाते हैं।पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मीरपुर मथेलो की रिंकल कुमारी को अगवा कर जर्बदस्ती धर्म परिवर्तन कराके उसका विवाह मुस्लिम युवक से करा दिया गया।रिंकल ने निकाल कबूल नहीं किया।रिंकल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया तो उसकी दलील यह कहकर खारिज कर दी गई कि तुमने कलमा पढ़ लिया है।इसलिए अब तुम हिन्दू नहीं, मुस्लिम हो।रिंकल अपने हक की लड़ाई लड़ रही है,लेकिन उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।पाकिस्तानी इस्लाम की परिभाषा अपने हिसाब से गण रहे हैं।एक तरफ हिन्दुस्तान में मुसलमानों की सबसे विश्वसनीय संस्था देवबंद ही नहीं अन्य कई धार्मिक गुरू भी बार-बार यह कहते है कि कोई अगर निकाह करने के लिए धर्म परिवर्तन का सहारा लेता है तो उसे इस्लाम में जायज नहीं ठहराया जा सकता है,वहीं पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों को निकाह के लिए जबरन मुसलमान बनाया जा रहा है।भले ही पाकिस्तान मुस्लिम बाहुल्य देश हो लेकिन हकीकत यही है कि भारत के मुसलमान पाकिस्तानी मुसलमानों से कही तरक्की पसंद हैं।यहां पाकिस्तान की तरह इस्लाम की मान्यता से खिलवाड़ नहीं किया जाता है।अगर कोई ऐसा करने की कोशिश भी करता है तो एक साथ कई आवाजें विरोध में उठने लगती हैं,जबकि पाकिस्तान में सेना, आईएसआई और कट्टर मुस्लिम संगठनों के आगे कोई मंुह खोलने की जुर्रत नहंीं कर पाता है।

हाल में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी हिन्दुस्तान आए थे।जरदारी के आने से पूर्व एक घटना घटी।पाकिस्तान के कुछ दुखी और पीडि़त हिन्दुओं ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से गुहार लगाई कि वह जरदारी से मुलाकात के दौरार पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के संबंध में उनसे बात करें। पाकिस्तानी हिन्दुओं के बात जायज भी थी।भारत को ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता था, लेकिन मनमोहन सिंह ने बात करना तो दूर इस मुद्दे पर मुंह तक खोलना बेहतर नहीं समझा। मनमोहन सिंह ने क्यों मुंह नहीं खोला इसका जबाव वह शायद ही दें,लेकिन लगता तो यही है कि उनके दिलो-दिमाग पर तुष्टिकरण की राजनीति हावी है,जिसका नजारा कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान देखने को मिला था,जब कांगे्रस ही नहीं समाजवादी पार्टी,बसपा आदि दलों ने मुसलमानों को लुभाने के लिए सारी हदें पार कर दी थीं।

शायद हिन्दुस्तान की यही नियति है कि उसे दूसरों की तरफ मुंह ताकना पड़ता है। जिस मुम्बई बम कांड सहित कई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी हाफिज सईद अहमद को वह पाकिस्तान से हासिल नहीं कर सका।उसे अमेरिका ने अपने कब्जे में लेने की पहल की है।उसके ऊपर ईनाम की घोषणा की।अगर भारत चाहता तो कम से कम वह भी अमेरिका की तरह हाफिज सईद पर ईनाम की घोषणा तो कर सकता था,लेकिन उसने ऐसा करना जरूरी नही समझा।भारत खुश है कि उसके दावे (मुंबई बम बलास्ट कांड )पर अमेरिका ने भी मोहर लगा दी है,लेकिन भारत को यह भी समझना होगा कि अमेरिका की इस सहानुभूति का वह निहितार्थ समझ सके।बहरहाल, बात हिन्दुस्तानी सरकार के लचीलेपन की कि जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसकी तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ही कसाब और अफजल जेल में आराम से जिंदगी गुजार रहे हैं।उनकी सुरक्षा के नाम पर अब तक करोड़ो रूपया खर्च किया जा चुका हैं इतना ही नहीं उनको हिन्दुस्तान के खिलाफ इतना सब कुछ करने के बाद भी समर्थन मिल रहा है।तुष्टिकरण का खेल केन्द्र से लेकर राज्य तक में सभी जगह चल रहा है।

हाल के दौर में उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार का दृश्य देखा जा रहा है, वह ऐसा है कि मानों सारे राजनीतिकों में मुसलमानों की आत्मा में घुस जाने की होड़ सी मची हुई हो। आजम खां और मौेलाना बुखारी के बीच का द्वंद्व यही साबित करता है कि राजनीति में साम्प्रदायिकता का विषय कितना अंदर तक जा चुका हैं।यह भी विचित्र है कि धर्म निरपेक्ष देश में साम्प्रदायिकता पर चर्चा होती है। साम्प्रदायिकता मौजूदा राजनीति में वह शक्ति बन गई है जिसके द्वारा सत्तासीन हुआ जा सकता है। भले ही आप साम्प्रदायिक हो अथवा न हों किंतु यदि एक बार आप पर

सांपद्रदायिक होने अथवा न होने का तमगा चस्पा हो गया तो आपका कद स्वतः ही राजनीतिक ऊंचाईयों को छूने लगता हैं

आज बहुसंख्यकों के हितों की बात करना साम्प्रदायिकता कहलाती है।ऐसे में समझा जा सकता है कि साम्पद्रायिक शब्द की परिभाषा को ही किस प्रकार मरोड़ा गया है।आज देश के समाने सबसे बड़ा सवाल यह है कि साम्प्रदायिकता क्या है ? कौन है सांप्रदायिक? क्या वह साम्पद्रदायिक नहीं जो रविवार के अवकाश को शुक्रवार के अवकाश में बदलने की बात करता है? अमरनाथ यात्रियों से यह सवाल करना कि हज यात्रियों को सब्सिडी क्यों दी जाती है ? जिस देश का प्रधानमंत्री कहे कि देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है तो फिर उसकी सरकार के अन्य मंत्री या पार्टी के नेता भी उसी की जुबान बोले तो आश्चर्य कैसा।तुष्टीकरण वाले इन बयानों को साम्प्रदायिकता कहने पर उन धर्मनिरपेक्षों को बेहद कष्ट होता जो ओसामा बिन लादेन के सम्मान की बात करते हैं।उन्हें आदर सहित संबोधन से पुकारते है। भारत में सांपद्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा दिग्गविजय सिंह,मुलायम सिंह, सलमान खुर्शीद,मायावती, जैसे तमाम माननीयों ने ही गढ़ी है। उत्तर प्रदेश में ऐसे ही परिभाषा गढ़ने वाले तेजी से उभर रहे हैं।समाजवाद नेता आजम खान और बूुखारी से भी यह अपील की जानी चाहिए कि एक बार वे भी बता ही दें कि साम्प्रदायिकता की परिभाषा क्या है। यदि एक बार भी इन्होंने बहुसंख्यकों के हितों की बात की होती,जैसा कि वे अक्सर अल्पसंख्यकों के लिए रोते रहते हैं तो यह माना जा सकता था कि इन्हें एक संप्रदाय नहीं अपितु समूची जनता की चिंता है। अल्पसंख्यकवाद और साम्पद्रदायिकता में अंतर केवल वर्तनी का ही रह गया हैं।

आज हिन्दुस्तान में अमेरिका ,इजरायल लीबिया के विरोध में तो लाखों लोग सड़क पर उतर आते हैं लेकिन पाकिस्तान में हिन्दुओं के खिलाफ हो रही कू्ररता की तरफ से सामाजिक संगठन, मनावाधिकार आयोग ,राजनेता और सरकार सब मौन धारण किए है।जबकि फेसबुक और ट्विटर पर पाकिस्तान के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार की लंबी बहस छिड़ी हुई है।राजीव गांधी की सरकार के समय चर्चित शाहबानों केस में एक वर्ग विशेष के मुट्ठी भर लोगों को खुश करने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत का फैसला बदलने में देर नहीं करने वाली सरकारें हिन्दुओं के हितों उनके साथ हो रही नाइंसाफी को क्यों नहीं देख पाती हैं ? आखिर दो इंसानों के बीच धार्मिक आधार पर भेदभाव की इजाजत कैसे दी जा सकती है,जबकि भारतीय संविधान साफ-साफ कहता है कि सरकारें जाति धर्म के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं कर सकती हैं।संयुक्त राष्ट्र ही नहीं अन्य अंतरराष्ट्रीय फोरम पर भी हिन्दुओं के दुख-दर्द पर चर्चा नहीं होती है।

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