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२०. ” अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष की सूचना दे दे। …. किन्तु अल्लाह इस काम के लिये जिसको चाहता है, चुन लेता है और वे उसके रसूल होते हैं। अतः अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ।” (४ : १७९, पृ. ६४)
समीक्षक-”जब मुसलमान लोग सिवाय खुदा के किसी के साथ ईमान नहीं लाते और न किसी को खुदा का साझी मानते हैं तो पैगम्बर साहेब को क्यों ईमान में खुदा के साथ शरीक किया ? अल्लाह ने पैगम्बर के साथ इमानलाना लिखा इसी से पैगम्बर भी शरीक हो गया, पुन’ लाशरीक कहना ठीक न हुआ।

यदि इसका अर्थ यह समझा जाए कि मुहम्मद साहेब के पैगम्बर होने पर विश्वास लाना चाहिए तो यह प्रश्न होता है कि मुहम्मद साहेब के पैमब्र होने की क्या आवश्यक है ? यदि खुदा उनको पैमब्र किये बिना अपना अभीष्ट कार्य नहीं कर सकता तो अवश्य असमर्थ हुआ।” (पृ. ५६४-५६५)

२१. ”ये अल्लाह की निश्चित की गई सीमाएं हैं जो कोई अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों का पालन करेगा उसेअल्लाह ऐसे बागों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी।

उनमें वह सदैव रहेगा।” परन्तु जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करेगा उसे अल्लाह आग में डालेगा जिसमें वह सदैव रहेगा और उकसे लिए अपमानजनक यातना है।” (४ : १३ – १४, पृ. ६९)

समीक्षक-”खुदा ही ने मुहम्मद साहेब पैगम्बर को अपना शरीक कर लिया है और खुद कुरान ही में लिखा है। और देखो ! खुदा पैगम्बर के साथ कैसा फंसा है कि जिसने बहिश्त में रसूल का साझा कर दिया हैं किसी एक बात में भी मुसलमानों का खुदा स्वतन्त्र नहीं तो लाश्रीक कहना व्यर्थ है। ऐसी-ऐसी बातें ईश्वरोक्त पुस्तक में नहीं हो सकती।” (पृ. ५६५)

२२. ”अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल की आज्ञा का पालन करो……….।” (५ : ९२, पृ. १०२)
”देखिये ! यह बात खुदा के शरीक होने की है, फिर खुदा को ”लाशरीक” मानना व्यर्थ है।” (पृ. ५६९)