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८. ”अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए खास कर ले ; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करने वाला है।” (२ः१०५, पृ. १९)
समीक्षक- ”क्या जो मुखय और दया करने के योग्य न हो उसको भी प्रधान बनाता और उस पर दया करता है ? जो ऐसा है तो खुदा बड़ा गड़बड़िया है क्योंकि फिर अच्छा काम कौन करेगा ? और बुरे कर्म को कौन छोड़ेगा ? क्योंकि खुदा की प्रसन्नता पर निर्भर करतेहैं, कर्मफल पर नहीं, इससे सबको अनास्था होकर कर्मोच्छेदप्रसंग होगा।” (पृ. ५५४)

९. ”… और यह कि अल्लाह अत्यन्त कठोर यातना देने वाला है।” (२ : १६५) ”शैतान के पद चिन्हों पर मत चलो । निसन्देह वह तुम्हारा खुला शत्रु है ” (२ : १६८)।” वह तो बस तुम्हें बुराई और अश्लीलता पर उकसाता हे और इस पर कि तुम अल्लाह पर थोपकर वे बातें कहो जो तुम नहीं जानते।” (२ : १६९, पृ. २६)
समीक्षक- ”क्या कठोर दुःख देने वाला दयालु खुदा पापियों पुण्यात्माओं पर है अथवा मुसलमानों पर दयालु और अन्य पर दयाहीन है ? जो ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। और पक्षपाती नहीं है तो जो मनुष्य कहीं धम्र करेगा उस पर ईश्वर दयालु और जो अधर्म करेगा उस पर दण्ड दाता होगा, तो फिर बीच में मुहम्मद साहेब और कुरान को मानना आवश्यक न रहा। और जो सबको बुराई कराने वाला मनुष्य मात्र का शुत्र शैतान है, उसको खुदा ने उत्पन्न ही क्यों किया? क्या वह भविष्यत्‌ की बात नहीं जानता था ? जो कहो कि जानता था परन्तु परीक्षा के लिये बनाया, तो भी नहीं बन सकता, क्योंकि परीक्षा करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ तो सब जीवों के अच्छे बुरे कर्मों को सदा से ठीक-ठीक जानता है और शैतान सबको बहकाता है, तो शैतन को किसने बहकाया ? जो कहो कि शैतान आप बहमता है तो अन्य भी आप से आप बहक सकते हैं, बीच में शैतान का क्या काम ? और जो खुदा ही ने शैतान को बहकाया तो खुदा शैतान का भी शैतान ठहरेगा, ऐसी बात ईश्वर को नहीं हो सकती और जो कोई बहकाता है वह कुसुग तथा अविद्या से भ्रान्त होता है ” (पृ. ५५७)

१०. ”जब तुम ईमान वालों से कह रहे थे; ”क्या यह तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है कि तुम्हारा रब तीन हजार फरिश्ते उतारकर तुम्हारी सहायता करे।” (३ : १२४, पृ. ५८)
समीक्षक- ‘जो मुसलमानों को तीन हजार फरिश्तों के साथ सहाय देता था तो अब मुसलमानों की बादशाही बहुत-सी नष्ट हो गई और होती जाती है क्यों सहाय नहीं देता ? इसलिए यह बात केवल लोभ के दो मूखा्रें को फंसाने के लिये महा अन्याय की है।” (पृ. ५६४)

११. ”अल्लाह बिगाड़ को पसन्द नहीं करता” (२ : २०५)/हे ईमानवालों ! तुम सब इस्लाम में दाखिल हो जाओ और शैतान के पद चिन्हों पर न चलो। वह तो तुम्हारा खुला शत्रु है।” (२ : २०८, पु. ३१)
समीक्षक-”जो झगड़े को खुदा मित्र नहीं समता तो क्यों आप ही मुसलमानों को झगड़ा करने में प्रेरणा करता ? और झगड़ालू मुसलमानों से मित्रता क्यों करता है ? मुसलमानों के मत में मिलने ही से खुदा राजी है तो वह मुसलमानों ही का पक्षपाती है, सब संसार का ईश्वर नहीं। इससे यहाँ यह विदित होता है कि न कुरान ईश्वरकृत और न इसमें कहा हुआ ईश्वर हो सकता है।” (पृ. ५५९)

१२. ”वह जिसको चाहे-नीति (तत्त्वदर्शिता) देता है।” (२ : १६९, पृ. ४२)
समीक्षक-”जब जिसको चाहता है उसको नीति देता है तो जिसको नहीं चाहता है उसको अनीति देता होगा, यह बात ईश्वरता की नहीं किन्तु जो पक्षपात छोड़ सबको नीति का उपदेश करता है वही ईश्वर और आप्त हो सता है, अन्य नहीं।” (पृ. ५६१)

१३. ”फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ प्राप्त है।” (२ः२८४, पृ. ४४)
समीक्षक-”क्या क्षमा के योग्य पर क्षमा न करना, अयोग्य पर क्षमा करना गवरगंड राजा के तुल्य यह कर्म नहीं है ? यदि ईश्वर जिसको चाहता पापी वा पुण्यात्मा बनाता तो जीव को पाप पुण्य न लगना चाहिये। जब ईश्वर ने उसको वैसा ही किया तो जीव को दुःख सुख भी होना न चाहिए। जैसे सेनापति की आज्ञा से किसी भृत्य ने किसी को मारा वा रक्षा की उसका फलभागी वह नहीं होता, वैसे वे भी नहीं।” (पृ. ५६१-५६२)

१४. ”निःसन्देह अल्लाह रत्ती भी जुल्म नहीं रकता और यदि कोई एक नेकी हो तो वह उसे कई गुना बढ़ा देगा और अपनी ओर से बड़ा बदला देगा।” (४ : ४०, पृ. ७२)
समीक्षक-”जो एक त्रसरेणु (तनिक) भी खुदा अन्याय नहीं करता तो पुण्य को द्विगुणा क्यों देता ? और मुसलमानों का पक्षपात क्यों करता है ? वास्तव में द्विगुण वा न्यून फल कर्मों का देवे तो खुदा अन्यायी हो जावे।” (पृ. ५६५)

१५. ”निश्चय ही अल्लाह कपटाचारियों और इनकार करने वालों-सबको जहन्नम में एकत्र करने वाला है।” (४ : १४०)…..”कपटाचारी अल्लाह के साथ धोखेबाज़ी कर रहे हैं हालांकि उसी ने उन्हें धोखे में डाल रखा है…”। (४ : १४२)। हे ईमानवालो ! ईमानवालों ! (मुसलमानों) को छोड़कर इन्कार करने वालों (काफ़िरों) को अपना मित्र न बनाओ।” (४ : १४४, पृ. ८५)
समीक्षक-”मुसलमानों के बहिश्त और अन्य लोगों के दोज़ख़ में जाने का क्या प्रमाण ? वाह जी वाह ! जो बुरे लोगों के धोखे में आता और अन्य को धोखा देता है ऐसा खुदा हम से अलग रहे, किन्तु जो धोखेबाज़ हैं उनसे जाकर मेल करे और वे उनसे मेल करें। क्योंकि-याद्‌टशी शीतलादेवी तादृश : खरवाहन :।
जैसे को तैसा मिले तभी निर्वाह होता है। जिसका खुदा धोखेबाज़ है उसके उपासक लोग धोखेबाज क्यों न हों ? क्या दुष्ट मुसलमान हो उससे मित्रता और अन्य श्रेष्ठ मुसलमान-भिन्न से शत्रुता करना किसी को उचित हो सकता है ?” (पृ. ५६७-५६८)

१६. ”… जो पहले हो चुका उसे अल्लाह ने क्षमा कर दिया, परन्तु जिस किसी ने फिर ऐसा किया तो अल्लाह उससे बदला लेगा।” ०१८८५ : ९५, पृ. १०३)
समीक्षक-”किये हुए पापों का क्षमा करना जानो पापों को करने की आज्ञा दे के बढ़ाना है। पाप क्षमा करने की बात जिस पुस्तक में हो वह न ईश्वर और न किसी विद्वान्‌ का बनाया है किन्तु पापबर्द्धक है। हाँ, अगामी पाप छुड़वाने के लिये किसी से प्रार्थना और स्वयं छोड़ने के लिये पुरुषार्थ पश्चात्ताप करना उचित है, परन्तु केवल पश्चात्ताप करता रहे, छोड़े नहीं, तो भी कुछ नहीं हो सकता।” (पृ. ५६९)

१७. …………….”हालांकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करने वालों (काफ़िरों) की जड़ काट दें।” (८ : ७) (उसने कहा🙂 ”…..मैं इनकार करने वालों के दिलों में रौब (भय)डाल देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ।” (८ : १२, पृ. १५०)
समीक्षक-”वाहजी वाह ! कैसा खुदा और कैसे पैंगम्बर दयाहीन, जो मुसलमानी मत से भिन्न काफ़िरों की जड़ कटवावे। और खुदा आज्ञा देवे उनको गर्दन मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्पत्ति देवे ऐसा खुदा लंकेश से क्या कुछ कम है ? यह सब प्रपंच कुरान के कर्त्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हमसे दूर और हम उससे दूर रहें।” (पृ. ५७२)

१८. ”उन्हें उनका रब़ अपनी दयालुता औ प्रसन्नता और ऐसे लोगों की शुभ सूचना देता है जिनमें उनके लिए स्थायी सुख-सामग्री है। उनमें वे सदैव रहेंगे। निःस्संदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला है।”
(९ : २१-२२) ”हे ईमानवालो ! अपने बाप और अपने भाईयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुकाबले में कुफ्र उन्हें पिय्र हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे।” (९ः२३) ”अन्नतः अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और ऐसी सेनाएँ उतारीं जिनको तुमने नहीं देखा और इनकार करने वालों को यातनादी और यही इनकार करने वालों का बदला है।” (९ : २६) ”और इसके बाद अल्लाह जिसको चाहता है उसे तौबा : नसीब करता है।” (९ : २७) ”वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न अंतिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते हैं और न सत्य धर्म का अनुपालन करते हैं, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज्जया देने लगें।” (९ : २९, पृ. १५९-१६०)
समीक्षक-”भला ! जो बहिश्तवालों के समीप अल्लाह रहता है तो सर्वव्यापक क्यों कर हो सकता है ? जो सर्वव्यापक नहीं तो सृष्टिकर्त्ता और न्यायाधीश नहीं हो सकता। ओर अपने माँ, बाप, भाई और मित्र को छुड़वाना केवल अन्याय की बात है। हाँ जो वे बुरा उपदेश करें, न मानना परन्तु उनकी सेवा सदा करनी चाहिए। जो पहले खुदा मुसलमानों पर बड़ा सन्तोषी था और और उनके सहाय के लिये लश्कर उतारता था, सच हो तो अब ऐसा क्यों नहीं करता ? और जो प्रथम काफ़िरों को दण्ड देता और पुनः उसके ऊपर आता था तो अब कहाँ गया ? क्या बिना लड़ाई के ईमान खुदा नहीं बना सकता ? ऐसे खुदा को हमारी ओर से सदा तिलांजलि है, खुदा क्याहै, एक खिलाड़ी है।” (पृ. ५७४)

१९. ”निःसन्देह अल्लाह सारे ही गुनाहों को क्षमा कर देता है।” (३९ : ५३) ”हालांकि कियामत के दिन सारी की सारी धरती उसकी मुट्‌टी में होगी और आकाश उसके दाएँ हाथ में लिपटे हुए होंगे।” (३९ : ६७) ”और धरती अपने रब के प्रकाश से जगमगा उठेगी और किताब रखी जाएगी और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा और लोगों के हक़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा। उन पर कोई जुल्म न होगा।” (३९ : ६९, पृ. ४१२-४१३)
समीक्षक-”यदि समग्र पापों को खुदा क्षमा करता है तो जानो सब संसार को पापी बनाता है और दयाहीन है, क्योंकि एक दुष्ट पर दया और क्षमा करने से वह अधिक दृष्टता करेगा और अन्य बहुत धर्मातओं को दुःख पहुंचावेगा। यदि किचिंत भी अपराध क्षमा कियाजावे तो अपराध ही अपराध जगत्‌ में छा जावे। क्या परमेश्वर अग्निवत्‌ प्रकाश वाला है ? और कर्मपत्र कहाँ जमा रहते हैं ? और कौन लिखता है ? यदि पैगम्बरों और गवाहों के भरोसे खुदा न्याय करता है तो वह असर्वज्ञ और और असमर्थ है। यदि वह अन्याय नहीं करता, न्या ही करता है तो कर्मों के अनुसार करता होगा। वे कर्म पूर्वापर वर्तमान जन्मों के हो सकताहैं। तो फिर क्षमा करना, दिलों पर ताला लगाना और शिक्षा न करना, शैतान से बहकवाना, दौरा सुपुर्द रखना, केवल अन्याय है।” (पृ. ५९७-५९८)