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१. ”आरम्भ साथ नाम अल्लाह के क्षमा करने वाला दयालु ।” (१ : १)
समीक्षक-”मुसलमान लोग ऐसा कहते हैं कि यह कुरान खुदा का कहा है। परन्तु इस वचन से विदित होता है कि इसका बनाने वाला कोई दूसरा है क्योंकि जो परमेश्वर का बनाया होता तो ”आरम्भ साथ नाम अल्लाह के” ऐसा न कहता किन्तु ”आरम्भ वास्ते उपदेश मनुष्यों के” ऐसा कहता।” (पृ ५४४)

२. ”सब स्तुति परमेश्वर के वास्ते है जो परबरदिगार अर्थात्‌ पालन करने हारा है तब संसार का। क्षमा करने वाला दयालु है।” (१ : २)
समीक्षक-”जो कुरान का खुदा संसार का पालन करने हारा होता और सब पर क्षमा और दया करता है तो अन्य मत वाले और पशु आदि को भी मुसलमानों के हाथ से मरवाने का हुकम न देता। जो क्षमा करने हारा है तो क्या पापियों पर भी क्षमा करेगा ? और जो वैसा है तो अगे लिखेंगे कि ”काफ़िरों को कतल करो” अर्थात्‌ जो कुरान और पैगम्बर को न मानें वे काफ़िर हैं, ऐसा क्यों कहता है? इसलिए कुरान ईश्वरकृत नहीं दीखता।” (पृ. ५४४-५४५)

३. ”दिखा उन लोगों का रास्ता कि जिन पर तूनपे निआमत की॥ और उनका मार्ग मत दिखा कि जिनके ऊपर तू ने गज़ब अर्थात्‌ अत्यन्तक्रोध की दृष्टि की और न गुमराहों का मार्ग हमको दिखा।” (१ : ६)
समीक्षक-”जब मुसलमान लोग पूर्वजन्म और पूर्वकृत पाप-पुण्य नहीं मानते तो किन्हीं पर निआमत अर्थात्‌ फ़जल या दया करने और किन्हीं पर न करने से खुदा पक्षपाती हो जायेगा, क्योंकि बिना पाप-पुण्य, सुख-दुःख देना केवल अन्याय की बात है और बिना कारण किसी पर दया और किसी पर क्रोध दृष्टि करना भी स्वभाव से बहिः है। वह दया अथवा क्रोध नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व संचित पुण्य पाप ही नहीं तो किसी पर दया और किसी पर क्रोध करना नहीं हो सकता। और इस सूरः की टिप्पणी पर ”यह सूरः अल्लाह साहेब ने मनुष्यों के मुखय से कहलाई कि सदा इस प्रकार से कहा करें” जो यह बात है तो ‘अलिफ्‌ बे” आदि अक्षर भी खुदा ही ने पढ़ाये होंगे। जो कहो कि बिना अक्षरज्ञान के इस सूरः को कैसे पढ़ सके ? क्या कण्ठ ही से बुलाए और बोलते गये ? जो ऐसा है तो सब कुरान ही कण्ठ से पढ़ाया होगा। इससे ऐसा समझना चाहिए कि जिस पुस्तक में पक्षपात की बातें पाई जायें वह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता, जैसा कि अरबी भाषा में उतारने से अरबवालों को इसका पढ़ना सुगम, अन्य भाषा बोलने वालों को कठिनहोता है इसी से खुदा में पक्षपात आता है और जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्याय दृष्टि से सब देश भाषाओं से लिक्षण संस्कृत भाषा कि, जो सब देशवालों के लिए एक से परिश्रम से विदित होती है, उसी में वेदों का प्रकाश किया है, करता तो यह दोष नहीं होता।” (पृ. ५४५-५४६)

४. ”हे नबी ! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमान वाले अनुयायी ही काफ़ी है। ‘हे रबी ! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे पास पचास बीस आदमी जमें होंगे तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुममें से ऐसे सौ होंगे तो वे इंकार करने वालों में से एक हजार पर प्रभावी होंगे क्योंकि वे नासमझ लोग हैं।” (८ः६४-६५, पृ. १५५)
”अतः जो कुछ गनीमत (लूट) का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो।” (८ : ६९, पृ. १५६)
समीक्षक-”भला ! यह कौन-सी न्याय, विद्धत्ता और धर्म की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहे अन्याय भी करे उसी का पक्ष और लाभ पहुंचावे ? और जो प्रजा में शान्ति भंग करके लड़ाई करे, करावे और लूट मार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी कानाम क्षमावान्‌ दयालुलिखे यह बात खुदा की तो क्या किन्तु किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी-ऐसी बातों से कुरान ईश्वर वाक्य कभी नहीं हो सकता।” (पृ. ५७४)

५. ”और इसी प्रकार हमने इस (कुरआन) को एक अरबी फरमान के रूप में उतारा है। अब यदि तुम उस ज्ञान के पश्चात्‌ भी जो, तुम्हारे पास आ चुका है, उसकी इच्छाओं के पीछे चले तो अल्लाह के मुकाबले में न तो तुम्हारा कोई सहायक मित्र होगा औन न कोई बचाने वाला।” (१३ : ३७)
हम जो वादा उनसे कर रहे हैं चाहे उसमें से कुछ हम तुम्हें दिख दें या तुम्हें उठा लें। तुम्हारा दायित्व तो बस सन्देश का पहुंचा देना ही है, हिसाब लेना तो हमारे जिम्मे है।” (१३ः४०, पृ. २१२-२१३)
समीक्षक-”कुरान किधर की ओर से उतारा ? क्या खुदा ऊपर रहता है ? जो यह बात सच्च है तो वह एकदेशी होने से ईखश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैगा़ाम पहुंचाना हल्कारे का काम है और हल्कारे की आवश्यकता उसी को होती है जो मनुष्यवत्‌ एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है, ईश्वर का नहीं, क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया कुरान है।” (पृ. ५७९)

६. ”और जो तौबा कर ले और ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, फिर सीधे मार्ग पर चलता रहे उसके लिए निश्चय ही मैं अत्यन्त क्षमाशील हूँ।” (२०ः ८२, पृ. २७२)
समीक्षक-”जो तोबाः से पाप क्षमा करने की बात कुरान में है, यह सबको पापी कराने वाली है। क्योंकि पापियों को इससे पाप करने का साहस बहुत बढ़ जाता है। इससे यह पुस्तक और इसका बनाने वाला पापियों को पाप करने में हौसला बढ़ाने वाला है। इससे यह पुस्तक परमेश्वर कृत और इसमें कहा हुआ परमेश्वर भी नहीं हो सकता।” (पृ. ५८४)

७. ”(जो आयतें उतर ही हैं) वे तत्वज्ञान से परिपूर्ण किताब की आयतें हैं।” (३१.२)। ”उसने आकाशों को पैदा किया (जो थमे हुए हैं) बिना ऐसे स्तम्भों के जो तुम्हें दिखाई दें और उसने धरती में पहाड़ डाल दिए कि ऐसा न हो कि तुम्हें लेकर डावांडोल हो जाए।” …. (३१.१०) ”क्या तुमन देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है”………….(३१ : २९) ”क्या तुमने देखा नहीं कि नौका समुद्र में अल्लाह के अनुग्रह से चलती हैं ताकि वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाए।” (३१ : ३१, पृत्र ३६०-३६२)
समीक्षक-वाह जी वाह ! हिक्मतवालीकिताब ! कि जिसमें सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उसमें खम्भे लगाने की शंका और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए पहाड़ रखना! थोड़ी-सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता और हिकमत देखो कि जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं ओर जहाँ रात है वहाँ दिन नहीं, उसको एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है यह बड़े अविद्यानों की बात है, इसलिए यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्या विरुद्ध बात नहीं है कि नौका, मनुष्य और क्रिया कौशलादि से चलती है वा खुदा की कृपा से ? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बनाकर समुद्र में चलावें तो खुदा की निशानी डूब जाय वा नहीं ? इसलिए यह पुस्तक न विद्यान्‌ ओर न ईश्वर का बनाया हुआ हो सकता है।” (पृ. ५९०-५९१)