२३. ”और हमने मूसा को किताब दी थी और उसके पश्चात्‌ आगे-पीछे निरन्तर रसूल भेजते रहे और मरियम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियां प्रदान की और पवित्र-आत्मा के द्वारा उसे शक्ति प्रदान की तो यही तो हुआ किजब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम्हारे जी को पसन्द न थ, तो मि अकड़ बैठे, तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को कत्ल करते रहे ? (२ : ८७, पृ. १७)
समीक्षक-”जब कुरान में साक्षी है कि मूसा को किताब दी तो उसका मानना मुसलमानों को आवश्यक हुआ और जो-जो उस पुस्तक में दोष हैं वे भी मुसलमानों के मत में आ गिरे ओर ‘मौजिज़े’ अर्थात्‌ दैवी शक्ति की बातें सब अन्यथा हैं, भोले-भाले मनुष्यों को बहकाने के लिए झूठमूठ चला ली हैं क्योंकि सुष्टिक्रम और विद्या से विरुद्ध सब बातें झूठी ही होती हैं। जो उस समय ‘मौजिज़े’ थे तो इस समय क्यों नहीं ? जो इस समय भी नहीं, तो उस समय भी न थे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं।” (पृ. ५५३)

२४. ”दीन (धर्म) तो अल्लाह की दृष्टि से इस्लाम ही है।” (३ : १९, पृ. ४६)
समीक्षक-“क्या अल्लाह मुसलमानों ही का है औरों का नहीं ? क्या तेरह सौ वर्षों के पूर्व ईश्वरीय मत था ही नहीं ? इसी से यह कुरान ईश्वर का बनाया तो नहीं, किन्तु किसी पक्षपाती का बनाया है।” (पृ. ५६२)

२५. ”प्रत्येक व्यक्ति को जो उसने कमाया होगा, पूरा-पूरा मिल जाएगा और उनके साथ कोई अन्याय नहोगा।” (३ : २५) कहो : ”ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी ! जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले और जिसे चाहे इज्जत (पभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाइ है निसंदेह तुझे हर चीज़ की समर्थ्य प्राप्त है।” (३ : २६) ”तू रात को दिन में पिरोता है और दिन को रात में पिरोता है। तु निर्जीव से सजीव को निकालता है और सजीव से निर्जीव को निकालता है जिसे चाहता है बेहिसाब देता है।” (३ : २७) ”ईमानवालों (मुसलमानों) को चाहिए कि वे गैर-ईमानवालों (गैर-मुसलमानों) से हटकर इंकार करने वालों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाएँ और कोई ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं।” (३ : २८) ”कह दो : यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह भी तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा।” ( ३ : ३१, पृ. ४७-४८)
समीक्षक-”जब प्रत्येक जीव को कर्मों का पूरा-पूरा फल दिया जावेगा तो क्षमा नहीं किया जाएगा और जो क्षमा किया जाएगा। तो पूरा फल नहीं दिया जाएगा और अन्याय होगा। जब बिना उत्तम कर्मों के राज्य देगा तो भी अन्याय हो जाएगा और बिना पाप के राज्य औरप्रतिष्ठा छीन लेगा तो भी अन्यायकारी हो जाएगा, भला जीवित से मृतक और मृतक से जीवित कभी हो सकता है ? क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था अछे?-अभे? है, कभी अदल बदल हनीं हो सकती। अब देखिये पक्षपात की बातें कि जो मुसलमान के मजहब में नहीं हैं उनको काफ़िर ठहराना, उनमें श्रेष्ठों से भी मित्रता न रखने और मुसलमाना में दुष्टों से भी मित्रता रखने के लिए उपदेश करना ईश्वर को ईश्वरता से बिह : कर देता है। इससे यह कुरान, कुरान का खुदा ओर मुसलमान लोग केवल पक्षपात अविद्या के भरे हुए हैं इसीलिए मुसलमान लोग अन्धेरे में हैं और देखिए मुहम्मद साहेब की लीला कि जो तुम मेरा पक्ष करोगे तो खुदा तुम्हारा पक्ष करेगा और जो तुम पक्षपातरूप पाप करोगे उसको क्षमा भी करेगा। इससे सिद्ध होता हैं कि मुहम्मद साहेब ने कुरान बनाया या बनवाया, ऐसा विदित होता है।” (पृ. ३६३)

२६. ”तो यदि वे तुमसे अलग-अलग न रहें और तुम्हारी ओर सुलह का हाथ न बढ़ाएं और अपने हाथ न रोकें तो तुम उन्हें पकड़ों और कत्ल करो, जहाँ कहीं भी तुम उन्हें पाओ। उनके विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकर दे रखा है।” (४ : ९१) ”किसी ईमानवाले का यह काम नहीं कि वह किसीईमानवाले (मुसलमान) की हत्या करे। भूल-चूक की बात और है और कोई व्यक्ति यदि गलती से किसी ईमानवाले की हत्या कर दे तो एक मोमिन गुलाम को आजाद करना होगा।” (४ : ९२) ”और जो व्यक्ति जान-बूझकर किसी मोमिन की हत्या करे, तो उसका बदला जहन्नम है जिसमें वह सदा रहेगा, उस पर अल्लाह का प्रकोप और उसकी फिटकार है और उसके लिए अल्लाह ने बड़ी यातना तैयार कर रखी है।” (४ : ९३, पृ. ७९)
समीक्षक-”अब देखिए महापक्षपात की बात ! कि जो मुसलमान न हो उसको जहाँ पाओ मार डालों और मुसलमानों को न मारना । भूल से मुसलमान को मारने में प्रायश्चित और अन्य को मारने से बहिश्त मिलेगा। ऐसे उपदेश को कूप में डलना चाहिए। ऐसे-ऐसे पुस्तक, ऐसे-ऐसे पैग़म्बर, ऐसे-ऐसे खुदा और ऐसे-ऐसे मत से सिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं ऐसों का न होना अच्छा और ऐसे प्रामादिक मतों से बुद्धिमानों को अलग रहकर वेदोक्त सब बातों को मानना चाहिए, क्योंकि उसमें असत्य किचिंमात्र भी नहीं हे, और मुसलमान को मारे उसको दोज़ख मिले और दूसरे मतवाले कहते हैं कि मुसलमान को मारे तो स्वर्ग मिले। अब कहो इन दोनों मतों में से किसको मानें, किसकोछोड़े ? किन्तु ऐसे मूढ़ प्रकल्पित मतों को छोड़कर वेदोक्त मत स्वीकार करने योग्य सब मनुष्यों के लिए है कि जिसमें आर्य मार्ग अर्थात्‌ श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग मं चलना और दस्यु अर्थात्‌ दुष्टों के मार्ग से अलग रहना लिखा है, सर्वोत्तम है।” (पृ. ५६६-५६७)

२७. ”उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाकी न रहे और दीन (धर्म) पूरा-का-पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए।” (८ : ३९) ”और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ गनीमत (लूट) के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पांचवा भाग अल्लाह का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफिरों का है।” ०१८८ः४१, पृ. १५२-१५३)
समीक्षक-”ऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शान्ति-भंगकर्त्ता दूसरा कौन होगा ? अब देखिये यह मज़हब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत्‌ को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है ? और लूट के माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्‌टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैगम्बर संसार में ऐसी उपाधि और शान्ति भंग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिए कहां से आया ? जो ऐसे-ऐसे मत जगत्‌ में प्रचलित न होते तो सब जगत्‌ आनन्द में बना रहता।” (पृ. ५७३)