Tags

, , , ,


तिमूर (१३९८-१३९९)

तिमूर ने अपनी जीवनी मुलफुजात-ई-तिमूरी (तुजुख-ई-तिमूरी) में अपनी महत्वाकांक्षाओं को बलपूर्वक लिखा- ‘लगभग उसी समय मेरे मन में एक अभिलाषा आयी कि मैं गैर-मुसलमानों के विरुद्ध एक अभियान प्रारम्भ करूं और ‘गाजी’ बन जाऊँ; क्योंकि मेरे कानों में यह बात पहुँची थी कि अविश्वासियों का कातिल ‘गाज़ी’ हो जाता है और यदि वह स्वयं मर जाता है तो ‘शहीद’ हो जाता है (सूरा ३ आयत १६९, १७०, १७१) इसी कारण मैंने एक निश्चय किया किन्तु मैं अपने मन में अनिश्चित अनिर्णीत था कि मैं चीन के अविश्वासियों की ओर अभियान प्रारम्भ करूँ अथवा भारत के अविश्वासियों और मूर्ति पूजकों व बहु ईश्वर वादियों की ओर। इस उद्‌देश्य के लिए मैंने कुरान से शकुन (शुभ सूचना) खोजना चाही और जो आयत निकली वह इस प्रकार थी, ‘ए! पैगम्बर अविश्वासियों और विश्वासहीनों के विरुद्ध युद्ध करो, और उनके प्रति कठोरता का व्यवहार करो (सूरा ६६ आयत ९ दी कुरान)। मेरे महान अफसरों ने बताया कि हिन्दुस्तान के निवासी, अविश्वासी और विश्वासहीन हैं। सर्वशक्तिमान अल्लाह के आदेशानुसार आज्ञापालन करते हुए मैंने उनके विरुद्ध अभियान की आज्ञा दे दी।’
(तिमूर की जीवनी-मुलफुजात-ई-तिमूर : एलियट और डाउसन, खण्ड III पृष्ठ ३९४-९५)

उलेमा और सूफ़ियों द्वारा जिहाद का अनुमोदन

‘इस्लाम के विद्वान लोग मेरे सामने आये और अविश्वासियों तथा बहुत्ववादियों के विरुद्ध संघर्ष/युद्व के विषय में वार्तालाप प्रारम्भ हुआ;उन्होंने अपनी सम्मति दी कि इस्लाम के सुल्तान का और उन सभी लोगों का, जो मानते हैं, ‘कि अल्लाह के सिवाय अन्य कोई ईश्वर नहीं है और मुहम्मद अल्लाह का पैगम्बर है’, यह परम कर्तव्य है कि वे इस उद्‌देश्य की पूर्ति के लिए युद्ध करें कि उनका पन्थ सुरक्षित रह सके, और उनकी विधि व्यवस्था सशक्त रही आवे और वे अधिकाधिक परिश्रम कर अपने पन्थ के शत्रुओं का दमन कर सकें। विद्वान लोगों के ये आनन्ददायक शब्द जैसे ही सरदारों के कानों में पहुँचे उनके हदय, हिन्दुस्तान में धर्म युद्ध करने के लिए, स्थिर हो गये और अपने घुटनों पर झुक कर, उन्होंने इस विजय वाले अध्याय को दुहराया।’
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ३९७)

भाटनिर में नरसंहार (कसाई पन)

तिमूर की यह जीवनी, भाटनिर (जो आजकल राजस्थान के गंगानगर जिले का हनुमान गढ़ है) को मूर्ति पूजा से सुरक्षित करने के विषय में एक अति विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है।
‘इस्लाम के योद्धाओं ने हिन्दुओं पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया और तब तक युद्ध करते रहे जब तक अल्लाह की कृपा से मेरे सैनिकों के प्रयासों को विजय की किरण नहीं दीख गई। बहुत थोड़े समय में ही किले के सभी व्यक्ति तलवार द्वारा काट दिये गये और समय की बहुत छोटी अवधि में ही दस हजार हिन्दू लोगों के सिर काट दिये गये। अविश्वासियों के रक्त से इस्लाम की तलवार अच्छी तरह धुल गई और सारा खजाना सैनिकों की लूट का माल हो गया।’
(वही पुस्तक, पृष्ठ ४२१-२२)

सिरसा में नरसंहार

‘तिमूर ने आगे लिखा- जब मैंने सरस्वती नदी के विषय में पूछा, मुझे बताया गया कि उस स्थान के लोग इस्लाम के पंथ से अनभिज्ञ थे। मैंने अपनी सैनिक टुकड़ी उनका पीछा करने भेजी और एक महान युद्ध हुआ। सभी हिन्दुओं का वध कर दिया गया उनकी महिलाओं और बच्चों को बन्दी बना लिया गया और उनकी सम्पत्तियाँ व वस्तुएँ मुसलमानों के लिए लूट का माल हो गईं। सैनिक अपने साथ कई हजार हिन्दू महिलाओं और बच्चों को साथ ले वापिस लौट आये। इन हिन्दू महिलाओं और बच्चों को मुसलमान बना लिया गया।’
(वही पुस्तक, पृष्ठ ४२७-२८)

जाटों का नरसंहार

तिमूर ने अपनी जीवनी में लिखा था- ‘मेरे ध्यान में लाया गया था कि ये उत्पाती जाट चींटी की भाँति असंखय हैं। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा महान्‌ उद्‌देश्य अविश्वासी हिन्दुओं के विरुद्ध धर्म युद्ध करना था। मुझे लगने लगा कि इन जाटों का पराभव (वध) कर देना मेरे लिएआवश्यक है। मैं जंगलों और बीहड़ों में घुस गया, और दैत्याकार, दो हजार जाटों का मैंने वध कर दिया…उसी दिन सैय्यदों, विश्वासियों, का एक दल, जो वहीं निकट ही रहता था, बड़ी विनम्रता व शालीनता से मुझसे भेंट करने आया और उनका बड़ी शान से स्वागत किया गया। मैंने उनके सरदार का बड़े सम्मान से स्वागत किया।’
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४२९)

सैक्यूलरिस्टों, जो अपने हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई के उन्माद युक्त सिद्धांत से बुरी तरह पगलाये रहते हैं, के लिए यह पाठ बहुत अधिक महत्व का है। यहाँ सैय्यद मुसलमान, अपने पड़ौसी जाटों के साथ न तो तनिक भी सहयोगी हुए, और न उन्होंने उनके साथ कोई कैसी भी सहानुभूति ही दिखाई; वरन्‌ अपने पन्थ के आक्रमणकारियों, द्वारा जाटों के नरसंहार पर खूब प्रसन्न हुए।

मुसलमान सैय्यदों का यह व्यवहार सभ्यता के माप दण्डों से बेमेल भले ही हो किन्तु वह कुरान के आदेशों के सर्वथा, पूर्णरूपेण, अनुकूल ही था यथा-

‘विश्वासियो! मुसलमानों को छोड़ गैर-मुसलमानों को अपना मित्र मत बनाओ। उन्हें मित्रता के लिए मत चुनो। क्या तुम अल्लाह को अपने विरुद्ध एक सच्चा साक्ष्य प्रस्तुत करोगे?
(सूरा ४ आयत १४४)

लोनी में चुन चुन कर कत्लेआम

जमुना के उस पार देहली के निकट शहर, लोनी, की बलात विजय का वर्णन करते हुए तिमूर लिखता है कि उसने किस प्रकार मुसलमानों की जान बचाते हुए, चुन चुन कर हिन्दुओं का वध किया था।

‘उन्तीस तारीख को मैं पुनः अग्रसर हुआ और जमुना नदी पर पहुँच गया। नदी के दूसरे किनारे पर लोनी का दुर्ग था। दुर्ग को तुरन्त विजय कर लेने का मैंने निर्णय किया। अनेकों राजपूतों ने अपनी पत्नियों और बच्चों को में घरों में बन्द कर आग लगा दी; और तब वे युद्ध क्षेत्र में आ गये, शैतान की भाँति लड़े, और अन्त में मार दिये गये। दुर्ग रक्षक दल के अन्य लोग भी लड़े, और कत्ल कर दिये गये और बहुत से बन्दी बना लिये गये। दूसरे दिन मैंने आदेश दिया कि मुसलमान-बन्दियों को पृथक्‌ कर दिया जाए, और बचा लिया जाए किन्तु गैर-मुसलमानों को धर्मान्तरणकारी तलवार द्वारा कत्ल कर दिया जाए। मैंने यह आदेश भी दिया कि मुसलमानों के घरों को सुरक्षित रखा जाए, किन्तु अन्य सभी घरों को लूट लिया जाए, और विनष्ट कर दिया जाए।’
(मुलफुज़ात-ई-तिमूरी, एलियट और डाउसन, खण्ड III पृष्ठ ४३२-३३)

एक लाख असहाय हिन्दुओं का एक ही दिन में कत्ल

हिन्दुओं के वध एवम्‌ रक्त पात में उसे कैसा व कितना आनन्द आता है, इसके विषय में तिमूर ने लिखा था- ‘अमीर जहानशाह और अमीर सुलेमान शाह और अन्य अनुभवी अमीरों ने मेरे ध्यान में लाया, यानी कि मुझसे कहा, कि जब से हम हिन्दुस्तान में घुसे हैं तब से अब तक हमने १००००० हिन्दू बन्दी बनाये हैं और वे सभी मेरे डेरे में हैं। मैंने बन्दियों के विषय में उनका परामर्श माँगा, और उन्होंने कहा, कि बड़े युद्ध के दिन इन बन्दियों को लूट के सामान के साथ नहीं छोड़ा जा सकता; और इस्लामी युद्ध नीति व नियमों के सर्वथा विरुद्ध ही होगा कि इन बन्दियों को मुक्त कर दिया जाए। वास्तव में उन्हें तलवार द्वारा कत्ल कर देने के अतिरिक्त विकल्प ही नहीं था। जैसे ही मैंने इन शब्दों को सुना, मैंने पाया कि वे इस्लामी युद्ध के नियमों के अनुरूप् ही थे, और मैंने सीधे ही सभी डेरों में आदेश दे दिया, कि प्रत्येक व्यक्ति जिसके पास युद्ध बन्दी हैं, उन्हें मृत्यु को सौंप दें, यानि कि उनका वध कर दें। इस्लाम के गाजियों को जैसे ही आदेशों का ज्ञान हुआ, उन्होंने बन्दियों को मौत के घाट उतार दिया। १००००० ‘अविश्वासी’, ‘अपवित्र मूर्ति पूजक’, (हिन्दू) उस दिन कत्लकर दिये गये। मौलाना नसीरुद्‌दीन उमर, एक परामर्श दाता और विद्वान, जिसने अपने सारे जीवन में जहाँ एक चिड़िया भी नहीं मारी थी, मेरे आदेश के पालन में, उसने अपने पन्द्रह हिन्दू बन्दियों का वध कर दिया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४३५-३६) (सूरा ८ आयत ६७ कुरान)

दिल्ली में चुन चुनकर कत्ल

‘महीने की छः तारीख को मैंने देहली को लूट लिया, ध्वंस कर दिया। हिन्दुओं ने अपने ही हाथों अपने घरों में आग लगा दी, और अपनी पत्नियों और बच्चों को उन घरों के भीतर जला दिया, और युद्ध में दैत्यों की भाँति कूद पड़े, और मार दिये गये…उस दिन बृहस्पतिवार को और शुक्रवार की पूरी रात्रि को लगभग पन्द्रह हजार तुर्क, वध करने, लूटने और विनाश कार्य में लिप्त थे…अगले दिन शनिवार को भी पूरे दिन उसी प्रकार का क्रिया कलाप चलता रहा और बर्बादी व लूट इतनी अधिक थी कि प्रत्येक व्यक्ति के भाग पचास से लेकर सौ तक बन्दी-पुरुष, महिला व बच्चे-आये। कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसके पास बीस बन्दी न हों। और दूसरे प्रकार की लूट भी माणिक, मोती, हीरों के रूप में अथाह व असीमित थी। औरतें तो इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध थीं, कि गणना से भी परेथीं। उलेमाओं और दूसरे मुसलमानों को छोड़, सभी का वध कर दिया गया और सारे शहर को विध्वंस का दिया।’
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४४५-४६)

मोहम्मद हबीब और ए. के. निजामी ने, ए कम्प्रीहैन्सिव हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, खण्ड ५ दी ‘सुल्तानेट्‌स’, (पृष्ठ १२२) पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ऑफ इण्डिया, नई दिल्ली, पुस्तक में से बन्दी व वध हुए हिन्दू पुरुष महिला बच्चों सम्बन्धी इस लेख में से ‘हिन्दू’ शब्द को जानबूझ कर हटा दिया गया है। यह है उदाहरण हमारे सैक्यूलरवादी इतिहासज्ञों की बुद्धिवादी ईमानदारी का!

यमुना के किनारे-किनारे जिहाद

तिमूर ने लिखा था- ‘जुमादा-ई-अव्वाल के पहले दिन मैंने अपनी सेना की बाईं ओर के भाग, को अमीर जहाँशाह के नेतृत्व में सौंप दिया और आदेश दे दिया कि यमुना के किनारे-किनारे ऊपर की ओर अग्रसर हुआ जाए और मार्ग में आने वाले प्रत्येक दुर्ग, शहर व गाँव को विजय किया जाए और देश के सभी गैर-मुसलमानों को तलवार से काट दिया जाए…मेरे वीर अनुयायियों ने आज्ञा पालन किया और शत्रुओं का पीछा किया और उनमें से बहुतों को मार दिया और उनकी पत्नियों और बच्चों को बन्दी बना लिया। जब अल्लाह की कृपा से मैंने विजय प्राप्त कर ली। मैं अपने घोड़ों से उतर आया और अल्लाह को धन्यवाद देने के लिए भूमि पर लेट गया और साष्टांग प्रणाम किया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४५१-५४)

हरिद्वार के कुम्भ मेले में रक्तपात

तिमूर ने आगे लिखा था-‘ मेरे वीर आदमियों ने बड़े साहस और चुनौती का प्रदर्शन किया; उन्होंने अपनी तलवारों को सैनिक ध्वज बनाया और गंगा स्नान के पर्व के अवसर पर हिन्दुओं के वध में परिश्रम किया, उन्होंने अविश्वासियों में से बहुतों को वध कर दिया और उनका पीछा किया जो पर्वतों की ओर भागे। उनमें से इतनों का वध किया गया कि उनका रक्त पर्वतों और मैदानों में बहने लगा। इस प्रकार सभी को नर्क की अग्नि में झोंक दिया गया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४५९)

शिवालिक में इस्लाम का प्रवेश

शिवालिक पहाड़ी में लूट पाट व नर संहार के विषय में अपनी जीवनी में तिमूर ने लिखा-‘जुमादा-ई-अव्वाल के दसवें दिन शिवालिक के अविश्वासियों से युद्ध करने व उन का वध करने के निश्चय के साथ मैं अपने घोड़े पर चढ़ा और अपनी तलवार खींच ली। वीर-योद्धाओं ने, वध हुए (कट मरे) हिन्दुओं के, अनेकों ढेर बना दिये। पहाड़ी की सभी महिलायें व बच्चे बन्दी बना लिये गये। अगले दिन मैंने यमुना नदी पार कर ली और शिवालिक पहाड़ी की दूसरी ओर डेरा लगा दिया। मेरे विजयी सैनिकों ने अपनी तलवारों को लहराते हुए पीछा किया और भगोड़ों के समूहों का वध किया और उन्हें नर्क को भेज दिया। जब सैनिकों ने मूर्ति पूजकों का वध करना त्यागा तो उन्हें व्यापक लूट में असीमित वस्तुएं और बहुमूल्य पदार्थ, बन्दी, और पशु प्राप्त हुए। उनमें से किसी के पास एक या दो सौ गायों और दस या बीस दासों से कम न थे।’
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४६२-४६४)

कांगड़ा में जिहाद

‘शिवालिक के उस पार घाटी में मैं जैसे ही घुसा तो हिन्दुओं के एक विशाल शहर, नगर कोट, के विषय में मुझे सूचना दी गई, तो तुरन्त ही मैंने अमीर जहाँ शाह को शत्रु पर आक्रमण करने के लिए आदेश दिया। इस्लाम के पवित्र योद्धाओं ने हाथों में तलवारें लेकर भगोड़ों के मध्य घुस जाने का साहस दिखाया और हिन्दुओं की लाशों के ढेर लगा दिये। बहुतांश संखया में, वध कर दिये गये, और विजेताओं के हाथ में एक महान लूट के रूप में विशाल संखया में, वस्तुएं, बहुमूल्य पदार्थ व बन्दी आये।’
(वही पुस्तक, पृष्ठ ४६५-६६)

मुसलमानों के लिए लूट का माल माँ के दूध के समान

हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहक तत्वों, के सन्दर्भ में तिमूर ने अपनी जीवनी में लिखा था- ‘हिन्दुस्तान आने और इतना सारा परिश्रम करने तथा कष्ट उठाने का हेतु, दो उद्‌देश्यों की सिद्धि थी। प्रथम इस्लाम के शत्रुओं, अविश्वासियों (हिन्दुओं) से युद्ध करना; और इस धर्म युद्ध के द्वारा भावी जीवन के लिए किसी इनाम के लिए अधिकार प्राप्त कर लेना था। दूसरा एक सांसारिक उद्‌देश्य था; कि इस्लाम की सेना, अविश्वासियों की कुछ गणना योग्य धन सम्पत्तियों, और बहुमूल्य पदार्थों को लूट सके। मुसलमानों के लिए युद्ध में लूट का माल उतना ही विधि संगत है जितना उनके लिए माँ का दूध, मुसलमान, जो दीन के लिए युद्ध करते हैं उनके लिए लूट का माल, जो इस्लामी विधि के अनुसार सर्वथा उचित व मान्य है, उसका उपभोग महिमा कारक है, बड़प्पन का स्त्रोत है।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ-४६१)
सूरा ४९ आयत १५, सूरा ४ आयत १००, कुरान