Tags

, , , ,


शाहजहाँ (१६२८ -१६५८)

शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ”वह तिमूर का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उज्रबैंक के, जंगली जानवर, (तिमूर) से, उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपब्धि से, इतना प्रभावित था कि ”उसने अपना नाम तिमूर द्वितीय रख लिया”
(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया- डॉ. के. एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).

बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने अविश्वासियों के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई। पृथक-पृथक ने लिखा था कि, ”शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतहपुर सीकरी पर अधिकार कर लिया था और आगरे का शहर विध्वंस कर दिया था जहाँ, भारत यात्रा पर आये देला वैले, इटली के एक धनी व्यक्ति के अुनसार, उसकी (शाहजहाँ की) सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय कराया था। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया, और अनेकों उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग, और उनका अंग भंग किया गया।”
(कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड इट्‌स नेबरहुड, पृष्ठ २५)

अनेकों इतिहासज्ञ, विशेषकर सैक्यूलरिसटों ने, शाहजहाँ को एक महान्‌ निर्माता के रूप में चित्रित किया है। उसकी, सौन्दर्य शास्त्र की अभिरुचि वाले, के रूप में प्रशंसा की गई है। किन्तु इस तथाकथित सौन्दर्य शास्त्र के प्रति अभिरुचि रखने वाले मुजाहिद ने अनेकों हिनदू मन्दिरों, और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों, का बड़ी असाधारण लगन और जोश से विध्वंस किया था।

अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘बादशाह नामा’ में लिखा था, ”महामहिम शहन्शाह महोदयय की सूचना में लाया गया कि अविश्वासियों (हिन्दुओं) के एक सशक्त केन्द्र, बनारस, में उनके पिताजी के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था किन्तु वे अपूर्ण रह गये थे और अविश्वासी (हिन्दू) अब उन्हें पूर्ण कर देने के इच्छुक हैं। इस्लाम पंथ के रक्षक, महामहिम, ने आदेश दिया कि बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हो गया है, उन्हें विध्वंस कर दिया जाए। इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि जिला बनारस के छियत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर दिया गया था।”
(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरो, एलियट और डाउसन, खण्ड VII, पृष्ठ ३६)

”कश्मीर से लौटते समय १६३२ में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों महिलायें हिन्दू हो गईं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली थी। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया। प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका। तब इस्लमाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। चूंकि किसी ने धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन्हें वध कर दिया गया। लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात्‌ मुसलमान बना लिया गया।”
(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल : आर. सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन, खण्ड टप्प्, पृष्ठ ३१२)

”मनुष्य के रूप में शाहजहाँ एक नीच और पथभ्रष्ट व्यक्ति था। उसके बाबा अकबर के हरम में पाँच हजार महिलाऐं, अधिकांशतः हिन्दू थीं। अकबर की मृत्यु के पश्चात्‌ जहाँगीर को हरम, उत्तराधिकार में मिला और उसने रखैलों की संखया बढ़ाकर छः हजार कर ली। और वही हरम जब शाहजहाँ को प्राप्त हुआ, उसने उसे और भीबढ़ा दिया। उसने हिन्दू महिलाओं की व्यापक छाँट द्वारा हरम को और सम्पन्न किया। बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।”
(अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)

हिन्दू महिलाओं से यौन सम्बन्धों के लिए दासवृत्ति

भगाई हुई हिन्दू महिलाओं की यौन दासता और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार सवरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को दिया करता था। यह व्यभिचारी, नर पशु, यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था, कि हिन्दू महिलाओं के बाजार (मीना बाजार) लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी। सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि, ”महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार, जहाँ भगा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था, राज्य द्वारा बड़ी संखया में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था, और नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थित, शाहजहाँ के लम्पटपन व काम लिप्सा के समाधान के लिए ही थी।
(टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर- फ्रान्कोइस बर्नियर :पुन लिखित पुनः लिखित वी. स्मिथ, औक्स फोर्ड १९३४)

औरंगजेब (१६५८ – १७०७)

अपने पूर्वजों से पूर्णतः भिन्न, औरंगजब, कम से कम अपने मूल वास्तविक स्वरूप, स्वभाव और भावनानुसार ही, लोगों के ज्ञान में है। इरफान हबीब, और उसे अनय टोली के साथियों के, औरंगजेब के जिहादी कुकृत्यों को न्यायोचित ठहराने के अथक प्रयासों की उपस्थिति में भी, उसके जिहादी, कुकृत्य : उदाहरणार्थ बलात्‌ धर्मान्तरण, मन्दिर विध्वंस और सिख गुरुओं और सत्पुरुषों के वध, इस मुजाहिद को पन्थ निरपेक्ष (सैक्यूलर) प्रस्थापित करने की दिशा में, तकिन भी सहयोगी, नहीं हो सके हैं। चूंकि इस लेख के अति सीमित आकार के कारण, औरंगजेब की धार्मिक कट्‌टरता और उन्माद का संक्षिप्ततम विवरण भी समाविष्ट नहीं किया जा सकता है तो भी हम उसके द्वारा हिन्दुस्तान के मूर्ति पूजकों के विरुद्ध जिहादी कुकृत्यों की, एक झलक मात्र देने का प्रयास कर रहे हैं।

गुरु तेग बहादुर का वध

घाटी के ब्राह्मणों का एक प्रतिनिधि मण्डल गुरु जी के पास गया, और अपने गर्वनर इफ्तिकार खाँ के माध्यम से औरंगजेब के द्वारा, उन पर किये जाने वाले अत्याचारों, और यातनाओं की,शिकायतें को, उन्होंने गुरु जी को बताया कि उनके सामने दो मार्गों : मृत्यु और इस्लाम- में से एक को चुन लेने का आग्रह किया जा रहा है। उन्होंने गुरु जी से कहा, ”इस अन्धकार भरे काल में, आप ही हमारे एक मात्र स्वामी एवम्‌ सर्वस्व हैं। अब आप पर ही हमारी जाति और धर्म की रक्षा का भार निर्भर करता है। अन्यथा हम सम्मान के साथ अपने जीवन, और पीढ़ियों पुराने धर्म के पालन में सर्वथा असमर्थ हैं। हमारे लिए यह सब असम्भव हो चला है।”

जब उसके पन्थ और पन्थानुयाइयों पर पूर्णतः अनाश्वयक रूप में आक्रमण हो रहा हो, तब योद्धा सन्त, उपेक्षा भाव दिखा पाने में सर्वथा असमर्थ था। उसने (गुरुजी ने ) उन्हें सान्तवना दी और प्रोत्साहित किया। और हिन्दुओं द्वारा कश्मीर में बलात धर्म परिवर्तन के प्रतिरोध का नेतृत्व किया, इससे औरंगजेब क्रुद्ध हो गया और उसने गुरु जी को बन्दी बनाये जाने के लिए आदेश दे दिये। जब गुरु जी को औरंगजेब के सम्मुख प्रस्तुत किया गया तब उसने गुरु जी के सामने मृत्यु और इस्लाम में से एक को चुन लेने का विकल्प प्रस्तुत किया। गुरु जी ने धर्म तयाग देने (इस्लाम स्वीकार कर लेने) को मना कर दिया और शहंशाह के आदेशानुसार,पाँच दिन तक अमानवीय यंत्रणायें देने के उपरान्त, गुरु जी का सिर काट दिया गया। इस पर गुरु गोविन्द सिंह ने कहा था, ”कि उन्होंने (गुरु जी ने) अपना रक्त (बलि) देकर तिलक और हिन्दुओं के यज्ञोपवीत की रक्षा की।”
(विचित्र नाटक-गुरु गोविन्द सिंहः ग्रन्थ सूरज प्रकाश-भाई सन्तोख सिंह : इवौल्यूशन ऑफ खालसा, प्रोफैसर आई बनर्जी, १९६२)

औरंगजेब द्वारा मन्दिरों का विनाश
हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब- सर जदुनाथ सरकार, खण्ड III, अपेण्डिक्स V से

राज्यारोहण से पहिले
”सीतादास जौहरी द्वारा सरशपुर के निकट बनवाये गये चिन्तामन मन्दिर का विध्वंस कर, उसके स्थान पर शहजादे औरंगजेब के आदेशानुसार १६४५ में क्वातुल-इस्लाम नामक मस्जिद बनावा दी ग्ई।” (मीरात-ई-अहमदी, २३२)। दी बौम्बे गजऋटियर खण्ड I भाग I पृष्ठ २८० ”आगे गहता है कि मन्दिर में एक गाय का वध भी किया गया।”

”मेरे ओदशानुसार, मेरे प्रवेश से पूर्व के दिनों में, अहमदाबार और गुजरात के अन्य परगनों में अनेकों मन्दिरों का विध्वंस कर दिया गया था। उनकी मरम्मत कर दी गई और उनमें पुनः मूर्ति पूजा आरम्भ हो गई थी। मेरे पहले के आदेश दिनांक २० नवम्बर १६६५(फर्मान) को व्यवहार में लाओ”
(मीरात पृ. २७५)
”औरंगाबाद के निकट सतारा गाँव मेरा शिकार स्थल था। पहाड़ी के शिखर पर यहाँ खाण्डे राय का मूर्ति युक्त एक मन्दिर था। अल्लाह की महिमा से (कृपा से) मैंने उसे ध्वंस कर दिया।”
(कालीमात-ई-अहमदी, पृष्ठ ३७२)

१९ दिसम्बर १६६१ को मीर जुम्ला ने, वहाँ के जारा औरलोगों द्वारा खाली किये कूच विहार शहर में प्रवेश किया और, ”सैय्यद मोहम्मद सादिक को मुखय न्यायाधीश नियुक्त कर दिया और आदेश किया कि सभी हिन्दू मन्दिरों को ध्वंस कर दिया जाए और उनके स्थन पर मस्जिदें बनवा दी जाएँ। (सेनानायक ने) जनरल ने स्वयं, युद्ध की कुल्हाड़ी नेकर, नारायण की मूर्ति का ध्वंस कर दिया।”
(स्टीयूअर्ट्‌स बंगाल)

”जैसे ही शहंशाह ने सुना कि दाराशुकोह ने मथुरा के केशवराय मन्दिर में पत्थरों की एक बाड़ को पुनः स्थापित करा दिया है, उसने कटाक्ष किया, कि इस्लामी पंथ में तो मन्दिर की ओर देखना भी पाप है और इस रादा ने मन्दिर की बाड़ को पुनः स्थापित करा दिया है। मुहम्मदियों के लिए वह आचरण जनक नहीं है। बाड़ को हटा दो। उसके आदेशानुसार मथुरा के फौजदार अब्दुलनबी खान ने बाड़को हटा दिया।”
(अखबारातः ९वाँ वर्ष, स्बीत ७, १४ अक्टूबर १६६६)

२० नवम्बर १६६५ ”चूँकि महामहिम शहंशाह के ध्यान में लाया गया है कि गुजरात प्रान्त के निकट के क्षेत्रों के लोगों ने शहंशाह के प्रवेश से पूर्व के शाही आदेशाकें के अन्तर्गत ध्वंस किये गये मन्दिरों को पुनः बना लिया है… अतः महामहिल आदेश देते हैं कि… पूर्व में ध्वंस किये गये और आल ही में पुनः स्थापित मन्दिरों को ध्वंस कर दिया जाए”
(फरमान जो मीरात २७३ में दिया गया)

९ अप्रैल १६६९ ”सभी प्रान्तों के गवर्नरों को शहंशाह ने आदेश दिया कि अविश्वासियों के सभी स्कूलों और मन्दिरों का विध्वंस कर दिया जाए और उनकी शिक्षा और धार्मिक क्रियाओं को पूरी शक्ति के साथ समाप्त कर दिया जाए-
”मासिर-ई-आलमगीरी, (डी ग्राफ, १६७० में जब वह हुगली में था आदेश सुना ओरमें का फ्रोग, २५०)

मई १६६९ ”गदा धारी सलील बहादुर को मालारान के मन्दिर को तोड़ने के लिए भेजा गया।” (मासीर-ई-आलम गीरी ८४)

२ सितम्बर १६६९ ”न्यायालय में समाचार आया कि शाही आदेशानुसार उसके अफसरों ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर का ध्वंस कर दिया था (उसी पुस्तक में, ८८)जनवरी १६७० ”रमजान के इस महीने में धार्मिक मन वाले शहंशाह ने मथुरा के केशव का देहरा नामक मन्दिर के ध्वंस का आदेश किया। अल्पकाल में उसके अफसरों ने आज्ञा पालन कर दी। बहुत बड़े व्यय के साथ उस मन्छिर के स्थान पर एक मस्जिद बना दी गई। उस मन्दिर का निर्माण बीर सिंह बुन्देला द्वारा तेतीस लाख रुपयों के व्यय से कराया गया था। महान पन्थ इस्लाम के अल्लाह की खयाति बढ़े कि, अविश्वास और अशांति विनाशक, इस पवित्र शासन में, इतना महान, आश्चर्यजनक, और देखने में असम्भव, कार्य सम्पन्न हो गया। शहंशाह के पन्थ की शक्ति और उसकी अल्लाह के प्रति भक्ति की महिमा के इस उदाहरण को देखकर राजा लोग आश्चर्यचकित, और श्वास रुके, अनुभव करने लगे और भौचक्के हो ऐसे देख रहे थे जैसे एक मूर्ति दीवाल को रदेखती है। मन्दिर में स्थापित छोटी बड़ी सारी मूर्तियाँ, जिनमें बहुमूल्य जवाहरात जड़े हुए थे, आगरा नगर में लाई गईं, और जहाँनारा मस्जिद की सीढ़ियों में लगा दी गईं ताकि, उन्हें निरन्तर पैरों तले रौंदी जा सकें।”
(उसी पुस्तक में पृष्ठ ९५-९६)

”सैनोन के सीता राम जी मन्दिर का उसने आंशिक ध्वंस किया; उसके अफसरों में से एक ने पुजारी कोकाट डाला, मूर्ति को तोड़ दिया, और गोंड़ा की देवीपाटन के पूजाग्रह (मन्दिर) को अपवित्र कर दिया।”
(क्रुक का एन. डब्ल्यू. पी. ११२)

”कटक से लेकर उड़ीसा की सीमा पर मेदिनीपुर तक के सभी थानों के फौजदारों, प्रशासन अधिकारियों (मुतसद्दिसों), जागीरदारों के प्रतिनिधियों, कोरियों, औ अमल कर्ता सेवकों के लिए आदेश प्रसारित किये गये कि; उड़ीसा प्रान्त के एक समाचार पत्र से समाचार पाकर कि मेदिनीपुर के एक गाँव तिलकुटी में एक नया मन्दिर बनाया गया है, शहंशाह के आदेशानुसार शाही भुगतान के स्वामी असद खाँन ने पत्र लिखा और पवित्र आदेश दिया कि उस मन्दिर का और महत्वहीन अविश्वासियों द्वारा प्रदेश भर, में जहाँ कहीं, कोई मन्दिर बनाया गया हो, सभी का विनाश कर दिया जाए। अतः अधिकतम तीव्रता से, आपको आदेश दिया जाता है, कि इस पत्र की प्राप्ति के तुरन्त बाद, आप उपर्लिखित मन्दिरों को अविलम्ब ध्वंस कर दें। विगत दस बारह सालों में, जो भी मूर्तिघर बना हो, भले को वह ईंटों से बनाया गया हो, या मिट्‌टी से, प्रत्येक को अविलम्ब नष्ट कर दिया जाए। घृणित अविश्वासियों को, उनके प्राचीन मन्दिरों की मरमत भी, नहीं करनी देनी चाहिए। काजीकी सील के अन्तर्गत, और पवित्र शेखों द्वारा प्रमाणित मन्दिरों के विनाश की सूचना न्यायालय में भेज दी जानी चाहिए।
[मराकात-ई-अबुल हसन, (१६७० में पूर्ण की गई) पृष्ठ २०२]

”हर एक परगने में थानों के अफ़सर मूर्ति भंजन के आदेशों के साथ आते हैं।” (२७ जून १६७२ को लिखित और जे. एम. रे. के बंगाली हिस्ट्री ऑफ ढाका आई, ३८९ में प्रकाशित ढाका के धर्मारिया स्थान के याशो माधव मन्दिर में सुरक्षित रखे, पत्र के अनुसार)

”खण्डेला के राजपूतों को दण्ड देने, और उस स्थान के बड़े मन्दिरों के ध्वंस करने के लिए दराब खाँ को भेजा गया था।” (मासीर-ई-आलमगीरी १७१)। ”उसने ८ मार्च १६७९ को खण्डेला और शानुला के मन्दिरों का ध्वंस कर दिया और आसपास, अड़ौस पड़ौस, अन्य के मन्दिरों को भी ध्वंस कर दिया।”
(मासीर-ई-आलमगीरी १७३)

२५ मई १६७९, ”जोधपुर में मन्दिरों का ध्वंस करके और खण्डित मूर्तियों की कई गाड़िया भर कर खान-र्ठ-जहान बहादुर लौटा। शहंशाह ने आदेश दिया कि मूर्तियों, जिनमें अधिकांश सोने, चाँदी, पीतल, ताँबा या पत्थर की थीं, को दरबार के चौकोर मैदान में बिखेर दिया जाए और जामामस्जिद की सीढ़ियों में लगा दिया जाए ताकि उनकों पैरों तले रौंदा जा सके।”

(मासीर-ई-आलमगीरी पृष्ठ १७५)

१७ जनवरी १९८० ”उदयपुर के महाराणा के महल के सामने स्थित, एक विशाल मन्दिर, जो अपने युग के महान भवनों में से एक था, और अविश्वासियों ने जिसके निर्माण के ऊपर अपार धन व्यय किया था, उसे विध्वंस कर दिया गया, और उसकी मूर्तियाँ खण्डित कर दी गईं।”
(मासीर-ई- आलमगीरी १६८)

”२४ जनवरी को शहंशाह उदय सागर झील को देखने गया और उसके किनारे स्थित तीनों मन्दिरों के ध्वंस का आदेश दे आया।”
(पृष्ठ १८८, उसी पुस्तक में)।

”२९ जनवरी को हसन अली खाँ ने सूचित किया कि उदयपुर के चारों ओर के अन्य १७२ मन्दिर ध्वंस कर दिये गये हैं”
(उसी पुस्तक में पृष्ठ १८९)

”१० अगस्त १६८० आबू टुराब दरबार में लौटा और उसने सूचित किया कि उसने आम्बेर में ६६ मन्दिर तोड़ दिये हैं”
(पृष्ठ १९४)।

२ अगस्त १६८० को पश्चिमी मेवाड़ में सोमेश्वर मन्दिर को तोड़ देने का आदेश दिया गया।
(ऐडुब २८७a और २९०a)

सितम्बर १६८७ गोल कुण्डा की विजय के पश्चात्‌ शहंशाह ने ‘अब्दुल रहीम खाँ को हैदराबाद शहर का आचरणनिराोक नियुक्त किया और आदेश दिया कि गैर-मुसलमानों (हिन्दुओं) के रीति रिवाजों व परम्पराओं तथा इस्लाम धर्म विरुद्ध नवीन विचारों को समाप्त कर दें और मन्दिरों को ध्वंस कर उनके स्थानों पर मस्जिदें बनवा दें।”
(खफ़ी खान ii ३५८-३५९)

”१६९३ में शहंशाह ने वाद नगर के मन्दिर हाटेश्वर, जो नागर ब्राह्मणों का संरक्षक था, को ध्वंस करने का आदेश किया”
– (मीरात ३४६)

१६९८ के मध्य में ”हमीदुद्दीन खाँन बहादुर, जिसे बीजापुर के मन्दिरों को ध्वंस करने और उस स्थान पर मस्जिद बनाने के लिए नियुक्त किया था, आदेशों का पालन कर दरबार में वापिस आया था। शहंशाह ने उसकी प्रशंसा की थी।”
(मीरात ३९६)

”मन्दिर का ध्वंस किसी भी समय सम्भव है क्योंकि वह अपने सािन से भाग कर नहीं जा सकता”
-(औरंगजेब से जुल्फि कार खान और मुगल खान को पत्र (कलीमत-ई-तय्यीबात ३९ं)

”महाराष्ट्र के नगरों के मकान बहुत अधिक मजबूत हैं क्योंकि वे पत्थरों और लोहें के द्वारा बनवाये गये हैं। अभियानों के मध्य कुल्हाड़ियाँ ले जाने वाले सरकारी आदमियों के पास पर्याप्त शक्ति सामर्थ्य व अवसर नहीं रहता कि मार्ग में दृष्टिगत हो जाने वाले,गैर-मुसलमानों के मन्दिरों को, तोड़ कर चूराकर, भूमिसार कर सकें। तुम्हें एक परम्परा निष्ठ निरीक्षक (दरोगा) नियुक्त कर देना चाहिए जो बाद में सुविधानुसार मन्दिरों को ध्वंस करा के उनकी नीवों को खुदवा दिया करे।”
(औरंगजेब से, रुहुल्ला खान को कांलीमत-ई-औरंगजेब में पृष्ठ ३४ रामपुर M.S. और ३५a I.0.L.M.S. ३३०१)

१ जनवरी १७०५ ”कुल्हाड़ीधारी आदमियों के दरोगा, मुहम्मद खलील को शहंशाह ने बुलाया… ओदश दिया कि पण्ढरपुर के मन्दिरों को ध्वंस कर दिया जाए और डेरे के कसाइयों को ले जाकर, मन्दिरों में गायों का वध कराया जाए… आज्ञा पालन हुई”
(अखबारात ४९-७)