Tags

, , , , , ,


०६. कुतुबुद्‌दीन ऐबक (१२०६-१२१०)

सुल्तान ने कोहरान दुर्ग और समाना का शासन, कुतुबद्‌दीन को सौंप दिया।…..उसने अपनी तलवार से हिन्द को मूर्ति-पूजा और बहुदेवतावाद की गंदगी से मुक्त कर दिया।अपनी शक्ति और निर्भयता से एक मंदिर भी ध्वस्त करने से नहीं छोड़ा।(२७)

कतुबुद्‌दीन ने दिल्ली में प्रवेश किया। नगर और उसके आस-पास के क्षेत्रों से मूर्तियाँ और मूर्ति पूजा तिरोहित हो गई और मूर्तियों के गर्भगृहों पर मुसलमानों के लिये मस्जिदें बना दी गई।(२८)

‘११९४ ई. में कोल (अलीगढ़) विजय के पश्चात दुर्ग के हिन्दुओं में उन बुद्धिमान्‌ लोगों को छोड़कर जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, शेष को कत्ल कर दिया गया।’ (२९)

११९५ ई. में जब गुजरात के राजा भीम पर आक्रमण हुआ तो बीस हजार (२०,०००) हिन्दू कैदी, मुसलमान बनाये गये।(३०)

इब्न अल-असीर का कहना है कि कुतुबद्‌दीन ऐबक ने हिन्द के अनेक सूबों पर आक्रमण किये। (हर बार उसने कत्ले-आम किये और लूट का बहुत-सा सामान और कैदी लेकर लौटा।)

बनारस का विध्वंस
वहाँ से शाही सेना बनारस की ओर चल पड़ी जो हिन्द देश का हदय स्थान है। बनारस में लगभग १००० मंदिरों को तोड़ कर उनके स्थान पर मस्जिदें खड़ी की गईं। इस्लाम और शरियत स्थापित किये गये और उनकी शिक्षा का प्रबंध किया गया।

गुजरात में प्रवेश
११९७ ई. में विश्व विजयी खुसरु अजमेर से नहर वाले के राय को नष्ट करने के इरादे से पूर्ण सैन्य बल के साथ चल पड़ा। प्रातःकाल से दोपहर तक भयंकर युद्ध हुआ। मूर्तिक-पूजकों और नरक गामियों की सेना युद्ध क्षेत्र से भाग खड़ी हुई। उनके अधिकांश नेता युद्ध में काम आये। लगभग पचास हजार (५०,०००) हिन्दुओं को कत्ल कर दिया गया। बीस हजार (२,००००) से अधिक गुलाम बना लिये गये। २० हाथी और अनगिनत हथियार विजेताओं के हाथ लगे। ऐसा लगता था कि सम्पूर्ण विश्व के शासकों के कोषागार उनको प्राप्त हो गये हैं।

कालिंजर का पतन
कालिंजर का विखयात दुर्ग जो अपनी मजबूती के लिये सिकन्दर की दीवार की भाँति विखयात था, जीत लिया गया। मंदिरों को मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया।……….मूर्ति पूजा का नामोनिशान मिटा दिया गया।………. ५०,००० हिन्दुओं के गले में गुलामी के पट्‌टे डाल दिये गये। हिन्दुओं की मृत देहों से मैदान काला दिखाई देने लगा। हाथी, पशु और बेशुमार हथियार लूट में हाथ आये।(३३)
फखरुद्‌दीन मुबारक शाह के अनुसार १२०२ ई. में कालिंजर में पचास हजार (५०,०००) कैदी पकड़े गये। निश्चय ही जैसे-सिंध की अरब विजय के पश्चात हुआ, इन सब को, जो पकड़कर गुलाम बनाये गये, इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। फरिश्ता तो साफ़-साफ़ लिखता है कि कालिंजर पर कब्जा हो जाने पर पचास हजार (५०,०००) गुलामों को इस्लाम में दीक्षित किया गया।(३४) फलस्वरूप साधारण सिपाही अथवा गृहस्थ के पास भी कई-कई गुलाम हो गये।(३५)

दिल्ली का शुद्धिकरण
सुल्तान दिल्ली लौट आया।……….तब उसने उन मूर्ति-मंदिरों का नामोनिशान मिटा दिया, जिनके मस्तक आकाश को छूते थे।……… इस्लाम के सूर्य का प्रकाश दूर-दूर के मूर्ति-पूजक क्षेत्रों पर पहुँचने लगा।(३६)
इसी समय कुतुबद्‌दीन ऐबक के सिपहसालार मौहम्मद बखितयार खिलजी इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करने पूर्वी भारत में घूम रहे थे। सन्‌ १२०० ई. में इन्होंने बिहार के नितांत असुरक्षित विश्वविद्यालय उदन्तरी पर आक्रमण कर वहाँ के बौद्ध बिहार में रहने वाले भिक्षुओं को कत्ल कर दिया। सन्‌ १२०२ ई. में उन्होंने सहसा ही नदिया पर आक्रमण कर दिया। बदायुनीं की ‘मुतखबत-तवारीख’ के अनुसार ‘अतुल संपत्ति और धन मुसलमानों के हाथ लगा। बखितयार ने पूजा स्थल और मूर्ति-मंदिरों को तोड़कर, उनके स्थान पर मस्जिदें और खानकाहें स्थापित कर दिये।(३७) ऐबक के पद्गचात्‌ शम्शुद्दीन् इल्तुतमिश का काल आया।

०७. सुल्तान इल्तुतमिश (१२१०-१२३६)

१२३१ ई. में इल्तुतमिश ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और बड़ी संखया में लोगों को गुलाम बनाया। उसके द्वारा पकड़े और गुलाम बनाये गये महाराजाओं के परिवारीजनों की गिनती देना संभव नहीं है। (३८)

अवध में चंदेल वंश के त्रैलोक्य वर्मन के विरुद्ध युद्ध में विजयी होने पर ‘काफिरों के सभी बच्चे, पत्नियाँ और परिवारीजन विजयी सुल्तान के हाथ पड़े। १२५३ ई. में रणथम्भौर में और १२५९ में हरियाणा और शिवालिक पहाड़ों में कम्पिल, पटियाली और भोजपुर में यही कहानी दोहराई गई। (३९)

हिन्दू आसानी से इस्लाम ग्रहण नहीं करते थे क्योंकि अल-बेरुनी के अनुसार हिन्दू यह समझते थे कि उनके धर्म से बेहतर दूसरा धर्म नहीं है और उनकी संस्कृति और विज्ञान से बढ़कर कोई दूसरी संस्कृति और विज्ञान नहीं है।(४०) दूसरा कारण यह था जैसा कि इल्तुतमिश को उसके वजीर निजामुल मुल्क जुनैदी ने बताया था ‘इस समय हिन्दुस्तान में मुसलमान दाल में नमक के बराबर हैं। अगर जोर जबरदस्ती की गयी तो वे सब संगठित हो सकते हैं और मुसलमानों को उनको दबाना संभव नहीं होगा। जब कुछ वर्षों के बाद राजधानी में और नगरों में मुस्लिम संखया बढ़ जाये और मुस्लिम सेना भी अधिक हो जाये, उस समय हिन्दुओं को इस्लाम और तलवार में से एक का विकल्प देना संभव होगा।'(४१) डॉ. के.एस. लाल के अनुसार, यह स्थिति तेरहवीं शताब्दी के बाद हो गयी थी और इसलिये बलात्‌ धर्मान्तरण का कार्य तेहरवीं शताब्दी के पश्चात्‌ शीघ्र गति से चला।

इल्तुतमिश ने भी भारत के इस्लामीकरण में पूरा योगदान दिया। सन्‌ १२३४ ई. में मालवा पर आक्रमण हुआ। वहाँ पर विदिशा का प्राचीन मंदिर नष्ट कर दिया गया। बदायुनी लिखता है : ‘६०० वर्ष पुराने इस महाकाल के मंदिर को नष्ट कर दिया गया। उसकी बुनियाद तक खुदवा कर राय विक्रमाजीत की प्रतिमा तोड़ डाली गयी। वह वहाँ से पीतल की कुछ प्रतिमाएँ उठा लाया। उनको पुरानी दिल्ली की मस्जिद के दरवाजों और सीढ़ियों पर डालकर लोगों को उन पर चलने का आदेश दिया।(४२) ५०० वर्षों के मुस्लिम आक्रमणों ने हिन्दुओं को इतना दरिद्र बना दिया था कि मंदिरों में सोने की मूर्तियों के स्थान पर पीतल की मूर्तियाँ रखी जाने लगी थीं। किन्तु अभी तो अत्याचार और भी बढ़ने थे।

इल्तुतमिश के पश्चात्‌ बलबन (१२६५-१२८७) का राज्य आया। रुहेलखण्ड के कटिहार क्षेत्र केराजपूतों के प्रदेश ने कभी मुसलमानों की सत्ता स्वीकार नहीं की थी। सन्‌ १२८४ ई. में बलबन ने गंगा पार कर इस क्षेत्र पर आक्रमण किया। बदायुनी के अनुसार ‘दिल्ली छोड़ने के दो दिन बाद वह कटिहार पहुँचा। ७ वर्ष के ऊपर के सभी पुरुषों को कत्ल कर दिया गया। शेष स्त्री-पुरुष सभी गुलाम बना लिये गये।’