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अलीशाह (१४१३-१४२०)

सिकन्दर के प्रधानमंत्री सुहा ने इस सुल्तान के समय ब्राहमणों पर फिर अत्याचार प्रारंभ कर दिये। उनके धार्मिक अनुष्ठान और शोभा यात्राओं पर पाबंदी लगा दी। ब्राहम्ण इतने दरिद्र हो गये कि उनको कुत्तों की तरह भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ने लगा। अपने धर्म की रक्षा और अत्याचार से बचने के लिए बहुतों ने काश्मीर से भागने के प्रयास किये।

कहा गया है कि काश्मीर में केवल ११ (ग्यारह) ब्राहम्ण परिवार ही बच पाये जो राज्य सहमति के अभाव में भाग नहीं सके। उनमें से बहुतों ने आग में कूदकर, विष द्वारा, व फांसी लगाकर अथवा पहाड़ से कूदकर आत्महत्या कर ली। सुहा का कहना था कि वह तो केवल इस्लाम के प्रति अपनी कर्तव्य निभा रहा था।

बाबर (१५१९-१५३०)

मुसलमान बादशाहों में बाबर का नाम भारत में उसके द्वारा सबसे स्थायी मुगल साम्राज्य स्थापित करने का श्रेय प्राप्त होने के कारण प्रसिद्ध रहा है। रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के कारण यह नाम बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। मुसलमानों के लिए तो उनके धर्मानुसार जितना ही काफिर-कुश कोई सुल्तान रहा हो उतना ही अधिक उनकी श्रद्धा और आदर का पात्र होगा। किन्तु आश्चर्यजनक बात यह है कि हमारे कुछ आधुनिक विद्वान भी धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण पत्र पाने की होड़ में उसे एक धर्मनिरपेक्ष और हिन्दू तथा हिन्दू मंदिरों के प्रति सहानुभूति रखने वाला मजहबी कट्‌टरता से ऊपर सहदय बादशाह प्रमाणित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगाते फिरते हैं।

ऐसे विद्वानों का दुर्भाग्य है कि बाबर स्वरचित ‘तुजुके बाबरी’ में अपनी जीवन और विचारों का लेखा-जोखा छोड़ गया है। उसके जीवन-चरित्र में अयोध्या काल के कुछ पृष्ठ नहीं मिलते। हिन्दुओं में पढ़ने-पढ़ाने का प्रचलन कम है। इसलिये उनकी अज्ञानता का लाभ उठाकर कुछ भी कहा जा सकता है। उसका आत्म चरित्र ‘तुजुके बाबरी’ जिसका बेवरिज द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद भारत में सहज ही उपलब्ध है, बाबर के जीवन का प्रमाणिक ग्रंथ है-

स्वयं अपने कथन के अनुसार बाबर भारत में हिंदुओं की लाशों के पहाड़ लगाकर हर्षातिरेक से गुनगुना उठता है-

निकृष्ट और पतित हिन्दुओं का वध कर,
गोली और पत्थरों से बना दिये मृत देहों के पर्वत,
गजों के ढेर जैसे विशाल।
और प्रत्येक पर्वत से बहती रक्त की धाराएँ। हमारे सैनिकों के तीरों से भयभीत,
पलायन कर छिप गये कुन्जों और कंदराओं में।
इस्लाम के हित घूमता फिरा मैं बनों में,
हिन्दू और काफिरों से युद्ध की खोज में।
इच्छा थी बनूँगा इस्लाम का शहीद मैं
उपकार उस खुदा का बन गया ‘गाज़ी’।

यह कोरी कवि कल्पना नहीं है। वह अपने प्रत्येक युद्ध के पश्चात्‌ हिन्दू युद्धबंदियों के सिरें एक-एक कर काटे जाने का रोमांचक दृश्य शराब की चुस्कियों के बीच देखता है। फिर उन सिरों की मीनारें खड़ी करवाता है। वह लिखता है कि एक बार उसे अपना डेरा तीन बार ऊँचे स्थान पर ले जाना पड़ा, क्योंकि भूमि पर खून ही खून भर गया था। बाबर का दुर्भाग्य था कि उसके पूर्व के सुल्तानों ने उसके तोड़ने के लिए बहुत मंदिर छोड़े ही नहीं थे। सोने की मूर्तियां का स्थान पहले पीतल और फिर पत्थर की मूर्तियों ने ले लिया था।

बाबर को भारत भूमि इतनी शुष्क और अप्रिय लगती थी कि उसने मृत्योपरान्त वहाँ दफन होना भी पसंद नहीं किया। अफ़गानिस्तान में उसका टूटा-फूटा मकबरा है। कहा जाता है कि मुस्लिम देश अफगानिस्तान के मुसलमान बाबर को एक विदेशी लुटेरा समझकर उसके मकबरे का रखरखाव नहीं करवाते। उनके लिए वह आदर का पात्र नहीं है। वह फरगना का रहने वाला दुष्ट विदेशी था जिसने उनके देश को पद-दलित किया था। अरब में सड़क चौड़ी करने के लिए मस्जिदें हटा दी गयीं है। किन्तु भारत के मुसलमान, पठानों, अरबों जैसे दूसरी श्रेणी के मुसलमान नहीं है। वह विदेशी आक्रमणकारियों बाबर, मौहम्मद बिन-कासिम, गौरी, गजनवी इत्यादि लुटेरों को और औरंगजेब जैसे साम्प्रदायिक बादशाह को गौरव प्रदान करते हैं और उनके द्वारा मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों व दरगाहों को इस्लाम की काफिरों पर विजय और हिन्दू अपमान के स्मृति चिन्ह बनाये, रखना चाहते हैं जिससे हिन्दू अतीत में दीनदारों द्वारा प्रदरशित इस्लाम की कुव्वत को न भूल जायें। और हम हिन्दू, कानून में विश्वास करने वाले, सुसंस्कृत, उदार, धर्मनिरपेक्ष, भले लोग प्रमाणित होना पसंद करते हैं। इसलिए हमारी सरकार इन लोदियों, मुगलों, पठानों, खिलजियों और गुलामों के मकबरों के रखरखाव पर करोड़ों रुपया, जो वह मुखयतया हिन्दुओं से वसूलती है, प्रतिवर्ष खर्च करती है और उन बर्बर आक्रान्ताओं द्वारा अपने मंदिरों को अपवित्र और तोड़कर उनके स्थान पर बनाई गई मस्जिदों को इस देश की संस्कृति की धरोहर बताकर फौज पुलिस बिठाकर उनकी रक्षा करती है। संसार में क्या कोई ऐसा आत्म सम्मानहीन दूसरा देश और समाज देखने को मिलेगा?

शेरशाह सूरी (१५४०-१५४५)

यह सत्य है कि यह बादशाह विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिए नहीं निकलता था किन्तु अवसर पड़ने पर उसका व्यवहार इस विषय में दूसरे मुस्लिम सुल्तानों से भिन्न नहीं था। अवसर आने पर उसने इस्लाम को शिकायत का मौका नहीं दिया।

द्गोख नुरुल हक ‘जुवादुतुल-तवारीख’ में कहता है कि ९५० हिजरी में पूरनमल रायसेन दुर्ग का स्वामी था। उसके हरम में १००० स्त्रियाँ थीं। उनमें कुछ मुसलमान भी थीं। शेर खाँ ने इस पर मुसलमानी क्षोभ के कारण दुर्ग को विजय करने का निश्चय किया। किन्तु जब कुछ समय तक यह संभव न हो सका तो पूरनमल के साथ संधि कर ली। उसके पश्चात्‌ उसके पूरे कैम्प को (जो संधि के कारण बेखबर था) हाथियों द्वारा घेर लिया गया। राजपूतों ने अपनी स्त्रियों और बच्चों को आग में झोंक दिया और प्रत्येक पुरुष युद्ध करते मारा गया। (७६)