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(स्रोतः एन.के. जुत्शी द्वारा लिखित ‘सुल्तान जैनुल आब्दीन आफ काश मीर’
काद्गमीर का प्रभावी इस्लामीकरण सुहादेव (१३०१-१३२० ई.) के राज्य काल से प्रारंभ हुआ।

भारतवर्ष ने सदैव उत्पीड़ित द्गारणार्थियों को द्गारण दी है। धर्म के नाम पर कभी आगन्तुकों से भेद-भाव नहीं किया। पारसियों और यहूदियों ने हिन्दू भारत के इस आतिथ्य का दुरूपयोग नहीं किया। परन्तु मुसलमानों ने समय पड़ने पर इस्लाम की काफिर और कुफ्र विरोधी नीति के कारण एक दो अपवादों को छोड़ कर सदैव ऐसी नीति अपनाई जिससे भारत में इस्लाम की विजय हो और कुफ्र का नाद्गा। काश्मीर भी इस नीति का शिकार बना।

१३१३ ई. में शाहमीर नामक एक मुसलमान सपरिवार काश्मीर में आकर बसा। शाहमीर को हिन्दू राजा ने अपनी सेवा में नियुक्त कर उसे अंदर कोट का चार्ज सौंप दिया। लगता है कि यह परिवार पहले हिन्दू था।

इसी समय में जब काद्गमीर पर दुलाचा नामक मंगोल का भयानक आक्रमण हो चुका था, लद्‌दाख के एक बौद्ध राजकुमार रिनछाना ने लद्‌दाख से आकर अस्त-व्यस्त काद्गमीर पर कब्जा कर लिया। राजासुहादेव भय के मारे किद्गतवार भाग गया। रिनछाना ने काश्मीर में शांति स्थापित कर दी।

बौद्ध रिनछाना हिन्दू बहुत काश्मीर के हिन्दू प्रजाजनों से अच्छे संबंध बनाने के लिये हिन्दू मत स्वीकार करना चाहता था, परन्तु देव स्वामी नामक मुखय पुरोहित के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका। हिन्दुओं से निराश होकर मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिये उसने शाहमीर के समझाने-बुझाने से इस्लाम ग्रहण कर लिया।

रिनछाना की मृत्यु के पश्चात अनेक षडयंत्र रच कर शाहमीर ने गद्‌दी हथिया ली और सुल्तान शम्सुद्‌दीन के नाम से १३३१ ई. में सिंहासन पर बैठा। सिंहासन पर बैठते ही उसने काश्मीर में सुन्नी मुस्लिम सिद्धांतों का प्रचार प्रारंभ कर दिया। १३४२ ई. में शम्सुद्‌दीन की मृत्यु हो गई और उसके दोनों पुत्रों में झगड़े प्रारंभ हो गये। बड़े पुत्र जमशेद ने १३४२ से १३४४ तक राज्य किया और १३४४ में उसका छोटा भाई अलीशेर सुल्तान अलाउद्‌दीन के नाम से राज्य सिंहासन पर बैठा। उसने काश्मीर में गिरते नैतिक चरित्र की रोकथाम की, अनेक नये क्षेत्र वियज किये। १३५५ ई. में सुल्तान अलाउद्‌दीन की मृत्यु के पश्चात्‌, उसका पुत्र सुल्तान शिहाबुद्‌दीन (१३५५-१३७३ ई.) गद्‌दी पर बैठा। द्गिाहाबुद्‌दीन ने दंगा फसाद करने वालों को सखती से कुचल दिया।

सुल्तान शिहाबुद्‌दीन की मृत्यु के पश्चात्‌ उसका भाई हिन्दाल सुल्तान कुतुबुद्‌दीन के नाम से गद्‌दी पर बैठा।

अब तक अनेक विदेशों से भाग कर आये सैयदों ने काश्मीर में शरण ले ली थी। उन्होंने मुगलों तथा तैमूर के आतंक एवं उत्पीड़न के कारण काद्गमीर में प्रवेश किया था। उस समय फारस, ईराक, तुर्किस्तान, अफ़गानिस्तान और भारत में अराजकता थी। काश्मीर में शांति थी। हिन्दू राज्यकाल में धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में निरपेक्ष नीति के कारण वे काश्मीर में आबाद हो गये। उन्होंने अपने और साथियों को बुलाया। सैयदों की संखया बढ़ती गयी।

सैयद राजनीति में सक्रिय भाग लेते थे। वे सुल्तानों से विवाह संबंधी बनाकर, काश्मीर के कुलीन समाज में उच्चे स्थान प्राप्त करते गये। उनका प्रभाव बढ़ता गया। उन्होंने सुल्तानों पर नियंत्रण प्रारंभ किया। विदेशी सैयदों के प्रभाव एवं प्रोत्साहन पर हिन्दुओं पर अत्याचार हुए। उन्हें मुसलमान बनाने की सुनिद्गिचत योजना बनायी गई। सैयदों ने इसमें सक्रिय भाग लिया। सभी साधनों का प्रयोग काश्मीर के इस्लामीकरण में किया गया।

फलस्वरूप सुल्तान कुत्बुद्‌दीन (१३७३-१३८९) के राज्य काल में इस्लाम का बहुत प्रसार हुआ। इसके समय में ही सैयद अली हमदानी नामी सूफी ईरान से वहाँ आया। इसके प्रभाव में आकर सुल्तान ने हिन्दुओं के धर्मान्तरण में बड़ी रुचि ली। सादात लिखित ‘बुलबुलशाह’ के अनुसार इस सूफी के प्रभाव से ३७००० (सैंतीस हजार) हिन्दू मुसलमान बने।

कुत्बुद्‌दीन के पुत्र सिकन्दर बुतशिकन ने (१३८९-१४१३) विदेशी सूफी मीर अली हमदानी, सहभट्‌ट सैयदों तथा मूसा रैना ने इराक देशीय मीर शमशुद्‌दीन की प्रेरणा पर हिन्दुओं पर अत्याचार एवं उत्पीड़न किया। सिकन्दर बुतशिकन के समय समस्त प्रतिमाएँ भंग कर दी गयी थी। हिन्दू जबर्दस्ती मुसलमान बना लिये गये थे। इस सुल्तान के विषय में कल्हण ‘राज तरंगिणी’ में लिखता है :

‘सुल्तान अपने तमाम राजसी कर्तव्यों को भुलाकर दिन रात मूर्तियों तोड़ने का आनंद उठाता रहता था। उसने मार्तण्ड, विद्गणु, ईशन, चक्रवर्ती और त्रिपुरेश्वर की मूर्तियाँ तोड़ डाली। कोई भी बन, ग्राम, नगर तथा महानगर ऐसा न था जहाँ तुरुश्क और उसके मंत्री सुहा ने देव मंदिर तोड़ने से छोड़ दिये हों।’ सुहा हिन्दू था जो मुसलमान हो गया था।

सिकन्दर के पश्चात्‌ उसका पुत्र मीरखां अली शाह के नाम से गद्‌दी पर बैठा।

दूसरे सुल्तान

दिल्ली के सुल्तानों की हिन्दू प्रजा पर अत्याचारों में यदि कोई कमी रह गई थी तो सूबों के मुस्लिम गवर्नर उसे पूरी कर देते थे।

सन्‌ १३९२ में गुजरात के सूबेदार मुजफ्फरशाह ने नवनिर्मित सोमनाथ के मंदिर को तुड़वा दिया और उसके स्थान पर मस्जिद बनवाई। बहुत से हिन्दू मारे गये। हिन्दुओं ने फिर नया मंदिर बनाया। १४०१ ई. में मुजफ्फर फिर आया। मंदिर तोड़कर दूसरी मस्जिद बनाई गई। सन १४०१ ई. में उसके पोते अहमद ने, जो उसके बाद गद्‌दी पर बैठा था, एक दरोगा इसी काम के लिए नियुक्त किया कि वह गुजरात के सभी मंदिरों को ध्वस्त कर डाले। हिन्दू मंदिर बनाते रहते थे, और मुसलमान तोड़ते रहते थे।

सन्‌ १४१५ ई. में अहमद ने सिद्धपुर पर आक्रमण किया। रुद्र महालय की मूर्ति तोड़कर उस मंदिर के स्थान पर मस्जिद खड़ी की। सन्‌ १४१५ ई. में गुजरात के सुल्तान महमूद बघरा ने इन सभी से बाजी मार ली। उसके अधीन जूनागढ़ का राजा मंदालिका था जिसने कभी भी सुल्तान को निश्चित कर देने में ढील नहीं की थी। फिर भी सन्‌ १४६९ ई. में बघरा ने जूनागढ़ पर आक्रमण कर दिया। जब मंदालिका ने उससे कहा कि वह अपना निश्चित कर नियमित रूप से देता रहा है तो उसने उत्तर दिया कि उसे धन प्राप्ति में इतनी रुचि नहीं है जितनी कि इस्लाम के प्रसार में है। मंदालिका को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया।(८०) सन्‌ १४७२ ई. में महमूद ने द्वारिका पर आक्रमण किया। मंदिर तोड़ा और शहर लूटा। चंपानेर का शासक जयसिंह और उसका मंत्री इस्लाम कुबूल न करने पर कत्ल कर दिये गये।(७१)

बंगाल के इलियास शाह ने (सन्‌ १३३१-७९) नेपाल पर आक्रमण कर स्वयम्भूनाथ का मंदिर ध्वस्त किया।(८२) उड़ीसा में बहुत से मंदिर तुड़वाये और लूटपाट की।

गुलबर्ग और बीदर के बहमनी सुल्तान प्रति वर्ष एक लाख हिन्दू पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का वध करना अपना धार्मिक कर्तव्य समझते थे। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर उनके द्वारा ध्वस्त कर दिये गये।(८३)

इस प्रकार के खुले अत्याचारों से उत्पन्न भयानक आतंक से कितने हिन्दू शीघ्रतिशीघ्र मुसलमान हो गये होंगे, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।