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part 3., जिहाद का कार्य रूप में स्वरूप

जिहाद का कार्य रूप में स्वरूप

भारत पर राज्य करने वाले मुस्लिम शासक, भूमण्डल के विभिन्न युगों, वंशों, और क्षेत्रों से सम्बन्धित थे। उनकी भाषायें भिन्न थीं किन्तु उनके व्यवहार का प्रारूप् पूर्णतः एक समान था और वह अब भी है। इस चमत्कारिक व्यवहार की एकरूपता, का कारण कुरान, हदीस, सुन्नाह आदि में ही निहित है जिन्हें कि वे गर्व के साथ न केवल उद्धत करते हैं बल्कि अनुसरण भी करते हैं। इस्लामी पंथ के दो पहलू हैं। एक है सैद्धान्तिक पक्ष जो कि इस्लामी धर्म ग्रन्थों, कुरान (अल्लाह के इलहाम या प्रगटीकरण), हदीसों (पैगम्बर के कर्म और वचन) और सुन्नाह (पैगम्बर द्वारा बनाये नियम) द्वारा प्रतिपादित है। दूसरा पक्ष है जिहाद यानी कि इस्लामी धर्म युद्ध। ये दोनों पक्ष आपस में पूरी तरह जुड़े हुए हैं और यह पवित्र कुरान ही है जो कि अल्लाह के मार्ग में अल्लाह के लिए इस्लामी संघर्ष, ”जिहाद” करने को प्रेरित तथा निर्देश करता है, मार्गदर्शन् करता है।

आज भूमण्डल के सभी प्रबुद्ध नागरिक, विभिन्न भागों में बोस्नियाँ से लेकर फिलिपाइन तक, चैचिनियाँ से लेकर कश्मीर तक, रह रहे हैं, अरबी शब्द ”जिहाद”, से किसी न किसी मात्रा में परिचित हो चुके हैं, और कुछ न कुछ अनुभव भी कर चुके हैं। विश्व के किसी भी कोने में सही, यह शब्द ”इस्लामी जिहाद”, समान रूप से एक जैसी ही विशिष्टता, यानी कि मुस्लिमेतर समाज के प्रति सहिष्णुता, और उसका नर संहार तथाकथित काफिरों की सम्पत्ति की लूट व अग्निदाह, और उनकी महिलाओं का शील हरण, प्रगट करता है। मुहम्मद के समय में बदर के युद्ध के मुजाहिदों से लेकर वर्तमान में ओसामा बिन लादेन के मुजाहिदों की भावनाएं पहले जैसी अपरिवर्तित ही हैं। लैफ्टिनैण्ट सौरभ कालिया के द्गारीर के वध और उनके शव के विकृतीकरण से लेकर, २५.१२.२००० को जकार्ता में बम विस्फोट, ११.९.२००१ को न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सैण्टर और वाशिंगटन के पैण्टागत के विध्वंस तथा १.१०.२००१ को कश्मीर में एसैम्बली भवन पर बम विस्फोट तथा संसद भवन पर हमला (१३.१२.२००१) तक के आतंकवाद तथा अत्याचारों की शैली एक जैसी ही है।

अल्लाह और उसके पैगम्बर के अनुयायियों के व्यवहार प्रारूप की एक रूपता के उचित स्पष्टीकरण के लिए मुस्लिम मनोविज्ञान व मनोदशा के आधार, कुरान के संदर्भ में ही इस्लाम के, पक्षपातहीन, विश्लेषण की नितान्त आवश्यकता है। मुस्लिमेतर समाज में कुरान व हदीसों की शिक्षाओं के विषय में गहनतम अज्ञान के कारण अधिकतम अस्पष्टता, भ्रम व दुर्भाग्य का निर्माण हो रहा है। साथ ही मुस्लिमेतर समाज का इस्लामी धर्म ग्रन्थों एवम्‌ सिद्धान्तों का पूर्ण अज्ञान व भ्रम इस्लामी विश्व के लिए सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध हो रहा है। परम दुर्भाग्य ही है कि मुस्लिमेतर समाज कुरान व हदीसों का अध्ययन ही नहीं करता है। और उन बहुत थोड़े मुस्लिमेतर लोगों को, जिन्होंने पवित्र कुरान के पन्ने पलटने का प्रयास किया है, तथा माना है कि कुरान में उसकी आयतों की और उनकी शिक्षाओं की अन्तहीन पुनरावृत्ति का ही स्वभाव है जिससे उन्हें नीरस पन और अरुचि हो जाती है। उन्हें, गैर-मुसलमानों को, ऐसा अनुभव इसलिए होता है क्योंकि प्रत्यक्षतः वे अपेक्षा करते हैं कि हिन्दू या बौद्ध धर्म ग्रन्थों की भाँति कुरान में भी आध्यामिकता पढ़ने को मिलेगी किन्तु वैसा न होने के कारण वे निराश हो जाते हैं और पढ़ना बन्द कर देते हैं। अतः वेदान्तिक दर्शन के किसी कैसे भी आध्यात्मिक दर्शन की अपेक्षा वा पूर्वाग्रह के स्थान पर मात्र ज्ञान प्राप्ति ग्रन्थ परिचय के उद्‌देश्य से ही कुरान तथा हदीसों के पढ़ने का प्रयास करना चाहिए और जानने का प्रयत्न करना चाहिए कि एक सामान्य मुसलमान के व्यवहार में कुरान की शिक्षाओं का प्रभाव किस सीमा तक देखने को मिलता है। यदि कुरान का अध्ययन इस्लामी जिहाद को समझने के उद्‌देश्य से किया गया तो यह एक अत्यन्त उपयोगी एवम्‌ चमत्कारक प्रयास सिद्ध होगा। अतः मित्रों, भाइयों व देशवासियों! क़ुरान् को पढ़ने व समझने का प्रयास अवश्य कीजिए।

इस्लमी जिहाद

इतिहास की पुस्तकों से यह भलीभाँति स्पष्ट हो चुका है कि भारत प्रचण्ड आक्रमणों के सामने क्यों हारा? इसका प्रमुख कारण भारतीयों में युद्ध करने के गुणों एवं क्षमता की कमी नहीं थी वरन्‌ इस्लामी आक्रमणकारियों के हाथों हमारी पराजय और हजार वर्ष की हमारी लम्बी दासता का प्रमुख कारण था इस्लामी मानसिकता के विषय में हमारा घोर अज्ञान। यद्यपि पृथ्वीराज चौहान, महाराना प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह और अनेकों श्रेष्ठतम वीर पुरूष अपने-अपने समय के हमारे श्रेष्ठतम योद्धा थे। आधुनिक युग में भी गांधी, नेहरू व उन जैसे अन्य हमारे अनेकों नेताओं ने जो बुद्धि बल के तो धनी थे, किन्तु मुस्लिम मानसिकता के विषय में पूर्णतः अनभिज्ञ ही थे। परिणामस्वरूप स्थिति और भी गंभीर हो गई। इन लोगों ने पज्चशील और धर्म-निरपेक्षता जैसे निरर्थक नारे गढ़ लिए और जन साधारण को घोर विनाश् के लिए अग्रसर कर दिया। नाम मात्र भर के इन काफिर हिन्दुओं ने, जिन्हें इस्लाम व मुस्लिम मानसिकता के विषय में कोई कैसा भी ज्ञान नहीं था, और न कभी उन्होंने जानने का कभी, कोई, कैसा भी प्रयास ही किया, इन आत्मविनाशक व पूर्ण भ्रामक नारों को सच मान लिया और आचरण किया और मुसलमान, इस बज्र मूर्खता को देख, मन ही मन मुसकराते रहे। यह निबन्ध, इस्लाम के प्रमुख आधार स्तम्भ ‘जिहाद’, जिसके विषय में काफिर हिन्दुओं को पूर्ण अनभिज्ञता व भ्रम है, उसके तात्कालिक ज्ञान की अत्यन्त आवश्यकता है, का एक आलोचनात्मक किन्तु संक्षिप्त अध्ययन है।

शाब्दिक अर्थ में जिहाद का अर्थ है ‘प्रयास’। इस्लाम ने जिहाद की अवधारणा को इस्लाम ने अल्लाह के उद्‌देश्य की पूर्ति के लिए धर्म-युद्ध के रूप् में प्रस्तुत किया है। जिहाद का वास्तविक अर्थ कुरान के ही शब्दों में इस प्रकार है- उनसे युद्ध करो जो अल्लाह और कयामत के दिन में विश्वास नहीं करते; जो उस पन्थ पर नहीं चलते यानी कि उस पन्थ को स्वीकार नहीं करते जो सच का पन्थ है और जो उन लोगों का पन्थ है जिन्हें किताब (कुरान) दी गई है; (और तब तक युद्ध करो) जब तक वे उपहार न दे दें और दीन हीन न बना दिये जाएँ, पूर्णतः झुका न दिये जाएँ।

(सूरा ९ आयत २५)

मुस्लिमेतर लोगों के विरुद्ध युद्ध, इस्लामी धर्म ग्रन्थों में, ‘जिहाद’ कहा जाता है। प्रारम्भिक युग में अरब में मूर्ति पूजकों, यहूदियों और ईसाइयों के विरुद्ध जिहाद का युद्ध लड़ा जाता था। बाद में जहाँ कहीं भी इस्लाम का विस्तार हुआ, जिहाद का युद्ध लड़ा जाता था। इस्लाम के अनुसार जिहाद अल्लाह की सेवा के लिए ही लड़ा जाता है; और पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी ब्रिगेडियर एस.के. मलिक ने जैसा लिखा है कि जिहाद अल्लाह के अनुयायियों व भक्तों का सर्वाधिक आवश्यक कर्तव्य है-‘युद्ध के कुरान सम्बन्धी मापदण्ड का प्रमुख स्त्रोत यही तथ्य है कि युद्ध अल्लाह के निमित्त ही लड़ा जाता है…अल्लाह के उद्‌देश्य की पूर्ति के लिए युद्ध करने के विषय में मुसलमानों को एक धार्मिक कर्तव्य एवम्‌ दायित्व के रूप में आज्ञा है’

(कुरानिक कन्सैप्ट ऑफ वार – मलिक पृद्गठ ४४)।

कुरान कहता है-‘चाहे निहत्थे हो अथवा हथियारों से पूर्णतः युक्त हो, अग्रसर हो, अल्लाह के लिए युद्ध करो। अपनी धन सम्पत्ति से और अपने शरीर से यदि तुम समझ सको तो यही तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ है’ (सूरा ९ आयत ४१) ‘तुम्हारे लिए युद्ध करना अनिवार्य है भले ही (तुम्हें नापसन्द हो), तुम उसे न चाहो तो भी’ (सूरा २ आयत २१६)।

इस्लामी शब्द कोष में, मुहम्मद के उद्‌देश्य में जिनका विश्वास नहीं है उनके विरुद्ध धर्म युद्ध, ही जिहाद है। दैवी सन्देश् (कृतियाँ) कुरान व हदीसों में प्रतिपादित और इस्लाम के विस्तार के लिए विशेषकर बलपूर्वक आग्रह किया गया, यह (जिहाद) एक अनिवार्य धार्मिक दायित्व है। (डिक्शनरी ऑफ इस्लाम, टी. पी. हयूज पृष्ठ २४३) सूरा २ आयत १९३ में कुरान कहता है, उनके विरुद्ध तब तक युद्ध करो जब तक मूर्ति पूजा पूर्णतः समाप्त न हो जाए और अल्लाह के पन्थ की विजय सर्वत्र सम्पन्न न हो जाए।’

जिहाद का रूढ़िवादी प्रकटीकरण

पैगम्बर मुहम्मद के ठोस व्यवहारों से और अल्लाह द्वारा कुरान में प्रगटीकरण से प्रतिपादित, जिहाद की अवधारणा को अनेकों इस्लामी विद्वानों ने, सारगर्भित ग्रन्थों में, समीक्षाकर, व विस्तृत कर, उसे सामान्य बना दिया है। विगत शतियों में अनेकों देशों में इस्लाम के तलवार वाहक सैनिकों का अपने क्रम में इन सिद्धातों ने सदैव भरपूर मार्ग दर्शन किया है।

आठवीं शती के कानून को व्यवस्थित करने वाले इमाम आबू हनीफा का, विश्व भर के मुसलमान सर्वाधिक सम्मान करते हैं। भारत के मुसलमानों केलिए वह एक बहुत महत्वपूर्ण न्यायिक हस्ती हैं और उनमें से अधिकांश् उनके विचारों की शाखा (मत) को मानते हैं। शेख बुरहानुद्‌दीन अली, जो बारहवीं शती में फलीभूत थे द्वारा संग्रहीत ‘हिद्राया’ इस विचार क्षेत्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शोध प्रबन्ध है। भारत, बंग्लादेश्, व पाकिस्तान को सम्मिलित करते हुए विश्वभर के इस्लामी धर्म शास्त्र के कॉलेजों में न्याय-शास्त्र (फिकह) के पृथक-पृथक विद्यार्थियों के लिए अपने मूल अरबी भाषा में ‘हिदाया’ आज भी एक उच्च स्तरीय पुस्तक है। सर्व प्रथम ईस्ट इण्डिया कम्पनी के चार्ल्स हैमिल्टन द्वारा अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया गया था और १७९१ में लन्दन में इसका प्रकाशन किया गया था। इस बृहदाकार कृति में सभी पारम्परिक, जो इस प्रकार के भाष्यों से सम्बद्ध होते हैं, विषयों का, समावेश है।

वर्तमान सन्दर्भ में हमारा सम्बन्ध इसकी पुस्तक संखया ९ ‘दी इन्सटीट्‌यूट्‌स’ से है। अनुवादक कहता है ‘इस पुस्तक में समाविष्ट एक प्रमुख अंग है, जिसे मुहम्मद के राजनैतिक अध्यादेश् कहना न्यायोचित होगा। वह ऐतिहासिक और कानूनी दोनों ही दृष्टियों से उपयोगी है।’

यहाँ इस निबन्ध में पुस्तक संखया ९ के कुछ अध्यायों को, जिहाद का स्वभाव स्पष्ट करने के लिए, संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है।

स्थायी युद्ध की अवधारणा

अध्याय १ परिचय कराता है कि, जिहाद एक दैवी आदेश् के रूप् में स्थापित है; अल्लाह के शब्दों में, जिसने कुरान में कहा है- ‘जब कभी तुम्हें मिलें मूर्ति-पूजकों का वध कर दो, उन्हें पकड़ लो, घेर लो, रोक लो, हर स्थान पर उनकी घात में, खोज में प्रतीक्षा करो’ (सूरा ९ आयत ५) और भी, ‘उनसे युद्ध करो जब तक मूर्ति पूजा पूर्णतः समाप्त न हो जाए और अल्लाह के पंथ की पूर्ण व अन्तिम विजय न हो जाए’ (सूरा ८ आयत ३९)।

प्रथम अध्याय के अन्त में निष्कर्ष के रूप में आगे कहा है, ‘अनेकों पवित्र लेखों से जैसा प्रगट होता है जिन्हें सामान्यतया इसी प्रभाव के रूप में समझा जाता है, कि भले ही वे आक्रमणकर्ता न हों गैर-मुसलमानों का तलवार द्वारा वध आवश्यक हो जाता है।’ इस विषय में कुरान का आदेश इस प्रकार है- ‘विश्वासियो! अपने निकट बसने वाले गैर-मुसलमानों से युद्ध करो। तुम उनके साथ कठोर बनो’ (सूरा ९ आयत १२३)

युद्ध करने की विधि

दूसरे अध्याय में ‘युद्ध की विधि’ का वर्णन किया गया है। सिद्धांत में, ‘गैर-मुसलमानों’ को इस्लाम स्वीकार कर लेने और ज़िज़िया देना स्वीकार कर लेने के आग्रह के पूर्व ‘गैर-मुसलमानों’ के क्षेत्रों को विजय करने के लिए मुसलमानों को आक्रमण नहीं करना चाहिए। अन्य किसी कारण के वशीभूत नहीं वरन्‌ उनमे मात्र मुसलमान न होने के कारण ही उन पर आक्रमण किया जा रहा है। ”गैर-मुसलमानों” को ऐसी सूचना आक्रमण के पूर्व दे देनी चाहिए। यदि ”गैर-मुसलमान” मुसलमान धर्म या ‘जजिया’ देना स्वीकार कर लेते हैं तो युद्ध स्वतः ही समाप्त हो जाता है। इस संदर्भ में कुरान का आदेश है-

‘गैर-मुसलमानों को बता दो कि यदि वे अपने ढंग बदल देते हैं यानि कि इतिहास स्वीकार कर लेते हैं तो उनके भूतकालीन अपराध क्षमा कर दिये जाएँगे; किन्तु यदि वे पाप करने में लिप्त रहे आने की जिद्‌द करते हैं यानि कि मूर्ति पूजा करते रहते हैं तो, उन्हें उनके पूर्व पुरुषों के भाग्य (मृत्यु) का सामना करने दो यानि कि उन्हें मार दो।’

(सूरा ८ आयत ३८)

किन्तु व्यवहार में मुसलमान ‘अविश्वासियों’ के विरुद्ध आकस्मिक आक्रमण कर सकते हैं, उनका वध कर सकते हैं, उनकी सम्पत्ति लूट सकते हैं। उदाहरणार्थ, नाकी शहीद में जैसा लिखा है, स्वयं पैगम्बर ने मूशलिक के कबीले को आकस्मिक रूप में बिना सूचना दिये लूट लिया था और नष्ट कर दिया था; और कोबना पर निर्धारित तिथि से पूर्व आक्रमण करने और आग लगा देने को वह असमा के साथ सहमत भी हो गया था। इस विश्वासघात या सिद्धांत विरोध की आलोचना नहीं की जा सकती क्योंकि ” जिस काम से या जिस मार्ग से इस्लाम की रक्षा होती है, उसके विरुद्ध गैर-मुसलमानों को कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं है।’

महिलाओं और बच्चों का वध

सिद्धान्ततः ‘गैर-मुसलमान’ की महिलाओं और छोटे-छोटे बच्चों का वध नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई मुसलमान कत्ल (वध) कर भी देता है। तो कोई पाप नहीं है। वह किसी कैसी भी सजा या आर्थिक दण्ड का भागी नहीं होता। महत्व की बात यह है कि ”गैर-मुसलमानों” की महिलाओं और उनके बच्चों के वध की मनाही किसी कैसी भी दया भावना के कारण नहीं है वरन्‌ वे लूट के माल के प्रमुख अंग हैं जिससे मुजाहिदीन (इस्लामी योद्धा) को वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

सम्पूर्ण युद्ध

यदि ”गैर-मुसलमान” इस्लाम स्वीकार नहीं करते या जिजिया (प्रति व्यक्ति टैक्स) देना अस्वीकार कर देते हैं तो मुसलमान युद्ध के लिए आवश्यक सभी साधनों (अस्त्र-शस्त्र) से उन पर आक्रमण कर दें, उनके आवासों और मन्दिरों में आग लगा दें, उनके बाग बगीचों को तोड़ डालें, और उनके खेत व खतिहानों को रोंद डालें।’ ये सभी मार्ग विधि संगत हैं क्योंकि इनसे ”गैर-मुसलमान” दुर्बल (असहाय) हो जाते है; उनकी सहनशक्ति समाप्त हो जाती है, और उनके साधन समाप्त हो जाते हैं। इस विषय के कुरान के आदेश इस प्रकार हैं- ‘मैं ”गैर-मुसलमानों” के हदयों में भय भर दूँगा, उसके सिर तोड़ दूँगा, और उनके अंगों को काट दूँगा।’ (सूरा ८ आयत १२)

एक पुत्र पिता का वध कर सकता है

पिता का वध करना एक मुसलमान के लिए वर्जित है। किन्तु यदि पिता ”गैर-मुसलमान” है, तो ‘पुत्र को उस पर तब तक ध्यान रखना चाहिए, उसकी चौकसी करनी चाहिए, जब तक कोई दूसरा आकर उसका वध नहीं कर देता।’ इस संदर्भ में कुरान का आदेश है, ‘मुसलमानों यदि तुम्हारे पिता या भाई विश्वास’ की अपेक्षा ‘अविश्वास’ का अनुसरण करना पसन्द करें तो उन्हें मित्र मत समझो। वे ही पापी हैं, जो उनसे मित्रता करते हैं।’

(सूरा ९ आयत २३)

शान्ति स्थापना की रणनीतियाँ

अध्याय तीन में शांति स्थापना की रणनीतियों का वर्णन है। यदि इमाम (जिहाद का नेता) को लगे कि ”गैर-मुसलमानों” के साथ शांति करना मुसलमानों के हित में है तो उसे शांति के लिए सहमत हो जाना चाहिए जैसा कि पैगम्बर ने ‘मक्का के गैर-मुसलमानों’ के साथ किया था। किन्तु यदि शांति करना मुसलमानों के हित में नहीं है, तो शांति करना विधि संगत नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्षतः व्यवहार में शांति की बात युद्ध से पीछे हट जाने के बराबर होगी। ”गैर-मुसलमानों” के साथ जब यह मुसलमानों के हित में हो तभी केवल अस्थाई शांति कर लेने की स्थिति को छोड़कर कभी भी ‘मुसलमानों’ को अविश्वासियों के साथ न तो मित्रता करना चाहिए न शांति करनी चाहिए। इस सन्दर्भ में कुरान का आदेश है- ‘मुसलमानों को मुसलमान पर वरीयता देते हुए गैर-मुसलमानों को मित्र नहीं बनाना चाहिए; जो ऐसा करता है उसे अल्लाह से आत्म रक्षा के सिवाय कुछ भी आशा नहीं रखनी चाहिए।’

(सूरा ३ आयत ११८)

यदि सन्धि को तोड़ देना मुसलमानों के सर्वाधिक हित में हो तो गैर-मुसलमानों के साथ एक निश्चत अवधि वाली सन्धि को भी इमाम तोड़ सकता है। मुसलमानों के लिए अनुकूल अवसर आ जाने पर भी स्वीकृत शांति की संधि को चलाये रखना और न तोड़ने का अर्थ ‘युद्ध विसर्जित कर देना होता है’ और युद्ध करना अल्लाह का एक आदेश है, उसे त्याग देना, भुला देना, अपराध है। यदि मुसलमानों को निष्कासन का सामना करना पड़े तो ”गैर-मुसलमानों” के साथ शांति कर लेना तब तक के लिए विधि संगत है, जब तक कि मुसलमान उन्हें हरा दने और विनष्ट कर देने के लिए पर्याप्त मात्रा में शक्ति सम्पन्न न हो जाएँ।

लूट के माल का बँटवारा

हिदाया का चौथा लूट और लूट के माल के बंटवारे से सम्बन्धित है। यदि ”गैर-मुसलमानों” के देश को आयुधों की शक्ति से जीता गया है तो इमाम मुजाहिदों के मध्य लूट के माल का उसी प्रकार बटवारा कर सकता है जिस प्रकार पैगम्बर ने अपने अनुयायियों के मध्य खीबीर को बाँटा था। लूट के माल का १/५ भाग इमाम अपने पास रख सकता है शेष मुजाहिदों को बाँट दे जैसा कि पैगम्बर स्वयं किया करता था। यदि किसी ने ”गैर-मुसलमानों” के वध में कोई विशेष वीरता या लगन प्रदर्शन् किया है तो उसे उसके लूट के सामान्य भाग के अतिरिक्त कुछ पुरस्कार भी दिया जाना चाहिए। इमाम शफी का मानना था कि ‘वध हुए व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्तियों का वधकर्ता ही अधिकारी है।’ उसने पैगम्बर के वचनों को उद्धत किया जिसने कहा था कि ‘जो कोई भी ”गैर-मुसलमानों” का वध करता है वह ही उसकी सम्पत्ति का अधिकारीहै।’

इस संदर्भ में यहाँ यह कह देना उचित ही होगा ”गैर-मुसलमानों” की महिलायें और बच्चे लूट के माल में ही सम्मिलित रहते थे।

युद्ध बन्दियों के साथ इस्लामी व्यवहार

युद्ध में पकड़े गये ”गैर-मुसलमानों” के प्रति, इमाम तीन प्रकार व्यवहार कर सकता है। प्रथम विकल्प के अनुसार उन्हें वध कर या करा सकता है क्योंकि स्वयं पैगम्बर युद्ध बन्दियों को वध कर दिया करता था। वह इसलिए भी कि ऐसा करने से शैतानीपन सदैव के लिए समाप्त हो जाती है। इस सम्बन्ध में कुरान कहता है- ‘किसी पैगम्बर के लिए आवश्यक नहीं कि, युद्ध बन्दियों को, जब तक उनका वध न हो जाए, रखे रहे। (सूरा ८ आयत ६७) यह धार्मिक कारण की प्रेरणा ही थी कि १९९९ के कारगिल युद्ध के मध्य भारतीय भूमि पर वायुसेना के स्क्वैड्रन लीडर अजय आहूजा, लैफ्टिनैण्ट सौरभ कालिया और छः अन्य भारतीय सैनिकों को जो पाकिस्तानी सेना के हाथों युद्ध बन्दी थे, पाकिस्तानी सेना ने पूर्ण निर्ममता एवम्‌ बर्बरतापूर्वक अंगच्छेदन किया, टुकड़े-टुकड़े कर वध कर दिया। इमाम दूसरे विकलप के अनुसार युद्ध बन्दियों को दास बनाकर बेच सकता है ताकि उनके पाप की दवा हो जाए; साथ ही मुसलमान उनसे सेवा के रूप में लाभ कमा सकें। तीसरे उन्हें जिम्मी यानि कि दास बनाया जा सकता हैं। किन्तु ”गैर-मुसलमानों” और पंथ को त्याग देने वालों को मुक्ति दे देना पूर्णतः वर्जित है। यदि युद्ध बन्दी इस्लाम स्वीकार कर लें, तो उन्हें वध नहीं किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में यह ध्यान रखना चाहिए कि इस्लामी सिद्धांतों और परम्पराओं के अनुसार केवल शत्रु पक्ष के सैनिक ही नहीं वरन्‌ युद्ध से बाहर रहने वाले असैनिकों, महिलाओं और बच्चों, सभी को, युद्ध बन्दी के रूप में गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए।

इतिहास के पृष्ठों से युद्ध बन्दियों के प्रति इस्लामी दुर्व्यव्हार के अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं किन्तु सबसे अधिकृत तो वह हैं जिन्हें स्वयं पैगम्बर मुहम्मद ने प्रदर्शित किया, एवं व्यवहत किया। उत्तेजक उदाहरणों में से एक है ‘बैन कुरेजिया’ नामक यहूदी कबीले की अल्लाह के आदेश के अन्तर्गत मुहम्मद और उसके मुजाहिदों द्वारा गिरफ्तारी का उदाहरणः ‘इनके सशक्त क्षेत्रों से इन्हें पकड़ लो और इनके हदयों में भय व आतंक भर दो; ताकि इनमें से कुछ का वध कर दो और कुछ को दास बना लो। और अल्लाह ने तुम्हें उनकी सम्पत्तियों और घोड़ों का और वस्तुओं का स्वामी बना दिया।’

(सूरा ३३ आयत २६-२७पवित्र कुरान)

इस दैवी आदेश के पालन में कुरेजिया किस्म के कबीले के सभी आठ सौ यहूदी युद्ध बन्दियों से बलात उनकी कब्रें खुदवाईं गईं और एक-एक कर उनके सिर काटे गये। यह सारी कहानी मुहम्मद के जीवनी लेखक इब्न इशाक, ताबारी और मीरखण्ड द्वारा वर्णन की गई है। कत्ले आम सम्पन्न हो जाने के बाद मुहम्मद ने एक सुन्दर यहूदी महिला रेहाना, जिसके पिता, भाई और पति का उसकी आँखों के ही सामने वध किया गया था, से शादी का का प्रस्ताव रखा। चूंकि रेहाना ने पैगम्बर मुहम्मद से शादी करने से मना कर दिया उसे बलात्‌ अनेकों रखैलों में से एक रखैल बना दिया गया। बैन कुरैजिया महिलाओं में से अनेकों को मुजाहिदों में बाँट दिया गया, शेष को बेच दिया गया।

मुजाहिद का पारितोषिक

धार्मिक आदेशों के अतिरिक्त इन्द्रिय तुष्टि एक बहुत बड़ा प्रोत्साहन है जिसके कारण एक मुजाहिद ‘जिहाद’ में लिप्त होने के लिए प्रेरित होता है। युद्ध के संकटों में बचता है अथवा नहीं, अल्लाह ने मुजाहिद को नरसंहार में भाग लेने के लिए अनगिनत इन्द्रियसुखों का पुरस्कार घोषित कर रखा है। यदि वह मर जाता है तो उसकी काम लिप्सा पूर्ति के लिए अनन्त यौवना, बड़े और गोल उरोजों वाली कम उम्र वाली बहत्तर हूरियाँ और अट्‌ठाईस जवान सुन्दर लौण्डे जन्नत में उसे मिलेंगे, उसकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

पवित्र कुरान प्रतिज्ञा करता है कि ‘निश्चय ही (ईश्वर) अल्लाह से डरने वालों ‘विश्वासियों’ के लिए एक अति सुरक्षित स्थान (जन्नत) जहाँ बगीचे होंगे, अंगूरों का बाग होगा, उठे हुए उरोजों वाली हूरें होंगी, उनकी प्रतीक्षा में है।’ (सूरा ७८ आयत ३०)। और यदि वह बच जाता है तो लूट के माल में एक भाग, जिसमें ”गैर-मुसलमानों” की महिलायें सम्मिलित हैं, मिलेगा। लैंगिक अपराधों यथा कुमारी सम्भोग, व्यभिचार आदि के लिए कुरान कोड़ों से मारना, और पत्थर मारकर वध का दण्ड नियमित करता है क्योंकि वह ऐसे कामों को, जो वैवाहिक जीवन के प्रसंग में हों, विधि विरुद्ध व अपराधपूर्ण मानता है, किन्तु जब मुसलमान ”गैर-मुसलमानों” के वध व उनकी सम्पत्ति की लूट- ‘अल्लाह के काम के लिए युद्ध करता है’, तो पवित्र कुरान इस नियम में अपवाद कर देता है।

औटास के युद्ध में मुसलमानों ने कुछ महिलाओं को उनके पतियों के साथ गिरफ्तार कर लिया था। पूर्व काल में यद्यपि ”गैर-मुसलमानों”, की विवाहिता महिला के साथ सम्भोग करना एक मुसलमानके लिए वर्जित था; इस अवसर पर पैगम्बर ने प्रगट किया कि अल्लाह ने इस प्रतिबन्ध को ढीला कर दिया था और आज्ञा दे दी थी कि युद्ध के समय यदि कोई ऐसी महिला एक सैनिक के लूट के माल के रूप में उसके भाग में आती थी, तो वह उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति हो जाती थी और वह उसके साथ सम्भोग कर सकता था।

(हदीस : शाही तिरमिज़ खंड १, पृष्ठ ४१७)

पुनः इन्द्रिय सुख के अतिरिक्त जिहाद के लिए दूसरा प्रोत्साहन है, लूट का माल। यही कारण है कि पवित्र कुरान, लूट के माल को उचित ठहराता है। ‘जो कुछ तुम्हें लूट में मिलता है खाओ, उपभोग करो। वह सब वैध और अच्छा है।

(सूरा ८ आयत ७०)

जिहाद सदैव के लिए यानी कि अन्तहीन

हमारे समय के, इस्लामी धर्म व इतिहास के एक गण्य मान्य विद्वान, अनवर शेख कहते हैं कि, ‘अरब शक्ति एवम्‌ सामर्थ्य के विस्तार, और इस्लामी धर्म के पहले, अरब में, और बाद में, विश्व भर, में (फैलाव) प्रसार के निमित्त ही ”जिहाद” का प्रारम्भ हुआ था। मुहम्मद जानता था कि जब तक उसके लोगों को गैर-मुसलमानों के विरुद्ध उनकी व्यक्तिगत सम्पत्तियों के और उनकी महिलाओं के अपहरण, उनके देशों की विजय और उन्हें दास बनाने के लिए एक प्रभावशाली संघर्षशील, शक्ति सम्पन्न सामर्थ्य के रूप् में नहीं ढाल दिया जाता तब तक वे विश्व को जीत नहीं सकेंगे, उस पर शासन नहीं कर सकेंगे और अरब का प्रभुत्व नहीं हो सकेगा…। चूंकि जिहाद गैर-मुसलमानों के विरुद्ध होता है पैगम्बर के युद्ध के लिए, दूसरे धर्मों को झूठा व अल्लाह के विरुद्ध घोषित कर, असीमित अवसर निर्माण कर दिये हैं।’

(‘इस्लाम’ अनवर शेख पृष्ठ ४२, ४९, ५१)

इस्लाम एक ऐसा मत है जिसने सारी मानवता को दो स्थाई, प्रतिद्वन्दी एवं विरोधी वर्गों में बाँट दिया है। प्रथम वे जो अल्लाह और पैगम्बर में विश्वास रखते हैं, उन्हें (मुसलमान) अल्लाह का दल या मौमिन कहा जाता है, दूसरे वे हैं जिन्हें ”गैर-मुसलमान” कहा जाता है। (सूरा ५८ आयत २०)। प्रथम वर्ग का पवित्रतम कर्तव्य है कि वह ”गैर-मुसलमानों” का वध कर दें और उन्हें दास बना लें। कुरान कहता है, ‘हे मूर्ति पूजको! हम तुम्हें त्यागते हैं-हमारे और तुम्हारे मध्य घृणा और शत्रुता बनी रहेगी (सूरा ६० आयत ४)’ और ‘हे पैगम्बर! ”गैर-मुसलमानों” व ढोंगियों से युद्ध करो, उनसे कठोरता का व्यवहार करो। नर्क उनका घर होगा और विनाश उनका भाग्य’

(सूरा ६६ आयत ९)।

जिहाद का उद्‌देश्य परम आवश्यक है,इतना आवश्यक है कि इस्लाम अपने अनुयायियों को ”गैर-मुसलमानों” के वध, उनकी सम्पत्ति को लूटने और उनकी महिलाओं के अपहरण, शील भंग, आदि अपराधों के लिए खुला प्रोत्साहन एवम्‌ अनुमति ही नहीं देता है वरन्‌ इन जघन्य अमानवीय कृत्यों को सर्वश्रेष्ठ गुण भी प्रतिपादित करता है। इस्लाम इसे ‘जिहाद’ कहता है जिससे मुजाहिद को निश्चयात्मक रूप में मुक्ति यानी ‘जन्नत’ प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार, किसी के तथाकथित ”गैर-मुसलमानों” होने के आरोपित कारण से ही इस्लाम में मुजाहिद के लिए आवश्यक हो जाता हे कि एक मुजाहिद उनका वध कर दे, उनकी सम्पत्ति लूट ले, उनकी महिलाओं को भगाले और उनका शील भंग करे और उनके बच्चों को दास बना ले।

अल्लाह ने पहले से ही मानवता को दो भागों में बाँट रखा है पहले ‘विश्वासी’ और दूसरे ‘अविश्वासी’। और उन दोनों में युद्ध की दशा में कोई निश्चित निर्धारित नियम या मर्यादा नहीं है। अल्लाह के युद्ध में कुछ भी हो सकता है और युद्ध में कौन जीतता है महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि अन्ततः युद्ध में अल्लाह का दल ही जीतेगा। ये ही वे लोग हैं जो जन्नत में औरतों का उपभोग करेंगे, आनन्द लेंगे; और उनके विरोधी निश्चय् ही नर्क की आग में जलेंगे। गैर-मुसलमानों को समाप्त कर देने के लिए ‘जिहाद’ अल्लाह का आदेद्गा ही है। सूर्य के तले मुसलमानों के लिए ‘जिहाद’ एक धार्मिक कर्तव्य है जिसके अभाव में इस्लाम का अस्तित्व ही नहीं है।

भारत में इस्लामी जिहाद के ऐतिहासिक प्रमाण

अपनी विश्व विखयात पुस्तक, ‘दी स्टोरी ऑफ सिविलिजे़शन’ में बिल डयूरैण्ट लिखते हैं, ‘इतिहास में इस्लाम द्वारा भारत की विजय के इतिहास की कहानी सम्भवतः सर्वाधिक रक्त रंजित है। यह एक अति निराशाजनक कहानी है क्योंकि इसका प्रत्यक्ष आदर्श् यही है कि सभ्यता जो इतनी बहुमूल्य व महान है, जिसमें, स्वतंत्रता, संस्कृति एवम्‌ शांति का इतना कोमल मिश्रण है, कि उसे कोई भी बर्बर, विदेशी, आक्रमणकर्ता, अथवा भीतर ही पनप या बढ़ जाने वलो आतताई, किसी भी क्षण नष्ट भ्रष्ट व समाप्त कर सकते हैं।

भारत में इस्लामी विध्वंस के विषय में एक ऐसा ही चित्र स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में भी देखा जा सकता है- ‘उनके ही अपने ऐतिहासिक लेखों के अनुसार जब पहली बार मुसलमान भारत आये तो भारत में हिन्दुओं की जनसंखया साठ करोड़ थी। इस कथन में न्यून वर्णन का दोष हो सकता है किन्तु अतिश्योक्ति का नहीं; क्योंकि मुसलमानों के अत्याचारों के कारण असंखयों हिन्दुओं का वध हो गया था।…किन्तु वे हिन्दू अब आज घटकर बीस करोड़ रह गये हैं

(कम्पलीट वर्क्स, खण्ड पृष्ठ २३३)

विश्वभर के मुस्लिम शासन, उनके ही समय के, उनके ही मुस्लिम इतिहास लेखकों के रक्तरंजित विवरण, आतंकवाद, अत्याचार, बर्बरता, वध और अंग-भंग के अनुपम कीर्तिमानों वाले हैं। इस्लामी धर्म व्यवस्था और परम्परा में सभी मुस्लिमेतर समाजों के प्रति, हदय दावक, भयानकतम, यातनाएँ, उनकी सम्पत्तियों की लूट, उनकी महिलाओं को भगा लेने व शीलभंग, उनके पूजा स्थलों के विनाश, को प्रत्येक मुसलमान का परम पवित्र कर्म व दायित्व माना गया है। इस प्रकार की हिंसा के कृत्य, अमानवीय, यंत्रणायें, और बर्बरता को स्वयं कुरान ने प्रोत्साहित किया है;

‘अल्लाह ने देव दूतों के समक्ष यह कहकर अपनी इच्छा प्रगट की, ‘मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, मुसलमानों को साहस दो। उनकी हिम्मत बढ़ाओ मैं गैर मुसलमानों के हदयों में भय भर दूँगा। उनके सिरों को तोड़ दो, उनके एक-एक अंग को भंग कर दो।

‘ (सूरा ८ आयत १२)

विश्व विखयात इतिहासकार श्री जदुनाथ सरकार ने अपने प्रसिद्ध उच्चतम कोटि के शोध ग्रंथ, ‘ए शौर्ट हिस्टरी ऑफ औरंगजेब’ में लिखा है, ‘एक धर्म, (इस्लाम) जिसके अनुयायियों को लूट, और वध वा हत्या को धार्मिक कर्तव्य सिखाया (बताया) जाता हो मानव विकास के साथ, सहगामी नहीं हो सकता।’ (तृतीय आवृति खण्ड ३ पृष्ठ १६८) इसी पुस्तक में आगे कहा है, ‘मुस्लिम राज्यव्यवस्था ने विश्वासियों का एक ऐसा वर्ग बनाया जिसका युद्ध के अतिरिक्त अन्य कोई काम ही नहीं है…युद्ध ही एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें उनकी स्वाभाविक प्रवृति है। उनके लिए शान्ति बेरोजगारी और पतन है।’

(वही पुस्तक पृष्ठ १६९)

तीन फर्बरी उन्नीस सौ में कैलिफोर्नियाँ के शेक्सपीयर क्लब में स्वामी विवेकानन्द ने, अपने प्रखयात प्रवचन में सम्पूर्ण मुस्लिम समाज का एक उपयुक्त वर्णन किया था। उन्होंने कहा था, ‘मुसलमान सर्वाधिक असभ्य, बर्बर और घोर पन्थवादी हैं। उनका आदर्श वाक्य है- अल्लाह एक है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’ इसके परे जो कुछ भी है वह केवल बुरा ही नहीं है उसे तुरन्त नष्ट कर दिया जाना चाहिए; एक क्षण की भी सूचना दिये बिना उन सभी मनुष्यों और स्त्रियों को जो उसमें एकदम वैसा ही विश्वास नहीं करते, हर हालत में मार देना चाहिए; प्रत्येक पुस्तक जो उससे भिन्न शिक्षा देती है,जला दी जानी चाहिए, पैसिफिक से लेकर अटलाण्टिक तक पूरे पाँच सौ वर्षों तक सारे विश्व में रक्तपात होता रहा। यह है मौहम्मदवाद।

(कम्पलीट वर्क्स, खण्ड ४ पृष्ठ १२६)।

इतिहासज्ञ कोनार्ड ऐल्स्ट ने अपनी प्रखयात पुस्तक ‘निगेशनिज्म इन इण्डिया’ के पृष्ठ ३३-३४ पर लिखा है, ‘बलात मुस्लिम विजयें हिन्दुओं के लिए सोलहवीं शती तक जीवन मरण के संघर्ष का ही प्रश्न बनी रही। सम्पूर्ण शहर जला दिये गये थे, सम्पूर्ण जनसंखया का वध कर दिया गया था। प्रत्येक आक्रामक संघर्ष में हजारों का वध कर दिया जाता था, और उतनी ही संखया को बन्दी बना देश् से बाहर निकाल दिया जाता था। प्रत्येक आक्रान्ता द्वारा वध किये हुए हिन्दुओं के सिरों के वस्तुतः पहाड़ खड़े किये जाते थे। एक हजार ईसवी में अफ़गानिस्तान की बलात विजय के बाद वहाँ हिन्दुओं का वध कर पूर्ण सफ़ाया कर दिया गया था; उस स्थान को अभी भी हिन्दू कुश यानी कि ‘हिन्दुओं के कत्लेआम का स्थान’ कहा जाता है।

अतः मुस्लिम शासन, भारत के इतिहास में सर्वाधिक रक्तरंजित काल रहा है जिसमें मानवता पूर्णतः लुप्त थी। सारे विश्व भर में कहीं भी कभी भी मानवता ने जो यातनायें सही हैं उनमें सर्वाधिक यातनाएँ भारत में केवल हिन्दुओं ने ही सहीं हैं। सम्पूर्ण मानव जाति को सभ्यता की प्रथम किरण दिखाने वाले समाज के जीवन के लिए इस्लाम ने नितान्त अन्धकार, अशान्ति व यातनायें दीं।

जब से श्री मोहनदास कर्मचन्द गाँधी और उसके चाटुकार जवाहरलाल नेहरु भारत के क्षितिज पर आये, राजनीतिज्ञों और मार्क्सिस्ट जाति के इतिहासकारों ने इस्लाम के तेजाब जैसे तीखे शासनकाल को पवित्र, समझदारी भरा बना दिया है। सभी शैक्षणिक पाठ्‌य पुस्तकों एवम्‌ सन्दर्भ पुस्तकों से जिहाद की सारी बर्बरता भरी घटनाओं को निकाल दिया और दबा दिया गया है। हमारे इतिहास के विकृतीकरण या पंथनिरपेक्षीकरण के उन अनेकों उदाहरणों में से एक है पद्गिचम बंगाल की वामपन्थी सरकार के शिक्षा विभाग का आदेश सूचना संखया ऐस वाई ऐल/८९/;दिनांक २८.४.१९८९ है जो इस प्रकार का सन्देश देता है-

‘मुस्लिम शासन की कोई कैसी भी आलोचना का समावेश् नहीं होना चाहिए। मुस्लिम आक्रान्ताओं और शासकों द्वारा मन्दिरों के तोड़े जाने का वर्णन समाविष्ट नहीं किया जाना चाहिए।’

जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के अन्तः वासी लोगों ने केवल मार्क्सिस्टों की स्वभावगत विशिष्टता-प्रोत्साहित ढोंग-भरे उत्साह के अन्तर्गत उपनिवेशकाल से पूर्व, यानि कि मुस्लिम शासनकाल में ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ और ‘मिश्रित संस्कृति’ के झूठ को अमर वा स्थाई बनाने का भरसक प्रयास किया है। रोमिला थापर, बिपिन चन्द्र, इरफान हबीब प्रभृति लोगों, ने, जो आई.सी.एच. आर. (इतिहास सम्बन्धी खोज़ की भारतीय काउन्सिल) की आरामदायक शैक्षणिक पदवियों पर अभी हाल तक विराजित थे, नेहरू वंशीय वा परम्परा वाले राजनीतिज्ञों को प्रसन्न करने के लिए क्या नहीं किया? इन लोगों ने, अनेकों आतताई, बर्बर, पथभृष्ट शासकों को वास्तव में पन्थ निरपेक्ष व उदार, सम्भवतः हिन्दू राजाओं से भी अधिक परोपकारी व समतावादी घोषित कर दिया है। भारतीय इतिहास के प्रवर, डॉ. रमेद्गा चन्द मजूमदार ने, इतिहास के इस जानबूझकर और राजनीति प्रेरित ढंग से विकृतीकरण के सन्दर्भ में उच्च स्वर में कहा;

‘यह बड़े दुःख की बात है कि राजनीतिक उद्‌देश्यों की पूर्ति के लिए इतिहास का विकृतीकरण मात्र राजनीतिज्ञों तक ही सीमित नहीं रह गया है वरन्‌ यह दोष पेशेवर इतिहासज्ञों में भी व्याप्त हो गया है’…भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्वावधान में लिखित इतिहास में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा हिन्दू मन्दिरों के ध्वंस को झुठलाने का प्रयास किया गया और बल देकर कहा गया कि मुस्लिम शासक धर्म के मामलों में बड़े सहिष्णु थे।’

(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इण्डियन पीपुल, खण्ड पृष्ठ १२, १३, बी.वी.बी.)

एक बार श्री सीताराम गोयल ने कहा-‘जिन हिन्दुओं ने मुस्लिम काल में इस्लामी आतंक के आघात सहे उन्होंने कोई इतिहास नहीं लिखा कि उनके साथ क्या हुआ, उन्हें क्या कुछ सहना पड़ा। यह तो मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासज्ञ ही थे जिन्होंने पूर्णता व जागरूकता के साथ और बड़ी प्रसन्नता के साथ ‘गाजियों’ द्वारा ‘काफिरों’ के साथ बार-बार क्या किया गया सम्बन्धी, सभी प्रलेखों को सम्हाल कर रखा है।’

भारत में इस्लामी जिहाद का यह संक्षिप्त इतिहास, सुल्तानों और बादशाहों के दरबारी इतिहासज्ञों द्वारा फारसी और अरबी में लिखित मूल लेखों-प्राथमिक स्त्रोत-से ही उद्धत है। कुछ विषयों में विश्व में जाने माने प्रखयात आधुनिक इतिहासज्ञों, जिनकी अधिकृतता और निश्छलता विश्व विखयात है, के संदर्भ भी लिए गये हैं। इस प्रयास का प्रमुख उद्‌देश्य मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं को दी गईं असंखय यातनाओं में से कम से कम कुछ को जिन्हें इतिहासज्ञों ने जान बूझकर दबा दिया है, शोध द्वारा निकाल लिया जाए, ज्ञात कर लिया जाए और इस प्रकार पूरी तरह अन्धेरे, अज्ञान, और उपेक्षा में लिप्त हिन्दुओं को कुछ तो बता दिया जाए कि उनके पूर्वजों का कैसा दुर्भाग्य था; ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के विषय में कुछ चिन्ता करने लगें। इस पुस्तक में कुछ सीमित मात्रा में ही उन प्रसिद्ध/अप्रसिद्ध मुस्लिम शासकों, व आक्रमणकर्ताओं के बर्बर क्रियाकलापों के प्रलेखों का वर्णन है। यह प्रयास अपने आप में समुद्र की एक बूंद के ही समान है।