Tags

, , , ,


जिहाद इस्लाम का केन्द्र बिन्दु है। जिहाद के बिना इस्लाम का कोई अस्तित्व नहीं है या यह कहना/ज्यादा उचित है कि जिहाद ही इस्लाम है और इस्लाम ही जिहाद है। जिहाद से विश्व भर के गैर-मुसलमान सबसे अधिक प्रभावित हैं। इसलिए गैर-मुसलमानों के सन्दर्भ में जिहाद के सही स्वरूप को समझना बहुत आवश्यक है।

पिछले कुछ वर्षों में इस्लाम के कट्‌टर-पंथियों ने जिहाद के नाम पर इस्लामी और गैर-इस्लामी सभी प्रकार के देशों पर बम विस्फोटों से अनेक फ़ियादीन हमले किए जिनमें हजारों निरपराध लोग मारे गए। इस धर्म-प्रेरित आतंकवाद की निष्पक्ष लोगों ने बड़े कड़े शब्दों में भर्त्सना की। साथ ही उत्सुकतावश पूछा कि क्या निपराध लोगों की हत्या करना ही इस्लाम है? दूसरी ओर मुसलमानों का कहना है कि इस्लाम तो शान्ति का मज़हब है। इसका आतंकवाद से कुछ लेना-देना नहीं है। पर साथ ही कहते हैं कि ‘अल्लाह के लिए जिहाद करना’ प्रत्येक मुसलमान का एक अनिवार्य धार्मिक कर्त्तव्य है। यह अल्लाह के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। परन्तु फिर जिहाद को भी इस्लाम के पाँच प्रमुख स्तम्भों-‘एक परमेश्वर अल्लाह, माज़, रोज़ा, हज्ज और ज़कात’ में शामिल नहीं किया गया है। आखिर क्यों ?

इस रहस्यमय प्रश्न के अनेक पहलू हैं जैसे-जिहाद किससे, क्यों, कब, कैसे, कहाँ, कब तक आदि ? आज सारा विश्व इस्लामी जिहाद से पीड़ित है। अतः इन प्रश्नों को इस्लामी धर्म शास्त्रों के आधार पर समझना अत्यन्त आवश्यक है। हम यहाँ इन प्रश्नों की, विशेषकर गैर-मुसलमानों के सन्दर्भ में, इस्लामी धर्मशस्त्रों, कुरान, हदीसों एवं विधि शास्त्रों, शब्दकोशें, विश्वज्ञानकोशों, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम इस्लाम के विद्वानों, इस्लाम के इतिहास आदि के आधार पर जिहाद के शाब्दिक और व्यवहारिक अर्थ की समीक्षा करेगें और इसके उद्‌देश्यों को समझने का प्रयास करेंगे।

अनेक मुस्लिम विद्वानों ने समय-समय पर यह असंदिग्ध घोषणा की है कि ‘इस्लाम’ शांति, प्रेम एंव भाईचारे का मजहब है, किन्तु विगत दो शताब्दियों से सारा विश्व इस्लामिक जिहाद से त्रस्त है। विशेषकर विश्व के गैर इस्लामिक देश-अमेरिका, यूरोप के देश, इजरायल और भारत आदि इस्लामिक जिहादी आंतकवाद का कहर झेल रहे हैं। इन देशों में भारत शीर्ष पर है। विगत 26 नवंबर, 2008 को भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पाक से निर्यातित जिहादी आतंकवाद के निशाने पा आ गयी थी जहाँ करांची से समुद्री रास्ते से चलकर मुंबई तट पर उतरे दस आतंकवादियों ने रेलवे स्टेशन सहित सभी भीड़-भाड़ वाले इलाकों में अंधाधुंध गोलाबारी एंव विस्फोट करके लगभग 180 निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया और लगातार तीन दिनों तक पांच सितारा होटल ताज, ओबराय आदि पर कब्जा जमाये रखा जहाँ भारतीय सुरक्षा बलों से लगातार संघर्ष करते हुए नौ आतंकवादी एवं एक आतंकवादी आमिर अजमल कसाब जीवित गिरफ्तार कर लिया गया।

अब तक  ‘मारो और भागो’ की नीति अपनाने वाले आतंकवादी नवंबर 2008 के आतंकी हमले में लगातार तीन दिनों तक भारतीय कमान्डोज से मुकाबला करते रहे। इस संघर्ष में भारतीय सुरक्षाबलों के बीस जवान शहीद हो गये। इस आतंकी हमले के संबंध में जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विचार-विमर्श शुरू हुआ, तो पाकिस्तानी प्रतिनिधि अब्दुला हारूम ने यह कहकर सबकों चौंका दिया कि जिहादी आतंकवाद का उत्पादन भारत के देवबंद मदरसे में हो रहा है जहां से पाकिस्तान और अफगानिस्तान को उसका निर्यात हो रहा हैं। उन्होंने यह सत्परामर्श भी दिया कि भारत सरकार को इस पर नजर रखनी चाहिए। ‘दि रूटस आफ टेररिज्म’ – पृष्ठ 10 – 11 यह अत्यंत गंभीर आरोप है जिसकी सचाई की पुष्टि भारत के गृह मंत्रालय को समुचित छान बीन एवं जाँच- पड़ताल करके करना चाहिए।

इस समय दक्षिण एशिया अत्यंत विस्फोटक एवं ज्वलनशीलता के मुहाने पर है। इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी भारत में 25-26 करोड़, पाकिस्तान में 14.5 करोड़, बाग्लादेश में 14 करोड़ और अफगानिस्तान में 1.6 करोड़ हैं जिनमें जेहाद में आस्था रखने वालों की बड़ी संख्या शामिल है। यह गंभीरतम शोध विश्लेषण का विषय है कि आतंकवादियों को वह प्रेरणा कहां से प्राप्त होती है जिससे प्रेरित होकर अपने प्राण हथेली पर लेकर निर्दोषों की बर्बर हत्या करने के लिय तत्पर हो जाते हैं। कुछ आत्मघाती आतंकी तो स्वयं को विस्फोट से उड़ाकर भीड़भाड़ वाले इलाकों में कुछ निरीहों को मौत की घाट उतार देते है। वह कौन सा दार्शनिक, धार्मिक अथवा राजनीतिक सिध्दांत है जिससे प्रेरित होकर युवाओं का एक बड़ा वर्ग आत्मघाती आतंकी बन जाता है।

श्रीलंका के लिट्टे आतंकियों का प्रेरणाश्रोत बहुत कुछ रातनीतिक था। एक प्रकार से श्रीलंका सरकार ने सैन्यबल के साथ लंबे समय संघर्ष के बाद अब करीब-करीब लिट्टे आतंकियों का समापन हो चुका हैं। भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में विभिन्न नामधारी आंतकी संगठन कार्यरत हैं। जैसे- लश्करे तैयबा आदि खूंखार आतंकी संगठन हैं। इन पर संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावानुसार प्रतिबंध लगाये जाने पर ये नाम बदलकर अपना कार्य जारी रखते हैं। इसके अतरिक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलकायदा और तालिबान का उल्लेख बराबर होता रहता है। ओसमा बिन लादेन घोषित रूप से अलाकायदा का प्रमुख हैं। विश्व स्तर पर अनेक देश आतंकी कार्यवाहियों को अंजाम देने लिए अलकायदा को पर्याप्त धन मुहैया कराते रहते हैं। विगत कई वर्षो से अमेरिका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित अलकायदा सरगना एवं तालिबान प्रमुख की खोज की जा रही है किंतु दोनों आतंकी संगठनों के प्रमुख पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर कहीं छिपे बताये जाते हैं एवं अब तक उनका सुराग नहीं लगया जा सका।

भारत सहित अनेक देश आतंकियों के निशाने पर हैं। विशेषकर गैर इस्लामिक देश। वैसे पाकिस्तान के पश्चिमोतर इलाकों में तालिबान आतंकी सक्रिय होकर शरीयत कानूनों के अनुसार देश की शासन व्यवस्था संचालित कराने के लिए संघर्षरत हैं। वे वहां लगातार विस्फोट करके निर्दोषों की हत्या कर रहे है। लड़कियों के स्कूल वे जमींदोज कर रहे है। उनके घर से निकलने पर पांबदी है। तालिबान आतंक इस 21वीं सदी में इस्लाम के अनुयायिओं को 1400 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये शरीयत कानूनों के अनुपालन हेतु न केवल निर्देष देते हैं, वरन् उनका पालन करने के लिए विवश भी करते है। मूल प्रश्न यह है कि आतंकवादियों को अपनी जान जोखिम में डालकर निर्दोषों की हत्या करने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त होती है? क्या कोई धर्मशास्त्र ऐसे जघन्य कृत्य करने की प्रेरणा दे सकता है? भारत से बौध्द धर्म, विदेशों को निर्यात हुआ। श्रीलंका, चीन, जापान, तिब्बत, म्यांमार, थाईलैण्ड आदि देशों में बौध्द भिक्षु,सत्य, अहिंसा, करुणा, प्रेम और मानवता आदि का संदेश लेकर गये थे और बिना रक्त की एक बूंद बहाये विभिन्न देशों में भगवान बुध्द का संदेश पहुंचा दिया।

अफगानिस्तान भी कभी बौध्द धर्म का अनुयायी रह चुका है। तालिबानों ने वामियान की भगवान बुध्द की प्रतिमा तोप से गोले बरसाकर ध्वस्त कर दी। इसी प्रकार भारत से हिंदू व्यापारी अनेक देशों में गये और वहां अपने व्यवहार से भारतीय संस्कृति की पताका फहराई। इस्लाम धर्म में अपने धर्म प्रचार के लिए ‘जिहाद’ या ‘जेहाद’ एक धार्मिक कृत्य माना जाता है। यह कथित ‘जिहाद’ ही आज आतंकवाद को प्रोत्साहित कर रहा है। कहा जाता है कि विश्व के जो समुदाय एक विशेष धार्मिक कृत्य एवं पूजा पध्दति में विश्वास नहीं रखते, वे अधार्मिक हैं, काफिर हैं और ‘जिहाद’ के द्वारा उन्हें विशेष पूजा पध्दति अपनाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए इसमें सामूहिक कत्लेआम भी निर्देश दिया जाता है। अब उपयुक्त समय आ गया है कि विश्व की खुशहाली के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘जिहाद’ को व्याख्यायित कराया जाय। इस कार्य के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का धार्मिक सम्मेलन आयोजित कराया जाय जिसमें विश्व के सभी मुस्लिम देशों से धार्मिक प्रतिनिधि मंडलों को सादर आमंत्रित किया जाय। इसी के साथ विश्व के सभी प्रमुख धर्मो के प्रतिनिधियों को भी उस सम्मेलन में आमंत्रित किया जाय। इन धार्मिक प्रतिनिधियों के समक्ष विश्व-शांति का एक प्रमुख एजेण्डा प्रस्तुत करते हुए उनसे निवेदन किया जाय कि वे अपनी धार्मिक मान्यताओं में समाहित इंसानियत के संदेशों को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके साथ ही इस विषय पर भी व्यापक विचार-विमर्श किया जाय कि ईश्वर तक पहुंचने का केवल एक ही मार्ग हो सकता है अथवा अपनी आस्थानुसार उस परमपिता परमेश्वर तक पहुंचाने के लिए भिन्न मार्ग भी अपनाये जा सकते हैं। इस्लामिक देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष आग्रह सहित उपांगों सहित व्याख्यायित करें जो जिहाद के नाम पर आतंक फैलाने वालों के लिए ‘फतवे’ जैसा फरमान बन जाय। विभिन्न विद्वानों द्वारा ‘जिहाद’ को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया जाता है। इससे अनेक प्रकार के मतभेद उजागार होते हैं।

सउदी अरेबिया द्वारा जो व्याख्या की जाय, वह बहुत प्रामाणिक मानी जानी चाहिए। इस संबंध में भारत के दारुल उलूम, देवबंद, के विद्वानों द्वारा भी इस शब्द की कारक तत्वों सहित व्याख्या महत्वपूर्ण होगी। यह व्याख्या एक संगोष्ठी द्वारा की जानी चाहिए। इस संगोष्ठी का स्वरुप सर्व धर्म सम्मेलन के रुप में ही होना चाहिए। आजकल आतंकी घटनाओं से विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका, यूरोप का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश इगलैण्ड (ग्रेट ब्रिटेन), इजरायल, भारत, चेचन विद्रोहियों द्वारा रुस आदि विशेष रुप से पीड़ित हैं। यह दुखद संयोग है कि ये सभी देश जिन आतंकियों से परेशान एवं पीड़ित हैं वे सभी एक विशेष पंथ के अनुयायी हैं।

आतंकवादी घटनाओं से पीड़ित देशों के निर्दोष नागरिक इन आतंकी हमलों के शिकार हो जाते है। यह मानवता के विरुध्द नितांत भयावह के शिकार हो जाते हैं। यह मानवता के विरुध्द नितांत भयावह अपराध है। विश्व के निर्दोष नागरिक आखिरकार राजनीतिक नेताओं, धार्मिक समूहों, आतंकवादियों के हिंसक कारनामों के शिकार क्यों हों? और वह भी विश्व के खुले वातावरण में। यह 21 वीं सदी है। विश्व के किसी छोटे से देश को भी पराजित करके उसके विश्व स्वीकृत मानचित्र में बदलाव लाना संभव नहीं है।

निर्दोषों की जानबूझकर हत्या करना या करवाना मानवता के विरुध्द बहुत घातक अपराध है। विश्व संगठन संयुक्त संयुक्त राष्ट्र संघ का यह उत्तदायित्व है कि वह मानवता के विरुध्द हो रहे इस जघन्य अपराध के विरुध्द समुचित कार्यवाही कराये। आतंकवाद से निपटने के लिए कठोर कानून अधिनियमित करने का निर्देश पहिले ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सदस्य देशों को जारी किया जा चुका है। अब धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाकर (विश्व मानवता) के विरुध्द किये जा रहे जघन्यतम अपराध (सामूहिक कत्लेआम) पर अंकुश लगाने के लिए विश्व जनमत को जागृत किया जाय और यदि किसी गलत व्याख्या के साथ भ्रम फैलाकर यह कृत्य किया जा रहा है तो उसे रोकने का उपाय सुझाया जाय। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवता के हित में कठोर कार्यवाही करने की भी तत्परता दिखायी जाय।

* लेखक समाजसेवी व पूर्व सहायक वाणिज्य कर अधिकारी हैं।