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(i) दी कैम्ब्रिज ऐन्साइक्लोपीडिया (पृ. ६३७) “The term Jihad is used in Islam for “Holy war”. According to the Koran, Muslims have a duty to oppose those who reject Islam, by armed struggl, if necesary, and Jihad has been invoked to justify both the expansion and defense of Islam. Islamic states pledged a Jihad against Israel in the Mecca declaration of 1981, though not necessarily by military attachk.”

जिहाद : ”जिहाद शब्द इस्लाम में -पवित्र युद्ध’ के लिए प्रयोग किया गया है। कुरान के अनुसार मुसलमानों का यह कर्त्तव्य है कि वे इस्लाम को न मानने वालों का विरोध करें और यदि आवश्यक हो तो उनके विरुद्ध सशस्त्र युद्ध करें। जिहाद का आदेश इस्लाम के विस्तार तथा उसकी रक्षा के लिए प्रयोग किया गया है। इस्लामी दउेशों ने, सन्‌ १९८१ में, ‘मक्का घोषणा’ में इज्राइल के विरुद्ध जिहाद करने की कसम खाई थी। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि जिहाद सैन्य हमलों के द्वारा ही किया जाए।”

(ii) दी ऐन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ इस्लाम (सं. एमाइली टाइन)

“Jihad consists of military action with the object of expansion of Islam. This reference work dismisses as “wholly apologetic” the idea that Jihad is undertaken only in self-deefence, for this disregards entirely “the previous doctrine and historical tradition as well as the texts of the quran and the Sunna”.

जिहाद : ”जिहाद इस्लाम के विस्तार के लिए एक सैनिक कार्यवाही है। यह शोध ग्रंथ इस बात को क्षमा याचना के समान मानते हुए नकारता है कि जिहाद केवल आत्मरक्षा के लिए ही की जाती है। ऐसा मानने से पिछले सिद्धान्त और ऐतिहासिक परम्परा एवं कुरान और सुन्ना आदि की भी पूरी तरह से अवहेलना होती है।”

(iii) दी न्यू एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (खं. ६)

“Jihad, also spelled Jehad, Arabic Jiohad (“fight or batle”) a religious duty imposed on Muslims to spread Islam by waging war; Jihad has come to denote any conflict waged for principle or belief and is often translated to mean “holy war”.

“Islam distinguishes four ways by which the duty of Jihad can be fulfilled; by the heart, the tongue, the hand, and the sword. The first consists in a spiritual purification of one’s own heart by doing battle with the devil and overcoming his inducements to evil. The propagation of Islam through the tougue and hand is accomplished in large measure by supporting that which is right and correcting what is wrong. The fourth way to fulfill one’s duty is to wage war physically against unbelievers and enemies of the Islamic faith. Those who professed belief in a divine revelation-Islamic faith. Those who professed belief in a divine revelation-Christians and Jews, in particular-were given special consideration. They could either embrace Islam or at leat submit themseles to Islamic rule and pay a poll and land tax. If both options were rejected, Jihad was declared.”

जिहाद- ”जिहाद को ‘जेहाद’ भी लिखा जाता है और अरबी भाषा के ”जिओहद” शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘लड़ाई या युद्ध’। जिहाद, लड़ाई द्वारा, इस्लाम का विस्तार करने के लिए, मुसलमानों का एक धार्मिक कर्त्तव्य है-जिहाद का अर्थ सिद्धान्त अथवा मत के लिए छेड़े गए किसी संघर्ष से लिया जाने लगा है और प्रायः इसका अर्थ ‘पवित्र युद्ध’ के रूप में किया जाता है।

इस्लाम में जिहाद के कर्त्तव्यों का पालन चार प्रकार से पूरा किया जा सकता है-जैसे-हृदय (या मन से) वाणी, हाथ और तलवार से। पहला तरीका मन के बुरे विचारों से लड़कर और उन पर विजय पाकर तथा आत्मशुद्धि करके है। दूसरा तरीका वाणी के द्वारा इस्लाम का प्रचार करना है। तीसरा तीरका सुकर्म से है जिसके द्वारा अच्छाई का समर्थन करना और बुराई को दूर करना है और चौथा तरीका इस्लाम को इन्कार करने वालों और इस्लाम के शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध छेड़कर अपने कर्त्तव्य का पालन करने से है। जिन्होंने अल्लाह के दैवी प्रगटीकरण के उपदेशों के प्रति विश्वास व्यक्त किया था, विशेषकर ईसाईयों और यहूदियों ने, उनके साथ विशेष रियायत की गई थीं उन्हें इस्लाम को अपनाने अथवा इस्लामी शासन के प्रति आत्मसमर्पणकरने और ज़िज़िया देने के विकल्प दिए गए थे। यदि वे दोनों ही विकल्पों को मानने से इंकार करते थेतो उनके विरुद्ध जिहाद की घोषणा की जाती थी।”

(ii) दी एन्साइक्लोपीडिया एमेरिकन इन्टरनेशनल एडीशन (खं. १६, पृ. ९१-९२) :

“Jihad, and Arabic word meaning, “struggle”. As a religious duty theoritically laid upon all followers of Muhammad, Jihad is based on the concept that the Islamic faith, since it is of universal validity, must be spread to all mankind, by force of arms, if necessary. In classical Islam Jihad was to be directed against “People of the Book” (that is, possessors of authoritative sacred writing, above all Jews and Christians) until they submitted to the political authority of Islam, and against idolaters unitl they become Muslims. Sufi mystics, however, often considered Jihad as a spiritual struggle against the evils within the self.”

जिहाद- ”जिहाद अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है ‘संघर्ष’। जिहाद मुहम्मद के सभी अनुयायियों के लिए सिद्धान्ततः एक धार्मिक कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है। यह इस अवधारणा पर आधारित है क्योंकि इस्लामी मत, विश्वभर के लिए वैध है, इसलिए इसे समस्त मानव समुदाय में फैलाना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो हथियारों की शक्ति द्वारा भी। शास्त्रीय इस्लाम में जिहाद ”किताब के लोग-पवित्र पुस्तकों का अनुसरण करने वाले (जैसे यहूदी, इसाई आदि) के विरुद्ध तब तक किया जाता था जब तक कि वे इस्लाम स्वीकार नहीं कर लेते थे। लेकिन सूफ़ी अक्सर जिहाद को अपने भीतर की बुराईयों को खत्म करने के लिए एक धार्मिक संघर्ष कानते हैं।”

(v) एकेडेमिक अमेरिकन एन्साइक्लोपीडिया (पृ. ४१८)

“In Islam, the duty of each Muslim to spread his religious beliefs, is termed ‘Jihad’. Although the word is widely understood to mean a “holy war’ against non-believers, Jihad may also be fulfilled by a personal battle against evil inclinations, the righting of wrongs, and the supporting of what is good.”

जिहाद- ”इस्लाम में, प्रत्येक मुसलमान का अपने धार्मिक विश्वासों को फैलाना एक कर्त्तव्य है और इसी को ‘जिहाद’ कहा गया है। हालांकि आमतौर पर इस शब्द का अर्थ गैर-मुसलमानों े विरुद्ध ”धार्मिक युद्ध” से लगाया जाता है। लेकिन कुप्रवृत्तियों व बुराइयों को दूर करने के उद्‌देश्य से निजी तौर पर लड़ाई करके और अच्छाई का साथ देकर भी जिहाद का कर्त्तव्य निभाया जा सकता है।

(vi) कोलियर्स एन्साइक्लोपीडिया (खं. १३, पृ. ५८७)

“Jihad, from an Arabic verb meaning to struggle and perserve, denotes, in the history of Islamic civilization, religious war waged against heretics, and the enemies of the state or the community of Muslims. In early Islamic phenomenon, it bears a strict relation to the spread of the faith by Muslims arms. It was a duty to the Kharijits, a band of warlike rebels, and Jihad was considered an obligation or command; and by them it was ranked as a sixth pillar of religion.”

‘जिहाद’- ”जिहाद शब्द अरबी भाषा की एक क्रिया से है जिसका अर्थ है संघर्ष एवं लगातार प्रयास करना; तथा इस्लामी सभ्यता के इतिहास में इस्लाम धर्म के विरोधियों व गैर-मुसलमानों, तथा मुस्लिम समाज और राज्य के विरोधियों के विरुद्ध युद्ध करना है। प्रारम्भिक इस्लामी इतिहास में ‘जिहाद’ का अर्थ होता था पवित्र युद्ध, और कठोर इस्लामी तथ्यानुसार इसका सीधा सम्बन्ध मुसलमानों का हथियारों द्वारा इस्लामी पंथ का प्रसार करने से है। यह खारिजितियों (एक कबीला), जो कि युद्ध प्रिय विदोहियों का एक दल था, का कर्त्तव्य था और जिहाद को आदेश या अनिवार्य कर्त्तव्य समझा जाता था और उनकी दृष्टि में यह इस्लाम का छठा स्तम्भ था।”

(vii) दी कन्साइज़ एन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम (पृ. २०९)

“Holy war”, a Divine institution of warfare to extend Islam into the dar al-harb (the non-Islamic terrtories which are described as the “abode of struggle”, or of disbelief) or to defend Islam from danger. Audit males must participate if the need arises, but not all of them, provided that “a sufficient number” (fard al-kifayah) take it up.”

“An important precondition of Jihad is a reasonable prospect of success, failing which a Jihad should not be undertaken. According to the sunnah, a Jihad is not lawful unless it involves the summoning of unbelievers to belief, and the Jihad must end when order is restored that is, when the unbelievers have accepted either Islam or a protected status within Islam, or when Islam is no longer under threat. It is impossible to undertake a Jihad against Muslims.”

जिहाद- ”पवित्र युद्ध”, दार-उल-हर्ब (गैर-इस्लामी देश जिन्हें संघर्ष अथवा इस्लाम में इन्कार करने वालों का स्थन माना जाता है) में इस्लाम के विस्तार के लिए अथवा खत्रतरे से इस्लाम की रक्षा करने के लिए मज़हबी युद्ध। आवयकता पड़ने पर इसमें, सबको नहीं, किन्तु पर्याप्त संखया (फर्द-अल-किफ़ायह) में वयस्क पुरुषों को हिस्सा अवश्य लेना चाहिए।

जिहाद की पहली महत्वपूर्ण शर्त यह है कि जिहाद से उद्‌देश्य की सफलता की सम्भावना दिखाई दे। यदि ऐसा नहीं होता माूलम पड़े तो जिहाद नहीं करनी चाहिए। सुन्ना के अनुसार जिहाद तब तक उचति नहीं है जब तक कि उसके द्वारा ‘इन्कार करने वालों’ को ”ईमान लाने वालो’-‘ के रूप में बदल न दिया जाए और इस उद्‌देश्य की पूर्ति के बाद जिहाद को अवश्य ही समाप्त करन देना चाहिए। उद्‌देश्य की पूर्ति का अर्थ यह है कि ‘इन्कार करने वालों’ ने या तो इस्लाम को स्वीकार कर लिया हो अथवा इस्लाम में संरक्षित हैसियत प्राप्त कर ली है अथवा इस्लाम को कोई खतरा नहीं हो। मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद छेड़ना असम्भव है।”

(viii) एन्कार्टा एन्साइक्लोपीडिया :

“Jihad in Islam, the spiritual struggle against evil. Jihad is the duty of all main stream Muslims, or Sunnites. There are four ways they may fulfil a Jihad : by the heart, the tongue, the hand, and the sword. These refer to the inner, spiritual battle of the heart against vice, passionn, and ignorance; spreading the word of Islam with one’s tongue ‘choosing to do good and avoiding evil with one’s tongue; choosing to do good and avoiding evil with one’s hand; and waging war aginst non-Muslims with the sword.

Islamic law divides the world into dar-al-Islam (abode of Islam) and dar-al-harb (abode of war-that is, of non-Muslims’ rule). Most modern branches of Islam stress the iner, spiritual Jihad. But Islamic law also states the all nations must surrender to Islamic rule, if not its faith. Until that time, all adult, male, and able-bodied Muslims are expected to take part in hostile Jihads against non Muslim neighbors and neighboring lands. The Quran states that those who die in this type of Jihad automatically become martyrs of the faith and are awarded a special place in heaven.

For Muslims, there exist two kinds of non-Muslim enemies: kafir (non-believers in Islam) and ahl-al-Kitab (People of the Book). Kafir, such as Buddhists and Hindus, must either convert to Islam or face execution. Once converted to Islam, it is a capital offence to renounce the faith. People of the Book include Jews, Christians, and followers of Zorostrianism. These people need only submit to Muslim political authority to avoid or end a Jihad. They may keep their original faith, but their status becomes dhimmi (a ‘protected’ non-Muslim) and they must pay a prescribed poll tax. In contrast to main stream Sunnites, Muslim groups such as the Imami and Bohora Ismaili-Shiates are forbidden from participating in the hostile Jihad. These sects believe the only person legitimately capable of conducting such a Jihad, is their Imam, or spiritual leader.”

जिहाद-”इस्लाम के अनुसार जिहाद बुराई के विरुद्ध एक आध्यात्मिक युद्ध है। जिहाद सुन्नियों और मुखय धारा के सभी मुसलमानों के लिए एक कर्त्तव्य है। वे जिहाद के अपने कर्त्तव्य को चार तरीकों से निभाज सकते हैं। जैसे-मन, वाणी, कर्म और तलवार से। मन के बुरे विचार और अज्ञानता के विरुद्ध मन से की जाने वाली आध्यात्मिक लड़ाई, वाणी से इस्लाम का प्रचार; अच्छे कर्म करना और बुरे कर्मों से दूर रहना और गैर-मुसलमानों के विरुद्ध तलवार / हथियार से युद्ध करना।

इस्लामी कानून संसार को दो भागों में विभाजित करता है : (i) दार-उल-इस्लाम (इस्लामी क्षेत्र), और दार-उल-हर्ब (लड़ाई का क्षेत्र जहाँ गैर-मुसलमानों का राज्य हो)। इस्लाम के अधिकतर आधुनिक सम्प्रदाय आन्तरिक या आध्यात्मिक जिहाद पर बल देते हैं। इस्लामी कानून का यह कहना है कि उन सभी देशों को, यदि इस्लाम उनका धर्म नहीं है, तो उन्हें इस्लाम की सत्ता स्वीकार कनी चाहिए। तब तक सभी वयस्कों, पुरुषों तथा स्वस्थ शरीर वाले मुसलमानों से यह उम्मीद की जाती है कि गैर-मुस्लिम पड़ोसी देशों और आस-पास के क्षेत्रों के खिलाफ़ वे सशस्त्र जिहाद में हिस्सा लें। कुरान के अनुसार जिन लोगों की इस प्रकार के जिहाद में जान चली जाती है, वे स्वतः ही ‘दीन’ लिए ‘शहीद’ बन जाते हैं और उन्हें जन्नत में विशेष जगह मिल जाती है।

मुसलमानों के लिए गैर-मुस्लिम दुश्मन दो प्रकार के होते हैं-‘काफ़िर’ (यानी इस्लाम में ईमान न लाने वाले) और दूसरे ‘अहले-किताब वाले’ (पवित्र किताब के लोग जैसे-यहूदी ईसाई आदि)। काफ़िरों, जैसे कि हिन्दुओं और बौद्धों, को या तो इस्लाम कबूर कर लेना चाहिए अथवा प्राण-दण्ड पाने के लिए तैयार रहना चाहिए। एक बार इस्लाम कबूल करने के बाद उसे त्यागने का नतीजा प्राण-दण्ड की सज़ा है। ‘अहले-किताब’ के अन्तर्गत, यहूदी, ईसाई और पारसी धर्म के अनुयायी शामिल हैं। इनके लिए केवल यही जरूरी है कि वे जिहाद से बचने या उसको समाप्त करने के उद्‌देश्य से मुसलमानों की राजनैतिक सत्ता स्वीकार कर लें। वे अपने मूल धर्म के अनुयायी बने रह सकते हैं। लेकिन उनकी हैसियत एक ‘ज़िम्मी’ (एक रक्षित गैर-मुस्लिम) जैसी होगी और उन्हें निर्धारित ज़जिया (टैक्स) अवश्य देना पड़ेगा। मुखयधारा के सुन्नियों े विपरीत, इमामी, तथा बोहरा-इस्माइली, शिया नामक मुस्लिम समुदायों को आक्रामक जिहाद में भाग लेने की मनाही है। इन सम्प्रदायों का मानना है कि उनाक इमाम अथवा धार्मिक नेता ही इस प्रकार के जिहाद की घोषणा कर सकता है।”

जिहाद की उपरोक्त व्याखयाओं से सुस्पष्ट है कि मुसलमान अपने को विश्व भर का डिक्टेटर मानते हैं और गैर-मुसलमानों को आदेश देते हैं कि यदि जिन्दा रहना चाहते हो तो मुसलमान बनकर जियो वर्ना जिहाद द्वारा तलवार के घाट उतार दि जाओगे। क्या सर्वसृष्टा दयालु परमेश्वर, जिसे अल्लाह कहा जाता है, अपनी ही सृष्टि को नष्ट करना चाहेगा ? वह भी सिर्फ अपनी पूजा कराने के लिए। गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जिहादी युद्ध का यह आह्‌वान तो अरबी साम्राज्यवाद की एक स्पष्ट घोषणा है।