Tags

, ,


इस्लाम के विद्वानों की दृष्टि में जिहाद

(i) Shaikh Abdullah bin Muhammad bin Hamid : the Head cleric of the Sacred Mosque of Mecca, writes : “Praise be to Allah who had ordained “Al-Jihad” (fighting for Allah’s Cause), (i) with the heart (intentions or feelings), (ii) With the hand (weapons) and (iii) With the tongue (speeches, etc., in the cause of Allah) and has rewarded the one who performs it with the high rooms in the Gardens of (Paradise). (the Call To Jihad, Fighting for Allah’s Cause in the Holy Quran, (Sahih Bukhari, vol. 1, pref. xxiv).

शेख अब्दुल्ला बिन मुहम्मद बिन हामिद- मक्का की पवित्र मस्जिद के मुखय इमाम : ”प्रशंसा हो अल्लाह के लिए जिसने १) मन से (इरादों और भावनाओं से, २) हाथ (हथियारों) से, ३) वाणी (अल्लाह के लिए भाषणों) से ‘अल-जिहाद’ (अल्लाह के लिए लड़ने) का हुक्म दिया है तथा जिसने इसे करने वाले को जन्नत में ऊँचे भवनों में स्थान दिया है।” (दी कॉल टू जिहाद-इन दी होली कुरान, बुखारी, खंड १, प्रीफेस पृ. xxiv) ।

(ii) S. Abula’la Maududi : “The Arabic words Jihadi-i-Kabir imply three meanings : (i) To exert one’s utmost for the cause of Islam, (ii) To dedicate all one’s resources to this cause, and (iii) To fight against the enemies of Islam on all possible fronts with all one’s resources in order to raise high the “Word of Allah”. This will include Jihad with one’s tongue, pen, wealth, life and every other available weapon.” (The Meaning of the Quran, vol. VIII, p. 98 on every p. 88).

सैयद अबुल’ ला मौदूदी- ”अरबी भाषा के शब्द ‘जिहाद-इ-कबीर’ के तीन अर्थ हैं : १) इस्लाम के हित के लिए अपना सर्वाधिक प्रयास करना; २) इस काम के लिए अपने संसाधनों को समर्पित कर देना, और ३) इस्लाम के दुश्मनों के विरुद्ध अपने सभी संसाधनों के साथ हर सम्भव मोर्चों पर लड़ाई करना ताकि ”अल्लाह का कलाम” ऊँचा हो जाए यानी इस्लाम फैले, इसमें वाणी, कलम, धन, जीवन तथा अन्य सभी उपलब्ध हथियारों से जिहाद करना शामिल समझा जाएगा।” (दी मीनिंग ऑफ दी कुरान, खं. ८, P. 98) ।

(iii) Anwar Shaikh : “Jehad is an Arabic word, which literally means ‘endeavour’, but as an Islamic doctrine, it implies ‘fighting in the way of Allah (the Arabic God) to establish His supremacy over unbelievers until they relinquish their faith to become Muslims or acknowledge their subordination by paying a humiliation-tax called ‘JAZIA’.”

“Jehad is a perpetual war against infidels, which include Hindus, Buddhists, Athesists, Deists, Sceptics as well as Jews and Christians.According to this doctrine, a person’s biggest crime is to deny allah and Muhammad’s exclusive right to be believed in and adored. Therefore, this is sufficient cause for a Muslim state to raid the subjugate non-Muslim territories. (Islam : Sex and Violence, p. 112)

He further says in his book “This is Jehad” : “The concept of Jehad has been presnted by Islam as “a holy war in the way of Allah” as well as, ” a defensive struggle against unbelievers”. There is no truth, whatever, in either of these assertaions. History clearly demonstrates that it is an absolutely aggressive war against non-Muslims, who refuse to accept the Islamic faith and want to worship God the way they like, but this is not acceptable to Allah, who does not acknowledge the ravacity of any other faith and ardently desires to eliminate all other beliefs along with their followrs.” (preface, p. 1).

He also says that, “The following are the cardinal points of Jehad and must be noted carefully to proper understanding of this discussion.

(a) “Jehad is all about massacre, mutilation and misery and not about any moral, social or humanitarian service as the Muslim divines pretend. Again there is a direct connection between Jehad (Murdering non-Muslims) and Paradise i.e. the provision of the choicest sex-after-death in the most hilarious settings ebullient with pleasures, prsents and pleasantries. Having sex after death is a novel concept, which can be realized by terrorizing, tearing and tyrannising the non-Muslims. Commission of atrocities against infidels makes Allah honour-bound to offer Paradise as a gift to a Muslim !

(b) Islam is the only true way of life : the rest is fake, fould and felonious; the People of the Book i.e…., the Jews and Christians are not believers but infidels. They must be murdered or enslaved.” (P. 5).

अनवर शेख- ”जिहाद अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ”प्रयास”। किन्तु इस्लामी दर्शन में इसका आशय है अल्लाह (अरब का देवता) के लिए युद्धरत होना जिससे काफ़िरों परअल्लाह की प्रभुता स्थापित हो जाए और जब तक कि वे अपना पंथ त्याग कर मुसलमान न हो जाएं या अपमानजनक ज़िज़िया नामक कर देकर उनकी अधीनता स्वीकार न कर लें।

जिहाद गैर-ईमान वालों के विरुद्ध एक अन्तहीन युद्ध है जिसें हिन्दू, बौद्ध, अनीश्वरवादी, देववादी, संशयवादी तथा यहूदी और ईसाई सभी शामिल हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी भी व्यक्ति का सबसे बड़ा अपराध यही है कि वह अल्लाह और मुहम्मद पर ईमान लाने और अल्लाह कोपूजे जाने के एक मात्र अधिकार को नहीं मानता है। इसीलए एक मुस्लिम देश को किन्हीं भी अन्य गैर-मुस्लिम देशों पर आक्रमण करने और उन्हें दास बना लेने के लिये यह पर्याप्त कारण ळै।” (इस्लाम : सेक्स एण्ड वायलेंस, पृ. ११२)।

उन्होंने ”दिस इज़ जिहाद” में लिखा है : ”इस्लाम में जिहाद की अवधारणा को ‘अल्लाह के मार्ग में पवित्र युद्ध” एवं ‘गैर-ईमानवालों (गैर मुस्लिमों) के विरुद्ध एक रक्षात्मक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों कथनों में किसी में कुछभी सच्चाई नहीं है। इतिहास साफ तौर पर बतलाता है कि यह पूरी तरह से उन गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध एक आक्रामक युद्ध है जो कि इस्लामी पंथ को नहीं स्वीकारते हैं और जो कि अपनी इच्छानुसार ईश्वर की पूजा करना चाहते हैं। लेकिन यह सब अल्लाह को स्वीकार नहीं है जो कि किसी अन्य पंथ के अस्तित्व को नहीं मानता है और बेहद उन्माद के साथ सभी अन्य पंथों को, उनके अनुयायियों सहित, नष्ट करना चाहता है। (पृ. १) पुनः” ”जिहाद का मतलब है-नर संहार, अंग-विकृतीकरण और विपत्ति, न कि यह किसी प्रकार के नैतिक, सामाजिक अथवा मानव कल्याणकारी सेवा के लिए है, जैसा कि मुस्लिम धार्मिक नेता दावा करते हैं।” (वही. पृ. ५)।

(iv) Ibn Warraq : “The totalitarian nature of Islam is nowhere more apparent than in the concept of Jihad, the holy war, whose ultimate aim is to conquer the entire world and submit it to the one true faith, to the law of Allah. to Islam alone has been granted the truth : there is no possibility of salvation outside it. It is the sacred duty an incumbent religious duty, established in the Quran and the traditions-of all Muslims to bring Islam to all humanity. Jihad is the divine institution enjoined specially for the purpose of advancing Islam. Muslims must strike, fight and kill in the name of God.” (Why I am not a Muslim, p. 217)

इन्ब वरौक : ”इस्लाम के सर्व सत्तात्मक स्वरूप का सुस्पष्ट दर्शन जिहाद की अवधारण की अपेक्षा और कहीं अधिक साफ़ दिखाई नहीं देता है।यह एक धर्म युद्ध है जिसका अन्तिम उद्‌देश्य समस्त विश्व को जीतना और फिर उसे एक सच्चे पंथ तथा अल्लाह के कानून के हवाले कर देना है। सत्य केवल इस्लाम को ही दिया गया है; इसके बाहर मोक्ष की कोई सम्भावना नहीं है। प्रत्येक ईमान वाले (मुसलमान) का यह पवित्र कर्त्तव्य और आवश्यक धार्मिक कार्य है कि वे समस्त मानव जाति तक इस्लाम को और आवश्यक धार्मिक कार्य है कि वे समस्त मानव जाति तक इस्लाम को पहुंचायें जैसा कि कुरान और हदीसों में सुनिश्चित किया गया है। जिहाद एक दैवी सिद्धान्त है जिसका उद्‌देश्य, विशेषकर इस्लाम का प्रसार करना है। मुसलमानों को अल्लाह के नाम पर प्रयास, युद्ध और हत्या करनी चाहिए।” (हृाई आई एम नॉट ए मुस्लिम, पृ. २१७)।

(v) Imam Saraksi-“Jihad is obligatory and commanded by Allah. Any person who denies Jihad is a kafir and people who doubt the obligation of Jihad, have gone astray.” (Fathul Qadeer, p. 191, V. 5, Jihad Jixation, p. 21)

इमाम सराक्सी- ”जिहाद एक अनिवार्य कार्य है और इसकी अल्लाह ने आज्ञा दी है। जो कोई व्यक्ति (मुसलमान) जिहाद से इन्कार करता है वह काफिर है और जो लोग जिहाद की अनिवार्यता पर संदेह करते हैं, वे पथ भ्रष्ट हो गए हैं।” (फतूल कादिर, पृ. १९१, खंड ५; जिहाद फिक्जेशन, पृ. २१)

(vi) Sahibul Ikhtiyar-“Jihad is an ordained obligation (fareeda). One who denies it, is a Kafir.” (Jihad Fixation, p. 21).

साहिबुल इखितयार- ”जिहाद (फरीदा) एक विधिसम्मत दायित्व है। जो इससे इंकार करताहै, वह काफ़िर है।” (जिहाद फिक्जे़शन, पृ. २१)।

मजीद खुद्‌दूरी- (जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी) : ”जिहाद इस्लामी पंथ को सार्वभौमिक बनाने और साम्राज्यिक विश्व राज्य स्थापित करने का एक साधन है।” (वॉर एण्ड पीस इन द लॉ ऑफ इस्लाम, पृ. ५१)।

(viii) French Scholar Alfred Morabia-“Offensive, bellicose Jihad, the one codified by the specialists and theologians, has not ceased to awaken echo in the Muslim consiciousness, both individual and collective… To be sure contemporary apologists present a picture of this religious obnligation that conforms well to the contemporary norms of human rights….. but the people are not convinced by this…. The overwhelming majority of Muslims remain under the spiritual sway of law…. whose key requirement is the demand, not to speak of the hope, to make the word of God triumph everywhere inthe world.” (quoted by Daniel Pipes Militant Islam Reaches America p. 265).

फ्रांसीसी विद्वान्‌ अल्फ्रैड मोराबिया : ”आक्रामक व युद्धप्रिय जिहाद, ने जिसे विशेषज्ञों और मज़हब के मर्मज्ञों ने संहिताबद्ध किया है, अकेले तथा सामूहिक दोनों प्रकार से मुस्लिम चेतना को जागृत करना नहीं छोडा है…. .निश्चित तौर पर समकालीन इस्लाम के समर्थक इस मज़हबी फर्ज की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जो तत्कालीन मानवीय अधिकारों के मानदण्डों के अनुरूप है….. लेकिन लोग उनके इस कथन से आश्वस्त नहीं होते हैं……………………अधिकांश मुसलमान मज़हबी कानून से प्रभावित रहते हैं…… जिसकी मुखय अपेक्षा, यह मांग है आशा नहीं, कि संसार में हर जगह अल्लाह की वाणी का बोलबाला हो।” (डेनियल पाइप्स द्वारा मिलिटेंट इस्लाम रीचिंज़ अमेरिका पृ. २६५)

(ix) Dr. Muhammad Sayyid Ramadan al Buti-an Azhar scholar in his book, “Jurisprudence in Mohammad’s Biography” mentioned :

“The Holy War (Islamic Jihad), as it is known in Islamic Jurisprudence, is basically an offensive war. This is the duty of Muslims in every age when the needed military power becomes available to them. This is the phase in which the meaning of Holy war has taken its final form. Thus the apostle of God said “I was commanded to fight the people until they believe in Allah and his messenger…… ” (p. 134)

“The apostle of Allah started to send military detachments from among his followers to various Arab tribes which were scattered in the Arab Peninsula to carry out the task of calling (these tribes) to accept Islam. If they did not respond, they (Muslims) would kill them. This was during the 7th Hagira Year. The number of the detachments amouned to ten.” “The concept of Holy War (Jihad) in Islam does not take into consideration whether defensive or an offensive war. Its goal is the exalation of the World of Allah and the construction of Islamic society and the establishment of Allah’s Kingdom on Earth regardless of the means. The means would be offensive warfare. In this case, it is the apex, the noblest Holy War. It is legal to carry on a Holy War.” (p. 263)

डॉ. मुहम्मद सैयद रमादान अल बूती-ने अपनी किताब, ‘ज्यूरिस प्रूडेंस इन मुहम्मद्‌स बायोग्राफी’ में लिखा : ”जैसा कि इस्लामी कानून में ज्ञात है-‘मज़हबी युद्ध’ (इस्लामी जिहाद) बुनियादी तौर पर एक आक्रामक संघर्ष है। हर समय के मुसलमानों का, जब उन्हें आवश्यक सैन्य शक्ति उपलब्ध हो जाती है, यह एक फर्ज़ है। यह वह दौर है जिसके दौरान मज़हबी युद्ध के अर्थ ने अपना अंतिम रूप ग्रहण किया है। इस प्रकार अल्लाह के पैगम्बर ने यह कहा ‘मुझे उन लोगों के साथ तब तक लड़ने का हुक्म हुआ है जब तक कि वे अल्लाह पर ईमान नहीं ले आते।……………” (पृ. १३४)

”अल्लाह के पैगम्बर ने विभिन्न अरबी जनजातियों के पास, जो अरब प्रायद्वीप में फैली हुई थीं, अपने अनुयायी सैनिक भेजे। उन सैनिक अनुयायियों को भेजने का उद्‌देश्य अरब जनजातियों को इस्लाम कबूल करने के लिए समझाना-बुझाना था। यदि वे नहीं मानें तो अनुयायी (मुसलमान) उन्हें मौत के घाट उतार दें। यह जिहरी सन्‌ सात की बात है। भेजी गई टुकड़ियों की संखया १० थी।”….. ”इस्लाम के अनुसार ”मज़हबी युद्ध” (जिहाद) की संकल्पना में इस बात पर ध्यान नहीं किया गया है कि वह रक्षात्मक अथवा आक्रामक है। इसका लक्ष्य तो अल्लाह की वाणी को बुलंद करना है और इस्लामी समाज की स्थापना करना तथा इस धरती पर जैसे भी हो अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करना है। इन सभी के लिए आक्रामक युद्ध माध्यम होगा। इस मामले में यह शीर्षस्थ आदर्श पवित्र युद्ध है और इस पवित्र युद्ध को छेड़ना विधि सम्मत है।” (पृ. २६३)।

(x) Baydawi (The Lights of Revelation, p. 252) : “Fight Jews and Christians because they violated the origion of their faith and they do not believe in the religion of the truth (Islam), which abrogated all other religions. Fight them until they pay the poll tax (Ziziya tax) with submission and humiliation.”

बेदावी : (दी लाइट्‌स ऑफ रिवीलेशन, पृ. २५२)-”यहूदियों तािा ईसाइयों के साथ लड़ाई करो क्योंकि उन्होंने अपने मज़हब के उद्‌गम का उल्लंघन किया है और वे सच्चाई के मज़हब (इस्लाम) पर ईमान नहीं लाते हैं जिसने अन्य सभी मज़हबों का खण्डन किया है। उनके साथ अब तक लड़ाई करो जब तक वे समर्पण और विनम्रता से ज़ज़िया अदा नहीं करने लगें।”

(xi) Amit Taher—”Islam makes it incumbent on all adult males, provided they are not disabled or incapacitated, to prepare themselves for the conquest of (other) countries so that the writ of Islam is obeyed in every country in the world……….Those who know nothing of Islam pretend that Islam counsels against war. Those (who say this) are witless. Islam says : “Kill all the unbelieverrs just as they would kill you all ! Does this mean that Muslims should sit back until they are devoured by the unbelievers ? Islam says; Kill them (non-Muslims), put them to the sword and scatter (their armies). Does this mean sitting back until (non-Muslims) overcome us ? Islam says : Kill in the service of Allah those who may want to kill you ! Does this mean that we should surrender to the enemy ? Islam says : Whatever good there exists thanks to the sword and in the shadow of the sword ! People cannot be made obedient except with the sword ! The sword is the key to Paradise, which can be opened only for the Holy Worriors ! There are hundrereds of other (Quranic) psalms and Hadiths (sayings of the Prophet) urging Muslims to value war and to fight. Does all this mean that Islam is a religion that prevents men from waging war ? I spit upon those foolish souls who make such a claim.” (Holy Terror, pp. 226-227).

अमीर ताहिर- ”इस्लाम के अनुसार सभी वयस्क पुरुषों के लिए, बशर्तें वे विकलांग व अशक्त न हों, यह आवश्यक है कि वे अन्य देशों को जीतने के लिए तैयार हो जाएं ताकि संसार के हर एक देश में इस्लाम का अनुसरण हो।….लेकिन जो इस्लामी मज़हबी युद्ध का अध्ययन करेंगे, वे इस बात का समझेंगे कि इस्लाम पूरे विश्व को क्यों जीतना चाहता है…… जो इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते, वे यह तर्क देते हैं कि इस्लाम युद्ध के खिलाफ़ है। वे जो ऐसा कहते हैं, नासमझ हैं। इस्लाम के अनुसार, ”सभी इंकार करने वाले को जान से मार दो क्योंकि नहीं तो वे आप सबको जान से मार देंगे।” क्या इसका मतलब है कि मुसलमान तब तक बैठे रहें जब तक इंकार करने वाले उन्हें नष्ट नहीं कर देते। इस्लाम का कहना है-”सभी गैर-मुसलमानों को तलवार से मौत के घाट उतार दो।’ क्या इसका मतलब यह है कि तब तक बैठे रहो जब तक गैर-मुसलमान हम पर काबू नहीं पा लेते हैं। इस्लाम का कहना है कि’-अल्लाह की सेवा में उन सभी को जान से मार दो जो आपको जान से मारना चाहते हैं। क्या इसका मतलब यह है कि हमें दुश्मनों के सामने आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। इस्लाम का कहना है-जो भी कुछ अच्छाई मोजूद है, उसका श्रेय तलवार और तलवार के भय से है। लोगों को तलवार के भय के बिना आज्ञाकारी नहीं बनायाजा सकता। तलवार जन्नत प्राप्ति की चाबी है और जन्नत के दरवाजे मज़हबी युद्ध करने वालों के लिए ही खुलते हैं। ऐसी कई सौ अन्य हदीसे हैं जिनका उपयोग करके मुसलमानों से कहा जाता है कि वे युद्ध को महत्व दें तथा युद्ध करें। क्या इन सभी का यह मतलब है कि इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जो मनुष्य को युद्ध करने से रोकता है ? मैं उन सभी मूख्र लोगों पर थूकता हूँ जो इस प्रकार का दावा करते हैं।” (होली टेरर पृ. २२६-२२७)।

(xii) Ibn-Hisham-Al Sohaily (Al-Rawd al-Anaf pp. 50-51) : “No two religions are to exist in the Arab Peninsula.” Therefore, Saudi Government does not allow any other religion to manifest their religious task. What tolerant and peaceful religion Islam is ! ”

इब्न-हिशाम-अल-सोहेली (अल-रब्द अल-अनाफ,पृत्र ५०-५१)-”अरब प्रायद्वीप में कोई दो मज़हब एक साथ नहीं रह सकते।”। इसीलिए सउदी अरब की सरकार अपने देश में किसी अन्य मज़हब को अपने धार्मिक कृत्य करने की आज्ञा नहीं देती है। वह इस्लाम कितना सहिष्णु और शान्तिपूर्ण मज़हब है।”

(xiii) Ibn Khaldun (1332-1406 A. D., Islam’s great historian, sociologist and philosopher): “In the Muslim community, the holy war is a religious duty, because of the universalism of the (Muslim) mission and (the obligation) to convert everybody to Islam either by persuasion or by force. Therefore, caliphate and royal authority are united in (Islam), so that the person in charge can devote the available strength to both of them at the same time.” (The Muquaddimah, vol. 1 : 473).

इब्न खालदुन-(१३३२-१४०६; इस्लाम का महान्‌ इतिहासकार, समाजशास्त्री तथा दार्शनिक)-”मुस्लिम समुदाय में पवित्र युद्ध एक मज़हबी फ़र्ज है क्योंकि इसका उद्‌ेश्य इसलाम को सार्वभौतिक बनाना है और ह व्यक्ति को समझा-बुझाकर अथवा बल प्रयाग से इस्लाम स्वीकार करवाना है। इसीलिए इस्लाम में शाही-सत्ता और खलीफ़ा (धार्मिक सत्ता) को एक साथ रखा गया है ताकि प्रभावी व्यक्ति दोनों को ही उपलब्ध शक्ति एक ही समय दे सके।” (दी मुकदि्‌दमाह, खं. १, पृ. ४७३)।

(xv) A. A. Engineer (Rational Approach to Islam’ p. 211) : “The concept of Jihad in Islam has been grossly misundertood both by Muslims and Non-Muslims, Actually the word, Islamic Jihad cannot be transalated in any language. However, its spirit can be explained to some extent. So any effort of a Muslim, individually or collectively, which promotes the cause of Islam and proves beneficial individually, and collectively to the Muslim community, in a non-Muslim state, politically, religiouslyand economically, is jihad. Its main trust is always agaisnt the non-Muslims and their country to win over them, in favour of Islam, by any means, whatsoever is possible. However, its mode of operation may vary with specific situation, strength and resources of the activists as well as of the opponents. It is mainly controlled by the local, naional and international political conditions and alignments.”

ए. ए. इंजीनियर (रेशनल अप्रोच टू इस्लाम, पृ. २११) : ”इस्लाम में जिहादकी संकल्पना को मुसलमान तथा गैर-मुसलमान दोनों ही पर्याप्त रूप से नहीं समझ पाए हैं। वास्तव में ”इस्लामी जिहाद” शब्दों का अनुवाद किसी भी भाषा में नहीं किया जा सकता है। लेकिन कुछ हद तक इसके भाव की व्याखया की जा सकती है। इसलिए किसी मुसलमान द्वारा व्यक्तिगत तौर पर अथवा सामूहिक तौर पर किया गया यह ‘प्रयास’ जिहाद है जिसमें गैर-मुसलमान देश में इस्लाम की अभिवृद्धि होती है और वह राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक तौरपर मुसलमान समुदाय के किसी व्यक्ति के लिए अथवा सामूहिक आधार पर लाभकर सिद्ध होता हो। इसका मुखय निशाना हमेशा गैर-मुसलमान और उनका देश होता है ताकि किसी भी सम्भव तरीके से इस्लाम के पक्ष में उनका हृदय परिवर्तन किया जा सके। लेकिन इसके संचालन का तरीका, स्थिति, ताकत तथा काय्रकर्ताओं के संसाधनों को देखते हुए अलग-अलग हो सकता है। यह मुखयतया स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों से नियंत्रित होता है।”

(xvi) Sayed Kamran Mirza : “Historically, Jihad means Holy War. For 1400 years, Muslims always understood the meaning of Jihad as Islamic Holy War….. In Islamic history, more than 80 percent of the texts are filled with Holy War (Jihad). Early Islam was apread in the Arabian Peninsula solely by holy wasrs (Jihad). ” ….. ” The majority of the Quran’s texts themselves clearly indentify Jihad as physical warfare in Islam, and Islamically God’s way of establishing the Kingdom of God on earth. Likewise, from the Hadith and the earliest biographies of Muhammad, it is just as evident that the early Muslim community understood these Quranic texts to be taken literally. ” (The Jihad Juggernaut, p. 48).

सैयद कामरान मिर्ज़ा : ”ऐतिहासिक रूप से जिहाद का अर्थ मज़हबी युद्ध है। १४०० वर्षों से मुसलमानों ने सदैव जिहाद का अर्थ इस्लामी मज़हबी युद्ध ही समझा है।…. इस्लाम का इतिहास देखें तो ८० प्रतिशत से अधिक अतिहास मज़हबी युद्धों (जिहाद) से भरा पड़ा है। प्रारम्भिक काल में अरब प्रायद्वीप में इस्लाम का विस्तार केवल मज़हबी युद्ध ही समझा है।…. इस्लाम का इतिहास देखें तो ८० प्रतिशत से अधिक इतिहास मज़हबी युद्धों (जिहाद) से भरा पड़ा है। प्रारम्भिक काल में अरब प्रायद्वीप में इस्लाम का विस्तार केवल मज़हबी युद्ध (जिहाद) से किया गया था।”

”कुरान के अधिकांश आदेशों में स्पष्ट रूप से इस्लाम में जिहाद को भौतिक संघर्ष की संज्ञा दी गई है, तथा इस्लामी तौर से इसे धरती पर अल्लाह की सत्ता स्थापित करने का साधन बताया गया है। इसी प्रकार हदीस और मुहम्मद साहब की जीवनियों से यह स्पष्ट है कि प्रारम्भिक काल में मुसलमान समुदाय ने कुरान के वचनों का शाब्दिक अर्थ ‘धर्म युद्ध’ लिया।” (दी जिहाद जुगरनौट, पृ. ४८)।

(xvii) Abd al-qadir as Sufi ad-Darqawi- Writes in his book, “Jihad a Ground Plan” : “We are at war. And our battle has only just begun. Our first victory will be one tract of land somewhere in the world that is under the complete rule of Islam…. Islam is moving across the earth…. Nothing can stop it, spreading in Europe and America.” (Quoted by John Laffin, Holy War Islam Fights, p. 22).

अब्द-अल-कादिर अस सूफी अद-दर क़ावी ने अपनी किताब ‘जिहाद ए ग्राउंड प्लान’ में लिखा : ”हम संघर्षरत है और हमारा संघर्ष अभी शुरू हुआ हैं। हमारी पहली विजय विश्व की ऐसी भूमि के रूप में होगी जहाँ पूरी तरह इस्लाम का शासन होगा।…… इस्लाम पूरी धरती पर फैल रहा है। इस्लाम के विस्तार को यूरोप और अमेरिका में कोई रोक नहीं सकता।” (जोन लाफ़िन, होली वार इस्लाम फाइट्‌स, पृ. २२)।

(xviii) Ayatullah Khomeini (1903-1989) : ” Jihad is a multifaceted form of of warfare, more genuinely a ‘total war’ than that concieved by the Fascist and Communist Leaders of the mid-20th century. It means armed struggle and battle; it also means war through economic and political pressures, through subversion and propaganda, through conversion of non-Muslims to Islam and through penetration of non-Muslim societies. Translated, Jihad means’ a great striving’ and it calls for relentless and remorseless action world-wide.” (Quoted by John Laffin, ibid p. 15).

Khomeini while in exile in Paris said, “Holy War means the conquest of all non-Muslim territories. Such a war may well be declared after the formation of an Islamic government. …. It will then be the duty of every able-bodied adult male to volunteer for this war of conquest, the final aim of which is to put Koranic law in power from one end of the earth to the other.” He also said, “The person who governs the Muslim community must alwasy have its interest at heart and not his own. This is why Islam has put so many people to death. To safeguard the interests of the Islamic community, Islam has obliterated many tribes because they were sources of corruption and harmful to the welfare of Muslims.” (Quoted by John Laffin, ibid p. 23).

अयातुल्लाह खुमैनी (१९०३-८९) ”जिहाद, संघर्ष का बहुआयामी रूप है। वास्तव में यह पूर्ण संघर्ष है और यह बीसवीं शताब्दी के फ़ासिस्ट और कम्युनिस्ट नेताओं की संकल्पना से कहीं अधिक है। इसका अर्थ सशस्त्र युद्ध और लड़ाई है; इसका अर्थ आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव के जरिए संघर्ष करना भी है जिसका संचालन प्रचार के माध्यम से, गैर-मुसलमानों का इस्लाम में मतान्तरण करके और गैर-मुसलमान समाजों में घुस करके किया जाता है। जिहाद का अर्थ घोर प्रयास करना है और यह विश्वभर में अथक कार्रवाई की अपेक्षा करता है।” (जोन लाफ़िन, वही, पृ. १५)।

पेरिस में अपने निर्वासन काल के दौरान खुमैनी ने कहा : ”मजहबी युद्ध का मतलब सभी गैर-मुस्लिम प्रदेशों को जीतना है। इस्लामी सरकार के गठन के बाद ऐसे संघर्ष की अच्छी तरह से घोषणा की जा सकी है………तब हर स्वस्थ वयस्क पुरुष का फर्ज़ होगा कि वह इस विजय-युद्ध में स्वेच्छा से हिस्सा लें। इस विजय युद्ध का अन्तिम उद्‌देश्य धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक कुरान के कानून को लागू करना है।”

उन्होंने यह भी कहा : ”जो व्यक्ति मुसलमान समुदाय पर शासन करता है, उसके मन में हमेशा अपनी भलाई की अपेक्षा मुसलमानी समुदाय की भलाई मौजूद होनी चाहिए। इसीलिए इस्लाम ने अनेक लोगों को मौत के घाट उतारा है। इस्लामी मसुदाय के हितों की रक्षा के लिए इस्लाम ने अनेक जनजातियों का इसलिए विनाश किया कि वे भ्रष्टाचार की स्रोत थीं और मुसलमानों के कल्याण के प्रति हानिकारक थीं।” (जोन लाफ़िन, वही, पृ. २३)।

(xix) Shaikh Zahara (a leading Muslim the ologian in Cairo) : “Jihad is not confined to the summoning of troops and the establishment of huge forces. It takes various forms. From all territories of Islam, there should arise a group of people reinforced with faith, well eqipped with means and methods and let them set ot to atach theusurpers, harassing them incessantly until their abode is one of everlasting torment…. Jihad will never end…… it will last to the Day of Judgement. But war comes to a close as far as paticular group of people is concerned, it is terminated when the war aims are relized, either by the repulse of aggression and the enemy’s surrender by the signing of the covenant or by the permanent peace treaty or truce in favour of Islam.” (Quoted by John Laffin, ibid p. 22-23).

काहिरा के विद्वान शेख ज़ाहरा ने यह घोषणा की : ”जिहाद सैनिकों तथा बड़ी संखया में सैनिक बलों की स्थापना तक सीमित नहीं है। इसके अलग-अलग रूप हैं। इस्लामी देशों से लोगों के एक ऐसा मज़हबी दल उदय होना चाहिए जो पूरी तरह से ईमान से लैस हो और वह इंकार कनेवालों पर हमला करने के लिए कूच करें और उनको तब तक निरंतर उत्पीड़ित करता रहे जब तक उनका आवास स्थान हमेशा के लिए यातनागृह न बन जाए।” जिहाद कभी भी खत्म नहीं होगा।…..यह क़ियामत के दिन तक चलेगा। लेकिन लोगों के एक दल विशेष के सम्बन्ध में संघर्ष उस हालात में समाप्त हो सकता है, जब इसके उद्‌देश्य पूरे हा जाएंगे। समाप्त होने की शर्त दुश्मनों द्वारा लिखित समझौता करके आत्मसमर्पण अथवा इस्लाम के पक्ष में शांति संधि या युद्ध विराम की स्थायी संधि करना है।” (जोन लाफिन, वही, पृ. २२-२३)।

(xx) Prof. Asma Yaqoob (Karachi University) : “Jihad in its given concept denotes the meaning of an organised struggle, reform movement or resistance of Muslims living under particular circumstances, against the undivine and unjust rule of Muslims or non-Muslims.” (The Jihad Fixation, p. 217).

प्रो. आस्मा याकूब, (कराची विश्वविद्यालय) : ”जिहाद का अर्थ उसकी मौजूदा अवधारणा के अनुसार संगठित संघर्ष, सुधार अभियान अथवा परिस्थितियों विशेष में रह रहे मुसलमानों का मुसलमानों अथवा गैर-मुसलमानों के गैर-मज़हबी और अन्यायपूर्ण शासनों के खिलाफ प्रतिरोध करना है” (दी जिहाद फिक्शेसन, पृ. २१७)।

(xxi) Shaikh Muhammad as-Saleh-al-Uthaimin : “It is our opinion that whoever claims the acceptability of any existing religion today other than Islam-such as Judaism, Christianity and so forth, is a non-believer. He should be asked to repent. If he does not, he must be killed as an apostate because he is rejecting the Quaran.” (The Muslim Belief, p. 22)

शेख मुहम्मद-अस-सलेह-अल-उथेमिन (दी मुस्लिम विलीफ, पृ. २२): ”हमारी यह सम्पत्ति है कि जो कोई इस्लाम के अलावा वतर्तमान में मौजूद किसी अन्य धर्म जैसे यहूदीमत, ईसाईयत और अन्य (हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म आदि) में विश्वास रखता है, वह गैर-ईमान वाला है। उससे पश्चाताप करने के लिए आग्रह करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता है, तो उसकी धर्मत्यागी के समान हत्या कर देनी चाहिए क्यों वह कुरान को नकारा रहा है।”

(xxi) Brigadier S. K. malik (The quranic Concept of War, pp. 142-143) : “The Quranic view on war (Jihad) is, however, altogether different. According to the Book (Quran) the very initration of war is for the Cause of God (Allah). It is, therefore, controlled and conditioned by the ‘Word of God’ from its conception till culmination….. The Quranic philosophy of war is fuly integrated into the total Quranic Ideology… Jehad, the Quranic concept of total strategy, demands the preparation and application of total natonal power, and military instruments is one of its elements.”

ब्रिगेडियर एस. के. मलिक (कुरानिक कंसेप्ट ऑफ वॉर, पृ. १४२-१४३) : ”युद्ध (जिहाद) के सम्बन्ध में कुरान का मत बिल्कुल अलग है। कुरान के अनुसार युद्ध अल्लाह के लिए छेड़ा जाता है। इसलिए यह प्रारम्भ से अंत तक ‘खुदा की वाणी’ के द्वारा ही नियंत्रित होता है। युद्ध के सम्बन्ध में कुरानका दर्शन पूरी तरह से कुरान की विचारधारा से जुड़ा हुआ है…. जिहाद, जो कुरान की सम्पूर्ण रणनीति अवधारणा की मांग है कि राष्ट्र की सम्पूर्ण शक्ति तैयर करके लगा दी जाए, तथा सैन्य शक्ति जिहाद का एक घटक है।”

(xxii) Quazi Hussain Ahmed-President Jamaat-e-islami Pakistan says “Jihad is Worship.” (Jihad Fixation, p. 209)

काजी हुसेन अहमद (अध्यक्ष, जमाते इस्लामी पाकिस्तान) ”जिहाद पूजा है” (जिहाद फिक्सेशन, पृ. २०९)।

(xxiv) Prof. Mohammad Ayoob (Michigan State University, mentions in Jihad Fixation, p. 212) : “In the present context of the large number of multi-religious and multi-ethnic politics, and they form a majority of members of the international system, to talk of Jihad in the traditionally popular term of struggle of Muslims for self-rule against non-Muslims is at best antediluvian and at worst pernicious i character. It harks back to the assumed division between dar-ul-Islam (the land the Islam) and dar-ul-Harb (the land of war) which bears no correspondence to the current politicall reality, if it ever did during any earlier era.”

प्रो. मुहम्मद अयूब, (मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी) ने लिखा (जिहाद फिक्ेसेशन, पृ. २१२) : ”बहु-मज़हबी तथा बहु-नस्लीय राजनीति के, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के बहुसंखयक सदस्य हैं, वर्तमान प्रसंग में उनका, गैर-मुसलमानों के खिलाफ, स्वशासन के लिए मुस्लिमों के परंपरागत रूप से लोग प्रिय संघष्र के संदर्भ में जिहाद की बात करना दकियानूसी तो है ही, साथ ही घातक भी है। यह विश्व को पुनः कल्पित दो भागों में बाँटता है जैसे दारूल इस्लाम (इस्लामी राज्य) तािा दारुल हरब (युद्ध क्षेत्र) जिसका वर्तमान राजनीतिक सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। हो सकता है कि पहले कभी किसी काल में ऐसा किया गया हो।”

(xvv) Jonah Winters (professor Toronoto Universty, Canada) : “The various meanings of Jihad, as found in the Quran, can be broken down into the following broad categories. First, Jihad is the allegiance which one must hold before all others. Second, it is the way to confront the non-Muslim. Forth, it is a requirement for entering paradise. Fifth, it can simply be a synonym for fighting.” (The Jihad Juggernaut, p. 49).

जोनाह विन्टर्स (प्रोफेसर, टोरंटो यूनिवर्सिटी, कनाडा) : ”कुरान में जिहाद के मिलने वाले विभिन्न अर्थों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहला-जिहाद एक निष्ठा है जिसे एक व्यक्ति को अन्य सभी व्यक्तियों के समक्ष दिखानी चाहिए। दूसरा-यह गैर-मुसलमानों का विरोध करने का माध्यम है। तीसरा-यह मुसलमान के रूप में अपना दैनिक जीवन व्यतीत करने का एक निश्चित तरीका है। चौथा-यह जन्नत में प्रवेश की एक पक्की अपेक्षा है। पाँचवा-इसे साधारणतः युद्ध करने का एक पर्याय कहा जा सकता है।” (दी जिहाद जुगरनौट, पृ. ४९)।

(xvi) Ergum Mehmet Caner and Emir Fethi Caner : “Strictly speaking, Jihad means a continuing warfare against them. Despite the explanations of Islamic apologists afte the terrorists attacks, Jihad does not primarily refer to a “struggle of personal piety”. Jihad is a combat on the fronts of politics, warfare, and culture. ” (Unveiling Islam, p. 185)

इरगम मेहमत केनर तथा एमिर फिथिी केनर : ”डंके की चोट पर कहा जाए तो जिहाद का अर्थ उनके (गैर-मुसलमानों के) खिलाफ एक निरन्तर युद्ध है। आतंकवादी हमलों के बाद, इस्लाम-समर्थकों के स्पष्टीकरणों के बावजूद बुनियादी रूप से जिहाद का अर्थ ”व्यक्तिगत मज़हबी निष्ठा” के लिए संघर्ष से नहीं है। जिहाद राजनीति, युद्ध, और सांस्कृतिक मोर्चों पर एक संघर्ष है। (अनवीलिंग इस्लाम, पृ. १८५)

(xxvii) ‘John Laffin writes in ‘Holy War Islam fights’ : “Jihad is a passionately held ideal and Islam’s most dominant obsession. As already explained, the word (Jehad) means literally ‘extraordinary effort’ or ‘great stiving’ for Allah. Because this effort is nowhere more strenuous than in war, Jihad came to mean holy war. Its aim is direct-the subjection of unbelievers to Islam. In modern times, other means and ends have been attached to holy war but the fundamental principle of conquest in the name of Allah, is constant. Together the passion for action and the principle of Islamic domination have made Jihad difficult for western Christians to comprehend.

Yet the rules of concepts of holy war have remained constant for centuries. They are virtually unchangeable because they were laid down in the Koran, reinforced by the Hadiths (the traditional sayings and actions of Muhammad) endorsed by the Shari’a (the law of Islam) and confirmed by Fi-qh (the science of jurisprudence in Islam)

Differences exist in the application of Jihad, according to the four main Schools of Islamic Law, but these differences are in the superstructure of Jihad, not in its solid base. Some of Islam’s commands and promises are still powerful after thirteen centuries, such as the effect of the promise of Paradise for those who fight in the cause of Holy war.” (pp. 39-40).

“A fundamental tenent of Jihad concerns the Islamic belief that soeverignty lies in God rather than in the people; it then becomes logical that rebellion against the state is viewed not merely as an act of civil disobedience but also as an infringement of the will of Allah. Taken a steop further, it is the manifest will of Allah that all men subscribe to Islam; those who do not are obviously enemies of Allah.” (pp. 45-46).

जॉन लाफिन ने ”होली वार इस्लाम फाइट्‌स” में लिखा : ”जिहाद एक आवेशपर्ूा ढ़ंग से माना जाने वाला लक्ष्य है और यह इस्लाम का सबसे प्रबल हावीपन है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है, इसका शाब्दिक अर्थ ”अल्लाह के लिए असाधारण अथवा अथक प्रयास करना है।” क्योंकि यह प्रयास किसी भी स्थिति में युद्ध से अधिक कठिन नहीं है। इसलिए जिहाद का अर्थ मज़हबी युद्ध से लगाया जाने लगा है। इसका उद्‌देश्य इंकार करने वालों को इस्लाम स्वीकार करवाना है। आधुनकि युग में इस पवित्र युद्ध से अन्य तौर-तरीके भी जुड़ गए हैं, लेकिन अल्लाह के नाम पर विजय का मौलिक सिद्धान्त यथावत्‌ बना हुआ है। सक्रियता के प्रति आवेग और इस्लामी प्रभुता के सिद्धान्त के कारण ही, पश्चिमी देशों के ईसाइयों े लिए जिहाद को समझ पाना कठिन हो गया है।”

धार्मिक युद्ध की संकल्पनाओं के नियम सदियों से वैसे के वैसे ही बने हुए हैं। वे अपरिवर्तनीय से हैं क्योंकि उन्हें कुरान में निर्धारित किया गया है, हदीसों (मुहम्मद साहब के पारम्परिक कथन और कार्य) तथा शरीयत (इस्लामी कानून) द्वारा उनका समर्थन किया गया है और फिक्ह (इस्लाम की विधि) द्वारा उनकी पुष्टि की गई है।

इस्लामी कानून की मुखय चार धाराओं के अनुसार जिहाद को छेड़ने के सम्बन्ध में मतभेद हैं। लेकिन यह मतभेद जिहाद की ऊपनी रचना के बारे में हैं, न कि उसके बुनियादी सिद्धान्त के बारे में। तेरह सदियां बीत जाने के बाद भी इस्लाम के कुछ आदेश तथा कायदे अभी भी शक्तिशाली हैं जैसे मज़हबी युद्ध में हिस्सा लेने वालों के लिए जन्नत प्राप्ति का वायदा।” (पृ. ३९-४०)।

”इस्लामी पंथ से सम्बन्धित जिहाद का मौलिक सिद्धान्त यह है कि सम्प्रभुता लोगों के हाथों में निहित न होकर, अल्लाह में निहित है और इस प्रकार यह बात तर्क सम्मत नब जाती है कि सरकार के विरुद्ध विद्रोह को न केवल सविनय अवज्ञा के रूप में देखा जाता है बल्कि उसे अल्लाह की इच्छा का उल्लंघन भी माना जाता है। इससे भी बढ़कर यह अल्लाह की सुस्पष्ट इच्छा है कि सभी लोग इस्लाम को मानें और जो ऐसा नहीं करते हैं, प्रत्यक्षतः वे अल्लाह के दुश्मन हैं” (पृ. ४५-४६)

(xxviii) Prof. Daniel Pipes (In the Path of God’, pp. 43-44) : “War on behalf of Islam is known as Jihad and is usually translated into English as “Holy war”. But “holy war” brings to mind warriors going off to battle with God in their hearts intent on spreading the faith-someting like medieval European crusaders or soliders of the Reformation. Jihad is less a holy war than a “righteous war,” fighting carried out in accordance with the Shari’a. Of course, Jihad must be on behalf of Islam, but the emphasis of its definition is on legality, not on holiness. A muslim may go to battle with thoughts of Allah or he may dream of booty; the key is that his behaviour should confirm to the Shari’a and thereby increase the scope of its application. Not every attack on non-Muslims qualifies as Jihad; there are eleborate restrictions which, if transgressed, make the fighting non-Shar’ia and therefore not Jihad. For instance, if an attach breaks an oath, it is nt righteous war. Conversely, Jihad can be directed against Muslims who flout the Shari’a, including apostates and bridgands-hardly what “Holy war” brings to mind.

More importnat yet, Jihad is not holy war because its purpose is not to spread the faith. Non-Muslims commonly assume that Jihad calls for the militant expansion of the Islamic religion; in fact, its purpose is to spread the rule of Islamic law. The logic behind law being the central concern of Jihad has special importance for the topic of Islam and political power : to approach God properly, man must live by the Shari’a, because the Shari’a contains provisions which can only be executed by a government, the state has to be in the hands of Muslims; Muslims must therefore control territory; to do this, they need to wage wr-and thus, the provision for Jihad. If Muslims do not rule, Kafirs do; by definition, the latter do not see the Shari’a as a sacred law. For expendiency’s sake, to minimize Muslim antagonism toward their rule, non-Muslims may enforce some Islamic precepts, especially private ones, but they would never go to the effeort of implementing Shari’s publci regulations. For these reasons, Islam requires the expulsion of non-Muslims from power and their replacement by believers, by force, if necessary.

Jihad, Offensive in Dar al-Harb, defensive in Dar0-al-Islam, takes many forms-insurrection, invasion, aid to neighbours, self-defense, or guerrilla action. In addition to polities, tribes and individual warriors, can launcha a Jihad on their own. Muslim power should be extended both to areas where Muslims already live and to where they do not, for Shari’a rule (in the Islamic view) brings advantages even to non-Muslims by preventing them from engaging in practices forbidden by God. Jihad, Muslims believe, should continue until they take control of the entire planet and all mankind becomes subject to Islam’s law.

The goal has little common with the widespread image of Jihad as “Islam or the sword.” Jihad impels Muslim conquests, not Islamic conversions, leding to the political subjugation of non-Muslims, not their religious coercion. “The primary aim of the Jihad is not, as it was often supposed in the oldr european literature, the conversion by force of unbeleivers but the expansion-and also the defence-of the Islamic State.”

प्रो. डेनियल पाइप्स (इन दि पाथ ऑफ गॉड, पृ. ४३-४४) : ”इस्लाम की ओर से छेड़े गए युद्ध को जिहाद का नाम दिया गया है, और आमतौर पर अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद ‘होली वार’ (मज़हबी युद्ध) के रूप में किया जाता है। लेकिन ‘होली वॉर’ से यह आभासा होता है कि सैनिक अपने मन में अल्लाह को संजो कर अपने मज़हब का विस्तार करने हेतु लड़ने जा रहे हैं। यह कुुछ-कुछ मध्यकालीन यूरोपीय धार्मिक योद्धाओं अथवा सुधार सैनिकों जैसा ही है। जिहाद न्यायसंगत युद्ध से कम एक पवित्र युद्ध है जो शरीयत के अनुसार लड़ा जाने वाला मज़हबी युद्ध है। निःसन्देह जिहाद इस्लाम की ओर से है। लेकिन इसकी परिभाषा का बल वैधता पर है, न कि इसकी पवित्रता पर। एक मुसलमान अल्लाह के ध्यान अथवा लूट के खयाल से लड़ाई के लिए जा सकता है; मुखय बात यह है कि उसका व्यवहार शरियत के अनुसार होना चाहिए ताकि उसे लागू करने की सम्भावना बढ़े। यह जरूरी नहीं है कि गैर-मुसलमानों पर हर हमला जिहादी ही हो। ऐसी बहुत सी पाबंदियां हैं जिनका उल्लंघन होने पर लड़ाई शरियत के अनुकूल नहीं रहती। इसलिए वह जिहाद नहीं कहलाती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी हमले से कोई शपथ टूटती है तो वह मज़हबी युद्ध नहीं कहलाता है। इसके विपरीत जिहाद शरियत को न मानने वाले मुसलमानों के खिलाफ भी छेड़ा जा सकता है, जिनमें मज़हब त्यागने वाले मुस्लिम तथा लुटेरे भी शामिल हैं।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिहाद इसलिए मज़हबी युद्ध नहीं है क्योंि इसका उद्‌देश्य मज़हब को फैलाना नहीं है। आमतौर पर गैर-मुसलमान यह मानते हैं कि जिहाद का उद्‌देश्य आतंक के द्वारा इस्लामी मजहब का विस्तार करना है; वस्तुतः इसका उद्‌देश्य इस्लामी कानून का विस्तार करना है। इस्लामी कानून के सम्बन्ध में तर्कसंगत बात जिहाद है जिसका इस्लाम के विषय और राजनीतिक सत्ता के सम्बन्ध में विशेष महत्व है। अल्लाह को पाने के लिए मनुष्य को अवश्य ही शरीयत के अनुसार जीवन यापन करना चाहिए क्योंकि शरियत में ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जिन्हें सरकार द्वारा निष्पादित किया जा सकता है, राज्य का शासन मुसलमानों के हाथों में होना चाहिए; इसलिए मुसलमानों को देश पर नियन्तण के हाथों में होना चाहिए ; इसलिए मुसलमानों को देश पर नियन्तण करना चाहिए; इस उद्‌देश्य से उनके लिए यह आवश्यक है कि वे युद्ध छेड़ें और इस प्रकार जिहाद की व्यवस्था की गई है। यदि शासन मुसलमानों के हाथों में नहीं है तो शासन की बागडोर काफ़िरों के हाथों में होगी; और काफ़िर शरियत को पवित्र कानून नहीं मानते हैं। गैर-मुसलमान सुगमता के लिए अपने शासन के विरुद्ध मुसलमानों के असन्तोष को कम से कम करने के उद्‌देश्य से इस्लाम के कुछ छोटे-छोटे कायदे-कानून लागू कर सकते हैं।

लेकिन वे शरियत के सार्वजनिक नियमों को भी लागू करने का प्रयास नहीं करेंगे। यही कारण है कि इस्लाम, गैर-मुसलमानों को सत्ता से बेदखल करना जरूरी और आवश्यकता पड़े, तो बल प्रयोग करके ‘ईमान लाने वालों’, को सत्ता में लाना, आवश्यक समझता है।

तिहाद, जहाँ ‘जारुल हरब’ में आक्रामक है, वहीं ‘दारुल-इस्लाम’ में रक्षात्मक है। इस प्रकार जिहाद के कई रूप हैं-आक्रमण करना, पड़ोसियों को मदद देना, आत्मरक्षा अथवा गुरिल्ला कार्रवाई करना आदि। शासन के साथ-साथ, कबीले और अलग-अलग लड़ाकू भी अपनी ओर से जिहाद छेड़ सकते हैं। मुस्लिमों की सत्ता का विस्तार, उन क्षेत्रों में जहाँ मुस्लिम रहते हैं तथा उन क्षेत्रों में भी जहाँ वे नहीं रहते दोनों में किया जाना चाहिए क्योंकि शरियत के शासन से गैर-मुसलमानों को भी लाभ मिलता है। गैर-मुसलमानों को लाभ इसलिए मिलता है क्योंकि शरियत का शासन उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए रोकता है जिन्हें करने के लिए अल्लाह ने मना किया हैं मुसलमानों का यह विश्वास है कि जिहाद तब तक जारी रहना चाहिए जब तक पूरी पृथ्वी पर मुसलमानों का अधिकार न हो जाए और सम्पूर्ण मानवजाति इस्लामी कानून के अधीन न आ जाए।

यह लक्ष्य ”इस्लाम का अथवा तलवार” के रूप में जिहाद की व्यापक छवि से मेल नहीं खाता है। जिहाद का लक्ष्य इस्लाम में मतान्तरण न होकर मुसलमानों का विजय (राज्य) को आगे बढ़ाना है जिसके परिणामस्वरूप गैर-मुसलमानों को राजनीतिक रूप में दास बनाना है, न कि उनका मजहबी उत्पीड़न है। जिहाद का मुखय लक्ष्य वह नहीं है जिसे कि यूरोप के पुरानत साहितय में प्रायः समझा गया था अर्थात्‌ बल प्रयोग करके इंकार करने वालों का मतान्तरण, अपितु इस्लामी राज्य का वितसार करना और उसकी रक्षा करना है।

(xxix) Bat Ye’-or (Decline of Eastern Christianity under Islam’, pp. 39-40) : “the doctrine of Jihad borrowed the practice of the razzias perpetrated by the nomads but softened them with Quranic injunctions….. The aim of Jihad is to subjugate the peoples of the world to the law of Allah, decreed by His Prophet Muhammad…. As the Jihad is the permanent war, it excludes the idea of peace but authorizes temporary truces related to the political situations.”………………. TheHoly war (Jihad) regarded by Islamic theologians as one of the pillars of the faith, is incumbent on all Muslims : they have to contribute to it according to their capacities, by their persons, their property, or their writings.”

“…………….Jihad is generally transalated as ‘Holy war’ (this term is not satisfactory) : this suggests both that this war is provoked by strong religious feeling, and then that its first subject is not so much to conquer land as to Islamise the population” (p. 18).

बेट ये ओर (डिक्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी अंडर इस्लाम’) : ”जिहाद के सिद्धान्त खानाबदोशों की छापामार प्रवृत्तियों में लिया गया हैं मगर उन्हें कुरानक े आदेशों से नरम बनाया गया है। ….. जिहाद का लक्ष्य पैगम्बर मुहम्मद के आदेशानुसार संसार के लोगों को अल्लाह के कानून की अधीनता में लाना है…………….. क्योंकि जिहाद एक स्थायी युद्ध है, इसमें शान्ति की अवधारणा का बहिष्कार” किया गया है। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसारा अस्थायी युद्ध विराम का विधान किया गया हैं मज़हबी युद्ध (जिहाद) को इस्लाम के विद्वानों ने मज़हब के स्तम्भों में से एक माना है और उनके मुताबिक सभी मुसलमानों के लियेयह अनिवार्य है कि वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार अपने शरीर, सम्पत्ति अथवा लेखन से इसमें सहयोग करें।” (पृ. ३९-४०)

”…. जिहाद का अनुवाद आमतौर पर ‘पवित्र युद्ध’ के रूप में किया जाता है। (यह शब्द संतोषजनक नहीं है)। इससे दो बातों का संकेत होता है : पहला, यह युद्ध एक उग्र मज़हबी भावना से प्रेरित है और दूसरा, इसका मुखय लक्ष्य भूमि जीतना न होकर लोगों का इस्लामीकरण ळै।” (पृ. १८)।

(xxx) Jecques Ellul : “In Islam, however, Jihad is the religious obligation. It forms part of the duties that the believer must fulfil; it is Islam’s normal path to expansion. And this is found repeatedly dozens of times in the Koran. Therefore, the believer is not denying the religious message. quite the revrse, Jihad is the way he best obeys it. And the facts, which are recorded meticulously and analysed, clearly show that the Jihad is not a “spiritual war” but a real military war of conquest. It expresses the agreement between the ‘fundamental book’ and the believers practical strivings….. Further, “since the Jihad is not solely an external war, it can break out within the Muslim world itself–and wars among Muslims have been numerious but always with the same fatures.

Hence, the second important specific characteristics is that the Jihad is an instituion and not an event, that is to say, it is part of the normal functioning of the Muslim world. This is so on two counts. First, this war creates the institutions which are its consequence. Of course, all wars bring institutional changes merely by the facts that there are victors and vaniquished, but here we, are fac4d with a very different situation. The conqured populations change status (they became dhimmis), and the shari’a tends to be put into effect integrally, overthrowing the former law of the country. The conquered territories do not simply change “owners.” Rather, they are brought into a binding collective (religious) ideology-with the exception of the dhimmi condition-and are controlled by a highly perfected administrative machinery.

Lastly, in this perspectiv the Jihad is an institution in the sense that it participates extensively in the economic life of the Islamic world-like dhimmitude does, which involves a specific conception of his economic life.”…..

But it is most important to grasp that the Jihad is an institution in itself; that is to say, an organic piece of Muslim society. As a religious duty, it fits into the religious organization, like pilgrimages, and so on. However, this is not the essential factor, which derives from the division of the world in the (religious) thought of Islam. The world is divided into two regions, the dar al Islam and the dar-al-harb; in other words, “the domain of Islam” and “the domain of war.” “The world is no longer divided into nations, peoples, and tribes. Raher, they are all located en bloc in the world of war. where war is the only possible relationship with the outside world. The earth belongs to Allah and all its inhabitants must acknowledge this reality; to achieve this goal there is but one method : war. War then is clearly an institution, not just an incidental or fortuitous institution, but a constitutent part of the thought, organization, and structures of this world. Peace with this world of war is impossible. Of course, it is sometimes necessary to call a halft; there are circumstances where it is better not to make war. The Koran makes provision for this. But this changes nothing : war remains an institution, which means that it must resume as soon as circumstances permit.” (Foreword, Decline of Eastern Christinity under Islam, pp. 19-20).

जेक्यूस एलूल : ”इस्लाम में, यद्यपि जिहाद एक मज़हबी फर्ज है, इसकी गणना ‘ईमानलाने वालों’ के कर्त्तव्यों में होती है और उन्हें इसे अवश्य निभाना है; यह इस्लाम के विस्तार का सामान्य रास्ता है और कुरान में जगह-जगह इसका वर्णन आता है। इसीलिए ‘ईमान लाने वाला’ इस मज़हबी संदेश का खण्डन नहीं करता। इसके बिल्कुल विपरीत जिहाद वह रास्ता है जिसे वह सबसे अच्छी तरह अपनाता हैं सावधानी से लिखित तथा स्पष्ट रूप से विश्लेषित तथ्यों से यह साफ़ तौर पर स्पष्ट है कि जिहाद एक आध्यात्मिक युद्ध न होकर जीत के लिए एक वास्तविक सैन्य युद्ध है। यह ‘मौलिक किताब’ तथा ‘ईमानलोन वालों’ के व्यावहारिक प्रयासों कें बीच एक समझौते को व्यक्त करता है।” इसके साथ-साथ ”चूंकि यह केवल बाह्‌य युद्ध नहीं है, इसलिए यह मुस्लिम संसार में भी छिड़ सकता है-और मुसलमासनों के बीच अनेक युद्ध हुए हैं लेकिन उनकी विशेषताएं सदैव एक जैसी रहीं हैं।”

”इसलिए, दूसरा महत्वपूर्ण विशिष्ट लक्षण यह है कि जिहाद संस्थागत क्रिया है, न कि एक घटना अर्थात्‌ यह मुसलमानी संसार के सामान्य कार्यकलाप का एक अंग है। इसके दो कारण हैं : पहला, युद्ध से उसकी संस्थाओं की स्थापना होती है जो कि उसका परिणाम हैं। निः संदेह, सभी युद्धों से मात्र संस्थागत परवित्रन होते हैं, इस तथ्य से कि समजा में अब विजेतागण और दूसरे विजित हैं; लेकिन यहाँ हमारे सामने एक अलग ही स्थिति पैदा हो जाती है। विजित लोगों की हैसियत ही बदल जाती है (वे धिम्मी हो जाते हैं) और देश के पुराने कानून को फेंक कर उन पर शरियत लागू कर दी जाती हे। अतः विजित क्षेत्रों के केवल स्वामी ही नहीं बदलते बल्कि उन्हें बाध्यकारी सामूहिक (मज़हबी) विचारधारा के अन्तरगत लाया जाता है और धिम्मी स्थिति के अपवाद सहित उन पर परिपक्व प्रशासनिक तंत्र का नियंत्रण होता है।

अंततः इस परिप्रेक्ष्य में जिहाद इस अर्थ में संस्थागत है कि यह इस्लामी विश्व के आर्ािक जीवन में व्यपक रूप से उस तरह से सहभागी होता है जैसे धिम्मीपन करता है जिसमें उसके आर्थिक जीन की एक खास संकल्पना छिपी होती है।

इस बात को समझना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि जिहाद अपने आप में एक संस्था है; अर्थात् यह मुस्लिम समाज का एक मूलभूत अंग है। मज़हबी फ़र्ज के रूप में यह मज़हबी यात्राओं आदि की तरह, मज़हबी संगठन के अनुकूल है। तथापि यह वह अनिवार्य तत्व नहीं है जो कि इस्लाम के मज़हबी चिंतन से विश्व के विभाजन से उत्पन्न हो। विश्व का विभाजन दो भागों में किया गया है; दारूल-इस्लाम तथा दारूल हरबा दूसरे शब्दों में ‘इस्लामी क्षेत्र’ तथा ‘युद्ध क्षेत्र’। ‘विश्व अब राष्ट्रों, लोगों, एवं कबीलों में विभाजित नहीं रह गया है, अपितु वे सभी ऐसे युद्ध के विश्व में हैं जहाँ बाहरी विश्व के साथ युद्ध का ही एक मात्र सम्भव सम्बन्ध ळै। समस्त पृथ्वी अल्लाह की है और इसके स्वयं निवासियों को यह सच्चाई अवश्य माननी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल एक ही तरीका है-वह है युद्ध। युद्ध तब स्पष्ट रूप से एक संस्था है जो कि केवल प्रांसगिक अथवा आकस्मिक संस्था नहीं है बलिक् इस संसार की रचना, चिंतन और ंसगठन का एक घटक अंग है। इस युद्ध के विश्व के साथ शांति असम्भव है। निः सन्देह, कभी-कभी युद्ध विराम करना आवश्यक हो जाता है; ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं जिनमें युद्ध न छेड़ना बेहतर होता है। कुरान में इसकी व्यवस्था है। लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलता-युद्ध एक संस्था बनी रहती है, जिसका अभिप्राय यह है कि परिस्थितियों के अनुकूल होते ही इसे शुरू हो जाना चाहिए।” (प्राक्थन, डिक्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी अंडर इस्लाम, पृ. १९-२०)।

(xxxi) Rudolf Peters, (professor of Islamic Law at the University of Amsterdam) : ” The crux of the doctrine (of Jihad) is the existence of one single Islamic state, ruling the entire “Ummah’ [Muslim Community). It is the duty of the ‘Ummah’ to expand the territory of this state in order to bring as many people under its rule as possible. The ultimate aim is to expand the territory of this state in order to bring the whole earth under the sway of Islam and to extirpate unbelief (other religions).” (p. 3).

“the most important function of the doctrine of Jihad is that it mobilizes and motivates Muslims to take part in wars against unbelievers, as it is considered to be the fulfillment of a religious duty. this motivation is strongly fed by the idea that those who are killed on the battelfied, called martyrs (shaheed, plur, shuhadda), will go directly to Paradise. At the occasion of wars fought against unbelievers, religious texts would circulate, replete with Koranic verses and hadiths extolling the merits of fighting a Jihad and vividly describing the reward waiting in the hereafter for those slain during the fighting.” (Jihad in Classical and Modern Islam, p. 5).

रूडोल्फ पीटर, (इस्लाम कानून के प्रोफेसर, युनिवर्सिटी ऑफ एम्सटरडम) : ”जिहाद के सिद्धान्त का मर्म यह है कि सम्पूर्ण इस्लामी समुदाय (उम्मा) पर शासन करने वाला मात्र ‘एक इस्लामी राज्य’ है। उम्मा का यह फर्ज़ है कि वह इस राजय का विस्तार करे ताकि उसके शासन के अधीन अधिक से अधिक लोगों को लाया जा सकें इसका अंतिम लक्ष्य इस राज्य की सीमाओं का इतना विसतार करना है ताकि पूरी पृथ्वी पर इस्लाम का राज्य स्थापित हो जाए और अन्य पंथों को मिटा दिया जाए।” (पृ. ३)।

”जिहाद के सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह मुसलमानों को इस बात के लिए संगठित तथा प्रेरित करता है कि वे ‘इंकार करने वालों’ के विरुद्ध छेड़े गए युद्ध में भाग लें क्योंकि इसे मज़हबी फर्ज़ समझा जाता है। यह प्रेरणा इस ज़बरदस्त सोच पर आधारित है कि युद्ध के मैदान में मारे जाने वाले लोग शहीद, (या शुहदा) कहलाएंगे तथा वे सीधे जन्नत में जाएंगे। ‘इंकार करने वालों’ के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों के दौरान धार्मिक शिक्षाएँ प्रसारित-प्रचारित की जाती हैं, जिनमें कुरान की आयतें तथा हदीस होती हैं। कुरान की इन आयतों तथा इन हदीसों में जिहाद को छेड़ने के गुणों, प्रलोभनों व लाभों का वर्णन होता हैं उनमें युद्ध में मारे जाने वाले लोगों को मृत्यु के बाद मिलने वाले इनाम (जन्नत) का भी भरपूर उल्लेख होता है।” (जिहाद इन क्लासिकल एण्ड मॉडर्न इस्लाम, पृ. ५)।

(xxxii) Bernard Lewis”(The Political Language of Islam, p. 72) : “The overwhelming majority of classical theologians, jurists and (Hadith specialist)… understand the obligationof Jihad in a military sense.”

बनार्ड ल्युइस : ”अधिकतर विद्वानों, न्यायविदों तथा हदीस-विशेषज्ञों ने जिहाद के कर्त्तव्य को सैनिक अर्थ में ही लिया है।” (पौलिटिकल लैंग्वेज़ ऑफ़ इस्लाम, पृ. ७२)।

(xxxiii) Dr. K. S. Lal, (an eminent historian of Islam) : “The Quran does not permit the existence or continuance of other faiths and their religious practices. Of the 6326 ayats in the Quran, about 3900 directly or indirectly related to Kafirs, Mushriks, Munkirs, Munafiqs or non-believers in Allah and his Prophet. Broadly speaking, these 3900 ayats fall into two categories-those relating to Muslims who for their faiths will be rewarded in this as well as the rold Hereafter, and those relating to Kafirs or non-believers who are to be punished in this world, and are destined to go to hell after death.”…………………..

“The Quran reads like a manual of war on mankind rather than a charater of brotherbhood for all mankind. For people of other faiths, Jihad or permanent war, was the command of the Quran and order of the ay. Islam recommends Jihad or perpetual war on adherents of other religions to lay hold of them, bind the, strike off their heads and burn them, in the fire of hell. This makes Islam a totalitarian and terrorist cult which it has remained ever since its birth.” (Theory and practice of Muslim State in India, pp. 5-6)

डॉ. के. एस. लाल (इस्लाम के विखयात इतिहासकार) : ”कुरान अन्य पंथों के अस्तित्व और उनके मज़हबी रीति-रिवाजों के बने रहने की आज्ञा नहीं देता है। कुरान की ६३२६ आयतों में से ३९०० आयतें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से ‘काफ़िरों’, ‘मुशरिकों’, ‘मुनकिरों’, ‘मुनाफिकों’ अथवा अल्लाह एवं उसके पैगम्बर पर ‘ईमान न लाने वालों’ से सम्बन्धित हैं। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ये ३९०० आयतें दो श्रेणियों के अन्तर्गत आतीं हैं। पहली श्रेणी की आयतें उन मुसलमानों से सम्बन्धित हैं जिन्हें उनके ‘ईमान लाने’ के लिए इस संसार में तथा इस संसार के बाद पुरस्कृत किया जाएगा, और दूसरी र्श्रेणी की आयतें उन ‘काफ़िरों’ तथा ‘इंकार करने वालों’ से सम्बन्धित हैं जिन्हें इस संसार में दण्ड दिया जाना है और जो मृत्यु के बाद निश्चित रूप से जहन्नम में जाएंगे।”

”कुरान सम्पूर्ण मानवजाति के लिए भाईचारे का ग्रंथ न होकर मानवजाति के विरुद्ध एक युद्ध की नियम पुस्तिका (मैनुअल) जैसी है। अन्य पंथों के अनुयायियों के विरुद्ध, जिहाद अथवा स्थायी युद्ध, कुरान का आदेश है और यही युग का आदेश है। इस्लाम अन्य पंथों के अनुयायिों के खिलाफ़ जिहाद अथवा लगातार युद्ध की सिफ़ारिश करता है ताकि उन्हें पकड़ लिया जाए, उनके सिर काट दि जाएं और उन्हें जहन्नम की आग में जलाया जा सके। इससे इस्लाम कट्‌टारवादी तथा आतंकवादी मज़हब बन जाता है जैसा कि उसका उत्पत्ति से लेकर अब तक यही रूप रहा है। (थ्यौरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया, पृत्र ५-६)

कुरान, हदीसों, इस्लामी कानूनों एवं इस्लाम के विद्वानों के ऊपर कहे गए कथनों से पाठकों को सुस्पष्ट हो गया होगा कि जिहाद का मुखय अर्थ गैर-मुसलमानों को इस्लाम में धर्मान्तरित करना और उनके सभी देशों को अल्लाह के कानून-शरियत के अधीन लाना है चाहे इसके लिये सशस्त्र युद्ध ही क्यों न करना पड़। फिर भी कुछ मुसलमान इस्लाम को शान्ति का मज़हब कहते हैं। मगर उनके इस कथन में भी कुछ सच्चाई हैं क्योंकि जिहाद के दो चेहरे हैं : एक शान्ति का, दूसरा खुनी युद्ध का।