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भारत में जिहाद क्यों?

इतिहास साक्षी है कि भारत ने न अरेबिया और न अन्य किसी इस्लामी देश पर कभी हमला नहीं किया। फिर भी मुसलमान ६३६ एडी से ही भारत पर लगातार आक्रमण क्यों करते रहे? उसका उत्तर पाकिस्तान के विद्वान अनवर शेख ने अपनी पुस्तमक ”इस्लाम एण्ड टैरोरिज्म” (पृ. १२१) में सुस्पष्ट दिया हैः ”वास्तव में पैगम्बर मूर्तियों से घृणा नहीं करता था। वह वास्तव में भारतीय संस्कृति और उसके प्रबल धार्मिक प्रभाव का विरोधी था जिसका कि मध्यपूर्व पर भी प्रभाव था और सांस्कृतिक दृष्टि से अरेबिया भारत का एक अंग बन चुका था। इसलिए भारतीय मूल की प्रत्येक वस्तु को अपमानित, अधोपतित एवं नष्ट-भ्रष्ट किया जाना चाहिए।”

उपरोक्त कथन पूरी तरह से सही है क्योंकि इतिहासकार मानते हैं कि इस्लाम-पूर्व अरेबिया में सहिष्णुतावादी भारतीय संस्कृति का प्रभाव था। यहाँ के ‘काबा’ में अनेक देवी-देवताओं की एक साथ पूजा होती थी जो विभिन्न कबीलों के इष्ट देव थे। इनमें भारतीय देवी-देवताओं की भी पूजा होती थी।

कुरान का प्रसिद्ध भाष्यकार यूसुफ अली लिखता हैः ”यहाँ (अरेबिया में) विभिन्न रूपों में चन्द्रमा की पूजा लोकप्रिय थी…. भारत की तरह सेमिटिक धर्म में भी चन्द्रमा देवता की नर के रूप में पूजा होती थी। इसके विपरीत सूर्य (शमा) को स्त्री रूप में पूजते थे। सुप्रसिद्ध काबा और मक्का के आस पास देवी अल-लाट, देवी अल-उजा (वीनस देवी) और अल-मनात (भाग्य देवी) की पूजा होती थी।” (दी होली कुरान, पृ. १६१९-२०)

इसी प्रकार रोबर्ट मोरे अपनी पुस्तक ”दी इस्लामिक इनवेजन”, (पृ. २११-२१५) में लिखता हैः ”मैसोपोटामिया एवं टर्की के पहाड़ों से लेकर नील नदी (मिश्र देश) तक चन्द्र देव की पूजा होती थी। दक्षिणी यमन में चन् द्र देव के मन्दिरों के अवशेष्ज्ञ पाए गए हैं। इस्लाम का कलेण्डर चन्द्रमा की गति पर आधारित होता है। अरेबिया में अल-लाट, अल-उजा और अल-मनात को अल्लाह की बेटियाँ माना जाता था।”

वास्तव में पैगम्बर मुहम्मद ने इस भारतीय प्रभाव को अरेबिया में देखा, और वह इस्लाम की स्थापना के बाद से ही यहाँ से भारतीय संस्कृति को नष्ट करना चाहता था। उसे लोगों का भगवा रंग, जो कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, के कपड़े पहनना भी सहन नहीं था। हदीस मुस्लिम (खं. ३; ५१७३-७५, पृ. १३७७-७८) बतलाती हैः ”अब्दुला व अमर ने बतलाया कि अल्लाह के रूसल ने मुझे भगवा रंग के दो कपड़े पहने देखा। इस पर उन्होंने कहा ”ऐसे कपड़े अक्सर गैर-मुसलमान पहनते हैं। अतः इन्हें मत पहनो।” दूसरी हदीस में अब्दुला से पैगम्बर ने पूछाः क्यो ये कपड़े तुम्हारी माँ ने पहनने को दिए’? मैंने कहा; मैं उन्हें धो दूंगा। पैगम्बर ने कहाः उन्हें जला दो”।

इसके अलावा मुसलमानों के लिए भारत ही नहीं, किसी भी गैर-मुस्लिम देश पर हमला करने के लिए किसी कारण को ढूढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है। उनके लिए तो इतना ही काफी होता है कि वह देश इस्लामी राज्य क्यों नहीं है?

भारत में लगातार जिहाद

मुसलमान, इस्लाम के प्रारम्भ से ही, आज तक सम्पूर्ण भारत को एक इस्लामी राज्य बनाने के उद्‌देश्य से लगातार जिहाद करते चले आ रहे हैं जिसका कि हिन्दू कठोरता से विरोध करते रहे हैं। जय-विजय, पराजय और हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के इस काल खंड (६३६-२००९) को मुखयतया छः भागों में बांटा जा सकता हैः

१. हिन्दू विजय काल (६३६-७११ एडी); २. पश्चिमोत्तर भारत में संघर्ष काल (७१२-१२०६); ३. आंशिक भारत में मुस्लिम राज्य काल (१२०६-१७०७); ४. हिन्दू-मुस्लिम-ब्रिटिश संघर्ष काल (१७५७-१८५७); ५. स्वतंत्रता आन्दोलन काल (१८५७-१९४७) और ६. स्वातंत्रयोत्तर काल (१९४७-२००९)

१. हिन्दू विजय काल (६३६-७११ एडी) – इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद (५७०-६३२ एडी) और पहले खलीफा अबू बकर (६३२-६३४) के काल में भारत पर कोई जिहादी हमला नहीं हो सका। परन्तु दूसरे खलीफा उमर (६३४-६४४) ने कहा ”अल हिन्द की भूमि पर इस्लाम स्थापित होना चाहिए” (मुहम्मद इशाक, पृ. २)। उसके आदेश पर ६३६ में समुद्री मार्ग से सबसे प हला हमला उथमान अल थकवी के नेतृत्व में थाने-बम्बई पर हुआ जो कि विफल कर दिया गया। (मिश्रा, हिन्दू रेजिस्टेंस टू अर्ली मुस्लिम इनवेडर्स, पृ. १६) इसी तरह के भरोच और देवल बन्दरगाह पर दो और समुद्री हमले हिन्दुओं ने विफल कर दिए। (मिश्रा, वही, पृ. १६)

खलीफा उमर जो सब जगह इस्लाम की जीत देख रहा था, इस हार से अचम्भिरत हुआ और उसने मकरान (बिलोचिस्तान) के सड़क मार्ग से हमला करने की सोची। मगर इराक के गवर्नर अबू मूसा ने परामर्श दिया कि वह फिलहाल हिन्द के बारे में भूल जाए (मिश्रा, वही, पृ. १७)। इसके बाद तीसरे खलीफा उस्मान (६४४-६५६) ने हमला करने से पहले हिन्द व सिंघ के हालात जानने के लिए हकीम को भेजा जिसने लौटकर परामर्श दिया कि ”एक छोटी सेना वहाँ फौरन मारी जाएगी और बड़ी सेना जल्दी ही भूखों मर जाएगी” (चचनामा, खं. १, पृ. ५९-६०; मिश्रा वही, पृ. १७) अतः खलीफा ने भारत पर हमला करने का विचार ही छोड़ दिया। चौथे खलीफा अली (६५६-६६०) ने एक दल भेजा। मगर सारी मुस्लिम सेना हिन्दुओं के हाथों मारी गई। (इलियट एवं डाउसन, खं. १, पृ. ११६, मिश्रा वही पृ. १८)। पाँचवो खलीफा मुवैया (६६१-६८०) के काल में सिंध को जीतने के लिए मुसलमानों के सभी ६ हमले हिन्दुओं ने विफल कर दिए (चचनामा, खं. १, पृ. ६१-६२; मिश्रा वही, पृ. १८)

इसे बाद ६९५ में जब अल-हज्जाक इराक का गवर्नर हुआ तो उसने काबुल व जाबुल पर हमले के आदेश दिए। मगर ये आक्रामक भी हिन्दुओं के हाथों पराजिक हुए (मिश्रा वही, पृ. १८)। इस प्रकार मुसलमानों के भारत पर ६३६ से ७१० एडी तक सभी दसों जिहादी हमले विफल रहे।

२. पश्चिमोत्तर भारत में संघर्ष काल (७१२-१२०६)- पश्चिमोत्तर के तीनों हिन्दू राज्यों-सिंघ, काबुल और जाबुल ने लगभग पांच सौ वर्षों तक मुसलमानों से टक्कर लीं। काबुल पराजय के बाद हज्जाज ने सिंघ पर हमला करने के लिए पहले अब्दुला ओर बाद में बुदेल को भेजा। परन्तु ये दोनों ही हिन्दुओं के हाथों मारे गए (चचनामा, खं. १, पृ. ७१-७२, मिश्रा, वही, पृ. १९)। इससे आक्रोशित हज्जाज ने ७११ में अपने दामाद मुहम्मद बिन कासिम को एक बड़ी सेना के साथ विंध पर हमला करने को भेजा। यहाँ ब्राह्मणों के अंध-विश्वास, बौद्धों और उसके वजीर सिस्कार के विश्वासघात के कारण सिंघ नरेश दाहिर संयोगवश युद्ध करते हुए जून ७१२ में मारा गया। उसकी बहादुर लाड़ो रानी ने अपने समस्त आभूषण और सरकारी खजाना हिन्दू योद्धाओं को पुरस्कार में देकर उन्हें युद्ध के लिए उत्साहित किया। परन्तु ७१४ तक सिंघ पूरी तरह पराजित हो गया। नए खलीफा सुलेमान ने द्वेषवश कासिम को बुलाकर जेल में डाल किया, जहाँ वह मर गया (ई. डा. खं.१, पृ. ४३७) कासिम के जाते ही सिंघ के अधिकांश बलात धर्मान्तरित मुसलमान पुनः हिन्दू धर्म में आ गए।

काबुल ओर जाबुल के हिन्दू राजा ६५० से ८६० तक अरबों के साथ कभी हार कभी जीत के साथ संघर्ष करते रहे। परन्तु ८७० में अरबों ने शान्ति संधि के प्रस्ताव के बहाने मिलने पर जाबुल के निहत्थे हिन्दू राजा की धोखे से हत्या कर दी। (ई. डा. खं. २, पृ. १७६-१७८, मिश्रा वही, पृ. ३८)

मगर काबुल के शाही वंश ने सुबुक्तगीन (९७७-९९७) और महमूद गजनवी (९९८-१०३०) से अनेक संघर्ष किए। काबुल के हिन्दू राजा जयपाल ने न केवल सुबुक्तगीन को भारत पर हमला करने से रोका, बल्कि (९८६-९८७) में गजनी पर हमला भी किया। जहाँ कई दिनों तक युद्ध चला तथा जयपाल जीत के कगार पर था और सुबुक्तगीन व मुहम्मद दोनों ही निराश थे। परन्तु यकायक बर्फीली आँधी के कारण विवश हो जयपाल को संधि करनी पड़ी।

सुबुक्तगीन के बाद ९९८ में महमूद गजनी की गद्‌दी पर बैठा जिसके बारे में डॉ. साचू लिखता हैः ”महमूद के लिए सारे हिन्दू काफिर हैं। वे सभी जहन्नम भेजने योग्य हैं क्योंकि वे लॅटने से इन्कार करते हैं।” (पी.एन.ओक, भारत में मुस्लिम सुलतान खं.१, पृ. ५९) तथा प्रो. हबीव के अनुसार ”उसने प्रतिज्ञा की ि कवह हर साल हिन्दुोिं पर जिहाद का कुठार चलाएगा।” (ओक वहीं, पृ. ६१)

महमूद ने अपने राज्यकाल (९९८-१०३०) में भारत पर लूट-खसूट, लाखों हिन्दुओं की निर्मम हत्या तथा हजारों मंदिरों के विनाश के साथ सत्रह हमले किए। इसका राजा जयपाल ने १००१ में दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, व कालिंजर के राजाओं की सैनिक सहायता से जबरदस्त विरोध किया। मगर दुर्भाग्य से उसके हाथी के वि दक जाने से सेना में हडबड़ी मच गई व जयपाल बन्दी बना लिया गया। बाद में उसने आत्मग्लानि के कारण आत्महत्या कर ली। (मिश्रा वही, पृ. ४२-४३)। परन्तु जयपाल के पड़-पोते राजा भीमपाल ने महमूद को १०१५ में हराया। लेकिन १०२६ में भीमपाल भी देश रक्षा में शहीद हो गया। संक्षेप में काबुल के इस शाही वंश ने तीस वर्षों तक महमूद का जबरदस्त मुकाबला किया। इसके बाद एक सौ पचास वर्षों (१०३०-११७५) तक अफगानिस्तान में शान्ति रही।

११७५ में, शहाबुद्‌दीन गौरी जिसकी बौद्ध धर्म और इस्लाम में समान आस्था थी, गद्‌दी पर बैठते ही सुन्नी मुसलमान हो गया। हालांकि शहाबुद्‌दीन ने ११७५ में मुलतान जीता मगर ११७८ में गुजरात के चालुक्यों ने उसे हरा दिया। पर उसकी हत्या नहीं की। इसी प्रकार की भूल पृथ्वीराज चौहान ने की। उसे शहाबुद्‌दीन को पन्द्रह बार हराया (पृथ्वीराज रासौ चन्द्रवरदाई) मगर हर बार उसे माफ करके छोड़ दिया। ११९२ में शहाबुद्‌दीन ने पृथ्वीराज चौहान पर हमला किया तथा बन्दीकर उसकी हत्या कर दी।

यदि पृथ्वीराज चौहान मुसलमान सुल्तानों की धोखाधड़ी, छल-कपट व विश्वासघात की इस्लामी मानसिकता को जानता होता और उसे हर बार माफ न करके, मार देता तो भारत का आज इतिहास कुछ अलग ही होता। ११९३ में कन्नौज का राजा जयचन्द भी मुसलमानों से पराजित हो गया तथा १२०६ में भारत में पहली बार इस्लामी राज्य स्थापित हुआ।

इस तरह सिंध, काबुल और जाबुल के वीर शिरोमणि हिन्दू राजाओं ने पाँच सौं सत्तर वर्ष तक भारत में इस्लामी राज्य स्थापित नहीं होने दिया। मुसलमानों की अधिकांश विजय छल, कपट और धोखे से हुई न कि वीरता व पराक्रम के फलस्वरूप। यहाँ यह बताना उचित होगा कि यूरोप, अफ्रीका व एशिया के अनेक देश इस्लामी आँधी के पहले १०० वर्षों में ही नतमस्तक हो गए जबकि भारत ५७० वर्षों तक मुस्लिम आक्रान्ताओं को खदेड़ता रहा।

३. आंशिक भारत में मुस्लिम राज्य काल (१२०६-१७०७)- इस काल खं डमें मुसलमानों ने अनेक वंशों ने विभिन्न कालों तक राज कियाः जैसे कुतुबुद्‌दीन ऐबक (१२०६-१२१०), अलाउद्‌दीन खिलजी (१२९६-१३१६); मुहम्मद बिन तुगलक (१३२६-१३५१); फीरोजशाह तुगलक (१३५७-१३८८); बाबर (१५१९-१५३०); शेरशाह सूरी (१५४०-१५४५); अकबर (१५५६-१६०५); शाहजहाँ (१६२८-१६५८); और औरंगजेब (१६५८-१७०७)।

इन पाँच सौं वर्षों में मुस्लिम सुलतानों ने इ्रस्लामी शरियाह के अनुसार हिन्दुओं पर असीम निर्मम अत्याचार किए। उनका इस्लाम में बलात्‌ धर्मान्तरण एवं सामूहिक कत्ले आत किया, युवाओं को गुलाम बनाया, लाखों स्त्रियों को लूटा, विदेशों में बेचा एवं हजारों मन्दिरों को तोड़ा। इनका प्रमाणिक वर्णन अनेक मुस्लिम और गैर-मुस्लिम सभी इतिहासकारों ने किया है जिनकी एक झाँकी जयदीपसेन द्वारा लिखित ‘भारत में जिहाद’ में देखी जा सकती है।

इन अमानुषिक अत्याचारों में मुस्लिम आक्राताओं के साथ अनेक सूफी संत जैसे मुउनुद्‌दीन (१२३३), शेख फरीदुद्‌दीन (१२६५), शेख निजामुद्‌दीन (१३३५) आदि आए। इन्होंने एवं सशस्त्र दोनों प्रकार की जिहाद द्वारा उत्तर प्रदेश, बंगाल दक्षिण भारत एवं कश्मीर में भारी संखया में हिन्दुओं का धर्मान्तरण किया (के.एस. लाला, इंडियन मुस्लिम्स हू आर दे, पृ. ५८-७०)

पर प्रश्न उठता है कि इतने पर भी हिन्दू भारत में कैसे बचे रहे? इसका उत्तर प्रसिद्ध सूफी सन्त अमीर खुसरों देता हैः ”अगर हनाफी कानून का भारत में प्रचलन न हुआ होता, जो हिन्दुओं को जजिया कर देने पर जीवन की टूट प्रदान करता है, तो हिन्दू जड़ शाखा सहित पूरी तरह समाप्त हो गए होतो— ‘बधिम्महा गढ़ना बुदि रुखसत-ई शरना मंडी नाम. ई हिन्दु जी स्ल ता फर’ (अमीर खुसरो आशिकाह, सं. राशि अहमद अंसारी, अलीगढ़ १९१७ पृ. ४६) हनीफी कानून के अलावा सभी मुस्लिम कानून गैर-मुसलमानों को ‘इस्लाम या मौत’ में से एक की इजाजत देते हैं। इसके अलावा १५६४ में जजिया हटा लिया गया जिसे औरंगजेब ने १६७९ में दुबारा लगा दिया।

संक्षेप में यह कहना उचित होगा कि इतने अत्याचारों के बाद भी मुसलमान इस अवधि में समस्त भारत पर कभी कब्जा नहीं कर सके क्योंकि एक तरफ साधु सन्तों ने भक्ति आन्दोलन के माध्यम से जन चेतना जगाई तथा विरोध किया और दूसरी तरफ लगभग सभी राजाओं ने अपने अपने क्षेत्र में मुसलमानों से डटकर संघर्ष किया।

प्रारम्भ में असम के राजा ने बखतियार खिलजी को १२०५ में आगे नहीं बढ़ने दिया तो दक्षिण में विजयनगरम्‌ के राजाओं ने १३५०-१५६५ तक यवनों से टक्कर ली। इन्होंने तत्कालीन राजनीति को नियंत्रित किया। (मजूमदार आदि वही, पृ. ३०७) पर सुलतान आदिलशाह के हमले (२३.१.१५६५) में महाराजा रामा राजा के दो मुस्लिम सेनापति जिनके अधीन ७०००० से ८०००० सैनिक थे, आदिलशाह की सेना में मिल गए। अतः विजयनगरम्‌ राज्य समाप्त हो गया (वोस्टोम-दी लीजेसी ऑफ जिहाद, पृ. ६५३)। इसी प्रकार पश्चिमी भारत में राजपूतों-राणा कुम्भा (१४३०-१४६९), राणा सांगा (१५०९-१५२७) और मेवाड़ सूर्य महाराणा प्रताप (१५३०-१५६९) ने मुस्लिम सुलतानों एवं अकबर से टक्कर ली। इसी तरह औरंगजेब के काली में (१६५८-१७०७) दक्षिण में छत्रपति शिवाजी (१६४६-१६००) एवं अन्य मराठों से संघर्ष किया तो उत्तर में सिख गुरुओं ने सशस्त्र विरोध किया। गुरु अर्जुन देव ने जहाँगीर (१६११) के काल में; और बाद में गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब के राज में इस्लाम का विरोध करते हुए अपने तीनों शिष्यों-भाई मतिदास, सतीदास एवं दयालदास सहित १६७५ में अपना बलिदान किया। यहाँ गोकुला जाट (६९६९) और नारनौल के सतनामियों ने सशस्त्र विरोध (१६७२) किया। इसी काल में गुरु गोविन्द सिंह ने धर्म और देश की रक्षार्थ सिखों का सैनिकीकरण किया। उनके चारों बेटे देश के लिए बलिदान हो गए। दो दीवारों में चुने गए और दो शहीद हो गए। १६०८ में एक धर्मान्ध अफगान ने गुरु की हत्या कर दी। इसकी प्रतिक्रिया में बन्दा वैरागी के गुरु के बच्चों के हत्यारे वजीरखां की हत्या कर दी। मगर मुगल सेना ने बन्दा वैरागी के बेटे को उनके ही सामने व स्वंय उनकी हाथी से कुचलवा कर हत्या कर दी गई।

सार की बात यह है कि इन पांच सौ वर्षों में गुरु नानकदेव, समर्थ गुरु रामदास आदि सन्तों और हिन्दू राजाओं ने आततायी मुस्लिमों का डटकर विरोध किया और उन्हें चैन से राज नहीं करने दिया। काश! ये हिन्दू राजा यदि अपना अहम्‌ एवं क्षेत्रीयता की संकुचित भावना को छोड़कर मुस्लिम आक्रान्ताओं को अपने धर्म व देश का सांझा शत्रु मानकर एक जुट होकर संघर्ष करते तो भारत में इस्लाम तभी समाप्त हो गया होता।

४. हिन्दू-मुस्लिम ब्रिटिश संघर्ष काल (१७०७-१८५७)- औरंगजेब के निधन (३ मार्च १७०७) के बाद मुगल साम्राज्य-डकन, बंगाल और अवध में विभाजित हो गया। दिल्ली की सत्ता कमजोर हो गई। (मजूमदार आदि, वही पृ. ५३९)। इधर मराठाओं में पेशवा एक प्रबल शक्ति के रूप में उभरे जिन्होंने अनेक क्षेत्र मुसलमानों से छीनकपर उत्तर भारत तक अपना राज्य स्थापित किया।

पंजाब में सिखों व उत्तर प्रदेश व हरियाणा में सूरजमल जाट (१७५६-१७६३) प्रभावशाली रहे। सिखों ने पहले अफगानिस्तान के सुलतान नादिरशाह (१७३९) और इसके सेनापति एवं बाद में सुलतान अब्दुलशाह अब्दाली के पाँच आक्रमणों (१७४७-१७५९) का विरोध किया। मग रवह (१७६१) में मराठों को पराजित कर १२ दिसम्बर १७६२ के लाहौर वापिस चला गया जिसका सिखों ने पीछ किया तथा १७६७ में वह भारत से पूरी तरह चला गया। १७७३ तक पश्चित में अटक तक सिखों का राज हो गया तथा महाराजा रणजीत सिंह (१७८०-१८३९) ने पंजाब, कश्मीर एवं पेशावर तक अपना एक सुदृढ़ राज्य स्थापित कर लिया। हालांकि मराठों, सिखों व जाटों ने मुसलमानों का डटकर विरोध किया मगर वे एक साथ मिलकर मुस्लिम राज्य समाप्त करने के लिए कोई प्रभावी रणनीति में सफल नहीं हो सके। मराठे शिवाजी के हिन्दू पद्‌पादशाही स्थापित करने के सपनों को पूरा न कर सके।

इस काल खं डमें १६०८ में भारत में, व्यापार के लिए आए ब्रिटिशों ने धीरे-धीरे एक मजबूत सेना तैयार कर ली और एक-एक कर कोरामंडल (१७४६), फिर मद्रास (१७४८), मैसूर (१७६७, १७७९ एवं १७८९) और पलासी के युद्ध (२३.०६.१७५७) में बंगाल पर कब्जा कर लिया। उत्तर भारत में जाटों एवं सिखों के प्रबल विरोध के बावजूद अंग्रेज साम-दाम, दण्ड-भेद की नीति से १८५७ तक पूरे भारत के शासक हो गए। इस काल खं डमें हिन्दू अपने शत्रुओं-अंग्रेजों और सुलतानों के विरुद्ध सफल न हो सके। परन्तु मुसलमानों ने अपने इस्लामी भारत के सपने नहीं छोड़े।

५. स्वतंत्रता आन्दोलन काल (१८५७-१९४७)- भारत का अंग्रेजों के विरुद्ध पहला स्वतंत्रता संग्राम १८५७ में प्रारम्भ हुआ। यह आन्दोलन जन मानस का था, किसी तेजस्वी दूरदर्शी नेता के मार्ग दर्शन में योजनाबद्ध नहीं था। अतः कानपुर (बिठूर) के नाना साहेब पेशवा के बाद यह आन्दोलन प्रभावहीन हो गया। मुसलमानों ने खोई सत्ता पाने के अनेक प्रयास किए। मगर अंग्रेजों ने इन सबको कुचल दिया। इस काल में महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द एवं योगीश्री अरविन्द ने राष्ट्र चेतना जागृत की। उधर अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों को ‘बाँटो और राज करो’ की नीति अपनाई तथा मुसलमानों का परोक्ष रूप में समर्थन किया। साथ ही हिन्दुओं का विरोध दबाने के लिए अंग्रेज ह्यूम ने १८८५ में कांग्रेस की स्थापना की जो ३० साल तक अप्रभावी रही। हालांकि बाल गंगाधर तिलक ने इसे आक्रामक बनाने का प्रयास किया।

मुसलमानों ने १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना की जो अंग्रेजों के संरक्षण के कारण सैदव कांग्रेस पर हावी रही। १९२० के बाद कांग्रेस पर गाँधी-नेहरू का वर्चस्व हो जाने के कारण यह मुस्लिम लीग के कट्‌टरपन के आगे नतमस्तक हो गई।

कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के मार्च १९४० के द्वि राष्ट्र सिद्धान्त के आधार पर भारत विभाजन तो माना परन्तु डॉ. अम्बेडकर एवं श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पाकिस्तानी नेताओं के हिन्दू-मुस्लिम आबादी की अदला-बदली के तर्कसंगत सिद्धान्त को नहीं माना। इसमें गाँधी-नेहरु कांग्रेस और भारतीय मुसलमानों दोनों के ही अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थ थे। नेहरू कांग्रेस मुस्लिम वोटों से लम्बे समय तक राज करना चाहते थे; और मुसलमान यहाँ बसे रहकर तेजी से आबादी बढ़ाकर शेष भारत को भी इस्लामी राज्य बनाना चाहते थे।

वास्तव में अगस्त १९४७ से पहले हिन्दू मुस्लिम जनसंखया की अदला-बदली ने करना भारत विभाजन से भी ज्यादा हानिकारक सिद्ध हुआ है। पाकिस्तान ने तो लाखों हिन्दुओं की हत्या, धर्मान्तरण व निष्कासन करके अपने देश को लगभग हिन्दू विहीन कर लियाख मगर देश द्रोही नेहरू ने भारत को हिन्दू राज्य न बनाकर हिन्दुओं के साथ महान विश्वासघात किया। हिन्दुओं को स्वतंत्रता नहीं मिली बल्कि उनका देश काटकर उन्हें दे दिया जो पिछले १३०० वर्षों से भारत में इस्लामी राज्य स्थापित करने के लिए जिहाद कर रहे थे।

सच्चाई यह है कि अंग्रेजों के विरुद्ध सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता का आन्दोलन मुखयतया हिन्दुओं ने ही चलाया था। मुसलमानों ने तो पाकिस्तान के लिए आन्दोलन में भाग लिया। अंग्रेजों ने जाने से पहले देश बाँट कर, जहाँ हिन्दुओं को सजा दी वहीं मुसलमानों को पाकिस्तान का पुरस्कार दिया। मगर उन्होंने भी जाने से पहले हिन्दू मुस्लिम आबादी की अदला-बदली न करके हिन्दुओं के साथ दूसरा विश्वासघात किया। मुझे तो इस अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय में अंग्रेजों-मुसलमानों और नेहरू की मिली भगत प्रतीत होती है जो कि सम्भतः पहले से ही तयह हो।

इसके अलावा जब विभाजन का आधार ही द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त था तो सारे मुसलमानों को पाकिस्तान में ही जाकर बसना चाहिए जिनके लिए इतना बड़ा भूभाग दिया गया। उनका भारत में बसे रहना अनैतिक है। मगर यह अनैतिकता जिहाद के उद्‌देश्य पूर्ति के सामने महत्वहीन है। नेहरू व बहुसंखयक हिन्दू-कांग्रेस ने मुस्लिमों को यहां बसाकर जो घाव हिन्दुओं को दिए हैं वे कभी भरेंगे नहीं। वास्तव में कांग्रेस ने भारत के इस्लामी जिहाद में अंसारो (सहायकों) और मुजाहिदों (योद्धाओं) की भूमिका निभाई थी जिसे वे आज तक भी सच्चाई के साथ निभा रहे हैं और सम्भवतः शेष भारत के इस्लामी राज्य बनने तक निभाते रहेंगे।

६. स्वातंत्र्‌योत्तर काल (१९४७-२००९) विभाजन के बाद भारत को सेक्यूलर राज्य दर्जा दिया गया। साथ ही भाषायी और धार्मिक अल्पसंखयकों को अनुच्छेद २५- से ३० तक में विशेष अधिकार दिए गए जो कि सेक्यूलरिज्म की अवधारणा के विरुद्ध हैं। मगर विडम्बना यह है कि अल्पसंखयकों-मुसलमानों व ईसाईयों को, जिस सेक्यूलरिज्म के आधार पर विशेष सुविधाऐं दी जा रही हैं, वे सैक्यूलरिज्म में विश्वास हीं नहीं करते हैं। वे चाहते हैं कि राज्य तो सेक्यूलर रहे ताकि वे सभी धार्मिक व राजनैतिक अधिकारों का लाभ उठाते रहें, परन्तु उन्हें सैक्यूलरिज्म से मुक्त रखा जाए।

हमारे उपरोक्त कथन की पुष्टि इस्लामी साहित्य के विद्वान प्रो. मुशीरूल हक अपनी पुस्तक ‘इस्लाम इन सेक्यूलर इंडिया’ में लिखते हैं-

(i) ”भारतीय मुसलमानों में, एक छोटे से वर्ग को छोड़कर, बहुसंखयक समाज किसी भी प्रकार से सैक्यूलर नहीं हैं।” (पृ. १)

(ii) उनमें से अधिकांशों (उलेमाओं) का विश्वास है कि राज्य तो सैक्यूलर रहे, मगर मुसलमानों को सैक्यूलरिज्म से बचाया जाए।” (पृ. १२)

(iii)”मुसलमानों को सेक्यूलरिज्म और सेक्यूलर राज्य की अवधारणाओं को शरियत के आधार पर स्वीकृत या अस्वीकृत करना होगा। सेक्यूलर राज्य जैसा हम देख चुके हैं, इस्लाम के इतिहास में भी है। अतः स्वीकार्य है। लेकिन सेक्यूलरिज्म का सिद्धान्त इस्लाम की मान्यताओं के अनुकूल नही हैं। (पृ. १५)

इसी भावना से प्रेरित हो, जमाते इस्लामी नेता सैयद अहमद हुसैन ने ७ फरवरी १९६१ को औरंगाबाद में कहा- ”क्या मुसलमान अपने तमाम इस्लामी सिद्धान्तों को छोड़कर सेक्यूलरिज्म की बढ़ती हुई धारा में बह जाएँगे? धारा के प्रवाह को ही बदल देंगे और यहाँ इस्लामी राज्य स्थापित करेंगे? यह एक गम्भीर चुनौती है जो हर मुसलमान के दिल हौर दिमाग को झकझोर रही है। इस्लाम के अनुयायियों का दावा है कि इस्लाम की उत्पत्ति ही विश्व में इस्लाम की स्थापना के लिए हुई है। हमें तो भारत में सेक्यूलर राज्य को बदलना है और उकी जगह इस्लामी राज्य बनाना है।” (बी.डी. भारती, दी हिन्दू पृ. १८)

इसी प्रकार मलेशिया के विद्वान लेखक सैयद मुहम्मद नकीब अल अतरस, अपनी पुस्तक ”इस्लाम, सेक्यूलरिज्म ऑफ दी फ्यूचर” में लिखते हैं-

(i) ”इस्लाम स्वयं सेक्यूलर या सेक्यूलरीकरण और सेक्यूलरवाद की अवधारणाओं और उनके प्रयोगों को पूरी तरह से नकारता है; क्योंकि वे उसके अंग नहीं हैं और वे इस्लाम से सभी बातों में विभिन्न हैं; और वे पश्चिमी ईसाई धर्म के अनुभवों के बौद्धिक इतिहास के अंग और उसके स्वभावतः अनुरूप हैं।” (पृ. २३)

(ii) ”सेक्यूलरिज्म केवल गैर-इस्लामी विचारधारा (दर्शन) ही नहीं, बल्कि सरासर इस्लाम विरोधी है और मुसलमानों को चाहिए कि जहाँ भी इसे पाएँ-अपनों के बीच अथवा अपने मन में, इसका तीव्र विरोध करें और कुचल दें क्योंकि यह सच्चे धर्म के लिए घातक विष है।” (पृ. ३८)

(iii) ”सेक्यूलरीकरण इस्लामी जगत की न केवल पूर्णतया एक गैर-इस्लामी अभिव्यक्ति है, बल्कि यह पूर्णतया इस्लाम विरोधी भी है।

अन्त में, सबसे आपत्तिजनक और आश्चर्यजनक तो यह है कि जब मुसलमान स्वयं सेक्यूलरिज्म का दृढ़ता से विरोध करते हैं तो ऐसे सेक्यूलरिज्म विरोधयों को, सेक्यूलरिज्म के नाम पर सरकार एवं सभी राजनैतिक पार्टियाँ क्यों समर्थन करती हैं।