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अध्याय -०९ जिहाद क्यों? part 1

जिहाद : क्या और क्यों ?

इस्लाम एक धर्म-प्रेरित मुहम्मदीय राजनैतिक आन्दोलन है, कुरान जिसका दर्शन, पैगम्बर मुहम्मद जिसका आदर्श, हदीसें जिसका व्यवहार शास्त्र, जिहाद जिसकी कार्य प्रणाली, मुसलमान जिसके सैनिक, मदरसे जिसके प्रशिक्षण केन्द्र, गैर-मुस्लिम राज्य जिसकी युद्ध भूमि और विश्व इस्लामी साम्राज्य जिसका अन्तिम उद्‌देश्य है। इसीलिए जिहाद की यात्रा अन्तहीन है।

अध्याय -०९ जिहाद क्यों?
अध्याय -१० क्या करें?
अध्याय-०१ प्राक्कथन
अध्याय-०२ कुरान में जिहाद
अध्याय-०३ हदीसों में जिहाद
अध्याय-०४ फ़िकहों में जिहाद
अध्याय-०५ शब्दकोशों में जिहाद
अध्याय-०६ विश्व ज्ञानकोशों में जिहाद
अध्याय-०७ विद्वानों की दृष्टि में जिहाद
अध्याय-०८ जिहाद के दो चेहरे
कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला

जिहाद क्यों?

अब दूसरा प्रश्न उठता है कि आखिर जिहाद क्यों? ६२३ एडी से लेकर आज तक सारे विश्व में मुसलमान ‘अल्लाह के लिए जिहाद’ के नाम पर करोड़ों निरपराध गैर-मुसलमानों की हत्या क्यों करते आ रहे हैं? प्रेम-शान्ति और भाई चारे के धर्म का दावा करने वाला इस्लाम आखिर इन मासूकों की लगातार हत्याएं करके क्या प्राप्त करना चाहता है? आखिर इस खूनी जिहाद का उद्‌देश्य क्या है?

इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर और जिहाद का उद्‌देश्य इस्लाम के धर्म-ग्रंथों-कुरान और हदीसों में सुस्पष्ट दिया गया है। देखए कुछ प्रमाण-

(१) ”तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फितना (उपद्रव) बाकी न रहे और ‘दीन’ (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह के लिए हो जाए”। (कुरान मजीद ८ः३९, पृ. ३५४)

(२) ”वही है जिसने अपने ‘रसूल’ को मार्ग दर्शन और सच्चे ‘दीन’ (सत्यधर्म) के साथ भेजा ताकि उसे समस्त ‘दीन’ पर प्रभुत्व प्रदान करे, चाहे मुश्रिकों को नापसन्द ही क्यों न हो”। (९ः३३, पृ. ३७३)

(३) पैगम्बर मुहम्मद ने मदीना के बैतउल मिदरास में बैठे यहूदियों से कहाः ”ओ यहूदियों! सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके ‘रसूल’ की है। यदि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो तो तुम सुरक्षित रह सकोगे।” मैं तुम्हें इस देश से निकालना चाहता हूँ। इसलिए यदि तुममें से किसी के पास सम्पत्ति है तो उसे इस सम्पत्ति को बेचने की आज्ञा दी जाती है। वर्ना तुम्हें मालूम होना चाहिए कि सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके रसूल की है”। (बुखारी, खंड ४ः३९२, खंड ४ः३९२, पृ. २५९-२६०, मिश्कत, खंड २ः२१७, पृ. ४४२)।

(४) पैगम्बर मुहम्मद ने अपने जीवन के सबसे आखिरी वक्तव्य में कहाः ”हे अल्लाह! यहूदियों और ईसाइयों को समाप्त कर दे। वे अपने पैगम्बरों की कबरों पर चर्चे (पूजाघर) बनाते हैं अरेबिया में दो धर्म नहीं रहने चाहिए।” (मुवट्‌टा मलिक, अ. ५११ः१५८८, पृ. ३७१)

(५) पैगम्बर मुहम्मद ने मुसलमानों से कहा ”जब तुम गैर-मुसलमानों से मिले तो उनके सामने तीन विकल्प रखोः उनसे इस्लाम स्वीकारने या जिजिया (टैक्स) देने को कहा। यहदि वे इनमें से किसी को न मानें तो उनके साथ जिहाद (सशस्त्र युद्ध) करो।” (मुस्लिम, खं ३ः ४२४९, पृ. ११३७; माजाह, खं. ४ः २८५८, पृ. १८९-१९०)

“The ultimate objective of Islam is to abolish the lordship of man over man and bring him under the rule of the One God. To stake everything you have – including your lives – to achieve this purpose is called Jihad. The Prayer Fasting, Alms giving and Pilgrimage, all prepare you for Jihad (p. 285) “If you are a true follower of Islam, you can neither submit to any other ‘Din’, nor can you make Islam a partner of it. If you believe Islam to be true, you have no alternative but to exert your utmost strength to make it prevail on earth; you either establish if or give your lives in this struggle”. (p. 300)

यानी ”इस्लाम का अन्तिम उद्‌देश्य मनुष्य के ऊपर से स्वामित्व समाप्त करना और इसे एक परमात्मा (अल्लाह) की अधीनता में लाना है। इसके लिए तुम्हें अपना सब कुछ अपनी जिन्दगी सहित, जो कुछ तुम्हारे पास है, दाव पर लगाना है और इस उद्‌देश्य को प्राप्त करना जिहाद कहलाता है। नमाज, रोजा, जकात और हज्ज आदि सब तुम्हें इस जिहाद के लिए तैयार करते हैं” (पृ. २८५)। ”यदि तुम इस्लाम के सच्चे अनुयायी हो तो तुम न किसी अन्य ‘दीन’ (धर्म) के प्रति अपने को समर्पित कर सकते हो और न तुम इस्लाम को उसका सहभागी बना सकते हो। यदि तुम इस्लाम को सच्चा धर्म मानते हो तो तुम्हें इसे सारे विश्व में फैलाने के लिए अपनी सारी शक्ति लगाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। अतः या तो तुम इसे सारे विश्व में स्थापित कर दो अथवा इस संघर्ष में अपने जीवन का बलिदान कर दो।” (पृ. ३००)

अतः कुरान, हदीसों एवं मुस्लिम विद्वानों के अनुसार जिहाद के उद्‌देश्य है-

(१) गैर-मुसलमानों को किसी भी प्रकार से मुसलमान बनाना; (२) मुसलमानों के एक मात्र अल्लाह और पैगम्बर मुहम्मद में अटूट विश्वास करके तथा नमाज, रोजा, हज्ज और जकात द्वारा उन्हें कट्‌टर मुसलमान बनाना; (३) विश्व भर के गैर-मुस्लिम राज्यों, जहाँ की राज व्यवस्था सेक्लयूरवाद, प्रजातन्त्र, साम्यवाद, राजतंत्र या मोनार्की आदि से नियंत्रित होती है, उसे नष्ट करके उन राज्यों में शरियत के अनुसार राज्य व्यवस्था स्थापित करना और (४) यदि किसी इस्लामी राज्य में गैर-मुसलमान बसते हों तो उनको इस्लाम में धर्मान्तरित कर के अथवा उन्हें देश निकाला देकर उस राज्य को शत प्रतिशत मुस्लिम राज्य बनाना।

अतः जिहाद का एक मात्र अन्तिम उद्‌देश्य विश्व भर के गैर-मुस्लिम धर्मों, जैसे हिन्दू धर्म, ईसाईयत, यहूदीमत, बौद्धमत कन्फ्यूसियस मत आदि, को नष्ट करके उनके देशों में शरियतानुसार इस्लामी राज्य व्यवस्था स्थापित करना है। इन दोनों में से इस्लाम, धर्मान्तरण की अपेक्षा, इस्लामी राज्य व्यवस्था स्थापित करने को प्रमुखता देता है क्योंकि एक बार इस्लामी सत्ता स्थापित और शरियत लागू हो जाने के बाद गैर-मुसलमानों को पलायन, धर्मान्तरण या मौत के अलावा अन्य कोई विकल्प बचना ही नहीं है। इसीलिए मैें कहता हूँ कि इस्लाम एक धर्म-प्रेरित मुहम्मदीय राजनैतिक आन्दोलन है, कुरान जिसका दर्शन, पैगम्बर मुहम्मद जिसका आदर्श, हदीसें जिसका व्यवहार शास्त्र, जिहाद जिसकी कार्य प्रणाली, मुसलमान जिसके सैनिक, मदरसे जिसके प्रशिक्षण केन्द्र, गैर-मुस्लिम राज्य जिसकी युद्ध भूमि और विश्व इस्लामी साम्राज्य जिसका अन्तिम उद्‌देश्य है।

निःसंदेह यह अत्यन्त उच्च महत्वाकांक्षी लक्ष्य है जिसके आगे विश्व भर के धर्म आसानी से घुटने नहीं टेकेगें, और कट्‌टर मुसलमान इस संघर्ष पूर्ण जिहाद को स्वेच्छा से बन्द ही करेंग। अतः मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच अल्लाह के नाम पर ‘जिहाद’ तब तक चलता ही रहेगा जब तक कि मुसलमान अपने सार्वभौमिक राज्य के समने को नहीं त्यागते।

इसके अलावा, मुस्लिम विद्वान दावा करते हैं। कि जब ”सारी पृथ्वी अल्लाह की है तो दुनिया भर पर राज भी अल्लाह का ही होना चाहिए।” परन्तु यह उनका बड़ा भ्रम और एक तानाशाही मनोवृत्ति का परिचायक है क्योंकि यही दावा एक हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, यहूदी, पारसी भी कर सकता है कि उसके परमात्मा या गॉड ने सारी दुनियाँ बनाई है। वही सारी सृष्टि का स्वामी है। इसलिए विश्व भर में राज्य व्यवस्था भी उसके धर्मानुसार होनी चाहिए। यदि इस्लाम विश्व भर में राज्य व्यवस्था भी उसके धर्मानुसर ही होनी चाहिए। यदि इस्लाम की तरह, सभी धर्मों वाले यही सिद्वान्त व्यवहार में अपना लें तो विश्व के सभी धार्मिक समुदाय अपने-अपने धर्मानुसार विश्वभर में राज्य व्यवस्था स्थापित करने के लिए दूसरे पंथवालों पर आक्रमण, हिंसा और उनका कत्लेआम ही करते रहेंगे। इससे तो धर्म के नाम पर अधर्म, अन्याया और अत्याचार ही बढ़ेगे। सारे विश्व के लोग आपस में लड़ते ही रहेंगे। सार रूप में जब तक मुसलमान कुरान और हदीसों की उपरोक्त जिहाद की आयतों का पालन करते रहेंगे, विश्व में शान्ति असम्भव है।

जिहाद की विधियाँ

इस्लामी धर्मग्रन्थों में मुसलमानों को अपने तन, मन, धन, जीवन, वाणी, लेखनी एवं सशस्त्र युद्ध द्वारा जिहाद करने के अनेक आदेश हैं। जिहाद की अनेक विधियाँ बतलाई गई हैं जो कि परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं। जिहाद अपनाते समय इस्लाम का हित सर्वोपरि रखा जाता हैं जिहाद अपने लाभ के लिए नहीं बल्कि ‘अल्लाह के नाम पर’ या ‘अल्लाह के लिए’ की जाती है। यह दूसरी बात है कि अल्लाह दिखाई नहीं देता है, इसलिए वास्तविक व्यवहार में जिहाद का लाभ कट्‌टरपंथी मुस्लिम मुल्ला एवं राजनैतिक नेता ही उठाते हैं।

जिहाद की सफलता के लिए, साधन, कार्य प्रणाली, औचित्य-अनौचित्य, मानवता, नैतिकता, निष्पक्षता, परम्परा, संविधान, कानून व्यवस्था का उल्लंघन, सन्धि विच्छेद आति बातों के लिए कोई स्थान नहीं होता है। बस साम, दाम, दण्ड, भेद आदि के द्वारा जिहाद का वांछित उद्‌देश्य पूरा होना चाहिए। विभिन्न देशों में जिहाद का इतिहास, उपरोक्त कथन की पुष्टि में प्रमाणों से भरा पड़ा है।

मुसलमान विश्व भर में अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करने के लिए जिहाद की जो विधियाँ अपनाते हैं उन्हें व्यापक रूप में चार भागों में बाँटा जा सकता है जैसेः

(१) सहअस्तित्ववादी जिहाद; (२) शान्तिपूर्ण जिहाद; (३) आक्रामक जिहाद और (४) शरियाही जिहाद। जिन देशों में मुसलमानों की संखया ५ प्रतिशत से कम, और वे कमजोर होते हैं, वहाँ वे शान्ति, प्रेम भाई-चारा व आपसी सहयोग द्वारा सह-अस्तित्ववादी जिहाद अपनाते हैं; तथा अपने धार्मिक आचरण से प्रभावित करके गैर-मुसलमानों को धर्मान्तरित करने की कोशिश करते हैं। जिन देशों में मुसलमान १०-१५ प्रतिशत से अधिक होते हैं, वहाँ वे शान्तिपूर्ण जिहाद अपनाते हैं। साथ ही ”इस्लाम खतरे में”, मुस्लिम उपेक्षित’ आदि का नारा लगाते हैं। साथ ही मुस्लिम वोट बैंक एक-जुट करके देश के प्रभावी राजनैतिक गुट से मिल जाते हैं तथा मुस्लिम वाटों के बदले सत्ता दल को अधकाधिक धार्मक, आर्थिक एवं राजनैतिक अधिकार देने को विवश करते हैं। साथ ही गैर-मुसलमानों को धर्मान्तरित, व उनकी युवा लड़कियों का अपहरण, एवं प्रेमजाल में फंसाकर, चार शादियाँ करके तथा तेजी से जनसंखया दर बढ़ाने का प्रयास करते हैं। आज कल भी ‘लव जिहाद राजनैतिक जिहाद का एक मुखय अंग है। भारत के विभिन्न प्रान्तों में लव जिहाद की अनेक घटनाएँ हुई हैं अकेले केरल में पिछले चार वर्षों में ही गैर-मुसलमानों की २८०० लड़कियाँ ‘लव जिहाद’ के जाल में फंसकर इस्लाम में धर्मान्तरित हो गई हैं। (पायो. ११.१२.२००९)

इस मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के फलस्वरूप मुस्लिम अल्पमत में होते हुए भी बड़ी प्रभावी स्थिति में हो जाते हैं। फिर भी वे वहाँ की मूल राष्ट्र धारा से नहीं जुड़ते हैं। अलगाववाद इस्लाम की मौलिक विशेषता है क्योंकि यह राष्ट्रवाद, प्रजातंत्र, सेक्यूलरवाद और मुसलमानों को स्वतंत्र चिन्तन की आज्ञा नहीं देता है। इतिहास साक्षी है कि पड़ोसी मुस्लिम देशों से अवैध घुसपैठ, आव्रजन (इम्मीग्रेशन) और मुस्लिम जनसंखया विस्फोट के फलस्वरूप विश्व के अनेक गैर-मुस्लिम देश इस्लामी राज्य हो गए हैं। यूरोप व भारत में यह प्रक्रिया आज भी तेजी से चली रही है। जनसंखया विशेषज्ञों के अनुसार २०६० तक भारत में हिन्दू अल्पमत में हो जायेंगे (जोशी आदि-रिलीजस डेमोग्राफी ऑफ इंडिया)

जिन देशों में बहुसंखयक मुस्लिमों का राज होता है, वहाँ वे निःसंकोच आक्रामक जिहाद अपनाते हैं और गैर-मुसलमानों को इस्लाम स्वीकारते, जजिया देने या देश छोड़ने को विवश करते हैं अन्यथा कत्ल कर दिए जाते हैं जैसा कि हम १९४७ से आज तक बंगला देश व पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं की स्थिति देख चुके हैं। आज भी लाखों हिन्दू व सिख पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में जजियिा देने का पलायन करने को विवश हो रहे हैं।

इनके अलावा जिन देशों में मुस्लिम जनसंखया ९० प्रतिशत से अधिक होती है, फिर भी वहाँ की राज्य व्यवस्था ‘विशुद्ध शरियाही’ नहीं होती है तो वे वहाँ अपने सम्प्रदाय/फिरके की शरियाह लागू करने के लिए ‘शरियाही जिहाद’ करते हैं। सत्तावन इस्लामी देश और सभी मुसलमानों का एक ही धर्मग्रन्थ ‘अरबी कुरान’ होते हुए भी इस्लामी शरियाह एक नहीं है। विभिन्न फिरकों की अपनी-अपनी शहिरयाह हैं। जैसे सउदी अरेबिया की शहिरयाह- ईरान से भिन्न है, जबकि दोनों ही इस्लामी राज्य हैं। इसीलिए शिया, सुन्नी, बहाबी, अमदिया आदि फिरकों में वैचारिक मतभेद होने के कारण आपस में संघर्ष होते रहते हैं। मुहम्मद अमीर राना के अनुसार ”२००२ तक कश्मीर और अफगानिस्तान में जिहाद करते हुए विभिन्न फिरकों में आपस में दो हजार संघर्ष हुए।” (गेट वे टू टेरोरिज्म, पृ. २९) पाकिस्तान में १९८० से अब तक ४००० मुसलमान शिया-सुन्नी संघर्ष में मारे गये। (पायो. २९.१२.२००९) अतः विभिन्न प्रकार की जिहाद, न केवल गैर-मुसलमानों के विरुद्ध बल्कि मुस्लिम समुदायों के बीच भी, पैगम्बर मुहम्मद के निधन के बाद से ही, आज तक चली आ रही है।

ससार की बात यह है कि किसी देश में जिहाद की कार्यविधि वहाँ इस्लाम की शक्ति और उद्‌देश्य के अनुसार बदलती रहती है। जैसे-जैसे मुसलमानों की शक्ति बढ़ती जाती है, सह अस्तित्ववादी शान्तिपूर्ण जिहाद सशस्त्र आक्रामक जिहाद में बदल जाती है। यह नीति पूर्णतया कुरान पर आधारित है जिसे कि मक्का और मदीना में अवतरित आयतों के स्वभाव में अन्तर साफ साफ देखा जा सकता है।

पैगम्बर मुहम्मद के निधन के बाद मुसलमानों के लिए कुरान का यही ओदश है कि वे ‘जहाँ कहीं गैर-मुसलमानों को पाऐं इस्लाम या अधीनता स्वीकारने को विवश करें, और न मानें तो उनकी हत्या कर दें। फिर भी विवशतावश, कहीं कहीं मुसलमान कूटनीति के अनुसार शान्तिपूर्ण जिहाद का मार्ग अपनाते हैं। इसीलिए आज विश्व में शान्तिपूर्ण जिहाद से लेकर अत्यन्त आक्रामक जिहाद, अपने विभिन्न रूपों में दिखाई दे रहा है।