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अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कुछ साल पहले कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के हाल के कुछ फैसलों में मुस्लिम महिलाओं के तलाक, शादी और मेन्टेनेंस के मामले में जो फैसले दिए गए, वह शरियत के इस्लामिक कानूनों के खिलाफ है और उन्हें सर्वोच्च अदालत को वापस ले लेना चाहिए। मुसलमानों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि ऐसे मामले या तो शरियत अदालतों में ले जाएं या फिर दारूल कज़ा में। मुसलमान सीधे उन्हें सरकारी अदालतों में न ले जाएं। उद्देश्य साफ है कि मुसलमानों के मामलों में शरियत की प्राथमिकता और वरिष्ठता रहे। 18 जुलाई 2007 को ‘‘टाइम्स ऑफ इण्डिया में यह भी कहा गया था कि सर्वोच्च अदालत के फैसलों में मुस्लिम महिलाओं के लिए अनेक मामलों में ज्यादा अधिकार दिए गए हैं।

शरियत कानून का मामला हाल में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के खूनी अध्याय से भी जुड़ा है। लाल मस्जिद के लोगों ने गैर-सरकारी तौर पर शरियत को ही लागू करने लिए तरह तरह के कदम उठाए थे। जिमसें ब्यूटी पार्लर को वेश्वावृति का अड्डा बताकर सात चीनी महिलाओं को अगवा किया गया था। शरियत को लागू करने के लिए ही संगीत के कैसेट बेचने वाली दुकानों पर भी छापा डाला गया था। पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है। वहां का संविधान इस्लामिक कानूनों से बहुत अधिक प्रभावित है। फिर भी कट्टर इस्लाम के पैरोकार उससे संतुष्ट नहीं हैं और इसीलिए वह कानून हाथ में ले लेते हैं।

इस आलेख में मैं इस्लामिक जेहाद की चर्चा नहीं करूंगा। हालांकि इस्लामिक जेहाद की प्रेरणा भी शरियत ही रही है। अफगानिस्तान में जब तक तालिबानी राज था, तब तक कुरान ही उनका संविधान था। वह भी तालिबानी समझ का कुरान। उसका जैसा विश्लेषण वह करते हैं। और हम सब जानते हैं कि तालिबानों के राज में पत्थर मार-मार कर हत्या करने वाले न्याय भी दिए गए। पत्थर मार कर हत्या के समारोह उत्सवी मूड में होते थे। टेलीविजन की दुकानें बंद कर दी गई थीं। उन्हें लूट लिया गया था। औरतें काम नहीं कर सकती थीं। दफ्तर नहीं जा सकती थी। उन पर बुर्का पहनना अनिवार्य था।

1400 साल पहले लिखे गए कुरान के कानूनों का अक्षरशः पालन करना आज दुनिया भर में मुश्किल हो रहा है और इस्लामिक कट्टरतावादी यही चाहते हैं। भारत जैसे देश में उनकी जुर्रत देखिए कि वह सर्वोच्च न्यायालय की न्याय प्रक्रिया में आज भी दखल देना चाहते हैं। अभी पिछले वर्षो में औरतों को लेकर ऐसी ऐसी घटनाएं हुई हैं जो हैरान कर देती हैं। एक ससुर ने पुत्रवधू से कई महीनों तक बलात्कार किया। पुत्रवधू जब अपने पति के साथ रहना चाहती थी तब फतवा आ गया कि अब वह उसकी मां हो गई है। इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती। कहा गया उसकी पत्नी अब उसके लिए हराम हो गई है। उसे अपनी पत्नी को तलाक देने का आदेश हुआ।

इधर हमारा दूसरा पड़ोसी राज्य बांग्लादेश बेगम खालिदा जिया के राज में कट्टरतावादियों का साथ होने के कारण शरियत की तरफ तेजी से दौड़ लगाने लगा। जब चुनाव आए तब शेख हसीना को भी उनके साथ समझौता करना पड़ा। बांग्लादेश में भी मध्ययुगीन शरियत के पालन की कठोरता बढ़ती जा रही है। इन 1400 वर्षों में दुनिया बदल गई है। राजकाज के तरीके बदल गए हैं। औद्योगिक क्रांति से लेकर संचार क्रांतियां हो गई हैं। प्रजातंत्र की परम्पराएं मजबूत होती जा रही हैं। पंथ-निरपेक्षता, लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता जैसी धारणाएं मजबूत हुई हैं। जबकि कुरान में लोकतांत्रिक, पंथ-निरपेक्षता, स्त्री-पुरुष समानता जैसी धारणाओं की कोई गुंजाइश नहीं है। ज्यादातर मुस्लिम देशों में या तो शेखों का राज है, या तानाशाहों का। जहां-जहां भी मुस्लिम आबादी रहती है, वहां-वहां शरियत कानून के किसी न किसी हिस्से से उनका टकराव स्थानीय समाज और शासन से होता रहता है। यहां तक कि पश्चिमी यूरोप के विकसित देशों में भी स्कूली बच्चों के यूनीफार्म तक को लेकर अक्सर पेंच फंसा रहता है।

इंडोनेशिया एक मुस्लिम देश है। वहां लोकतंत्र है लेकिन शरियत का आतंक बढ़ता चला जा रहा है। बर्बरता, कोड़ों से पिटाई, हाथ काट देना औरतों के आने-जाने पर पाबंदी, लिबास की पाबंदी अर्थात भूतकाल की तरफ यात्रा चालू हैं। एक विद्वान ने (जकार्ता पोस्ट, 18 दिसम्बर, 2006) बहुपत्नी प्रथा पर लेख लिखा था। इसमें लिखा गया कि ‘‘मध्ययुगीन कुरान के अलग-अलग तरह के विश्लेषण किए गए हैं। और यह शरियत लॉ को भ्रमग्रस्त बना देते हैं। इण्डोनेशिया में कुरान और शरियत को आधुनिक जीवन में लागू नहीं कर सकते। दूसरे मुसलमानों की तरह हम भी गरीबों और अमीरों के बीच बढ़ती खाई, भ्रष्टाचार, असहिष्णुता और हिंसा से चिंतित हैं। लेकिन हम कुरान या किसी और धर्म ग्रंथ को कानून या संविधान बना देने के पक्ष में नहीं है। इतिहास ने हमें बार-बार बताया है कि जब-जब मजहब को कानून बनाकर लोगों को दण्डित किया जाता रहा है, उससे लोग, समाज, बेहतर नहीं बन जाते, बदतर बनते हैं।’’

कनाडा की सरकार ने शरियत पर आधारित पंचाट को कनाडा के मुसलमानों के लिए छूट दे दी है। इसका विरोध मुस्लिम कनाडियन कांग्रेस ने किया। उसके प्रवक्ता तारिक फतह ने पाकिस्तान के ‘डेली टाइम्स’ को बातचीत में कहा कि मजहबी सहिष्णुता के नाम पर मुस्लिम समुदाय को जो छूट दी गई है, वह भेदभावमूलक है। उसमें जाति भेद की गंध आती है। वह हाशिए पर चले जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान मजहब के नाम पर जिस तरह सताए जा रहे हैं, कनाडा में भी प्रकारांतर से वही हो रहा है। मुस्लिम समाज वहां भेदभाव का शिकार हो रहा है, समाज से अलग थलग पड़ गया है। और यह सब हो रहा है मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर। नाइजीरिया का संविधान कहता है कि हम सब पहले नाइजीरियन हैं और फिर मुसलमान और ईसाई। फिर भी उत्तरी नाइजीरिया के धर्मान्ध लोग कहते हैं कि हम मुसलमान पहले हैं नाइजीरियाई बाद में और इसलिए हमें हक़ है कि हम शरियत के इस्लामिक कानून के तहत चलें। उत्तरी नाइजीरिया ने इस्लाम को राजकीय मजहब घोषित कर दिया है। इस तरह नाइजीरिया के पंथ निरपेक्ष राज्य के अंदर एक इस्लामिक राज्य भी है। वहां शरियत कानून की तरह हाथ काट देने, पत्थर मार-मार कर जान लेने जैसी घटनाएं कानूनी रूप से होती रहती हैं। स्कूलों में लड़के आगे की सीटों पर बैठते हैं और लड़कियां पीछे की सीटों पर। बाद में वह अलग अलग स्कूलों में पढ़ते हैं। स्त्री और पुरुष अपने अपने निर्धारित बसों में अलग अलग ही बैठेंगे। स्त्री और पुरुष दोनों अगर मोटर साइकिल पर साथ साथ जा रहे हों तो गिरफ्तार कर लिए जाते हैं।

कुरान लिखे जाने के समय न तो बसें थीं और न मोटर साइकिलें। जाहिर है शरियत के नाम पर उन्हें सताया जा रहा है। वहां दाढ़ी वाले मुसलमानों को ही सरकारी ठेका मिलता है। एक लेखक ने टिप्पणी की है कि शरियत नाइजीरिया को पत्थर युग में ले जाएगा। जहां एक पैर पत्थर युग में होगा और दूसरा पैर 21वीं सदी में। नाइजीरिया को इस्लामिक राज्य 21वीं सदी में उसको अपंग बना देगा। वहां ईसाइयों को कह दिया गया है कि रहना हो तो शरियत के तहत रहो वरना चले जाओ।

असल में एक ओर इस्लाम जहां राजनैतिक विस्तारवादी मजहब है वहां दूसरी तरफ मजहब के अलावा और भी कुछ है। वह समाज के जीवन के अधिकतम गतिविधियों में स्त्री और पुरुषों को अलग-थलग रखना चाहता है। वरना इसका क्या मतलब है कि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ टैक्सी में नहीं जा सकता? स्त्री-पुरुषों को अलग थलग करना, यह स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार की कटौती है। इन सब ने ही मिलकर नाइजीरिया में लम्बे समय की अराजकता को बढ़ावा दिया है।

मिस्र, टर्की, जॉर्डन जैसे कुछ देश आधुनिक और उदार हैं। लेकिन वहां भी कट्टरतावादी यदा कदा सिर उठाते रहते हैं और पर्यटकों, गैर मुसलमानों और यहां तक कि उदार मुसलमानों को अपनी हिंसा का शिकार बनाते हैं। सउदी अरेबिया में एक बार एक दक्षिण भारतीय राजनयिक की नियुक्ति हुई। उनकी पत्नी बहुत धार्मिक थीं लेकिन पति ने अच्छी तरह समझा दिया था कि कोई धार्मिक ग्रंथ साथ न ले जाएं। मगर पत्नी लोभ संवरण नहीं कर सकीं। एक शालीग्राम के पत्थर को साथ रख लिया। हवाई अड्डे पर जब तलाशी हुई तो वह छोटा सा पत्थर भी बच न सका। अधिकारियों ने उस पत्थर को जमीन पर दे मारा और उसके टुकड़े हो गए।

हालांकि सउदी अरब अपने यहां कट्टरतावादियों से टक्कर ले रहा है लेकिन यह टक्कर सिर्फ अपनी राजसत्ता को बचाए रखने के लिए है। यही सउदी रईस जब अपने व्यक्तिगत विमान से यूरोप जाते हैं तो स्त्री-पुरुष स्वछंदता का आनंद लेने में कभी पीछे नहीं रहते। हालांकि एक तरह से कुरान सउदी अरब का संविधान ही है। इस्लामिक कानून के मुताबिक स्त्रियों का स्थान पुरुषों से विश्व के हर भाग में हमेशा कमतर ही होता है। इसी तरह मुसलमानों के मुकाबले गैर-मुसलमान हमेशा कमतर ही रहेंगे क्योंकि एक तो गैर-मुसलमान जन्नत में जा ही नहीं सकते, उनको नर्क ही भोगना है। आज भी सूड़ान में मुसलमान गैर-मुसलमानों को गुलाम बनाकर रख सकता है। उनकी खरीद बिक्री भी होती है।

ऐसा नहीं है कि इस्लाम और शरियत में कुछ सुधार हुआ ही नहीं। बड़ी आबादी के इस्लामिक रिपब्लिकन ने परिवार व्यवस्था से सम्बंधित शरियत कानूनों में छूट दी है। टर्की में पंथ निरपेक्ष संविधान है लेकिन वहां भी अतिवादी इस्लामिक गुट सक्रिय हैं। अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते रहते हें। भारत में देश भर में अपराध दण्ड संहिता समान रूप से लागू है लेकिन परिवार सम्बंधी मामलों में शरियत कानूनों की बड़ी हद तक छूट दी गई है। कुछ कटौतियां हैं जिसका विरोध पिछले हफ्ते ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने किया था। पूर्वी और उत्तरी अफ्रीका में शरियत अदालत, परिवार, विवाह और उत्तराधिकार के मामले में देखभाल करता है। ईरान की शरियत अदालतें पूरी न्यायपालिका को समाहित किए हुए हैं। मजहबी पुलिस इसकी देखभाल करती है कि इसका पालन हो रहा है कि नहीं।

शरियत कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मान्यता नहीं देती। कोई पैगम्बर मोहम्मद और कुरान पर प्रश्न खड़ा नहीं सकता या आलोचना नहीं कर सकता। मिस्र में भी अल-अजहर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अबू ज़ैद को नीदरलैण्ड भागना पड़ा। लेकिन उसे अपनी मुस्लिम पत्नी के साथ रहने की स्वीकृति नहीं मिली।

दुनिया की सारी मुसलमान आबादी हिंसक, बर्बर असहिष्णु नहीं हैं। लेकिन कुछ मुट्ठी भर अतिवादी शरियत को लेकर हमेशा कुछ न कुछ परेशानी पैदा करते रहते हैं। एक देश में नहीं, सिर्फ वहां ही नहीं, जहां बहुमत में हैं, बल्कि सारे संसार में जहां-जहां वह हैं। सभ्यताओं के संघर्ष के जिस विषय पर आज संसार-व्यापी बहस चल रही है, वह पांच-दस प्रतिशत ऐसे लोगों के कारण ही है। अंग्रेजों के काल में एक कलेक्टर ने अपनी प्रकाशित डायरी में लिखा है कि जहां मुसलमान अल्पमत में हैं, वहां परेशानी का सबब हैं और जहां बहुमत में हैं वहां आततायी हैं।
(लेखक : वरिष्ठ पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)