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क्या आप जानते हैं कि…….. दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म है …. जहाँ वेश्यावृति ना सिर्फ वैध है बल्कि इसे इस्लाम में प्रोत्साहित भी किया जाता है और एक धार्मिक कार्य माना जाता है….!

इसका कारण जानने से पहले हमें इस्लाम और उसके प्रतिपादक मुहम्मद के क्रिया कलापों और उसकी मानसिकता को समझना अतिआवश्यक है…!

रसूल हमें उस से मना किया और फिर वह हमें (अस्थायी) Mutha शादी की अनुमति दी. तो, हम सभी कपड़े का एक टुकड़ा की दहेज के लिए एक निश्चित समय (आमतौर पर तीन दिन) के लिए शादी कर के पत्नी बना लिए…… Al Hadis, Vol. 2, page no. 686

और, सारी कहानी का सार ये है कि…. मुहम्मद साहब कोई साधू-महात्मा तो थे नहीं ….. वे तो एक अनपढ़, जाहिल और पेशे से दुर्दांत लुटेरे थे….!

तो…. अपनी लूट -मार और तथाकथित रूप से जेहाद फ़ैलाने के सिलसिले में उन्हें और उनके गिरोह को हफ़्तों-महीनों तक घर से बाहर रहना रहना पड़ता था ( शायद यही वजह थी कि.. मौका लगते ही उन्होंने अपनी सगी और मात्र 6 साल की मासूम बेटी तक को …………… सिर्फ खुद ही नही बल्कि अपनी लड़की को अपने चाचा को सौंप दिया.. ).

खैर…. तो , उसी लूट-मार के दौरान कहीं उनके साथी बिदक ना जाएँ और उनके लूट-पाट का फलता-फूलता धंधा चौपट ना हो जाए .. इसी डर से मुहम्मद साहब ने ना सिर्फ वेश्यावृति के धंधे को बढ़ावा दिया ..बल्कि उसे एक धार्मिक और कानूनी जामा पहनाते हुए उसे ना सिर्फ कुरान में भी उल्लेखित कर दिया बल्कि उसे पुण्य का काम भी घोषित कर दिया .

आपलोगों को लग रहा होगा कि ऐसा भला कैसे हो सकता है…. लेकिन आप ये बात जान लो कि…. जहाँ मुहम्मद साहब मौजूद हों वहां कुछ भी हो सकता है (सिर्फ उलुल -जुलूल और बुरी बातें )

लीजिए …. आप भी कुरान की उन हदीसों का अध्धयन करें और अपना सामान्य ज्ञान बढाएँ …

इस्लाम में “मुथा” और “मिस्यर” शादी शब्द ला कर वेश्यावृति को कानूनी जामा पहनाया गया है…. जिसे यात्री विवाह भी कहा जाता है..!
ये एक प्रकार से अनुबंध आधार पर अल्पावधि शादियां हैं और कुछ घंटों के लिए भी हो सकती है…!

@ इब्न मसूद ने बताया, “हम रसूल के साथ लड़ रहे थे और अपनी पत्नियों हमारे साथ नहीं थीं, तब हमने रसूल से पूछा, ‘क्या हम खुद को संतुष्ट करना चाहिए….?

@ सलामा बिन अल-अक्वा कहते हैं : अल्लाह से प्रेरित होकर मैं कहता हूँ .. अगर एक आदमी और एक औरत सहमत हैं ( अस्थायी रूप से शादी के लिए) तो उनकी शादी अधिकतम तीन रातों के लिए वैध होगी,

और उसके बाद अगर वे इसे जारी रखना चाहते हैं तो रखें रख सकते हैं, अन्यथा अलग होना चाहते हैं तो वे ऐसा कर सकते हैं….Volumn 007, Book 062, Hadith Number 053.

### मुझे तो लगता है कि जहाँ हिन्दू धर्म में स्त्रियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है और उन्हें देवी तक की संज्ञा दी गयी है वहीँ मुहम्मद साहब ने “इस्लाम में स्रियों को” भोग-विलास की “मात्र एक वस्तु” बना रखने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है.

नोट: इस्लाम को छोड़कर दुनिया के सभी धर्मों में चरित्रवान रहने पर जोर दिया गया है और वेश्यावृति को पाप मानते हुए उसे एक घिनौने अपराध की संज्ञा दी गई है…!
ये लेख किसी दुर्भावना के कारण नहीं बल्कि लोगों के सामाजिक जागरूकता में वृद्धि करने के पवित्र उद्देश्य से लिखी गई है…!