हिन्दुओ को मुस्लिमो के मजार पर नहीं जाना चाहिए; इसलिए नहीं की कोई भी मुस्लिम हिंदू मंदिरों में नहीं जाता है हिन्दुओ का दिया हुआ प्रसाद नहीं खाता है, उसका कारन बहुत ही स्पष्ट और सीधा है. कोई भी मुस्लिम कभी भी धर्म पर बहस क्यों नहीं करता है, उसके बहुत गुढ़ रहस्य हैं.

जिन मुस्लिमो के मज़ार पर हिंदू जाते हैं वे असली ईमान वाले मुस्लिम रहे थे जिसका मतलब है की उन्होंने इस्लाम को अक्षरसः माना था. इसका मतलब है की उनके लिए साम-दाम-दंड-भेद से हर काफ़िर (मुख्यतः हिंदू) को तो ईमान वाला (मुसलमान) बनाना चाहिए और यदि इतने पर भी उसकी बुद्धि नहीं खुलती है तो उसे क़त्ल कर दो तथा उसकी संपत्ति और औरतो को लुट लो. जिस आदमी ने जीतेजी सनातनियो (हिन्दुओ) के भले के बारे न सोचकर सिर्फ उसे मिटाने के बारे में ही सोचा, मरने के बाद उसका आशीर्वाद भला कैसे देगा.

गाजी का मायेने होता है वह मुस्लिम जिसने इस्लाम धर्म के प्रचार के रस्ते में आने वाले हर काफ़िर को मिटा दिया हो या सीधे सीधे जिसने हिन्दुओ का क़त्ल करके हिंदुत्व को ही मिटाने का महान काम किया हो. काफ़िर को इमान्वाला बनाने में सफलता कैसे मिली इन गाजियों को, सीधे सीधे नरसंहार किया जाता रहा है, बाबर को भी गाजी की अपाधि दी गयी जिसने अवध के सबसे बड़े अयोध्या के भव्य राम मदिर को हिन्दुओ के नरसंहार के साथ ही मिटा दिया था और इस्लामिक राज्य स्थापित किया था. इसी तरह के सभी गाजी बाबा की मजार पर हिंदू अपने को समृद्ध करने की दुआ मागने जाता है, यही सच्चाई है, इसे जो नकारे. या तो उसे कुछ भी नहीं मालूम है या वह मजबूरी में झूठ बोल रहा है.

इन्ही सच्चाइयो की वजह से हिन्दुओ को कभी भी किसी मुस्लिम की मजार पर नहीं जाना चाहिए क्योकि यदि वह हिंदू परिवार हिंदू बचा रह पाया तो अपने स्वाभिमानी पुरखो के शौर्य के बल पर और उस हिंदू को अपने इन महान पुरखो की समाधी पर जाकर उनकी पूजा करनी चाहिए नाकि उसके पुरखो को मिटाने वाले जेहादी मुस्लिमो की मजार पर शीश नवाना चाहिए.

यदि आप शिक्षित हैं तो क्षितित होने के लक्षण भी दिखाएँ. और यदि आप ऊपर में लिखी किसी भी बात से असहमत हैं तो उसे अवश्य ही व्यक्त करे जिससे की गलत फहमी का निराकरण किया जा सके. धार्मिक विद्वानों की भी मदद लिया जा सकता है. अपनी टिप्पणी जरुर देवें.

जय भारत,