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मेरी तहरीर में – – –

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,
हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,
और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह अलएराफ़ ७
चौथी किस्त

धर्मो की स्थापना बहुधा दो अवस्थाओं में होती है, या तो इसका नियुकता इसकी अलामतों और इसके अंजामों से बे खबर स्वर्ग सिधार जाए, या फिर संसार बाद में उसके महत्त्व को समझ कर उसको यादगार बना सके.
दूसरे वह जो अपनी ज़िन्दगी में ही अपने को पैगम्बर या भगवान आदि स्थापित करने के लिए पापड़ बेलते हैं. इसकी दो मिसालें हैं, गांधी जी, जो कहते थे कि लोग मुझे महात्मा क्यूँ कहते हैं?
दूसरे मुहम्मद जो मुहम्मदुर रसूल अल्लाह ”यानी मुहम्मद अल्लाह के दूत” हैं, कहलाते थे. मुहम्मदुर रसूल अल्लाह कहला कर ही लोगों को वह मुसलमान बनाते थे. मुहम्मदुर रसूल अल्लाह न कहने वाले पर जज्या का जुर्माना वसूलते थे या फिर उसका सर कलम करते थे.

अब देखिए क़ुरआन में मुहम्मद का गढ़ा हुआ अल्लाह क्या कहता है – – –

”और ज़मीन में बाद इसके कि कुछ दुरुस्ती कर दी गई , फसाद मत फैलाओ. ये तुम्हारे लिए नाफे है.”

अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (८५)

मज़हबी फसाद फ़ैलाने वाला मुहम्मदी अल्लाह बन्दों से कह रहा है कि फसाद मत फैलाओ, है न “जबरा मारे रोवे न देय.”

नवें पारे में अल्लाह शोएब का बाब खोलता है. बागी शोएब को बस्ती वाले अपने आबाई मज़हब पर वापस आने के लिए ज़ोर डालते हैं और शोएब इन लोगों से अल्लाह की पनाह में आने की दावत देते हैं(जैसे मुहम्मद की आप बीती है)
बस्ती के काफिरों के सरदार सरकशी करते हैं तो एक ज़लज़ला आ जाता है और सब अपने अपने घरों में औंधे मुंह गिर पड़ते हैं. पैगम्बर शोएब नाराज़ होकर बस्ती से मुंह मोड़ कर चले जाते हैं कि काफिरों के लिए मैं क्यूं रंज करूं. फिर अल्लाह ने वहां किसी नबी को नहीं भेजा. सब तकज़ीब करने वाले मुहताजी और बदहाली में पड़ गए और ढीले हो गए. मुहम्मद क़ुरान में इस किस्म की कई कहानियां मक्का के कबीलाई सरदारों के लिए गढ़े हुए हैं.

”हाँ! तो क्या अल्लाह की इस पकड़ से बे फ़िक्र हो गए? अल्लाह की पकड़ बजुज़ इसके जिसकी शामत आ गई हो कोई बे फ़िक्र नहीं सकता और इन रहने वालों के बाद ज़मीन पर, बजाए इन के ज़मीन पर रहते हैं, क्या इन को ये बात नहीं बतलाई कि अगर हम चाहते तो इनको इनके जरायम के सबब हलाक कर डालते और हम इन के दिलों पर बंद लगाए हुए हैं, इस से वह सुनते नहीं.”

अलएराफ़ ७ -नवाँ पारा आयत (८८-१००)

इन १३ आयातों में ऐसी ही बहकी बहकी बातें हैं जिसे मुहम्मद ने न जाने नशे (जब कि शराब हलाल थी) में,वज्द या दीवानगी के आलम में बकी है. हराम जादे ओलिमा ने इनमें ब्रेकेट लगा लगा कर अपने हिसाब से मानी और मतलब भरा है. मुहम्मद ने ऐसे बेवकूफ अल्लाह का खाका पेश कर के उस नामालूम हस्ती कि मिटटी पिलीद की है.
*अल्लाह, फिरौन और मूसा की कहानी एक बार फिर दोहराता है.
( इन्हीं बातों के अलावा कुरआन में कुछ है भी नहीं.)
जो कि किसी तौरेत के जानकार के मशविरे से मुहम्मद ने गढ़ी है. कभी कभी जानकारी देने वाले मुहम्मद को चूतिया बना देते है और नाज़िल शुदा आयत मौक़ूफ(रद्द ) हो जाया करती है. मुहम्मद अपनी तमाम सीमा पार करते हुए अल्लाह से कलाम कराते हैं कि मूसा और फिरौन के जादू गरों में जब मुकाबला होता है तो फिरौन के हारे हुए जादूगर इस्लाम कुबूल कर लेते हैं.
खुराफाती आयातों में पकड़ने की ज़लील तरीन बात यही है कि फिरौन के दरबार में यहूदी मूसा का मुकाबिला और हज़ारों साल बाद पैदा होने वाले मुहम्मद की दीवानगी की फतह.

अलएराफ़ ७ -नवाँ पारा आयत (१०२-१५६)
”जो लोग ऐसे रसूल उम्मी की पैरवी करते हैं जिन को कि वह अपने पास तौरेत, इंजील में लिखा पाते हैं कि वह उनको नेक बातों का हुक्म फ़रमाते हैं और बुरी बातों से मना फ़रमाते हैं और पाकीज़ा चीजों को हलाल फ़रमाते हैं

और गन्दी चीजों को उन पर हराम फ़रमाते हैं – – –

सो जो लोग उन पर ईमान लाते हैं और उनकी हिमायत करते हैं और उनकी मदद करते हैं और उस नूर की पैरवी करते हैं जो उनके साथ भेजा गया है, ऐसे लोग पूरी फलाह पाने वाले हैं”

अलएराफ़ ७ -नवाँ पारा आयत (१५७)

मुहम्मद खुद बतला रहे हैं कि जो लोग ऐसे अनपढ़ पैगम्बर कि बात मानते है जो बातें बतला न रहा हो बल्कि ”फ़रमा ” रहा हो। जो अपने जैसे अनपढ़ों को समझा रहा है कि उसका ज़िक्र तौरेत आर इंजील में है और उसके ज़ालिम जेहादी तलवार से समझा रहे हों कि पैगाबर सच बोल रहा है और अय्यार ओलिमा क़तार दर क़तार इसकी सदाक़त की तस्दीक कर रहे हों तो आज कौन उसको झुटला सकता है। हालाँकि झूट उनके सामने खुला रखा हुवा है।
कितना बड़ा सानेहा है कि झूट पर ईमान लाया जाए.
*मुहम्मदी अल्लाह नबियों के किस्से कहानियों में फंसे हुए लोगों को बतलाता है कि उसने क़दीम क़बीलों पर कैसे कैसे ज़ुल्म ढाए.
मुहम्मद जैसा ज़ालिम पैगम्बर बना मुखिया अगर नाकाम होता तो बद दुआ देने की धमकी देता. खुद मुहम्मद ने कई बार इसका सहारा लिया.. कहते है – – –

”शोएब अलैहिस सलाम की उम्मत पर तीन मर्तबा अल्लाह ने कहर ढाया”
गोया मुहम्मद धमकाते हैं सुधर जाओ वर्ना तुम्हारा भी यही हाल होगा। चालाक. मुहम्मद ने जिस तरह खुद को अल्लाह का रसूल बना लिया था उसी तरह पहले अपने क़बीले को अपनी उम्मत बनाया और कामयाब होने के बाद पूरे अरब को अपनी उम्मत बना लिया. उनके बाद माले गनीमत के घिनाओने हरबे से दुन्या के तमाम आबादी का एक हिस्सा उम्मते मोहम्मदी बन गई जो झूटे पैगम्बर के झूट के चलते आज रुस्वाए ज़माना है.

*सूरह बहुत देर तक मुहम्मद साख्ता पैगम्बर शोएब के कन्धों पर चलती है. जिसमें न तो उनकी जीवनी है न ही उनकी जीवन की कोई घटना. बस मुहम्मद ने जिस किसी का नाम समाजी पसे मंज़र में सुन रखा था, उसको लेकर कहानी गढ़ दी. उनकी तवारीख जानना हो तो अंग्रेजी हिस्टिरी को खंगालना पड़ेगा. मगर मुसलामानों को तो क़ुरानी तवारीख ही काफी है जिसकी गवाही अल्लाह दे रहा है.तमाम क़ुरआन की कहानियां, वाकेआत, मुअज्ज़े मुहम्मद की वक्फा ए पयंबरी की कोशिशों के हिसाब से गढ़े हुए हैं. खुद क़ुरआन हदीस, तारीख ए इस्लाम को गहराई से मुतलेआ किया जाए तो यह नतीजा सामने आ जाता है.
आखीर में मूसा के मार्फ़त क़ुरआन चलता है. मुहम्मद पर लगा इलज़ाम बतलाता है कि मुहम्मद के पास कोई यहूदी मुखबिर था जो यहूदयत और मूसा की टूटी फूटी मालूमात उन्हें देता था वह जगह जगह क़ुरआन में इसे जड़ देते थे और अल्लाह को इसका गवाह अना देते.
* मेरी तहरीर में तौरेत और यहूदयत का बार बार हवाला शायद कुछ लोगों को खटक रहा हो, मालूम होना चाहिए कि अगर क़ुरआन से इसे ख़ारिज कर दिया जाए तो क़ुरआन की बुन्याद खिसक जाए. क़ुरआन खुद तस्लीम करता है, इस्लाम को दीन ए इब्राहिमी कह के, जब कि अब्राहम ही यहूदयों के आबा ओ अजदाद की पहली कड़ी हैं. यहूदी इस्माइलियों को (जिस में मुहम्मद हैं) इस लिए अपने से कम तर मानते हैं कि वह अब्राहम की मिसरी लौंडी हाजरा की औलाद हैं, जिसे सारा के कहने पर अपनी रखैल तो बना लिया था मगर बाद में बीवी सारा के कहने ही उसे पर घर से निकल दिया था.यह दुन्या के तमाम मुसलमानों के साथ गायबाना सानेहा है कि इन की जड़ें जुगराफियाई एतबार से अपने ही चमनों से कटी हुई हैं. वह न इधर के रहे न उधर के. मियाम्नार ने जो की बुद्धिष्ट हैं, अपने यहाँ से मुसलामानों को निकाल बाहर किया है क्यूँ कि वह बर्मी होते हुए भी कौमी धारे में शामिल न रह कर अलग थलग कनारे गढ़े में रुके हुए पानी की तरह थे जो कि तअफ्फुन पैदा कर रहे थे. तरक्की पज़ीर बर्मियों में धर्म दाल में नमक की तरह बचा है और मुसलामानों में इस्लाम दाल की जगह नमक की तरह है, वह कहीं भी क्यों न हों.वह पहले मुसलमान होते हैं उसके बाद बर्मी, हिदुस्तानी या चीनी. यही वजह है कि इन को हर गैर मुस्लिम मुल्क में शक की निगाह से देखा जाता है जो हक बजानिब है.

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान