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मेरी तहरीर में – – –

क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
”हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी”का है,
हदीसें सिर्फ ”बुख़ारी” और ”मुस्लिम” की नक्ल हैं,
और तबसरा —- जीम. ”मोमिन” का है।

नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह अलएराफ़ ७
(पहली किस्त)

मिन जुमला काफिर

”सअब इब्ने जुसामा कहते हैं कि एक बार मुहम्मद से पूछा गया कि शब खून (रात के हमलों) में अगर कुफ्फर के बच्चे या औरतें क़त्ल हो जाएँ तो हम पर इसका कोई गुनाह होगा या नहीं? (मुहम्मद ने) फ़रमाया काफ़िरों के बच्चे और औरतें मिन जुमला काफ़िर ही शुमार किए जाएंगे और फ़रमाया कि अहाता सिवाय अल्लाह और उसके रसूल के किसी दूसरे का नहीं”

(बुखारी १२४३)

इस्लामी बरबरियत का नमूना आज जो तालिबानी दुन्या के सामने पेश कर रहे हैं वह चौदह सौ साल पहले से जारी है जिसको इसके ज़ालिम पैगम्बर मुहम्मद ने ईजाद किया था. किसी भी धर्म, धर्म क्या अधर्म में भी जंग के ऐसे घिनाओने कानून क़ायदे नहीं होंगे. ऐसे काबिले नफरत हस्ती को पूजने वाले दुन्या की २०% आबादी अपने को मुसलमान कहलाने पर नाज़ करती है ।

मुसलमानों !

इस्लाम से तौबा करके इंसानियत की राह को अपनाओ, बड़ी ही आसान राह है जिस पर हमेशा बे खौफ़ व ख़तर चला जा सकता है।

अब आइए मुहम्मदी अल्लाह की उम्मियत और इंसानियत सोज़ आयातों पर – – –

‘अल्लमस”

सूरह अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (१)

यह एक अर्थ हीन शब्द है. मुहम्मद ने मदारियों और जोगियों की नकल में इस तरह के बहुत से शब्द कुरआन में गढ़े हैं. सूरह शुरू करने से पहले वह मंतर की तरह इन्हें पढ़ते हैं. मुल्लाओं ने इसको

” हुरूफे मुक़त्तेआत ”

नाम दिया है. यह भी कोई एक आयत है, अल्लाह की कही हुई एक बात है, अल्लाह का पैगाम है, इसका मतलब अल्लाह ही जनता है.

”यह एक किताब है जो आप के पास इस लिए भेजी गई है कि आप इस के ज़रिए से डराएँ, सो आप के दिल में इस से बिलकुल तंगी न होना चाहिए और यह नसीहत है ईमान वालों के वास्ते.”

सूरह अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (२)

मुहम्मद का अभियान सब से बड़ा यह है कि लोगों को किताब में बखानी गई दोज़ख से डराओ, लोग डरने लगें तो उन पर क़ाबू पाकर, उनको मनमानी ढंग से इशारे पर नचाओ। डरपोकों को जन्नत की लालच भी दी गई है. इन्हीं दो मंत्रो से क़ाबू पाकर मुसलामानों को जंगी भट्टियों में झोका गया है.

”आप के दिल में इस से बिलकुल तंगी न होना चाहिए”

ऐसे जुमले जो इजहारे ख़याल न कर पा रहे हों जाहिल मुहम्मद की मजबूरी थी जिसको ओलिमा ने ” अल्लाह के कहने का मतलब ये है ” लिख कर मुहम्मद की मदद की है।

”और बहुत सी बस्तियों को हमने तबाह कर दिया है. और उन पर हमारा अज़ाब रात के वक़्त पहुंचा, या ऐसी हालत में दोपहर को जब वह आराम में थे. सो जिस वक़्त उन के ऊपर अज़ाब आया , उस वक़्त उन के मुंह से बजुज़ इस के कुछ भी न निकला कि वाकई हम ही ज़ालिम थे.”

”सूरह अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (४-५)

मुहम्मदी अल्लाह कैसा है?

इंसानी बस्तियों का और इंसानों का मश्शाक शिकारी ?

मुहम्मद अपनी हिकमते अमली अल्लाह के जुबानी कुरआन में बतला रहे हैं. वह खुद हमेशा सुब्ह तडके बस्तियों पर हमला करते थे जब लोग गहरी नींद में हों या सो कर उठ रहे हों, इसको उस अल्लाह का तरीका बतला रहे हैं जो बन्दों का खालिक और बाप की तरह है. मुहम्मद के लुटेरे हत्यारों के ज़ुल्म ढाने पर मुसलामानों की नादान नस्लें कहने लगी हैं कि वाकई हमारे पूर्वज ही ज़ालिम और काफ़िर थे।
*इस सूरह में मुहम्मद आदम, हव्वा और शैतान की मशहूर बाइबिल की कल्पना को अपने ढंग से पेश करते हैं. फारसी कहावत है कि झूटे की याद दाश्त बहुत कमज़ोर होती है, गरज मुहम्मद इन्जीली बातों को जितनी बार गढ़ते है, वह बदल जाती है, यहाँ मुहम्मद गढ़ते हैं कि शैतान को मरदूद और मातूब करके जन्नत से निकाल दिया जाता है, इस जुर्म पर कि वह माटी के माधव आदम को सजदा नहीं करता. इन्तेकामन वह आदम और हव्वा को जन्नत में भड़काने लगता है. सवाल यह उठता है कि जब अल्लाह ने उसको जन्नत से निकल दिया तो वह जन्नत में दाखिल कैसे हो पाता था? क्या मुहम्मदी अल्लाह के निज़ाम में इंसानी गफ़लत हुआ करती है? ऐसे सवाल जब अहले मक्का मुहम्मद के सामने उठाते तो वह इसे कुरान की सर्ताबी क़रार देते ”

बहुत ही ढीट तबा थे मुहम्मद.

अल्लाह से ज़बान दराज़ी करते हुए इब्लीस (बड़ा शैतान) कहता है – – –
”मुझको मोहलत दीजिए क़यामत के दिन तक. फरमाया कि तुझ को मोहलत दी गई. वह कहने लगा बसबब इसके कि आप ने मुझ को गुमराह किया, मैं क़सम खाता हूँ कि मैं उनके लिए सीधी राह पर बैठूंगा, फिर उन पर हमला करूंगा, उनके आगे से भी, उनके पीछे से भी, उनके दाहिने से भी, उनके बाएँ जानिब से भी और आप उनमें से अक्सर एहसान मानने वाला न पाएँगे.”

सूरह अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (१५-१६-१७)

अल्लाह की बातों में बे वज़नी मुलाहिज़ा हो. अपनी मादरी ज़बान में तर्जुमा करके इसे अपनी नमाज़ों में पढ़ कर देखिए. कुछ ही दिनों में खुद को पागल महसूस करने लगेंगे. या कम से कम परले दर्जे का बेवकूफ.

हर नमाज़ी मुसलमान दिन में लगभग ४४ रेकअत नमाज पढता है, इनका सच्चा रहनुमा वह है जो इनको इनकी मादरी ज़बान में नमाज़ें पढवाए। एक रेकअत में तीन आयत पढ़ी जाती हैं, यह सब अगर वह अपनी मादरी ज़बान में पढ़े तो हमें यकीन हैकि एह दिन वह खुद सच्चाई की राह पर आ जाएगा.

जीम ‘मोमिन’ निसारुल-ईमान