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Like other saints, Goswami Tulsidas Ji described about the influence of Kaliyuga (The Age of iron). He says:

कलि केवल मल मूल मलीना | पाप पयोनिधि जन मन मीना || – मानस 1-26-2

अर्थात कलियुग मलिनाता से भरा है और केवल पापों की जड़ है| कलियुग में लोगों का मन पाप रुपी समुद्र में मानो मछली बना रहता है| जैसे मछली पानी से अलग नहीं होना चाहती, ऐसे ही कलियुग में लोग पाप और मलिनता का त्याग नहीं करना चाहते|

The Kaliyuga is filled with dirt and grime and is the base of all sorts of evils. In Kaliyuga, the mind of human beings is like a fish in ocean of sins. As a fish does not want to leave water, mind also does not want to leave its evil and dirty ways.

In Uttarkand chapter of Manas, Mahatma Kakabhushund Ji tells Garuda about the effects of earlier Kaliyuga period experienced by him:

पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल|
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल|| – मानस 7-96-ख-0

आप कहतें हैं कि पूर्व के एक कल्प में कलियुग नामक एक युग आया था| यह युग भी मानो पापों का मूल था| उस युग में सम्पूर्ण नर-नारी धर्म से विमुख हो गये थे और उनका आचरण धर्म-ग्रन्थों के विरुद था|

(हिन्दू धर्म में एक कल्प होता है चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्षों के बराबर के समय को कहते हैं. यह ब्रह्मा के एक दिवस या एक सहस्र महायुग के बराबर होता है. आधुनिक वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड की आयु तेरह अरब वर्ष बतायी है. प्रत्येक कल्प चौदह मन्वन्तरों में बंटा होता है (एक मन्वन्तर बराबर 306,720,000 वर्ष). दो कल्पों से ब्रह्मा की एक दिवस और रात्रि बनती है. यानी 259,200,000,000 वर्ष. ब्रह्मा के बारह मास से उनका एक वर्ष बनता है. और सौ वर्ष उनकी आयु होती है. इसमें से पचास वर्ष बीत चुके हैं, और हम अब श्वेतवाराह कल्प में हैं. प्रत्येक कल्प के अन्त में प्रलय आती है. गिनियस बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने कल्प को समय का सर्वाधिक लम्बा मापन घोषित किया है)

He says that there came one period of Kaliyuga in his experience. That period was based on all sort of evil and sinful acts. All men and women deviated from ethical and religious code of conduct and indulged in immoral and evil acts.

आप कलियुग के धर्म-विपरीत और धर्म-विहीन वातावरण में समाज, परिवार तथा जनता के विभिन्न वर्गों के आचार-व्यवहार का वर्णन करतें हुए कहते हैं:

सुनु खगेश कलि कपट हठ दंभ द्देष पाषंड|
मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड||

आप कहते हैं कि कलियुग में लोग कपट, हठ, द्देष, पाखण्ड, काम, क्रोध और अभिमान में व्याप्त रहतें है| लोग जप-तप, व्रत-यज्ञ, दान आदि भी तामसिक व्रति के आधीन करते हैं| वर्षा कम होती है और धरती की उपज भी कम होती है|

He explains that in Kaliyuga, human beings are involved in treachery, stubbornness, egotism, jealousy, showmanship, anger and arrogance. They indulge in all sort of religious activities like fasting, prayer, charity, Yagya etc but they do them under selfish motive. Natural disasters increase, fertility decreases and pollution increases. Then he again says:

अबला कच भूषन भूरि छुधा| धनहीन दुखी ममता बहुधा||
सुख चाहहिं मूढ न धर्म रता| मति थोरि कठोरि न कोमलता ||
नर पीड़ित न रोग न भोग कहीं| अभिमान विरोध अकारनहीं||
लघु जीवन संबतु पंच दसा| कलपांत न नास गुमानु असा||
कलिकाल बिहाल किए मनुजा| नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा||
नहिं तोष बिचार न सीतलता| सब जाति कुजाति भए मगता||
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता| भरि पूरि रही समता बिगता||
सब लोग बयोग बिसोक हुए| बरनाश्रम धर्म अचार गए||
दम दान दया नहिं जानपनी| जड़ता परबंचनताति घनी||
तनु पोषक नारि नरा सगरे| परनिंदक जे जग मो बेगारे।

Females start dressing fewer clothes and try to show more. People suffer on account of inflation and food shortage. False emotional attachments develop more and less interest remain for spirituality. Their hearts are devoid of tolerance and forgiveness and are filled with harshness and cruelty.

There is lesser satisfaction and happiness and people are more prone to illness. But even in this helplessness situation, they always try to criticize and complain. Their life become short but ego is so much in them as if they will live for eternity.

The negative environment of Kaliyuga makes everybody mentally disturbed and thoughtless. There is less respect and love for sister and mother. Thoughts become maligned with disturbed mind. People from all walks of life turn into beggars, not satisfied with what they are having.

There is hatred, jealousy, greediness and improper conduct in society. All people The sense of helplessness, desperation and depression prevails.

Following of religious conduct, restraint over sensual pleasures, charity, merciful conduct and sense of discrimination vanishes. Cheating, frauds and criticism of other prevails.

संत रविदास समझाते हैं:

सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार|
तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम आधर||

अर्थात सत्युग में सत्य वचन, त्रेता में यज्ञ-हवन और द्दापर मे प्रभु की पूजा-अर्चना को मुक्ति का साधन समझा जाता था। परन्तु कलियुग में नाम का सिमरन और भजन ही मुक्ति का एक्मात्र साधन निश्चित किया गया है।