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आप इस शब्द को कूई गाली या अपशब्द नहीं समझें .यह तो कुरआन का एक पारिभाषिक शब्द है .जो कुरआन के हिन्दी अनुवाद के साथ दी गयी पारिभाषिक शब्दावली के पेज नंबर 1293 पर “लौंडी ‘शब्द के बारेमे अभिप्रेत किया गया है .लौंडी वह औरतें होती हैं ,जिन्हें जिहादी युद्ध में पकड़ लेते हैं ,या अगवा कर लेते हैं .बाद में यातो उन औरतों से जबरन शादी कर लेते हैं ,या बलात्कार करके बेच देते है .अगर इस्लामी राज होता हो तो औरतों को मुसलमानों में बाँट दिया जाता है .

जिहाद के बारे में कुरआन में यह कहा गया है –

1 -अल्लाहको मुसलमानों का जिहाद करना हरेक चीज से जादा प्यारा लगता है .सूरा -अत तौबा 9 :24

2 -अल्लाह उन लोगों से प्यार करता है ,जो पंक्ति बनाकर क़त्ल करते हैं सूरा-अस सफ़ 61 :4

जिहाद अल्लाह की नजर में एक धार्मिक कार्य है .जिसे अल्लाह पसंद करता है .जिहाद में धन दौलत के साथ औरतें भी लूटी जाती हैं .लूट कू इस्लाम में “माले गनीमत “कहा जाता है .कुरआन में लूटी गयी और पकड़ी गयी औरतों के लिए अरबी में जो शब्द दिए गए है वह हिन्दी ,अंगरेजी ,और अरबी के साथ कुरआन के हवाले से दिए जा रहे है

1 -सूरा -अल मोमनीन 23 :6 मलिकत ईमानुकुम ملكت ايمانكمslaves captives पकड़ी गयी ,गुलाम

2 -सूरा -अहजाब 33 :50 मलिकत यमीनुकुम ملكت يمينكم right hand posesed हथियाई गयीं

ऐसे कई उदहारण है .लेकिन मुल्लों ने इस सब्द के लिए हिन्दी में “लौंडी “शब्द गढ़ लिया है अब इस शब्द की परिभाषा में जो लिखा गया है वह हम ज्यों का त्यों दे रहे हैं –

“लौड़ी से अभिप्रेत वे स्त्रियाँ है जो युद्ध में जिहादी पकड़ लेते हैं .और राज्य की तरफ से मुसलमानों में बाँट दी जाती हैं .युद्ध में जो औरते पकड़ी जाती हैं उसके बारे में इस्लामी कानून यह है की ,यातो उन्हें जिहादियों में बाँट दिया जाए .या धन देकर छोड़ दिया जाये.जो स्त्री जिस जिहादी के कब्जे में आयेगी केवल वही उस स्त्री के साथ सम्भोग कर सकता है.किसी दूसरे को अधिकार नहीं होगा .और जब यह विशवास हो जाए की औरत गर्भवती तो नही हो गयी,तो राज्य किसी दूसरे को दे सकता है .यह उसी प्रकार का धर्मसंगत काम है ,जैसे विवाह है.इस्लाम में उत्तम बात इसको समझा गया है की लौंडिया किसी गरीब अपंग मुसलमान को दे दिया जाये ,जो अपंगता और गरीबी के कारण औरत नहीं रख सकता .इस्लाम ने इसके मानवीय पहलू को ध्यान में रखकर इसका बिलकुल स्वाभाविक रूप से युक्तिसंगत समाधान कर दिया है ”

”जहाँ तक हो सके बे निकाहों का निकाह पढ़ा दिया करो और इसी तरह तुम्हारे गुलाम और लौंडियो में. जो माली तौर पर निकाह की हैसियत नहीं रखते, वह अपनी नफ़स पर काबू रक्खें. गुलामों में जो मकातिब (मालिक की शर्त पर गुलाम मुक़रर्रह वक्क्त पर कोई काम करके दिखा दे तो वह मकातिब हो जाता है) होने के ख्वाहाँ हों उनको तआवुन करो ” सूरह नूर २४-१८ वाँ पारा आयत (३२)

पैगम्बर का साफ़ साफ़ पैग़ाम है कि ग़रीब लौड़ी और ग़ुलाम अपने नफ्स पर जब्र करके अज्वाज़ी ज़िन्दगी से महरूम रहें, ये पैगम्बरी नहीं, इंसानियत सोज़ी है. लौंडी और ग़ुलाम कोई मुजरिम नहीं होते थे यह जेहादी गुंडा गर्दी के शिकार कैदी हुवा करते थे. यह पुराने ज़माने की अख्लाकी फ़रायज़ आज लागू नहीं होते तो इसे आज क्यूँ तिलावत में दोहराया जाय. वैसे अल्लाह का कलाम ऐसा होना चाहिए जो कभी पुराना ही न पड़े. पेड़ों का खड़खड़ाना, चिडयों का चहचहाना, बादलों का गरजना, हवा की सर सर ही अल्लाह के कलाम हैं. कोई इंसानी भाषा अल्लाह का कलाम नहीं हो सकती. ऐ गुलामाने-रसूल! मकतिब करने का वह ज़माना लद गया, तुम भी मुहम्मद की गुलामी से नजात पाओ. हवा का बुत क़ायम किया था और नाम दिया था वहदानियत. मुहम्मद ने. मुस्लिम, काफ़िर और मुशरिक का साजिशी जाल बुना, फिर उस जाल का शिकार ऐसा कारगर साबित हुवा कि इंसानी आबादी का बीसवाँ हिस्सा उसमें फँसा, तो निकलना ना मुमकिन हो गया, फडफडा रहा है, इस जाल से मकातिबत की कोई सूरत उसके लिए नहीं बन पा रही है, पूरा का पूरा माफ़िया आलमी पैमाने पर मुसलामानों पर नज़र रखता है, कि वह इस्लामी गुलाम बने रहें ताकि हराम खोरों का राज क़ायम रहे.

मुसलमानों! आपको मकातिब तो होना ही है. पैगामारी वह है जो गुलामी से इंसानों को मुकम्मल आज़ाद करे. पैगम्बर भी कहीं लौंडी और गुलाम रखता है. “अपनी लौंडियो को ज़िना करने पर मजबूर मत करो, खास कर अगर वह पाक बाज़ है, महेज़ इस लिए कि कुछ मॉल तुम को मिल जाय. इसके बाद जो मजबूर करेगा तो अल्लाह तअला उसे मुआफ करने वाला है और मेहरबान है. हमने तुम्हारे लिए खुले खुले अहकाम भेजे हैं.” सूरह नूर २४-१८ वाँ पारा आयत (३३) यह अल्लाह के रसूल हैं जो अपने अल्लाह की दी हुई रिआयत का एलान करते है कि मुसलमान अगर भडुवा गीरी भी करे तो वह मुहम्मदी अल्लाह उसे मुआफ करने वाला है.

कौम के लिए कितना शर्मनाक ये पैगाम है. नतीजतन इस ज़लील पेशे में भडुआ बने हुए अक्सर मुसलमानों को पेट भरते देखने को मिलेगे. पाकबाज़ औरत को लौंडी बनाना ही नापाकी है. उसके बाद उस से पेशा कराना भी अल्लाह को गवारा है. लअनत है. एक शरई पेंच देखिए कि एक तरफ इसी सूरह में ज़ानियों को सौ सौ कोड़े रसीद करने का कानून अल्लाह नाज़िल करता है और इसी सूरह में लौंडियों से ज़िना कारी कराने की छूट देता है. गौर तलब ये है कि ज़िना यक तरफ़ा तो होता नहीं, इस लिए मुसलमानों को ज़िना करने की रिआयत भी देता है और सजा भी. ये कुरान का तज़ाद (विरोधाभास् ) है. मुसलामानों ! क्या तुम्हारा ज़मीर बिलकुल ही मुर्दा हो चुका है और अकलों पर पला पद गया है ? इन आयतों को आग लगादो, इस से पहले कि दूसरे इस काम की शुरुआत करें.

अब हम मुसलमानों से यह सवाल करना चाहते हैं की,यदि ईसाई ,यहूदी ,या हिन्दू ,युध्ह में मुस्लिम औरते पकड़ लें ,तो क्या यही कानून मुसलमान मान लेंगे ?क्योंकि कुरान में पकड़ी हुई औरते लिखा गया है ,चाहे कोई भी किसी की औरतें युद्ध में पकड़ ले .

यह कुरआन है ,या डाकुओं की लूट कीयोजना

आप फैसला करें