ध्यान से पढ़ें और इस बार कृपया बड़ी से बड़ी संख्या में इस कार्यक्रम में सम्मिलित होकर अपना कर्तव्य निभाएं ….

19 सितम्बर 2009,कल एक साल पूरा हुआ शहीद मोहनचंद शर्मा जी को देश के लिए अपना बलिदान दिए हुए।हम अपने शहीदों को बहुत जल्दी भूल जाते है,इसलिए एक बार सबको याद कराने के लिए बता दू शहीद मोहनचंद शर्मा वही जाबांज पुलिस अफसर जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बगैर बाटला हाउस में अपनी बहादुर टीम के साथ आतंकवादियो पर हमला किया था.ये वो खुन्कार आतंकव…ादी थे जिन्होंने पिछले साल दिल्ली में सीरियल बम ब्लास्ट किए थे और भारी तबाही मचाई थी.और जब इन आतंकवादियो को मारा गया और इनके कुछ साथियो को गिरफ्तार किया गया तो उनके बयानों ओर उनके पास से जो जरूरी दस्तावेज मिले उनके आधार पर गुजरात,मुंबई,दिल्ली में जो भी पिछले साल आतंकवादी घटने हुई थी उनके गुनहगारों तक पहुंचा जा सका,उनके गुप्त स्रोतों का पता लगा और बहुत भारी तादाद में देश में आतंकवादियो की गिरफ्तारी संभव हुई.अगर एक तरह से कहा जाए तो शहीद मोहनचंद शर्मा जी ने अपना बलिदान देकर देश में पनप रहे इस्लामिक आतंकवाद की कमर तोड़ कर रख दी.

 

लेकिन शहीद मोहनचंद शर्मा जी के बलिदान पर राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा हमेशा से उंगलिया उठती रही है.कभी तो एनकाउंटर को फर्जी कहा गया तो कभी मारे गये और गिरफ्तार हुए आतंकवादियो को मासूम और बेगुनाह बच्चे.बार-बार राष्ट्र द्रोहियो द्वारा मोहनचंद शर्मा जी की महान शहादत का अपमान किया गया.कभी जामिया के वि.सी. द्वारा तो,कभी जामिया के स्थानीये लोगो द्वारा समय-समय पर दिल्ली पुलिस की राष्ट्रवादी कार्यप्रणाली पर भी उंगलिया उठाई गई.

 

लेकिन मै पूछना हूँ सरकार का क्या फर्ज बनता था.क्या मोहनचंद शर्मा जी के शहीदी के पहले वर्ष में ही सरकार और देशवासी उन्हें भूल नहीं गये.शहीदी का पहला वर्ष,और ना सरकार द्वारा कोई बयान,ना कोई श्रधांजलि.ओर एक चीज हमे अभी पता लगी की,अभी तक शहीद मोहनचंद शर्मा जी के परिवार वालो को सरकार की तरफ से कोई मुआवजा भी नहीं मिला,जिसकी घोषणा ठीक एक साल पहले सरकार द्वारा मोहनचंद शर्मा जी की शहीदी के बाद बहुत जोश-खरोश से की गई थी.

 

खैर सरकार ने जो भी किया,पर देश के नागरिक होने के नाते मैंने,हमारे भाजयुमो के राष्ट्रीय कार्यालय मंत्री श्री संदीप ठाकुर,जामिया के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के अध्यक्ष श्री अरुण कुमार और हमारे कुछ साथी श्री महेश नोटियाल,श्री विद्याभूषण,श्री वरुण कुमार,श्री हिमांशु डबराल,रामेंदर मिश्रा,जयकरण सिंह,संघप्रकाश,सुधीर चौधरी ने मिलकर एक संघठन का घठन किया.जिसका नाम सबने मिलकर “यूथ फॉर नेशन(इंडिया)” तय किया.और इसी बैनर के तले हमने १९ सितम्बर को बाटला हाउस चौक पर जाकर शहीद मोहनचंद शर्मा जी को श्रधांजलि देने का निशचय किया.इस नये बैनर के गठन का मकसद सिर्फ इतना था की हम इसे कोई राजनेतिक कार्यक्रम नही बनाना चाहते थे और दूसरा इसमें किसी भी संघठन के लोग आराम से आ सकते थे.

 

श्रधांजलि देने के लिए हमने 19 सितम्बर को दोपहर एक बजे होली फेमिली अस्पताल के बाहर एकत्रित होने का समय रखा।होली फेमिली अस्पताल बाटला हाउस से लगभग एक किलोमीटर और जामिया मिलिया इस्लामिया विशवविद्यालय से 100 मीटर की दूरी पर है.हमने काफी लोगो के आने का अनुमान लगाया था,पर जिस प्रकार का जामिया में भय का माहोल रहता है और ठीक एक दिन पहले 18 सितम्बर को जिस प्रकार जामिया और बाटला हाउस के स्थानीय लोगो द्वारा हजारो की संख्या में मानवधिकार की दुहाई देकर,आतंकवादियो के समर्थन में और दिल्ली पुलिस की राष्ट्रवादी कार्यप्रणाली के खिलाफ रैली निकली गई,उसे देखते हुए हमारी संख्या मात्र 35 से 40 के बिच में सिमटकर रह गयी.फिर भी हम जितने भी लोग जुटे हम सब ने हिम्मत के साथ मिलकर आगे बढ़ने का निशचय किया.

 

हाथो में शहीद मोहनचंद शर्मा जी की तस्वीरे,तिरंगे झंडे और भारत माता की जय के नारों के साथ हम जामिया कैम्पस के बीचो-बीच पहुंचे ही थे की एक 23-24 साल का आतंकवाद समर्थक अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर सवार हमारे जलूस के बीचो-बीच आ गया और हमे वहा से हटने के लिए कहने लगा.जब हमने उसे रोड के साइड से निकलने के लिए कहा तो उसने हमे कहा की साइड होते हो या बाइक ऊपर चड़ा दू.हमने इलाके को मद्देनजर रखते हुए उस से ज्यादा बहसबाजी मुनासिब नहीं समझा,पर उसके दुबारा या कहने पर की कार्यकम बंद करो नही तो बाइक ऊपर चड़ा दूंगा.हम में से एक ने कहा की चड़ा दो उपर बाइक,अगर हिम्मत है तो.हमारे वापस जवाब देने पर वो हमे पांच मिनट में अंजाम भुगते की धमकी देकर चला गया.अभी वो आगे गया ही था की एक और आतंकवाद समर्थक हमारे बीच आ गया और हमसे कहने लगा की बंद करो ये ड्रामा.हमारे ये कहने पर की शहीद मोहनचंद शर्मा जी हमारे हीरो है और हम उन्हें अपनी श्रधान्जली देने यहा आये है.तो उसने दिल्ली और गुजरात बम विस्फोटो को जायज बताते हुए हमसे ये कहा की,’गुजरात का कोई रिएक्शन तो आना ही था.अपनी बात को आगे बढाते हुए उसने फिर हमसे कहा की वो मारे गये लोग जायज थे और गुजरात का बदला लेने आये थे.’इस तरह से उसने ये साफ दर्शा दिया की वह के स्थानीय लोग न बल्कि ये जानते है की वो मारे गये और गिरफ्तार हुए लोग आतंकवादी थे,बल्कि वो हर तरीके से उनके इस कुकर्म का समर्थन भी करते है.मै अभी ये सोच ही रहा था की किस तरीके से यहा अकेला-अकेला व्यक्ति आकर हमसे बहस कर रहा है,लेकिन अगले ही मिनट में स्थिथि स्पष्ट हो गई जब मोटरसाईंकलो से 20-25 स्थानीय युवक हमसे लड़ने के लिए आ गए और शायद हमसे बहस करने वाले युवक ये जानते थे उनके समर्थन में पीछे इतने लोग आ रहे है.तब तक हम बाटला हाउस से लगभग 200 मीटर की दूरी तक पहुँच चुके थे.और पूरा जामिया कैम्पस “शहीद मोहनचंद शर्मा अमर रहे” के नारों के साथ गूँज रहा था।

 

स्थिति काफी चिंताजनक हो चली थी पर तब तक दिल्ली पुलिस के एक बहादुर एस.आई. अपनी टीम के साथ वह पहुँच गये.और उन्होंने हमे कोई अनहोनी घटना होने के डर से आगे जाने को मना किया और हमे जलूस को वही से वापस ले जाने का अनुरोध किया.और उन्ही पुलिस वालो में से एक ने हमे बताया की वह बाटला हाउस चौक पर लोगो को हमारे इस कार्यकर्म का पता लग चूका है और हमारा विरोध करने के लिए वह अब तक 100 से ज्यादा लोग जुट भी चुके है.पर हमारे मनाने-समझाने पर की हम मोहनचंद शर्मा जी को श्रधान्जली देने आये है और श्रधान्जली दिए बिना वापस नही जायेंगे तो उन्होंने हमे वही श्रधान्जली देने की इजाजत दे दी.जामिया के बीचो-बीच हमने मोहनचंद शर्मा जी की तस्वीर रखकर जिसपर ‘शहीद मोहनचंद शर्मा जी को शत-शत नमन’ लिखा था वन्दे मातरम गायन किया और बारी-बारी से मोहनचंद शर्मा जी को अपनी श्रधान्जली अर्पित की.वह जो 20-25 स्थानीय लोग पहुँच चुके थे अगर दिल्ली पुलिस के बहादुर सिपाही न पहुँचते,तो हमे शायद जान से मारने पर उतारू थे.पर फिर भी हम पूरी तरह से निडर हो कर अपने जलूस को श्रधान्जली देने के बाद वही से नारों के साथ वापस लेकर जा रहे थे.वो स्थानीय लोग पुलिस से भी बहुत ही अभद्र भाषा में बात कर रहे थे और उनसे हमारे कार्यक्रम को बंद करने के लिए कह रहे थे.एक पुलिस वाले ने उनको ये कहकर समझाने का प्रयास भी किया की अब ये लोग वापस जा तो रहे है इसलिए आप भी जादा शोर मत मचाये.तो उसने पुलिस वाले को इस भाषा में जवाब दिया की अगर जाना है तो बहिन…….. को बोलो चुप होकर जाए.क्यों ये जामिया के माहोल को ख़राब करना चाहते हो. वो सज्जन अभी चुप ही हुए थे की एक और महापुरष आगे आके बोले की साले हमारी जमीन पर मोहनचंद शर्मा का नाम ले रहे हो.मै ये ‘हमारी जमीन’ शब्द सुनकर भोचक्का सा हो गया.मेरे दिमाग में एक कहानी बार-बार सामने आ रही थी,जो मेरे पिताजी मुझे बचपन से सुनाते रहे है.अगर उस कहानी को मै आपके सामने ना रखु तो मुझे लगेगा की मेरी कही गयी बात अधूरी सी रह गयी. “दो भाई थे.दोनों में लडाई हो गई और नोबत या तक पहुँच गयी की दोनों ने बटवारे का फैसला कर लिया.दोनों भाईयो में जमीन-जयदाद,मकान और सब कुछ बंट गया.पर जब एक भाई अपना हिस्सा लेकर वो सयुक्त मकान वह से छोड़कर जाने लगा तो उस भाई का छोटा बेटा जो की अपने चाचा का बहुत लाडला और प्यारा था अपनी प्यारी सी तुतलाती आवाज में बोला की,”मै तो चाचा के साथ रहूँगा”.उसके पिता को हिस्सा दिया जाने के बावजूद चाचा ने बिना किसी संकोच के अपने उस लाडले भतीजे को अपने साथ रखना स्वीकार किया और उसे अपने साथ रख लिया.इस प्रकार दोनों भाई अलग हो गये पर बड़े भाई का एक बेटा अपने चाचा के साथ रह गया.चाचा ने भी उसे पूरा लाड-प्यार दिया.जैसे अपने बेटो को जो कुछ दिया,उसे भी वही सब कुछ मिला.इस तरह अपने चचेरे भाइयो के साथ खेलते-कूदते वो बड़ा हुआ.पर बड़ा होते ही उस बड़े भाई के बेटे ने अपने भाइयो का सामान उठाकर घर से बाहर फेकना चालू कर दिया और घर पर अपना हक जताने लगा.अब बताइए उस चाचा को अब अपने उस लाडले भतीजे के साथ क्या करना चाइए.शायद आपके दिमाग में भी वही वही जवाब चल रहा होगा जो की एक आम आदमी के दिमाग में आना चाइये.पर जवाब जो भी हो मै यह आपको ये बताना चाहता हूँ वो चाचा कोई और नही,वो थे हमारे प्यारे चाचा पंडित जवाहर लाल नेहरु और वो भतीजा वो था जो आज हमे जामिया की जमीन पर खड़ा हो कर ये कह रहा था की हमारी जमीन पर मोहनचंद शर्मा का नाम लेने की हिम्मत कैसे हुई.खैर,हम उनकी इन बातो का जवाब अपने नारों के साथ दे रहे थे और हमने अब ‘वीर शहीदों का अपमान,नही सहेगा हिंदुस्तान’ और ‘शहीदों का अपमान हुआ तो,खून बहेगा सड़कों पर’ के नारे लगाने चालू कर दिए थे.वो स्थानिये लोग अभी भी हमारे आगे-पीछे चल रहे थे.शायद किसी ऐसे मौके की तलाश में की कब पुलिस वह से हटे और वो अपना काम करे.पर हम धन्यवाद् करना चाहेंगे दिल्ली पुलिस के उन वीर जवानों का जिन्होंने हमे सुरक्षित वापस होली फॅमिली हॉस्पिटल तक पहुँचाया और वो लोग भी वह तक आये लेकिन वो हमारा कुछ बिगाड़ नही पाए क्योकि स्वर्ग में बैठी मोहनचंद शर्मा जी की आत्मा शायद वही से बैठी हमे आर्शीवाद दे रही थी.पर उन लोगो में वह से आगे जाने की हिम्मत नही थी क्योकि वो सिर्फ अपने घर में ही शेर थे.पर वह से वापस जाने से पहले वो हमे एक बात कह गये की,’तुम्हारी किस्मत अच्छी थी,आज अच्छे दिन आये हो की आज कैम्पस बंद है.वरना तुम लोगो को काट कर भेजते’.

 

वह जो भी हुआ उसके बाद कुछ प्रशन मेरे मन में बार-बार आ रहे है की आज हमारे देश में हमारी क्या स्थिति है।क्या हम अपने एक बहादुर पुलिस अफसर को श्रधान्जली भी नही दे सकते।क्या इसके लिए भी हमे किसी से इजाजत लेनी पड़ेगी।कब तक सरकार वोट बैंक की राजनीती की खातिर इस तरह के फैसले लेते रहेगी की जिससे आतंकवादियो का हौसला बड़े।क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा अफजल को फांसी दिए जाने के फैसले के बावजूद अभी तक उसपर अमल न किया जाना इस तरह के राष्ट्रद्रोही लोगो का हौसला नही बड़ाता।क्यों अभी तक शहीद मोहनचंद शर्मा जी के परिवार वालो को सरकार की तरफ से कोई मुआवजा नही मिला।क्यों सारे मानव अधिकार एक विशेष कौम के लिए है।क्यों सरकार द्वारा मोहनचंद शर्मा जी को उनके बलिदान के पहले साल में ही भुला दिया गया।क्या अब फिर कोई बहादुर अफसर देश के लिए शहीद होने की हिम्मत रखेगा।क्या इस से उनका मनोबल नही टूटेगा।क्यों पुलिस की करवाई पर सरकार में बैठे लोगो द्वारा ही उंगलिया उठाई जाती है।मेरा ये सवाल सब से है,सब से।और ये भी सवाल है की कब तक हम इन सवालों से अंदर ही अंदर जूझते रहेंगे।अपनी बात खत्म करने से पहले एक पंक्ति कहना चाहूँगा जो मेरे मन में बार-बार आ रही है।

 

“शूरवीरों की चिताओ पर भी कभी लगते थे वो मेले,

 

पर वतन पर मरने वालो का, क्या अब यही बाकी निशा होगा.