गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,

तख्ते लन्दन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की

 

गाज़ी उस मुस्लमान को कहते हैं जो इस्लाम की और से जिहाद करता है और काफिरों को मरता है, और जो जिहाद में मारा जाता है .. उसे शहीद कहा जाता है l

शहीदों और गाजियों के लिए जन्नत में 72 हूरों और 27 लोंडों से पुरस्कृत करने का प्रावधान “कुरआन बदमाश” में लिखा गया है l

 

ये पंक्तियाँ बहादुर शाह जफर ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के समय लिखी थीं, या फिर किसके सम्बोधन में कही थीं ये आप स्वयम समझ सकते हैं l मुगल सल्तनत को खत्म हुए काफी समय बीत चुका था, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, बुन्देलखण्ड वीर छत्रसाल और दशम गुरु गोबिंद सिंह जी के संघर्षों ने औरंगजेब का 90 % खजाना खाली करवा दिया था l इसके बाद में रंगीले एय्याशों जैसे बादशाहों ने मुगालियाँ सल्तनत की रही सही कमर भी तोड़ ही दी थी l

बहादुर शाह जफर भी कुछ ऐसे ही मिजाज के थे …. अपनी एय्याशियों के चलते वो करदार हो चुके थे l पुरानी दिल्ली के जाने कितने ही व्यापारियों से कर्ज ले लेकर बहादुर शाह जफ़र अपनी सल्तनत चला रहे थे l

 

 

बहादुर शाह जफर के बारे में तो यहाँ तक कहा है इतिहासकारों ने की 75-80 वर्ष कीआयु में भी बहादुर शाह जफर की एय्याशियाँ खत्म नहीं हुई थीं, एक साहूकार से कर्ज लेकर बहदिर शाह जफर ने अपना अंतिम निकाह की रस्म पूरी की वो भी एक 12 वर्ष की लड़की के साथ l

 

खैर वापिस लौटते हैं स्वतन्त्रता संग्राम की और … बहादुर शाह जफ़र और अन्य इस्लामी शासकों को यह संदेश बाहरी इस्लामी शासकों से मिलने लगे थे की दारुल-इस्लाम को दारुल हर्ब बने अब बहुत समय बीत चुका है इसे अविलम्ब दारुल इस्लाम बनाने का कार्य प्रारम्भ किया जाये l इसी षड्यंत्र के अंतर्गत 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की बुनियाद रखी गयी थी l हिन्दू राजाओं और राष्ट्रवादी शक्तियों ने अपना भरपूर जोर लगाया इस और परन्तु  मुगलों की ही सेनाओं ने अंग्रेजी सेना में व्याप्त मुस्लिम सैनिकों के ऊपर शस्त्र न चलाते हुए हिन्दू सैनिकों पर ही प्रहार करने लगे और धीरे धीरे इस महान स्वतन्त्रता संग्राम का विफल होना इतिहास बन गया l

 

अनेक इतिहासकारों ने उस समय अपनी पुस्तकों में यह भी लिखा की केवल हिन्दू लोगों ने ही स्वतन्त्रता संग्राम के युद्ध को स्वतन्त्रता संग्राम की भाँती लड़ा …. इस्लामी मानसिकता के लोगों ने…. इस युद्ध का प्रयोग एक जिहाद की भाँती ही किया l

 

उपरोक्त पंक्तियों का अर्थ अब शायद आप सबकी समझ में आ गया होगा l

 

दारुल इस्लाम … दारुल कब्जा ही रह गया … दारुल हर्ब भी न बना l

हिंदुत्व के लिए भी यह कुछ कारणों  से लाभकारी ही सिद्ध हुआ, क्योंकि उस समय तक अधिकाँश हिन्दू जनता अपने शास्त्रों से कट चुकी थी .. उसके बाद के पतन से आप सब भली भाँती अवगत हैं l

 

जामा मस्जिद का  विक्रय….

 

अंग्रेजों के लिए 1857 का युद्ध एक बहुत खर्चीला युद्ध साबित हुआ, जिसके कारण अंग्रेजों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी थी, जिसकी भरपाई के लिए उन्होंने लाल किले की दीवारों में जड़े रत्नों को भी निकलवाया परन्तु उससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पडा … अंततः  अंग्रेजों ने जामा मस्जिद को बेचने का ही निर्णय लिया l जामा मस्जिद की नीलामी की गयी … उस समय अंग्रेजों का भी इतना था की किसी मुसलमान का ईमान नहीं जागा की आगे बढ़ कर अपनी मस्जिद को बचा ले … नीलामी के अंत में एक हिन्दू साहूकार ने ही जामा मस्जिद को खरीद लिया l उस साहूकार से कई हिन्दू लोगों ने एक बड़ा अस्पताल खुलवाने का सुझाव और विनती की परन्तु उस SICKULAR साहूकार ने वो मस्जिद वापिस मुसलमानों को यह कह कर दे दी की .. इबादत के स्थान पर इबादत ही हो तो अच्छा है l