आजमगढ़ के शिबली कॉलेज में पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह और प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी के साथ मुस्लिम छात्रों ने जैसा व्यवहार किया, वह वस्तुत: उनकी अपनी करनी का ही तार्किक परिणाम है।

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जिन हथकंडों के बल पर चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है, उनसे राष्ट्रनिष्ठा और संवैधानिक निकायों के प्रति उसके सम्मान भाव पर गहरा संदेह पैदा होता है। आजमगढ़ में दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी, दोनों ने ही दिल्ली में हुई बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी साबित करने की कोशिश की।

दिग्विजय सिंह ने कहा, मैं मानता हूं कि बाटला मुठभेड़ फर्जी थी, लेकिन प्रधानमंत्री व गृहमंत्री इसे जायज मानते हैं, इसलिए हमें इसकी जांच की मांग छोड़नी पड़ी। तुष्टिकरण के आगे कांग्रेस किस हद तक गिर चुकी है! बाटला मुठभेड़ में एक पुलिस अधिकारी को अपनी शहादत देनी पड़ी और उस मुठभेड़ को फर्जी बताने की कोशिश हो रही है।

देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि मुठभेड़ असली थी और मारे गए युवक आतंकी थे। किंतु दिग्विजय के बेतुके बयान पर कांग्रेस नेतृत्व फिर खामोश है। क्यों? राहुल गांधी को बिना रैली किए दिग्विजय सिंह के तीर्थस्थल आजमगढ़ से लौटना पड़ा। यह एक सबक है। शिबली कॉलेज के बाहर मुसलमान छात्रों ने राहुल गांधी का पुतला फूंक कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप लगाया। दुर्भाग्य से कांग्रेस राजनीतिक अवसरवाद के कारण उस मानसिकता को पढ़ना नहीं चाहती।

जब आप चरमपंथियों का साथ देते हैं तो उस अलगाववादी भावना को भी हवा देते हैं, जो कट्टरपंथ की बुनियाद है। जिन्ना के मुस्लिम पृथकतावादी राजनीति में आने से पहले ही एक समुदाय विशेष में कट्टरपंथ का पोषण प्रारंभ हो चुका था।

खिलाफत आंदोलन को समर्थन देकर गांधीजी ने उसकी नींव डाली, जिसकी परिणति मोपला दंगों और बाद में देश के रक्तरंजित विभाजन में हुई। सेक्युलरिस्ट अखिल भारतीय हिंदू महासभा को सांप्रदायिक पार्टी साबित करते आए हैं। किंतु सत्य यह है कि अखिल भारतीय हिंदू महासभा गांधीजी के साथ खड़े बहुसंख्यकों की भारी तादाद में से चार प्रतिशत को भी अपनी ओर खींचने में नाकाम रही। वहीं गांधीजी और उनकी पंथनिरपेक्षता जिन्ना के साथ वाले मुसलमानों में से चार प्रतिशत को भी अपने उस महान लक्ष्य में शामिल नहीं कर सकी।

कांग्रेस की पंथनिरपेक्षता, जो मुस्लिमों के तुष्टिकरण से ही पैदा हुई थी, मुस्लिम समुदाय को संतुष्ट करने के लिए यथेष्ट नहीं थी। बाटला मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी आजमगढ़ के संजरपुर के निवासी थे। पिछले कुछ वर्षो में उत्तर प्रदेश, खासकर आजमगढ़ और पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र जिहादियों के सुरक्षित ठिकाने के रूप में सामने आ रहे हैं।

बाटला मुठभेड़ से पूर्व अहमदाबाद बम धमाकों के सिलसिले में आजमगढ़ के ही एक मौलाना अबू बशर को गिरफ्तार किया गया था। बशर की गिरफ्तारी के बाद उसके घर मातमपुर्सी के लिए सपा-बसपा और कांग्रेस में होड़ लग गई थी। कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के परिजनों से मिलने के बाद दिग्विजय सिंह ने तब लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि न्याय में देरी, न्याय न देने के समान है।

जब सत्ताधारी दल राष्ट्रहितों की कीमत पर वोट बैंक की राजनीति करेगा तो स्वाभाविक है कि जहां एक ओर सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिरेगा, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रविरोधी शक्तियों को ताकत मिलेगी। आजमगढ़ में राहुल गांधी के हाथ लगी निराशा इसी खतरे को रेखांकित करती है। आजमगढ़ के मुसलमानों के लिए यदि यह देश सर्वोपरि है तो उन्हें अपने समुदाय में छिपे उन भेडि़यों की तलाश करनी चाहिए, जो दहशतगदरें को पनाह देते हैं।

मुंबई पर इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ, क्या वह सीमा पार कर अचानक घुस आए जिहादियों के द्वारा संभव था? आतंकवादियों को हमारे देश की धरती पर संरक्षण देने वाले कौन हैं? मानवता और देशविरोधी इस मानसिकता के लिए कौन-सा दर्शन जिम्मेदार है? इस देश की कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि मुंबई हमलों में जिंदा पकड़ा गया अजमल कसाब सरकारी मेहमान बना हुआ है। उसके खिलाफ वीडियो फुटेज हैं, चश्मदीद गवाह हैं, किंतु सुनवाई चल रही है।

वोट बैंक की राजनीति करने वाली कांग्रेस क्या इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने का साहस कर पाएगी? कांग्रेस के इतिहास को देखते हुए उससे ऐसी अपेक्षा बेमानी है। वह अल्पसंख्यकों के कट्टरवादी जुनूनी वर्ग के भयादोहन के बल पर ही आजादी के बाद के चार दशकों तक प्राय: पूरे देश में एकछत्र राज कर चुकी है। उसके तुष्टिकरण के नक्शेकदम पर चलकर जब छिटपुट सियासी दलों ने छलावों के बल पर मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी कर ली तो कांग्रेस का वर्चस्व भी टूटा। अब उस खोए जनाधार को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस एक बार फिर अल्पसंख्यक कार्ड थामे चुनावी मैदान में है।

लोकसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस ने सच्चर समिति का प्रहसन चलाया, अब वह विधानसभा चुनाव में रंगनाथ मिश्र आयोग का झुनझुना हिला रही है। चुनाव आयोग ने सही कदम उठाते हुए चुनाव होने तक अल्पसंख्यक कोटे के अमल पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। किंतु चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ केंद्रीय कानूनमंत्री ने जिस तरह की टिप्पणी की है, वह संवैधानिक निकायों के प्रति उनके तिरस्कार भाव को रेखांकित करने के साथ ही अधिनायकवादी मानसिकता की भी पुष्टि करती है।

सलमान खुर्शीद ने अपनी पत्नी के निर्वाचन क्षेत्र से अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की बात चलाई। चुनाव आयोग का नोटिस मिलने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आयोग को चुनाव के बेसिक फंडे की जानकारी ही नहीं है। कांग्रेस के इसी अंहकार के कारण पिछले दिनों संसद में लोकपाल बिल अटक गया। कांग्रेस में वकील नेताओं की अधिकता के कारण ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली नौबत है। क्या सलमान खुर्शीद को चुनाव आचार संहिता की सामान्य श्रेणी और सत्ता में रहने वाली पार्टी के संबंध में निर्धारित प्रावधानों की जानकारी नहीं है?

चुनाव आदर्श संहिता के अनुसार वोट पाने के लिए जाति या मजहबी भावनाओं पर अपील नहीं की जा सकती। इसके साथ ही सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई भी मंत्री इस तरह का वादा नहीं कर सकता। कांग्रेस की चिंता किसी तरह मुस्लिम वोट बैंक वापस पाने की है, जो उसकी गोद से छिटक कर दूसरे सेक्युलर दलों में बिखर गया है।

किंतु कांग्रेस के हाथों अब तक मुसलमानों का कितना भला हुआ है, इसका हिसाब-किताब तो अंतत: मुस्लिम समुदाय को ही करना होगा।