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यदि आप ८४ के नरसंहार को भूलते है,

…….. तो भारत विरोधी राक्षसी प्रवृत्ति को भूलते हैं
– जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा

३१ अक्टूबर १९८४

९.२० बजे प्रातः         प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को उसके दो सिख अंगरक्षकों ने निवास स्थान पर मार डाला गया। उन्हें ऑल इण्डिया मेडिकल हॉस्पीटल ले जाया गया।

११.०० बजे प्रातः      ऑल इण्डिया रेडियों की घोषणा।

प्रधानमंत्री को घायल बताया।

२.०० बजे दोपहर        अधिकारिक रूप से मृत्यु की पुष्टि नहीं। बी.बी.सी. ने मृत्यु की बात कही।

४.०० बजे दोपहर        राजीव गांधी पश्चिम बंगाल से वापस आए। एयरपोर्ट से सीधे ऑल इण्डिया मेडिकल हास्पीटल गए। सिखों के विरुद्ध कुछ छुटपुट घटनाओं के समाचार।

५.३० बजे शाम      ऑल इण्डिया मेडिकल हॉस्पीटल पहुंचते ही राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर पत्थर फैंके गए।
७.०० बजे शाम      दंगाइयों की संगठित भीड़ ने सिखों के विरुद्ध हिंसा की। कांग्रेस  पार्षद अर्जुनदास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में भीड़ जुटी। सिखों के विरुद्ध भड़काऊ भाषण दिए गए। पृथ्वीराज रोड पर सिखों के स्कूटर व कारों को आग के हवाले कर दिया गया। एक दर्जन सिखों का कत्ल।
१०.०० बजे रात   राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वरिष्ठ वकील व प्रतिपक्ष के एक नेता राम जेठमलानी ने गृहमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव से शांति बनाने की अपील की। दिल्ली के गवर्नर पी.जी. गावल और पुलिस  कमीश्नर एस.सी. टंडन ने नरसंहार के स्थलों का मुआईना किया। इस सबके बावजूद, ३१ अक्टूबर और एक नवम्बर के बीच की रात सिखों के नरसंहार की वारदातें चालू रही। प्रशासन मौन था।1 नवम्बर १९८४  ३१ अक्टूबर व 1 नवम्बर के बीच की रात को कांग्रेंस के शीर्ष नेताओं की बैठकों के दौर चलते रहे। समर्थकों को बडे+ पैमाने पर इस बात के लिए प्रेरित किया गया। कि वे इस नरसंहार को अंजाम दें। सुबह पूर्वी दिल्ली में पहले सिख को मारा गया। ९ बजे तक भीड़ सड़कों पर थी। भीड़ के प्रथम निशाने गुरद्वारे थे। भीड़ के पास लोहे की रॉड़ थी। सभी रॉड़ो का साइज एक समान था। भीड़ के पास प्रर्याप्त मात्रा में पेट्रोल और मिट्टी का तेल था। एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ब्रह्‌मानन्द गुप्ता का नाम उभर कर आया, जो मिट्टी के तेल का व्यापारी था और सुलतानपुरी के नरसंहार में भाग ले रहा था।
प्रत्येक थाने में पुलिस कर्मियों की काफी संख्या थी। फिर भी शरारती तत्वों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई। ÷÷नानावती  कमीशन” के अनुसार प्रतिरोध दिखाने वाले सिखों को   गिरफ्तार किया गया। उनके हथियार जब्त करके मुकदमें दर्ज किए गए। त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, सुलतानपुरी कांग्रेसी नरसंहार का कहर। नरसंहार के पीड़ितों ने कत्लेआम की रचना करने वाले  कांग्रेसी नेताओं एच.के.एल. भगत, सज्जन कुमार, धर्मदास शास्त्री, टाइटलर के साथ १० पार्षदों के नाम लिए।२ नवम्बर १९८४ पुलिस ने ऊपरी तौर पर कर्फ्यू लगा दिया। लेकिन यह सब ढ़कोसला था। अहिंसा के तथाकथित पुजारी नेहरूवादियों ने जकरिया खान और लखपत राय की याद दिला दी। जिस दिल्ली के सिख पंजाब की समस्या के सामने राष्ट्रीय पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे। उसी पर एकतरफा प्रहार हुआ था।    अति गरीब सिखों पर विशेष अत्याचार किए गए। पंजाब में सियासी प्रतिक्रिया करने के लिए कांग्रेस कहां थी? ३ नवम्बर १९८४ पूरी दिल्ली में नरसंहार करने वाले भीड़ की प्रकृति समान    थी। पुलिस ने एफ.आई.आर. नहीं लिखी। पीड़ित हताश थे। सारा दिल्ली हिटलर का गैस चैम्बर बन चुका था। वेद मारवा की एक कमेटी का नाटक हुआ। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक २७३३ सिखों का नरसंहार हो गया था। धर्मनिरपेक्ष  नेताओं ने अधर्म का काम किया था।

राजीव गांधी ÷÷जब एक बड़ा पेड़ गिरता है,
एतिहासिक बयान तो धरती हिलती ही है।”
नरसंहार के बाद
२७ दिसम्बर १९८४       राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी को ४०० से अधिक सीटें प्राप्त हुई। चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार का काम था-कानून के शिंकजे से बचना। जांच कमेटी   दो एन.जी.ओ. ÷सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी’ के जस्टिस वी.एम. तारकुण्डे और ÷सिटीजन कमीशन’ के पूर्व चीफ जस्टिस एस. एम. सीकरी ने सरकार और कांग्रेस पार्टी को दोषी माना।

रिट पैटीशन                    एक पत्रकार राहुल कुलदीप बेदी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में  १९८४ के नरसंहार में पुलिस की भूमिका पर जांच की मांग की।  पी.यू.डी.आर. ने दिल्ली उच्च न्यायालय में ÷कमीशन ऑफ  इंक्वारी’ की मांग की।

रंगनाथ मिश्रा कमीशन       १६ अप्रैल १९८५ को सरकार ने जांच कमीशन की घोषणा की।

सिटीजन जस्टिस कमेटी       सभी मानवाधिकार संगठनों ने इस बैनर के नीचे आकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया।सी.जे.सी. का हाथ खींचना   मिश्रा कमीशन की कार्रवाई कैमरे के सामने होनी थी। सिटीजन जस्टिस कमेटी को कैमरे से दूर रखने से पारदर्शिता की हत्या हो रही थी।

मिश्रा कमीशन              फरवरी १९८७ में मिश्रा कमीशन का नतीजा एक धोखा साबित हुआ। लोकतंत्र का एक स्तम्भ ढ़ह गया, ऐसा लगता है।जैन बनर्जी कमीशन    मिश्रा कमीशन के निर्देश पर एक और जांच कमेटी।

कपूर मित्तल कमेटी दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई के लिए जांच  या  प्रशासनिक ढ़कोसला ?

आहूजा कमेटी                 दिल्ली नरसंहार ने मृत सिखों की संख्या निर्धारण के लिए बनाई गई कमेटी।

स्टे ऑर्डर                    जैन बनर्जी कमीशन की पहली सिफारिश सज्जन कुमार के विरुद्ध मुकदमें के बाद एक अन्य अभियुक्त ब्रह्‌मानन्द गुप्ता ने   दिल्ली उच्च न्यायालय स्टे ऑर्डर प्राप्त किया। उच्च न्यायालय का निर्णय    दिल्ली उच्च न्यायालय ने जैन बनर्जी कमीशन की अधिसूचना को खारिज किया। (अक्टूबर १९८९) कपूर मित्तल कमेटी कमेटी के दोनों सदस्यों ने अलग-अलग रिपोर्ट दी। जस्टिस दिलीप कपूर के अनुसार कमेटी के पास पुलिस अधिकारियों को   सम्मन करने के प्रर्याप्त अधिकार नहीं। दूसरी सदस्या कुसुम लता मित्तल के अनुसार ७२ पुलिस कर्मी दोषी चिन्हित थे। पोटी पोषा कमेटी       वी.पी. सिंह सरकार ने उच्च न्यायालय के बताए बिन्दुओं को ठीक करते हुए जैन बनर्जी कमीशन के स्थान पर नई कमेटी बनाई।

सज्जन कुमार का          १९९० में पोटी पोशा कमेटी ने सज्जन कुमार पर मुकदमा चलाने एंटीस्पेट्री बेल  और गिरफ्तार करने की बात कही। सी.बी.आई.टीम को तब तक सज्जन कुमार समर्थकों ने कैद किए रखा, जब तक उनका वकील आर.के.आनन्द एंटीस्पेट्री बेल लेकर नहीं आ जाता।

एक नई कमेटी                   १९९० में जे.डी.जैन और डी.के. अग्रवाल ने पोटी पोशा कमेटी का स्थान लिया।
जैन अग्रवाल कमेटी             विस्तृत रिपोर्ट में एच.के.एल. भगत, सज्जन कुमार दोषी। का निर्णय जस्टिस आर.एस. नरूला           १९९४ में आई कमेटी ने पुनः कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं कमेटी  को दोषी ठहराया।

नानावती कमीशन           २००० में जस्टिस नानावती को कई सौ शपथ पत्र प्राप्त हुए। प्रमुख व्यक्तियों में आई.के. गुजराल, खुशवंत सिंह, कुलदीप नैयर और जगजीत सिंह अरोड़ा ने भी शपथ पत्र दिए। नानावती कमीशन का निर्णय कांग्रेसी नेती दोषी व कांग्रेस पार्टी दोषी।
पहले धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले नेहरूवादियों ने मजहब के आधार पर भारत का विभाजन करवाया। फिर अहिंसा की बात करने वाले नेहरूवादियों ने दिल्ली में नरसंहार करवाए।