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शंकर शरण

प्रस्‍तुति: डॉ0 संतोष राय

एक प्रवासी हिन्दू भारतीय की बिटिया ने किसी मुस्लिम से विवाह का निश्चय किया तो वह बड़े दुःखी हुए। उन्होंने समझाने का प्रयास किया कि यह उस के लिए, परिवार के लिए और अपने समाज के लिए भी अच्छा न होगा। तब बिटिया ने कहा, ‘मगर पापा, आप ही ने तो सिखाया था कि सभी धर्म समान हैं और एक ही ईश्वर की ओर पहुँचने के अलग-अलग मार्ग हैं। तब यह आपत्ति क्यों?’ कहने की आवश्यकता नहीं कि पिता को कोई उत्तर न सूझ पड़ा।

वस्तुतः असंख्य हिन्दू, विशेषकर उनका सुशिक्षित वर्ग, अपनी सदभावना को अनुचित रूप से बहुत दूर खींच ले जाते हैं। सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं, यह ठीक है। सभी मनुष्यों को समान समझना और सद्बाव रखना चाहिए यह भी उचित है। किंतु इस का अर्थ यह नहीं कि विचारधाराओं, विश्वास, रीति-नीति,राजनीतिक-सामाजिक-कानूनी प्रणालियों आदि के भेद भी नगण्य हैं। धर्म और मजहब का भेद तो और भी बुनियादी है। भारत के ‘धर्म’ का पश्चिम के ‘रिलीजन’ का पर्याय समझना सब से घातक भूल है। इसी से दूसरी भूलों का स्रोत जुड़ता है।

धर्म आचरण से जुड़ा है, जबकि रिलीजन विश्वास से। धर्म कहता है आपका विश्वास कुछ भी क्यों न हो, आपका आचरण नीति, मर्यादा, विवेक के अनुरूप होना चाहिए। यही धर्म है। इसीलिए भारतीय समाज में ऐसी अवधारणाएं और शब्द हैं जिनके लिए पश्चिमी भाषाओं में कोई शब्द नहीं है। जैसे, राज-धर्म, पुत्र-धर्म, क्षात्र-धर्म, आदि। दूसरी ओर, आप का आचरण कुछ भी क्यों न हो, यदि आप कुछ निश्चित बातों पर विश्वास करते हैं तो आप ईसाई या मुस्लिम रिलीजन को मानने वाले हुए। इसीलिए उन के बीच रिलीजन को ‘फेथ’ भी कहा जता है, बल्कि फेथ ही रिलीजन है।

निजामुद्दीन औलिया का एक प्रसंग है जिस में वह कहते हैं कि उलेमा का हुक्म बिना ना-नुच के मानना चाहिए। इससे उसे लाभ यह होगा कि “उस के पाप उस के कर्मों की किताब में नहीं लिखे जाएंगे”। जबकि हिंदू परंपरा में किसी के द्वारा कोई पाप करना या अनुचित कर्म करना ही अधर्म है। प्रत्येक हिन्दू यह जानता है। मिथिलांचल के गंगातटीय क्षेत्र में लोकोक्ति है, “बाभन बढ़े नेम से, मुसलमान बढ़े कुनेम से”। इसे जिस अर्थ में भी समझें पर अंततः यह धर्म और मजहब (रिलीजन) की पूरी विचार-दृष्टि के विपरीत होने का संकेत है। इस में कोई दुराग्रह नहीं है, वरन सामान्य हिन्दू का सदियों का अवलोकन है। ध्यान से देखें तो औलिया की बात और यह लोकोक्ति एक दूसरे की पुष्टि ही करती हैं। विडंबना यह है कि शिक्षित हिन्दू इस तथ्य से उतने अवगत नहीं हैं। वह नहीं जानते कि रिलीजन और धर्म का बुनियादी भेद मात्र आध्यात्मिक ही नहीं, अपनी सामाजिक, वैचारिक, नैतिक, राजनीतिक निष्पत्तियों में भी बहुत दूर तक जाता है।

यद्यपि धुँधले रूप में अपने अंतःकरण में कई हिन्दू इस तत्व को न्यूनाधिक महसूस करते हैं। अपने को सेक्यूलर, आधुनिक, वामपंथी कहने वाले हिन्दू भी। किंतु इस सच्चाई को खुलकर कहने, विचार-विमर्श में लाने में संकोच करते हैं। मुख्यतः राजनीतिक-विचारधारात्मक कारणों से। इसीलिए वह प्रायः ऐसी स्थिति में फँस जाते हैं जिस से साम्राज्यवादी विचारधाराएं उन्हें अपने ही शब्दों से बाँध कर शिकार बना लेती हैं। तब उदारवादी हिन्दू छटपटाता है, किंतु देर हो चुकी होती है।
यह मात्र निजी स्थितियों में ही नहीं, सामाजिक राजनीतिक मामलों में भी होता है। हिन्दू उदारता का प्रयोग उसी के विरुद्ध किया जाता है। उसकी दुर्गति इसलिए होती है कि हिन्दू शिक्षित वर्ग, विशेषकर इस का उच्चवर्ग अपनी परिकल्पनाओं को दूसरों पर भी लागू मान लेता है। वह रटता है कि सभी धर्म एक समान हैंय किंतु कभी जाँचने-परखने का यत्न नहीं करता कि क्या दूसरे धर्मावलंबी, उन की मजहबी किताबें, उनके मजहबी नेता, निर्णयकर्ता भी यह मानते हैं? यदि नहीं, तो ऐसा कहकर वह अपने आपको निहत्था क्यों कर रहा है?
ऐसे प्रश्नों पर समुचित विचार करने में एक बहुत बड़ी बाधा सेक्यूलरवाद है। इसका प्रभाव इतना है कि इस झूठे देवता को पूजने में कई हिंदूवादी भी लगे हुए हैं। यह किसी विषय को यथातथ्य देखने नहीं देता, चाहे वह इतिहास, दर्शन, राजनीति हो या अन्य समस्याएं। सेक्यूलर समझी जाने वाली अनेक धारणाएं वास्तव में पूर्णतः निराधार हैं। जैसे, यही कि ‘सभी धर्मों में एक जैसी बातें हैं’ या ‘कोई धर्म हिंसा की सीख नहीं देता’। इसे बड़ी सुंदर प्रस्थापना मानकर अंधविश्वास की तरह दशकों से प्रचारित किया गया। मगर क्या किसी ने कभी आकलन किया कि इस से लाभ हुआ है या हानि? सच्चाई से विचार करें तो विश्वविजय की नीति रखने वाले, संगठित धर्मांतरणकारी सामी (ैमउपजपब) मजहबों को सनातन हिंदू धर्म के बराबर कह कर भारत को पिछले सौ साल से निरंतर विखंडन के लिए खुला छोड़ दिया गया है।
कानून के समक्ष और सामाजिक व्यवहार में विभिन्न धर्मावलंबियों की समानता एक बात है। किंतु विचार-दर्शन के क्षेत्र में ईसाइयत, इस्लाम, हिंदुत्व आदि को समान बताना खतरे से खाली नहीं। इस से अनजाने ही भारतीय ईसाइयों को अपने देश की संस्कृति, नियम, कानून आदि की उपेक्षा कर, यहाँ तक कि घात करके भी, दूर देश के पोप के आदेशों पर चलने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसी तरह, भारतीय मुसलमानों को भी दुनिया पर इस्लामी राज का सपना देखने वाले इस्लामियों के हवाले कर दिया जाता है। केवल समय और परिस्थिति की बात रहती है कि कब कोई प्रभावशाली मौलाना दुनिया के मुसलमानों का आह्वान करता है, जिस में भारतीय मुस्लिम भी स्वतः संबोधित होंगे।

यदि सभी धर्मों में एक ही बातें हैं, तो जब कोई आलिम (अयातुल्ला, इमाम, मुफ्ती आदि) ऐसी अपील करे, जो मुसलमानों को हिंसक या देश-द्रोही काम के लिए प्रेरित करता हो दृ तब आप क्या कहकर अपने दीनी मुसलमान को उसका आदेश मानने से रोकेंगे? क्या यह कहकर कि अलाँ मौलाना या फलाँ अयातुल्ला सच्चा मुसलमान नहीं है? यह कौन मानेगा, और क्यों मानेगा? जब इस मौलाना या उस अयातुल्ला को इस्लाम का अधिकारी टीकाकार, निर्देशक, प्रवक्ता माना जाता रहा तो उसी के किसी आह्वान विशेष को यकायक गैर-इस्लामी कहना कितना प्रभावी होगा, इस पर ठंढे दिमाग से सोचना चाहिए।
अतः सच यह है कि सभी धर्मों में ‘समान’ नीति-दर्शन बिलकुल नहीं है। इस पर बल देना जरूरी है। पूरी मानवता को आदर का अधिकारी कहते हुए यथोचित उल्लेख करना ही होगा कि कौन मजहब किस विंदु पर, विवेक और मानवीयता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। तभी संभव होगा कि किसी कार्डिनल, मौलाना या रब्बी को (ईसाइयत, इस्लाम, यहूदी आदि) विशेष धर्म-दर्शन का विद्वान मान कर भी उस के अनुयायी उस के सभी आह्वान मानना आवश्यक न समझें। बल्कि अनुचित बातों का खुला विरोध करें। तभी विवेकशील मुसलमान विश्व-इस्लाम के नाम पर देशद्रोह, काफिरों की हत्या, उन्हें धर्मांतरित करने, जैसे आदेशों को खारिज करेंगे। किंतु यह तब होगा जब वे इस भ्रम से मुक्त हों कि इस्लाम ही एक मात्र सच्चा मजहब है। उन्हें यह समझाना ही होगा कि चाहे वह मुसलमान हैं, किंतु पूरी दुनिया को इस्लामी बनाने की बात में अन्य धर्मावलंबियों के प्रति हिकारत व हिंसा है, जो विवेक-विरुद्ध और मानवता की दृष्टि से अनुचित है। यदि यह कहने से हिंदू भाई कतराते हैं, तो निश्चय ही वह अपने और अपनी संततियों को भी मुसीबत में फँसा रहे हैं।

जब इस्लाम के आदेशों में मानवीय विवेक की दृष्टि से, किसी जड़सूत्र से नहीं, उचित और अनुचित तत्वों के प्रति मुसलमानों को चेतनशील बनाया जाएगा, तभी वे किसी मौलाना की बात को अपनी विवेक-बुद्धि पर कसकर मानने या छोड़ने की सार्वजनिक नीति बनाएंगे। इस आवश्यक वैचारिक संघर्ष से कतराने से केवल यह होगा कि मुस्लिम आबादी स्थाई रूप से देशी-विदेशी उलेमा की बंधक रहेगी। जब चाहे कोई कट्टरपंथी मौलाना मुसलमानों को यहाँ-वहाँ हिंसक कार्रवाई के लिए भड़काएगा। तब मुसलमानों के पास उस की बात को सक्रियध्निष्क्रिय रूप से मानने, अन्यथा खुद को दोषी समझने के बीच कोई विकल्प नहीं रहता। इस से अंतर नहीं पड़ता कि कितने मुसलमान वैसा आह्वान मानते हैं। किसी समाज, यहाँ तक कि पूरी दुनिया पर कहर बरपाने के लिए मुट्ठी भर अंधविश्वासी काफी हैं। न्यूयॉर्क या गोधरा का उदाहरण सामने है। वैसे आह्वान में भाग न लेने वाले मुसलमान भी दुविधा में रहेंगे। अंततः परिणाम वही होगा, जो 1947 में हुआ था। मुट्ठीभर इस्लामपंथी पूरे समुदाय को जैसे न तैसे अपने पीछे खींच ले जाएंगे। यह दुनिया भर का अनुभव है। सदाशयी मुसलमान कट्टर इस्लामी नेताओं की काट करने में सदैव अक्षम रहते हैं।

इसलिए भी जब तक ‘सभी धर्मों में एक ही चीज है’ का झूठा प्रचार रहेगा और मुस्लिम आबादी उलेमा के खाते में मानी जाएगी, सभी मुसलमान नैतिक रूप से उलेमा की बात मानना ठीक समझेंगे। न मानने पर धर्मसंकट महसूस करेंगे। उन के लिए यह संकट सुसुप्त अवस्था में सदैव रहेगा। केवल समय की बात होगी कि कब वह इसमें फंसते हैं।

यदि आप किसी मौलाना को नीति-विचार-दर्शन का उतना ही अधिकारी प्रवक्ता मानते हों, जितना हिंदू शास्त्रों का कोई पंडित, तब उस मौलाना के आह्वानों से अपने मुस्लिमों को आप जब चाहे नहीं बचा सकते। इस के लिए निरंतर, अनम्य वैचारिक संघर्ष जरूरी है, जिस में इस्लाम की कमियाँ दिखाने में संकोच नहीं करना होगा। इस पर बल देना होगा कि मुसलमान जनता और इस्लाम एक चीज नहीं। कहना होगा कि विचार-विमर्श में इस्लाम समेत किसी भी विचारधारा या सिद्धांत की समुचित आलोचना करने का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को है। इस पर नहीं डटने के कारण ही (सेक्यूलरिज्म के नाम पर) भारत को इस्लामी और चर्च-मिशनरी आक्रामकों के लिए खुला छोड़ दिया गया है।
इसीलिए विदेशी इस्लामी उलेमाध् आक्रांता भी भारतीय मुसलमानों को अपनी थाती समझते हैं। जब भी ऐसे लोग कोई हिंसक आह्वान करते हैं, जो वे करते ही रहते हैं, हम अपने ही फूहड़ सेक्यूलर तर्क के अधीन बेबस होकर रह जाते हैं। क्योंकि हमने सेक्यूलरिज्म के प्रभाव में इस्लामी विचारधारा की कुछ भी आलोचना को गलत मान लिया है। मानो इस्लामी विचार और राजनीति के बारे में विचारने या भूल दिखाने का दूसरे को अधिकार नहीं। यह अनुचित और आत्मघाती दृष्टि है।

एक ओर उलेमा पूरी दुनिया की एक-एक चीज का ‘इस्लामी’ मूल्यांकन ही नहीं रखते, उसे उसी तरह चलाने के लिए दबाव डालते रहते हैं। यूरोपीय देशों में भी जहाँ मुट्ठीभर मुसलमान हैं, वह भी अरब, अफ्रीका, एशिया से गए प्रवासी, वहाँ भी इस्लाम के मुताबिक यह करने, वह न करने की माँग अधिकारपूर्वक की जाती है। जबकि इस्लामी देशों में अन्य धर्मावलंबी की कौन कहे, उलेमा के सिवा आम मुसलमान को भी रीति-नीति में किसी परिवर्तन की बात करने का अधिकार नहीं। क्या यह साम्राज्यवादी, तानाशाही नजरिया सभी धर्मों में है?

(लेखक की पुस्तक ‘धर्म बनाम मजहब’ से साभार)