भारत में राजनीति, समाज और आरक्षण का घालमेल सबसे ज्यादा तनावकारी और विघटनकारी रहा है. समाज को कई हिस्सों में बांट कर राज करने की परंपरा अंग्रेजों ने डाली थी किंतु उन्होंने भी ये कल्पना नहीं की होगी कि आजाद भारत का ‘नेतृत्व’ उनके तौर-तरीकों को अपने ही नागरिकों पर इस्तेमाल करेगा. दुर्भाग्य से सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के नाम पर दलितों-पिछड़ों का राजनीतिक प्रयोग तो चलता ही रहा है किंतु भारतीय संविधान का खुल्लम-खुल्ला मखौल उड़ाते हुए धर्म आधारित आरक्षण की बात भी की जाने लगी है.

उत्तर प्रदेश सहित आने वाले समय में कुछ और राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचन व केंद्र में वर्ष 2014 में होने वाले संसदीय चुनाओं को दृष्टिगत रखते हुए, अपनी बाजी मजबूत करने की कोशिश के तहत, कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार जल्द ही मुस्लिम आरक्षण पर कुछ विशेष कदम उठाने की इच्छा जता रही है. केंद्र तमिलनाडु, आंध्र, केरल, कर्नाटक आदि राज्यों में मुस्लिम आरक्षण के फार्मूलों को आधार बना कर इस मसले को तय कर सकता है. इन राज्यों में ओबीसी के कोटे में से मुस्लिमों को आरक्षण दिया गया है. तमिलनाडु ने ओबीसी के कोटे में से 3.5 फीसदी आरक्षण दिया है और आंध्रप्रदेश ने चार फीसदी. कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए वामपंथी सरकार ने ओबीसी कोटे में से मुसलमानों को 10 फीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया था. वहीं वर्ष 2009 के अंत में केन्द्र सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की थी जिसमें अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का सुझाव दिया गया था. उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सच्चर समिति की रिपोर्ट को भी मुस्लिम आरक्षण से जोड़ा गया था.

भारत में आरक्षण और वोट की राजनीति शुरू से ही गुत्थम-गुत्था रही है. योग्यता के आधार की अनदेखी कर अयोग्य को प्रोत्साहन की नीति के तहत तमाम विवादास्पद निर्णय लिए गए जिससे देश की सामाजिक समरसता में भारी कमी आयी. कमजोरों और दलित-दमित, वंचित वर्गों के उत्थान की नीति की तहत एकबारगी इसे स्वीकार भी कर लिया जाए किंतु धर्म के आधार पर भेदभाव और आरक्षण की नीति की क्या स्वीकार्यता हो सकती है?

भारतीय संविधान धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को खारिज करता है. हालांकि संविधान में मुख्य धारा से पिछड़े लोगों को आगे लाने के लिए कुछ विशेष प्रावधान के उल्लेख हैं जिनके आधार पर राज्य आरक्षण की व्यवस्था समय-समय पर करता रहा है. उच्चतम न्यायालय ने भी इसकी आवश्यकता को स्वीकार किया है साथ ही उसने आरक्षण पर कुछ विशिष्ट दिशा-निर्देश भी दिए हैं. किंतु धर्म के आधार पर आरक्षण के किसी औचित्य को कोई भी मान्य नहीं कर सका. ऐसे में राजनीतिक दलों व सत्तासीन सरकारों द्वारा धार्मिक आधार पर आरक्षण का चारा फेंके जाने की बात को किस सीमा तक युक्तियुक्त ठहराया जा सकता है?

उपरोक्त के आधार पर तमाम ऐसे संशय और सवालों के बादल जेहन में उमड़ते हैं जिनका समाधान तलाशा जाना राष्ट्र हित में अत्यावश्यक है, यथा:

1. क्या धर्म के आधार पर आरक्षण भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि के अनुकूल होगा?

2. आरक्षण के लिए धर्म को आधार बनाना सांप्रदायिक समरसता और राष्ट्र की एकता-अखंडता के लिए किस सीमा तक वहनीय है?

3. सरकारी नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण की किसी भी परिपाटी को बढ़ाना विकसित भारत की छवि को किस तरह खंडित करता है?

4. क्या भारत में किसी भी प्रकार का आरक्षण कायम रखना योग्यता के मूलभूत सिद्धांत का उल्लंघन है?

5. आरक्षण राजनीतिक लाभ है या सामाजिक आवश्यकता?

जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से राष्ट्रहित और व्यापक जनहित के इसी मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है. इस बार का मुद्दा है:

मुस्लिमों को आरक्षण बनाम वोट की राजनीति !!

आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जारी कर सकते हैं.

नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें. उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “आरक्षण की राजनीति” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व आरक्षण की राजनीति – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें.

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गयी है. आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं.

धन्यवाद

By : जागरण जंक्शन परिवार