विश्व के सभी धर्मों में कविओं को आदर से देखा जाता है .ऐसे कई कवि हुए हैं कि जिनकी रचनाये लोग धर्म ग्रन्थ की तरह मानते हैं.विश्व में जो प्रख्यात कवि हैं उनके नाम से उस देश की पहचान होती है .और लोग उन कविओं पर गर्व करते हैं

लेकिन इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जो कविता या शायरी को हराम बताता है .कुरआन में शायरी करना गुनाह और हराम है .कुछ लोगों को ऐसा लगता होगा कि अल्लाह को और कोई काम नहीं है ,कि जब चाहे किसी भी चीज को कुरआन में हलाल या हराम घोषित करता रहता है .लेकिन ऎसी बात नहीं है .कुरआन के हरेक आदेश के पीछे मुहम्मद के जीवन की कोई न कोई घटना होती है .अगर हम कुरआन के साथ आयातों की तफसीरें भी पढ़ें तो पता चल जाएगा कि किसी चीज को हराम या हलाल करने के असली कारण क्या है .और इसके पीछे कौन सी घटना थी .कुरआन में शायरी को हराम करने के पीछे दो घटनाएं है .इनसे असली बात साफ़ हो जायेगी .यह घटनाएँ इस प्रकार हैं –

१-पहली घटना

मुहम्मद के दरबार में दो शायर भी थे .जिन्हें सहाबा भी कहा जाता था.१–हस्सान बिन साबित २-मिस्तह बिन उसासा .यह सब मुहम्मद के साथी या सहाबी थे यह अबू बकर के रिश्तेदार भी थे .गरीब होने के कारण अबू बकर इनकी मदद भी करते थे .एक दी यह लोग अबू बकर के घर में बैठे थे ,तभी मुहम्मद वहां आये और एक शेर पढ़ा “कफा बिल इस्लाम वल शैब लिल मर अना हया “यानी आदमी को बदी से रोकने के लिए यातो इस्लाम काफी है ,या जईफी .

इस पर अबू बकर ने कहा ,या नबी आप गलत कह रहे हैं ,आपको इस तरह कहना चाहिए .”कफा श्शैब वल इस्लाम लिल मर अना हया ”

हस्सान बिन साबित से रवायत है कि नबी फिर भी गलत बोलते रहे.तब अबू बके ने कहा कि मैं गवाही देता हूँ ,कि न तो आपको शेर का इल्म है ,और न शेर कहना आपके बूते की बात है .

इस पर मुहम्मद ने कहा कि अल्लाह ने मुझे शायरी करना नहीं सिखाया है .

कुरआन सूरे -या सीन ३३:६९

इसी तरह हजरत अकरमा से रवायत है .वह कहते है कि मैंने आयशा से पूछा कि क्या आपने रसूल की जुबान पर कोई शेर पढ़ते सुना है तो वह बोली कि जब रसूल घर में दाखिल होते है तो यह शेर उनकी जुबान पर होता है “व् या तीक बिल अखबार मिन्लम यरद्दद “यानी तेरे पास वह आदमी खबर लाएगा ,जिसे तू कभी रद्द नहीं करेगा .इब्ने साद .बुखारी

इस से पता चलता है कि मुहम्मद शायरी जानते थे ,लेकिन पूरी तरह से शायरी का ज्ञान नहीं था .

२- दूसरी घटना

एक बार मुहम्मद अपने काफिले के साथ मदीने की तरफ लौट रहे थे .साथ में उनकी पत्नी आयेशा भी थी ,जो ऊंट के हौदे पर थी .रास्ते में अल बैदा नामकी वादी में काफिला आराम के लिए रुका तो ,उहम्मद की पत्नी आयशा गायब हो गयी ,और उसका एक दिन और एक रात तक कोई पता नहीं चल सका .सवेरे वह सफ़वान इब्ने अल मुत्तल के साथ पायी गयी .आयेशा ने कहा के मेरा कीमती हार खो गया था.मैं उसी को खोज रही थी.लोग समझ गयेथे कि आयेशा ने सफ़वान के साथ व्यभिचार किया था,उस समय मुहम्मद की साली हमना बिन्त जहाश भी थी.यह बात उसने सारे लोगों को बता दी..उस काफिले में कई सहाबा थे जो शायर भी थे.जैसे मितासः बिन उसासा,अब्दुल्लाह बिन अबी ,और हिस्सान बिन साबित .साबित ने तो इस घटना पर एक नज़्म भी बना दी .और जगह जगह पर लोगों को सुनाने लगा..आयेशा की पूरे मदीने में बदनामी हो गयी

इसलामी कानून के अनुसार आयशा को सफाई के लिए चार गवाह पेश करना चाहिय्र थे या अस्सी कोड़े की सजा दी जानी थी.लेकिन मुहम्मद ने न तो गवाही मांगे और न सजा दी .बल्कि कुरआन की एक आयत सुना कर सब कु चुप कर दिया और आयेशा को निर्दोष घोषित करदिया

कुरआन सूरा नूर २४;४,११

इस तरह मुहम्मद ने अपनी पत्नी को तो बचा लिया ,चूंकि शायरों ने शायरी बनाकर आयशा को बदनाम किया था.मुहम्मद शायरों के खिलाफ हो गया.और कुरआन में शायरों के बारे में लिख दिया

“शायर जाल रचाने वाले होते है .और चुगली पर कान लगाए रखते है,अधिकतर झूठ बोलतेहैं,इनके पीछे बहके हुए लोग चलते हैं ,यह लोग शहर की गलिओं में भटकते रहते है.यह जो कहते हैं वह सब करते नहीं है .”

कुरआन सूरा अश शु अरा-२६:२२१ से २२६ तक

मुहम्मद ने यह भी कहा कि शायर शैतान के वश में रहते है.

इस तरह कुरआन में शायरी हराम कर दी गई .